परजा - गोपीनाथ महान्ती Parja - Hindi book by - Gopinath Mohanti
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परजा

गोपीनाथ महान्ती

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :303
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5278
आईएसबीएन :978-81-263-1359

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एक उड़िया उपन्यास...

Paraja

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अनुवादक की ओर से

गोपीनाथ महन्ती का नाम भारतीय साहित्य में महाकाव्यात्मक उपन्यासकार के रूप में अग्रणी है। उनको गैर-ओड़ियाभाषी पाठकों ने ‘अमृत सन्तान’, ‘माटीमटाल’ और दानापाणी’ के अनुवादों के जरिये ही विशेष जाना है। परन्तु अँग्रेजी भाषा का पाठक ‘परजा’ के अनुवाद से मुग्ध हुआ है। गोपीनाथ शरीर से अधिक आत्मा के कलाकार हैं, स्थिति से अधिक परिवेश के जीवन्त सहभोक्ता हैं। गोपीनाथ की दृष्टि केवल मनुष्य की आत्मा तक सीमित नहीं रहती। उन्हें प्रकृति का कण-कण संवेदनशील लगता है। जगदीशचंद्र बसु ने केवल यन्त्रों से स्पन्दन माना था। गोपीनाथ तो पर्वत, मेघ, झरना, नदी-नाले, महाद्रुम से लेकर दूब और घास,, सागर से ओर-बिन्दु तक सब में उनकी गतिशील सत्ता, संवेदनशील प्राण-निधि का अनुभव करते हैं। इस विराट सत्ता में मानव का एक छोटा-सा अंश है। उससे भिन्न नहीं और न ही स्वतन्त्र। गोपीनाथ की इस दृष्टि से रूबरू हुए बिना ‘परजा’ ही नहीं, ‘माटीमटाल’ अथवा’ ‘अमृत सन्तान’ आदि प्रकृतिनिष्ठ कृतियों का भी अमृतपान नहीं किया जा सकता।

यह अनुभव का एक पल या एक घटना से सम्भव नहीं। यह एक प्रक्रिया है जो निरन्तर जारी है ! इसमें तितली और चींटी से लेकर हिरन, साँभर और महाबली बाघ-शेर-बघेरा सब शामिल हैं। गोपीनाथ ने जीवन को इसी प्रकार अखंड रूप में देखा है इस सब के बीच में रहते प्राणों का अनुभव पाया है।

 वह अनुभव इन पन्नों में स्पन्दित होता मिल जाता है। हिन्दी में राजा-महाराजाओं और पुराणपुरुषों को साहित्य के नायक-नायिका की मर्यादा सदियों से दी जाती रही है। प्रेमचन्द ने पहली बार किसान ‘होरी’ को नायक बनाया—सामान्य एक मानव मूरत को सिंहासनासीन किया। वह ग्राम जीवन की उपज है। कृषक जीवन के बीच सुख-दुःख भोगकर कुछ मूल्यों को लिये देदीप्यमान है, उनके लिए मरकर भी वह अमर है। उसी प्रकार का प्रयास फकीर मोहन में हुआ है, वे खूब सफल रहे। ‘छह बीघा ज़मीन’ (छ माण आठ गुंठ) ऐसी एक मानव की जीवन महागाथा है। पर जीवन की खोज यहीं नहीं रुकती। गोपीनाथ गाँवों से और आगे बढ़ते हैं—वन, जंगल, अगम्य पर्वत और पर्वतमालाओं, कन्दराओं को लांघ मानवी सत्ता का सन्धान करते हैं। यह जीवन भी नगर जीवन की तरह सुख-दुःख, प्रेम-विरह, उतार-चढ़ाव से परिपूर्ण है। परन्तु इसकी निरीहता, इसकी प्रतिबद्धता और इसका अकृत्रिम आचरण आज भी हमारे सारे ह्रास-पतन और विघटन के बीच हमें गहरे तक अभीभूत कर देता है। गोपीनाथ का ‘परजा’ मानवीय करुणा, पीड़ा, उत्थान-पतन और मूल्यों से जुड़े रहने से उपजी वेदना का एकदम अनूठा कथानक है। इन भाषा रहित मानव नामधारी प्राणियों में और शेर, हिरण, खरगोश, अजगर, साँप-बिच्छू के बीच बहती जीवन धारा में कोई अन्तर नहीं मिलता। गोपीनाथ की भाषा इस पूरे दृश्यपटल को समेटने में पूर्णतः समर्थ है।

पर अनुवादकीय क्षमता का यही सबसे दुर्बल पक्ष है। वन-पर्वत प्रदेश के किसी प्राणी, पौधे अथवा जीव-जन्तु का पर्याय पाना जितना दुरूह, उनके भाव—अनुभव व्यवहार शैली का समतुल्य भाषा प्रयोग भी तदनुरूप दुरूह है। यहाँ हमारे प्रचलित मानदंडों का उसी स्तर पर वनवासी जीवन में मूल्य नहीं मिलता। इनकी आवश्यकताएँ, इनकी पसन्द-नापसन्द, प्रेम-घृणा के पात्र, लाज-शरम और चाहत—व्यक्त करने के अवसर हमारे-आपके मानदंडों से भिन्न हैं। सम्बोधन में इनके यहाँ ‘आप’ जैसी कोई स्थिति नहीं है। हालाँकि ओड़िया भाषा में ‘तू’, ‘तुम’ और ‘आप’ तीनों प्रयोग हैं। परन्तु परजा के यहाँ ‘तू’ या ‘तुम’ ही कार्य स्वीकार्य है। इनके मूल्यबोध में गाँव में कोई गरीब नहीं होता। अभाव सबके यहाँ लगा रहता है। पर अपने को तदनरूप ढालने को जीवन का सहज रूप मानकर वे सब प्रायः एक समान आर्थिक स्थिति में रहते हैं। मगर कोई स्वयं को गरीब नहीं कहता। उनमें अभावों से संघर्ष की अकूत क्षमता और साहस है। वे खुद को असहाय नहीं समझते। अभाव होने पर एक-दूसरे की मदद कर उसे बिना अहसास के उबार लेते हैं।
पर नदी सभ्यता के प्रवेश ने समूची दृष्टि ही बदल डाली। रुपये का मूल्य जीवन के मूल्यों से अधिक होने के बाद विनिमय में उनकी सारी चेतना बिक जाती है। यह नयी भावना उन्हें न परजा रहने देती है और न आधुनिकता-सम्पन्न नागरिक। कहीं वह अपने को फिट नहीं कर पाता। तभी तो नये नियम-कानून उसे अजीब जाल की तरह फाँस लेते हैं—उनकी जीवनधारा इन दाँवपेचों में फिसलकर धराशायी हो जाती है।

गोपीनाथ ने साठ साल पहले जो ढलान देखी थी, आज उसका रूप अनुवाद में सही-सही आकार ले नहीं पाता। आज की भाषा में शोषण और उत्पीड़न के ये बहुत हलके, ढीले और कम चुभने वाले लगेंगे। मगर परजा की उस मानसिकता की कल्पना करें जब आदमी मशीन का दास नहीं हुआ था। कुछ परम्परागत धारणाएँ जीवन्त थीं। अतः अनुवाद के समय भाषागत अनगढ़ता अधूरापन, शब्दों का कच्चापन अथवा व्याकरणिक शिथिलता मूल के अनुसरण पर, वह वातावरण और मानसिकता व्यक्त करने के हेतु बनायी रखनी पड़ी है। गोपीनाथ ने इस उपन्यास में परजा प्राणों में गूँजते गीतों की स्वरलिपि दी है, अर्थ सहित उसे यथावत् रखा गया है ताकि ध्वनिगुण से पाठक परिचित हो सके, वरना परजा जीवन की संगीतात्मकता खड़ी बोली में तो झुलस जाएगी।

काव्यात्मकता से दूर जाकर तो यह कथानक कुछ भी सम्प्रेषण नहीं कर सकेगा। गोपीनाथ ने बड़ी विनम्रता से इसमें अध्याय जोड़कर वर्गीकरण को अस्वीकार किया था। स्थिति बदलने के साथ अध्याय बदल सकते हैं। परन्तु गोपीनाथ ने पूरी कृति को एक लम्बी कविता के रूप में रचा है। ऐसी अखंडता में वर्गीकरण कर उसके सौन्दर्य अथवा समझने की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं ला सकते। पहाड़ी झोले (झरने) की तरह कथानक अबाध बहता गया। जहाँ दृश्यपटल बदला है वहाँ कुछ स्थान खाली छोड़ा है, मानो झोला दिशा बदलते समय कल-कल स्वर धीमा कर आगे बढ़ जाता है। गोपीनाथ का कथानक किसी नाटकीयता का मोहताज नहीं। यह जीवन स्वयं एक नाटक है। हर पल पट-परिवर्तन हो रहा है यहाँ पर। चाहे कोई भी मौसम हो, गोपीनाथ ने उस परिवर्तन के सूक्ष्म तत्वों को प्रकृति के कण-कण में अनुभव किया है।

मानो ‘परजा’ में नायकत्व मानव और प्रकृति दोनों के समभाव से प्रदान किया गया है। यहाँ गोपीनाथ का दृष्टिकोण अत्यन्त सन्तुलित है—कोई राजनीतिक झुकाव किये बिना वे बोलते जाते हैं। गोपीनाथ का यह समभाव ही पाठक को अभिभूत कर देता है। प्रकृति के हर मोड़ पर पाठक उससे अभिभूत हो जाता है। इसी में कथानक का ऐक्य दूर कहीं पीछे रह जाता है।

इसमें असम्पृक्त कोई रह सके, अन्य विषयगत सम्पृक्तता नहीं है। अनुवादक को ऐसी निस्पृहता जान-बूझकर अपने वेश में, विचार में अपनानी है। इस अनुवाद में टकसाली हिन्दी का अभाव कई अर्थों में जरूरी लगा। इसका मूल और सन्दर्भ, सब तो अनगढ़ हैं। यह भाषा पहली बार साहित्य में (परजा जीवनगाथा से लेकर) आ रही है, अतः अनुवाद में समताल पर ऐसा करना सार्थक है। हिन्दी पाठक देश के हर क्षेत्र—कश्मीर से कन्याकुमारी तक के जीवन में डूबा है। अब परजा के जीवन—रस का आनन्द भी उसके लिए उपलब्ध हो रहा है। यही सन्तोष की बात है। एक प्रकार से गोपीनाथ महान्ती को इससे बड़ी श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है। यह कृति उनको बहुत प्रिय थी। क्योंकि वे अपने जीवनकाल में परजा प्राणों, प्रकृति और परिवेश से अभिन्न हो गये थे। इस कृति के अनुवाद से वह महक कहाँ तक पहुँच पाती है, हिन्दी पाठक जान सकेंगे, अतः यह कृति उन्हें ही समर्पित है।

शंकर लाल पुरोहित

परजा

कोरापुट से लक्ष्मीपुर के रास्ते में लक्ष्मीपुर से कुल डेढ़ कोस पर जो भयंकर ‘धर्मदुवार’ घाटी पड़ती है—इधर से चालीस, उधर से पचास पहाड़ धक्का-मुक्की कर आमने-सामने हो जाते हैं—उस धर्मदुवार घाटी से उत्तर में कोस भर पर छोटा—सा गाँव है—‘सरसुपदर’। पहाड़ की ढलान पर ठीक कमरे के पास में।

पास-पास तीन जात वालों की बस्ती, तीन झोपड़ियों का झुण्ड-डोम साही, गदबा साही, परजा साही। कतार में घर। ‘टणिअ’ जाली की बाड़ में हरे-हरे मकई के खेत। मिरच, तम्बाखू के खेत। इसके अलावा माँडिया, अलसी, एरंड, कान्दूल आदि...!

सिर्फ बाइस घर की बस्ती है। इस गाँव की परजा भक्ति का शुक्रू जानी छोटी-सी दुनिया लिये मजे में जी रहा है। माँडिया का माँड़ सुबह-शाम कभी कम नहीं पड़ता, कमर में चार अँगुल वाली कौपीन का कभी अभाव नहीं होता। सुख-दुःख में गुजर कर लेता है।
तीन साल पहले उसकी घरवाली सोंबारी ‘भालुगाड़’ झरने पर सुबह-सुबह साग-पत्ती तोड़ रही थी, फिर कभी वापस नहीं लौटी। ‘कोरापुटिया बूटा’ के झुरमुटों से नरभक्षी बाघ घसीट ले गया। अब उसके परिवार के नाम पर शुक्रू जानी स्वयं, बड़ा बेटा माँडिया जानी, छोटा बेटा टिकरा जानी, दो बेटियाँ : जिली और बिली।

साँझ का समय। नीची छानवाली छोटी झोंपड़ी के बरामदे में आग दपदपा रही है। जिली या बिली एक हाँडी में माँडिया का आटा या साग की पत्तियाँ या पिसी हुई आम की गुठली डालकर चूल्हे पर चढ़ा पाँव पसारे बैठी रहती है। एक तरफ चिकने बालों में जू़ड़े बना उसमें लाल फूल लगाये रहती। दोनों भाई माँडिया और टिकरा जानी पहाड़ खोद-खोद कन्धे पर कुल्हाड़ी और हाथ में कुदाल लिये हारे-थके आकर बरामदे में बैठ जाते। शुक्रू जानी तम्बाखू के पत्ते को बल देकर पिक्का बनाता और फिर कश लेता रहता। इससे उसका मन एक सहारा-सा पा जाता। उसके चारों बच्चे जवान हैं। उसकी झोंपड़ी के चारों ओर पहाड़-जंगल और माथे पर इतना बड़ा आकाश, इतना बड़ा विस्तार....इसमें खुद को पाकर समझ लेता है कि वह इसमें रहता है।

एकमात्र कोठरी—वहाँ अँधेरा कुलबुलाता रहता। झोंपड़ी के एक कोने में ढेर—ढेर आम की गुठली, तेल निकालने के लिए एरंड के बीज तथा आठ-दस पसेरी माँडिया और तीन चार हाँडी। इधर-उधर छान से झूल रही दो-चार कौपीनी, साड़ी, चार-पाँच लौकी के तुम्बे, जिनमें माँडिया की खीर भरकर काम करने जाते समय अपने साथ ले जाते हैं। दीवार बाड़ पर पत्तों से बना ‘तलरा’, पीठ पीछे के लिए तलरी या सिर पर छाता।

बस, इसे लेकर उसकी गिरस्ती, सारा कूड़ा-करकट, मगर यह कूड़ा उसे भला लगता है। छान तले कान-नाक रोंधता घना-घना धुआँ उसे भला लगता है, क्योंकि सब उसका है, इसलिए।
साँझ के समय लहरीली पूर्वी घाट पर्वतमाला पर बिछे, जाने कितने रंग, माथे पर अबीर, बगल में हलदी का चूरा, तलहटी के गहरे जंगल में सागर का नीला—स्याह रंग। शुक्रू जानी का विश्वास है, सबका कर्ता है—एक भूत या ‘डूमा’। मन चैन से सोचता, किसी जादूगर ‘डूमा’ ने गढ़ा है—आकाश, जंगल, साँझ और रात। जो डूमा लाता है सौभाग्य, आनन्द, वही आँधी-तूफान भी लाता है।
इस ओर के पहाड़ के माथे से नीचे तक सिर्फ सीढ़ीदार खेती। पहाड़ के नीचे बह गया है भीम की हलकी रेखा अथवा झरना, पहाड़ी नदी। उसके उस ओर ढूह तले की धरती, नम जमीन, उसमें धान होता है। वह फिर गोल होकर ढँकी रहे, नीचे से ऊपर तक छोटे-बड़े कितने ही पहाड़ खड़े हैं, घने वन वाले बूढ़े पर्वत पर।

शुक्रू जानी दृश्य देखता है और देखता है सामने उस पहाड़ी को, जिसके माथे को उसने लोबो कन्ध के साथ मिलकर घोर बरसा में कुल्हाड़ी से काटकर नंगा किया, अब वहाँ उसकी खेती की जमीन है। और वह देखता है कि अपने भविष्य में किसी उपकारी डूमा का हाथ लगकर सब सुन्दर हो गया, कितने घर बन गये, माँडिया, टिकरा ब्याह कर चुके हैं—बेटे, पोते, पोते के बेटे, उसके बेटे...दो कोड़ी—तीन कोड़ी, गाय-गोरू, घर के आगे बड़ा गुहाल, गोबर की खाद...!
और चारों तरफ से सारे छोटे-बड़े पहाड़, वहाँ के जंगल साफ कर खेत-खेत...खेत, बेटे-पोते, दोहते आदि के।

सोच-सोच मानो शुक्रू जानी बूढ़ा हो गया। गाँव के बीच आम के पेड़ तले, जहाँ आदमी के मरने पर उसके नाम पर पैना पत्थर गाड़ा जाता है, मानो उसी से कोई बड़े-पैने पत्थर से शुक्रू जानी की आत्मा डूमा बनकर भविष्य के बेटे-पोतों के सौभाग्य को टिमटिमा कर ताकती रहे।
रात घिर आती है।
शुक्रू जानी बाहुबल को पहचानता है, किसी और को नहीं। उस ओर के पहाड़ पर खेती के लिए उसे नंगा करते समय, एक साथ पाँच-छः कुल्हाड़ी थामे लगातार, बिना रुके काम करता रहा। अधिकारी (हाकिम) साहब के दो मन वजन बोझ को काँवड़ बना उठाकर डंगर (वन) झरने को पार कर, अकेले माँकड़ झोला या ककरीनुमा बँगले में पहुँचा आया है। कोस भर जाने का एक पैसा, मोटी-सोटी देह पर उसके पाँव की पिंडलियाँ कड़के पत्थर हैं, चमड़ी उसकी बरसाती है। कायला (बीमार) वह होता नहीं है। आलस आता नहीं, उमर पचास धकिया रही है।

माँडिया जानी ठीक उसी की तरह, जवानी में वह जैसा था, वैसा ही है। कद्दावर देह, चेहरा बच्चों-सा सरल, भूख-प्यास की परवाह नहीं, सिर्फ हँसी और खुशी।
मगर टिकरा—सिर्फ अपनी मरी माँ को कभी कुछ-कुछ याद कर लेता है। वैसी ही डबडबायी आँखें, जल्दी-जल्दी बोलना।
साँझ की आग के पास कुटुम—कबीला बैठता—खूब जमता है, नीचे झरने से पानी का मटका लेकर हिलते-डुलते जिली-बिली आतीं, हँसी-ठिठोली करतीं और नकल उतारतीं, शुक्रू जानी कान से अधजला पिका खींचकर सुलगता है। धुआँ पीते-पीते पी जाता है साँझ की शान्ति, खुले पहाड़ की शान्ति-सब।

उस दिन सुबह पहाड़ी झरने में जिली-बिली दोनों बहनें नहा रही थीं। नाले के मोड़ पर परजा औरतों का घाट है, पहाड़ के पास खुला, उस ओर है झुरमुटेदार जंगल। ऊँची चट्टान पर साफ पानी उछल-उछलकर पछाड़ खा रहा है। लुढ़कता रहा है नीचे की ओर। वन प्रदेश में ऐसे अनगिनत डुडुमा प्रपात हैं। सिर पर बरगद की छाया, ढलान में हरे-भरे माँडिया के खेत, झुरमुटे में पानी पर झुके आ रहे हैं। सँकरी पगडंडी...लाल माटी, साँप-सँपीली राह।
नाले के सूनसान मोड़ पर, जिली-बिली नहा रही हैं। उमर सत्रह और चौदह साल। परजा के नहाने की आदत के मुताबिक दोनों नग्न हैं। जिली सामने मुँह कर अपने पहने ‘पाँचिया’ को चट्टान पर खँगाल रही है। बिली मटके को पास रख घुटनों तक पानी में बैठी है, खट्टे ‘चिली’ फल के झाग माझे पर रगड़ रही थी। बीच-बीच में सिर डुबोकर दोनों हाथों से छपाक-छपाक कर रही थी।
तभी झरने के उस ओर ढूह पर बँहगी लिये माथे का पसीना पोंछ एक जोड़ा परजा चले गये, सीधी आँखें। और एक नीचे की ओर हरड़ चिड़िया खोजने के बहाने कन्धे पर बन्दूक रखे इधर-उधर देख रहा था। वह सभ्य दुनिया का आदमी है, क्योंकि जाँघिया पहने था। हाफ कमीज पहने था। इस अधनंगे देस में। वह ‘अधिकारी’ हाकिम है, क्योंकि वह वन का गार्ड है, जंगल जमान (चपरासी) उसका काम है वन की रखवाली करना, जंगल जमान की इधर कमान (गश्त) पड़ गयी है। ध्यान रखना है कि वहाँ कौन वन काट रहा है, धर-पकड़ करना, गरजन करना। एक पेड़ को ढूँढ़ने के बहाने वह कभी इधर पानी को देख लेता, अचानक नजर पड़ गयी जिली पर। दोनों बहनें हड़बड़ाकर उठ खड़ी हो गयीं। जिली ने धोया कपड़ा लपेटा। बिली अपनी बहन के पीछे ओट में होकर इधर-उधर देख पीछे सरकती गयी। हाथ बढ़ाया बरगद की जटी की ओर, वहाँ उसकी लाल साड़ी हवा में झूल रही थी। हड़बड़ाहट में झरने का पानी छलछला गया। जमान खिलखिलाकर झुरमुट की ओट में चला गया।

जल्दी-जल्दी नहाकर भीगी साड़ी को निचोड़ा और दोनों बहन मटका बगल में दबाये जल्दी-जल्दी चढ़ गयीं। पहाड़ की ढलान में अदृश्य होने तक जंगल जमान देखता रहा। नाक फुलाकर आँखों में आग भरे छाती उठाती-गिरती रही, वह एकटक देखता रहा। सीटी मारता-मारता घुमाव वाली राह से धीरे-धीरे गाँव की ओर चल पड़ा। चिड़िया लौट चुकी थी। स्थिति बिगड़ गयी, कन्धे पर बन्दूक का बोझ भारी लग रहा था।
गाँव में नायक (गाँव का बड़ा) के घर के बरामदे में गहाल की छान बाँधी वहीं जंगल जमान की छावनी है। नायक लगान वसूल करता है, राजा का रिबिणि (रेवेन्यू इन्स्पेक्टर) अमीन को देता है। गाँव की खोज-खबर सरकार को देता है। अतः रैयतों में वह कुछ ऊँचा है, सब में वह आगे वह मुलाजिम ठहरा। अधिकारी पधारे हैं। नायक के बरामदे में निवास। गौरव दिखाकर कौपीन पर पुराना कोट पहना, माथे पर पगड़ी लगायी, उस पर पिका खींचने के लिए। शाल पत्तों की कुछ चिलम उझक रही हैं। सिर को कमर से नीचे झुकाकर दोनों हाथ से अधिकारी के पाँव छूकर माथे से लगा नायक ने खुद गद्गद होते हुए कहा—

‘‘जुहार ! गारड जमानजी ! आपकी पादुका शीतल रहें !’’
चारों ओर हलचल मच गयी—‘‘गारड़, गारड़, जमान, जमान !’’ नायक का मददगार गाँव का पहरेदार और कार्यकर्ता डोम ‘बारीक’ लाठी हिलाकर चारों ओर हलचल मचाते लोग जमा हो गये। चावल, दाल, साग-पान, गाँव की फसल सब आया। जंगल जमान भी महाप्रभु से कम नहीं। वन में गोरू चराने का हर जोड़े पर नांगल पानू (टेक्स) देना पड़ता है। यह तो मामूली है, किसी ने कहीं खेती के लिए बाघ झुरमुटा काटकर जमीन निकाली है, अर्थात् ‘पोडू खेती’ की है, उसका जुर्माना भरना होगा। किसी ने गैर-कानूनी तौर पर इजार (रिजर्व) वन से शहद निकाला है, अथवा घर बनाने के लिए शाल या पीपल काट लिया है। हर बात में सामने होगा जंगल जमान। एक जमान है, जिसका आठ रुपये वेतन, उसके दखल में है दस-पन्द्रह कोस का घना जंगल, श्वापद भरे हैं ! मुर्गा आया उसके साथ अण्डे भी होंगे। ये सब हैं ‘साग’। बहुतों ने मजूरी की, जंगल जमान भोग पाया। वरदान बरसाने लगा। शुक्रू जानी को चाहिए थी जमीन। उसका बढ़ता परिवार, बेटे का करेगा ब्याह। वह देखेगा बेटे का बेटा, ऊँचे टेकड़े की ओर देखकर गहरी साँस लेता है, जंगल जमान की दया से सलामत डोम, स्टीफन डोम, दस बीघा साफ कर चुके हैं। उसे भी कुछ जमीन चाहिए, उसका भी हाथ खुजलाने लगा है। शुक्रू जानी को बड़े-बड़े लक्कड़ चाहिए और घर बनाना होगा। बेटे के ब्याह के बाद वे अलग घर में रहेंगे। यही ‘परजा’ समाज की रीत ठहरी। दोपहर में मुर्गे का जोड़ा और तीन कटहल लेकर जमान के पास शुक्रू जानी हाजिर हुआ ! परजा की विनय भंगिमा में कहा—

‘‘महाप्रभु ! तू दया न करे तो हम मर नहीं जाएँगे ?’’
जंगल जमान चुप रहा।
अंटी से दो रुपये निकाल लिये, जमीन पर रखे, हाथ जोड़कर कहा--‘‘महाप्रभु !’’
‘‘हूँ !’’
‘‘क्या, कहते हो ? काट लूँ ?’’
‘‘ठीक है....’’
उसका काम हो गया। शुक्रू जानी के आनन्द की सीमा न रही। लम्बे-लम्बे डग भरता वह घर लौटा।
खा-पीकर बोरिया-बिस्तर समेटकर जंगल जमान ने छावनी उठा ली। अब एक और गाँव चला। सामान ढोने के लिए चार जवान खेत से बारीक लाकर हाजिर था ? बोझ उठाया, गठरी सिर पर, कन्धे पर बन्दूक रख जंगल जमान उठा। शाम ढलने की वेला। गाँव के घाट पर जिली ‘गुरदी’ साग धो रही थी। झरने के उस ओर रुककर जमान ने हाक लगायी—
‘‘ऐ ! ननी, का करती हो !’’
‘‘साग...बाबू !’’

‘‘देइसा (दोगी) ?’’
‘‘इतना साग ले रहे हो, फिर गुरदी साग का क्या करोगे, बाबू ?’’ जिली हँस पड़ी। और कुछ धाँगड़ियाँ पानी में उतरने के लिए ढलान में फिसलने लगीं। जमान ने सोचा—‘‘आज इतना ही...’’ उसने राह पकड़ी।
झरने के घाट पर धाँगड़ियाँ जमीं। चमकते चेहरों पर खिलखिलाहट भरी हँसी हँसना और मसखरी करना इनका स्वभाव है। आज गाँव के गप्पों में जंगल के जमान की चर्चा है। वन काटने-पीटने और जमीन की बातें बड़े-बड़ों की बातें हैं। धाँगड़ियों ने उसके हाव-भाव की आलोचना की। ‘‘मुझे देख रहा था !’’...‘‘मेरे पीछे-पीछे भाग रहा था’’...छिः पतली छड़ी-सा मरदु, उसमें क्या दम है ? उसकी ऊँची आवाज—‘‘उई मैं तो डर गयी....!’’ देखो तो सही, हमारी मुर्गी अंडे दिया करती थी, बापू ने उसे ही थमा दिया...अनेक बातें, अनेक चर्चा, फिर हँसी।



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