अपराधी कौन - शिवानी Apradhi Kaun - Hindi book by - Shivani
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अपराधी कौन

शिवानी

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :108
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5224
आईएसबीएन :9788183611107

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श्रेष्ठ कहानी-संग्रह.

Apradhi Kaun a hindi book by Shivani -अपराधी कौन - शिवानी

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

गौरा पंत ‘शिवानी’ का जन्म 17 अक्टूबर, 1923 को विजयादशमी के दिन राजकोट (गुजरात) में हुआ। आधुनिक अग्रगामी विचारों के समर्थक पिता श्री अश्विनीकुमार पाण्डे राजकोट स्थित राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जो कालांतर में माणबदर और रामपुर की रियासतों में दीवान भी रहे। माता और पिता दोनों ही विद्वान संगीतप्रेमी और कई भाषाओं के ज्ञाता थे। साहित्य और संगीत के प्रति एक गहरा रुझान ‘शिवानी’ को उनसे ही मिला। शिवानी जी के पितामह संस्कृत के प्रकांड विद्वान पं. हरिराम पाण्डे, जो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में धर्मोपदेशक थे, परम्परानिष्ठ और कट्टर सनातनी थे। महामना मदनमोहन मालवीय से उनकी गहन मैत्री थी। वे प्रायः अल्मोड़ा तथा बनारस में रहते थे, अतः अपनी बड़ी बहन तथा भाई के साथ शिवानी जी का बचपन भी दादाजी की छत्रछाया में उक्त स्थानों पर बीता, किशोरावस्था शान्तिनिकेतन में और युवावस्था अपने शिक्षाविद् पति के साथ उत्तर प्रदेश के विभिन्न भागों में। पति के असामयिक निधन के बाद वे लम्बे समय तक लखनऊ में रहीं और अन्तिम समय में दिल्ली में अपनी बेटियों तथा अमेरिका में बसे पुत्र के परिवार के बीच अधिक समय बिताया। उनके लेखन तथा व्यक्तित्व में उदारवादिता और परम्परानिष्ठता का जो अद्भुत मेल है, उनकी जड़ें, इसी विविधतापूर्ण जीवन में थीं।

शिवानी की पहली रचना अल्मोड़ा से निकलनेवाली ‘नटखट’ नामक एक बाल पत्रिका में छपी थी। तब वे मात्र बारह वर्ष की थीं। इसके बाद वे मालवीय जी की सलाह पर पढ़ने के लिए अपनी बड़ी बहन जयंती तथा भाई त्रिभुवन के साथ शान्तिनिकेतन भेजी गईं, जहाँ स्कूल तथा कॉलेज की पत्रिकाओं में बांग्ला में उनकी रचनाएँ नियमित रूप से छपती रहीं। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर उन्हें ‘गोरा’ पुकारते थे। उनकी ही सलाह, कि हर लेखक को मातृभाषा में ही लेखन करना चाहिए, को शिरोधार्य कर उन्होंने हिन्दी में लिखना प्रारम्भ किया। ‘शिवानी’ की एक लघु रचना ‘मैं मुर्गा हूँ’ 1951 में ‘धर्मयुग’ में छपी थी। इसके बाद आई उनकी कहानी ‘लाल हवेली’ और तब से जो लेखन-क्रम शुरू हुआ, उनके जीवन के अन्तिम दिनों तक अनवरत चलता रहा। उनकी अन्तिम दो रचनाएँ ‘सुनहुँ तात यह अकथ कहानी’ तथा ‘सोने दे’ उनके विलक्षण जीवन पर आधारित आत्मवृत्तात्मक आख्यान हैं।

1982 में शिवानी जी को पद्मश्री से अलंकृत किया गया। उपन्यास, कहानी, व्यक्तिचित्र, बाल उपन्यास और संस्मरणों के अतिरिक्त, लखनऊ से निकलनेवाले पत्र ‘स्वतन्त्र भारत’ के लिए ‘शिवानी’ ने वर्षों तक एक चर्चित स्तम्भ ‘वातायन’ भी लिखा। उनके लखनऊ स्थित आवास-66 गुलस्ताँ कालोनी के द्वार लेखकों, कलाकारों, साहित्य-प्रेमियों के साथ समाज के हर वर्ग से जुड़े उनके पाठकों के लिए सदैव खुले रहे। 21 मार्च, 2003 को दिल्ली में 79 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।


भूमिका

 

 

अपनी किसी कहानी के लिए कोई वक्तव्य या उपन्यास के लिए किसी प्रकार की भूमिका लिखने में मेरी लेखनी सदैव विद्रोह करती रही है। वर्जीनिया वुल्फ की इन पंक्तियों का मुझे अनायास ही स्मरण हो आता है, ‘‘किसी पुस्तक की भूमिका, मुझे गत्ते के उस टुकड़े-सी लगती है, जिसका उपयोग, किसी हिलती टाँगवाली मेज को दृढ़ता से टिकाने के लिए किया जाता है। जिस मेज़ की टाँगें हिलती हों, मेरे विचार में उस मेज़ को जीने का कोई अधिकार नहीं है। रचना में इतनी दृढ़ता होनी चाहिए कि वह बिना किसी गत्ते के आधार के स्वयं अपने पैरों पर खड़ी हो सके।’’ मैं भी वुल्फ़ की इन पंक्तियों का हृदय से समर्थन करती हूँ; एक-न-एक दिन मेज़ हिलाए जाने पर, स्थानच्चुत हो ही जाएगा और मेज़ फिर हिलने लगेगी।
फिर भी मैं आज इस संग्रह की भूमिका स्वयं लिख रही हूँ, किन्तु पाठकों को अपने पात्रों के परिवेश का परिचय देने को आज मेरी लेखनी स्वयं ही मुखरा बन रही है, इसका प्रवाह आरम्भ में ही अवरुद्ध करना मुझे उचित नहीं लगा। रचना क्यों लिखी गई, कहाँ से मुझे प्रेरणा प्राप्त हुई, क्या कथानक भोगे हुए यथार्थ का अनुभूत अंश है ?

ऐसी निरर्थक प्रश्न-शलाका से कोंची जाने पर मैं बंसी से बिंधी मीन-सी ही छटपटाने लगती हूँ। जीवन की समग्रता में कहानी की एकात्मता मेरे लिए सदैव एक अनोखे आनन्द की अनुभूति बन उठती है, किन्तु अपने पात्रों की सृष्टि कर, उनमें-विस्मय, हर्ष-विषाद, सबको अपने अनुभूत जगत् से रसप्लावित करने पर भी मुझे कभी सन्तोष नहीं होता। बराबर यही लगता रहता है कि कहीं चूक गई हूँ। जानकी की जिन मद-भरी आँखों की शरबती शोख़ी को मेरी कलम हू-ब-हू उतारना चाहती थी, उसे एक के बाद एक कई पृष्ठ फाड़ने पर भी ठीक से उतार नहीं पाती। लगता है जिसका चित्र खींच रही थी, या तो ही हिल गई है या मेरी फ़िल्म ही कहीं एक्सपोज़ हो गई है। मग्गी के मोटे अधरों पर थिरकता वह बालसुलभ स्मित या वॉर्डन की वह सोने की कील-टकी दन्त पंक्तियों की जगमगाती अमानवीय हँसी क्या मेरी लेखनी चित्रित कर सकी है ? यही तो लेखनी की विवशता है ! मैंने जो उस विचित्र परिवेश में देखा है, सुना है, अनुभव किया है, उसे क्या इन संस्मरणों को पढ़ने पर भी मेरे पाठक देख-सुन सकेंगे ? अनुभव भी तो कैसे विचित्र थे ! मैं उस पहाड़ी षोडशी का आत्मनिवेदन सुन रही थी, और जेठ की भरी दुपहरी में भी कारागार के किसी अदृश्य पौर से अचानक आ गया वातानुकूलित नकली शीतल बयार का एक झोंका मुझे चौंका गया था। यह कारागार था या रवीन्द्रालय का वातानुकूलित कक्ष ? कैसा आश्चर्य था ! बाहर पत्ता भी नहीं हिला-डुला, और कहानी के क्लाइमेक्स के बीच किस दयालु अन्तर्यामी का वरदहस्त यह विज़न डुला गया ! यह प्रकृति का विचित्र नियम है कि जिस सत्य को ग्राह्य करने की हमारी बौद्धिक क्षमता नहीं रहती, उस सत्य को हम सत्य मानकर विश्वास नहीं कर पाते।

किन्तु फिर भी सत्य, सत्य ही रहता है। नाभिकमल की सुगन्ध वैज्ञानिकों की दृष्टि में कोरी कल्पना-मात्र है, किन्तु कुछ सत्य ऐसे भी हैं जिनकी व्याख्या सम्भव नहीं होती। बाहर चटख धूप थी किन्तु मुझे बराबर यही लग रहा था जैसे गोधूलि का-सा निरन्तर आलोक पूरे कारागार पर छाया है। यह ठीक है कि कहानी लिखने का अधिकार केवल उसे ही है, जिसका जीवन अभिज्ञता से समृद्ध है, किन्तु जीवन की यह अभिज्ञता भी जंगली खरहे-सी भागती, कब कल्पना-लोक के किस अरण्य में दुबक जाएगी, इसका कोई ठिकाना है ? एक बार लुप्त हो जाने पर वह क्या फिर सहज ही में पकड़ में आती है ? कारागार का परिवेश ही कुछ ऐसा विचित्र होता है कि लेखनी की स्वाभाविक गति स्वयं ही शिथिल हो उठती है। मेरा परिचय वहाँ ऐसी बन्दिनियों से हुआ, जिनके विषय में लिखने को मेरी लेखनी किसी प्लांचेट की माध्यम बनी लेखनी की भाँति स्वयं ही चलने लगी, किन्तु कारागार के नियमानुसार मैं उनकी कहानी लिख नहीं सकती थी। जब तक उनकी अपील की सुनवाई न हो जाए, उनके विषय में कुछ लिखना कभी स्वयं मेरा ही गुरुतर अपराध बन सकता था। फिर भी कुछ चेहरे मुझे भुलाए नहीं भूलते। चौदह वर्ष की वे भोली निष्पाप आँखें, जो कुछ न पूछे जाने पर भी पहाड़ी ताल-सी डबडबाने लगी थीं, मेरी उत्सुकता को झकझोरकर जगा गई थीं। क्या अपराध कर सकती थी वह भला ! वह तो एकदम ही बच्ची थी, किन्तु कानून की दृष्टि में तो वह बच्ची नहीं थी। सत्तर वर्ष के ताऊ के बहकावे में आकर वह अबोध बालिका अपनी ही समवयसिनी गुँइया को बुला लाई थी। कामुक दाऊ की विवेकहीन कुटिल योजना को वह समझ नहीं पाई थी।

किन्तु मृत्यु से पूर्व दिए गए उसी की सहेली के बयान ने उसे भी बन्दिनी बना दिया था। फिर चिकने-चुपड़े चेहरेवाली कीर्तनिया प्रौढ़ा माँजी, जिनके पेशे की कुटिलता का अंगराग उनकी गोरी चमड़ी में रिस-भिंजकर रह गया था। कारागार में भी क्या उनके भक्तगणों का अभाव था ? एक पंक्ति गातीं तो कारागार की ऊँची प्राचीरें भी गूँजने लगतीं। किसी पेशेवर कव्वाल की-सी खनकती बुलन्द आवाज थी। और व्यक्तित्व ? उजड़ जाने पर भी दिल्ली, दिल्ली ही थी, इसमें कोई सन्देह नहीं।

अर्धोन्मीलित आँखों के नीचे स्मृतियों का कैसा गँदला सागर लहरा रहा था, यह भला कोई क्या देख सकता था ? किसी काल्पनिक यज्ञशाला के निर्माण हेतु एकत्रित की गई चन्दे की विपुल धनराशि इसी मेदबहुल चिकनी काया की तहों में बिछी है, यह कौन जान सकता था भला ? इसी भाँति, भृगुसंहिता के उस रहस्यमय युवा दैवज्ञ मार्त्तंड की लोमहर्षक कहानी लिखते कई बार मेरी अँगुलियाँ मचल उठी हैं। किन्तु, लेखनी की विवशता भी कैसी करुण विवशता है ! यह केवल वही समझ सकता है जो स्वयं मुक्तभोगी रह चुका है। कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ की ये पंक्तियाँ मुझे अत्यन्त प्रिय हैं, ‘‘कवि यदि सर्जन की ज्ञानगम्य भावराशि को अपने ज्ञान-नेत्र से अवलोकन नहीं करेगा तब उसकी दिव्य दृष्टि का प्रमाण ही भला किसी को क्या मिल पाएगा ?’’ किन्तु उस भावराशि को अपने ज्ञान-नेत्र से अवलोकन कर लेने पर भी उस दिव्य दृष्टि का प्रमाण देना क्या इतना सुगम है ? ‘धर्मयुग’ में जब ‘जा रे एकाकी’ धारावाहिक किश्तों में प्रकाशित हो रही थी, तब ही अधिकारी वर्ग में उसकी तीव्र आलोचना होने लगी थी। कैसे लिख दी थी मैंने यह पंक्ति, ‘‘क्या वे सचमुच बच्चे थे ? छह वर्ष के भोले, निष्पाप चेहरों पर छब्बीस वर्ष के अनुभव की छाप थी, बेरौनक उदास चेहरों में जड़ी पीली आँखों में क्षण-भर के लिए किसी दम तोड़ती टार्च के नन्हे-नन्हे की-सी चमक आई, फिर दप् से बुझ गई। क्या मुझे पता नहीं था कि कारागार में उन बच्चों के लिए नियमित दुग्धपान की सुव्यवस्था थी ?

मुझे अपनी उस मिथ्या पंक्ति के हेतु अब उसी पत्रिका में क्षमायाचना की संक्षिप्त विज्ञप्ति देनी होगी। किन्तु, न तब मैंने अपनी कैफ़ियत देने की आवश्यकता समझी थी, न अब समझती हूँ। कुछ परिवेश ऐसे होते हैं जहाँ स्वाभाविकता स्वयं दम तोड़ देती है। जिस परिवेश में वे अबोध बच्चे बड़ी विवशता से जी रहे थे, वहाँ यदि उन्हें किसी ऑस्ट्रेलियन स्वस्थ धेनु का थनपुछा दूध भी पिलाया जाता, तब भी उन चेहरों की करुण पीताभ विवशता नहीं मिट सकती थी। उसी कारागार से लगे एक दूसरे कारागार से मुझे जब ‘रक्षा-बन्धन’ का निमन्त्रण मिला, तब मैं पल-भर को झिझकी अवश्य थी। जाऊँ या नहीं ? एक दिन, दो-तीन अनजान-अपरिचित बन्दियों की कलाई में राखी बाँधने से क्या लाभ ?-मुझे यही सब दिखावटी, आडम्बरपूर्ण समाज-सेवा का प्रदर्शन-मात्र प्रतीत हुआ। सज-सँवरकर, चार-पाँच रंगीन चमकती राखियाँ बाँधने पर क्या उस पावन होर के अस्तित्व को जीवन-भर अक्षुण्य रखना मेरे लिए, अपनी व्यस्त गृहस्थी में, कभी सम्भव हो सकेगा ? यहाँ तो राखी-बन्धन के दिन, कभी-कभी प्रवासी सगे-सहोदर की कुशल पूछना भी भूल जाती हूँ ! किन्तु फिर मैं चली ही गई थी। एक विशाल सभा भवन में दूर-दूर तक फैली बन्दियों की उस पंक्ति को देखकर कलेजा डूबने-सा लगा था। खूनियों की एक विशेष रंग की वर्दी होती है ऐसा ही बचपन में कभी सुना था।

पाँच एक-सी पीली वर्दीधारी नम्बरदार धीरे-धीरे हमारी ओर बढ़े चले आ रहे थे। वे पाँचों पूरे कारागार का प्रतिनिधित्व करने का गौरव प्राप्त कर सके थे, अपने आदर्श एवं अनुकरणीय आचरण करने का प्रमाण-पत्र देकर। वैसे, उनका कलुषित अतीत उनके उजले वर्तमान के एकदम ही विपरीत था। एक-एक ने चार-चार पाँच-पाँच निर्मम हत्याएँ की थीं। आज उन्हीं हत्यारे सहोदरों की कलाई पर मुझे राखी बाँधने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। मेरे पाँच नवीन सहोदर घुटना टेककर मेरे सम्मुख बैठे तो मुझे लगा, रामलीला में राक्षस बने पात्रों ने अपने निशाचरी मुखौटों की डोरियाँ स्वयं ही कानों से नीचे उतार ली हैं। स्निग्ध, निष्पाप, निर्दोष, स्नेही, स्मित जैसे स्वयं मेरे सगे-सहोदर का था। ‘‘यह हैं-सिंह।’’ अधीक्षक हँस-हँसकर उनका परिचय दे रहे थे-‘‘बहुत अच्छी कविता करते हैं। और यह है हमारे कारागार के सुकंठी गायक, इनका बेजोड़ बैंड पूरे शहर में प्रसिद्ध है।’’ उधर राखी बँधवा रहे तरुण कवि का चेहरा विनीत नम्रता में झुकता घुटनों तक नत हो गया। गौरवर्ण, चौड़े कन्धे, तीखी नाक और पतली मूँछें, जैसे मेरी कहानी का नायक ही मेरे सम्मुख नतमस्तक बैठ गया हो। मुझे बंगला कवि काशीराम दास की बहुत पहले पढ़ी गई पंक्तियाँ स्मरण हो आईं :

 


‘‘देखो द्विज मनसिज
जिनिया मूरती
खगराज पाए लाज
नासिका अतुल’’


अचानक तबले, हारमोनियम और बाँझ की झम्मक-झम के साथ फिर बन्दियों का समवेत मधुर संगीत गूँज उठा :


‘‘यह है उजड़े वतन का चमन भाइयो
बहिनें आईं तो इसमें बहार आ गई।’’


सुकंठी गायक की पतली-मीठी आवाज सबके बीच में पहचानी जा रही थी, जैसे प्रायः कव्वालों के सधे मांसल कंठ के बीच किसी किशोर का मीठा कच्चा कंठ-स्वर बुलबुल-सा चहक उठता है, ठीक ऐसी ही आवाज थी उसकी। मास्टर मदन की-सी ही मीठी रुनक थी उसके अपूर्व कंठ-स्वर में। वही कारागार का संगीत-निर्देशक भी था। बैंड लेकर बाहर जाने की उसकी माँग, आरम्भ में सर्वसम्मति से ठुकरा दी गई थी। ऐसे ख़तरनाक कैदी को किसी विवाहोत्सव में बाहर भेजना ख़तरे से खाली नहीं था। न जाने कितने कत्ल कर, वह निर्मम डकैत, लम्बी सज़ा भुगत रहा था। क्षण-भर को मिली स्वतन्त्रता कभी भी उसका विकृत मस्तिष्क फिरा सकती थी। हाथ की मशक बीन दूर पटक, वह यदि बारात में हवा में छोड़ी जा रही बन्दूक को किसी के हाथ से छीनकर भाग गया तो कोई क्या कर लेगा ?

किन्तु, वह गिड़गिड़ाया, ‘‘मुझे एक बार भेजकर तो देखिए सरकार। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ, मैं ठीक लौट आऊँगा,’’ और फिर सचमुच ही उसके सहृदय अधीक्षक ने सबसे विरोध मोल लेकर उसे अनुमति दे दी थी। अपने अनोखे बैंड को लेकर वह ठीक समय पर लौट आया था। फिर तो आज तक वह न जाने कितनी बारातों, उत्सवों में जा चुका है। कभी भी उसने अपने प्रभु को धोखा नहीं दिया।

मैं उस दिन, जितनी ही बार एकसाथ अनुशासन में बँधे उन मूर्तिवत् बैठे बन्दियों को देखती उतनी ही बार एक अडिग मूर्ति बार-बार मेरे कौतूहल को उकसा रही थी। दोनों घुटनों में सिर छिपाए वह एक ही मुद्रा में बैठा था। उसके सतर कन्धे देखकर लगता था, वह जवान है। एक बार भी उसने चेहरा नहीं उठाया। कौन-सा दुख, कौन-सी स्मृति उस अभागे को विचलित कर रही थी ? एक के बाद एक कई गाने गाए गए, बन्दियों ने स्वरचित कवित-पाठ किया, भाषण हुए, तालियों की गड़गड़ाहट से कारागार की ऊँची निर्गम प्राचीरें थर्राईं, किन्तु वह अभिशप्त घने काले बालोंवाला माथा उसके दोनों घुटनों में छिपा ही रहा। एक बार जी में आया, पास बैठे अधीक्षक से उस कच्छप के छिपे मुंड का रहस्य पूछ लूँ, पर फिर चुर रही। जो व्यक्ति संसार से स्वेच्छा से ही गुमनाम बना, अदृश्य होना चाहता है, उसे बाहर खींचकर क्या लाभ ? किन्तु एक फ़रमाइश मैंने फिर भी कर ही दी थी।

‘‘आपके बाल-सुधार-गृह के सदस्य भी तो यहाँ उपस्थित होंगे, क्यों न सबसे छोटे बन्दी को भी एक राखी बाँध दी जाए ?’’ मैंने अधीक्षक से कहा, और थोड़ी ही देर में वह नन्हा बन्दी सिर झुकाए मेरे सम्मुख बैठ गया। ज्वर से तप्त, दुबली कलाई उसने मेरी ओर बढ़ा दी। उसे उस दिन तीव्र ज्वर था फिर भी वह ज़िद कर आ गया था। सुधार-गृह में उसके पठन-पाठन की भी पूर्ण व्यवस्था थी, इसी से उस दिन वह अपनी एन.सी.सी. की पोशाक पहनकर आया था। उस तप्त कलाई पर राखी की रेशमी डोर बाँधने लगी, तो मन ही मन पश्चात्ताप भी हुआ-मैं यह जानती कि मुझे एक ऐसे नन्हे सहोदर की कलाई पर राखी बाँधनी होगी, तो उसी की वयस से मेल खाती राखी ले आती, जैसी राखी देखकर कभी मेरा नन्हा पुत्र मचलता था। घड़ी बनी, राधाकृष्ण बनी, ऐरोप्लेन बनी चमकीली पन्नी से जगमगाती राखी। यह तो एक साधारण रेशमी डोर थी। बेचारा नन्हा-सा बन्दी ! क्या अपराध कर सकता था वह भला फिर भी हृदयहीन अधिकारियों ने उसे इसी बन्दीगृह में बन्दी बनाकर रख दिया था। शायद मेरे चेहरे पर मेरी उधेड़बुन आवश्यकता से अधिक स्पष्ट अक्षरों में बिखर गई थी। हँसकर अधीक्षक बोले, ‘‘बड़े बहादुर हैं ये-सिंह। क्यों हैं ना। पिछले वर्ष इन्होंने अपने एक साथी को पिता की भरी बन्दूक लेकर ठंडा कर दिया।’’

मैं अविश्वास से कभी उन्हें देख रही थी, कभी उस नन्हे बन्दी को।
क्या ऐसा कभी हो सकता था ? मेरे सम्मुख नतमस्तक बैठा, भोला बालक क्या सचमुच ही हत्यारा था ? किन्तु सत्य घटना भी कभी-कभी कैसी अविश्वासनीय लगने लगती है ! काँच के कंचों से खेल रहे साथियों में से एक से लड़ पड़ा था-सिंह। उम्र थी ग्यारह साल, पर गुस्सा था बाईस साल का। आव देखा न ताव, बाप की भरी बन्दूक उठा लाया और घोड़ा दबा दिया। फिर एक ओर बन्दूक का भारी धक्का खाकर निशानेबाज गिर पड़ा था और दूसरी ओर निर्जीव निशाना।



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