अपराजिता - शिवानी Aparajita - Hindi book by - Shivani
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अपराजिता

शिवानी

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :137
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5221
आईएसबीएन :9788183611121

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कहानी संग्रह.

Aprajita a hindi book by Shivani - अपराजिता - शिवानी

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

गौरा पंत ‘शिवानी’ का जन्म 17 अक्टूबर, 1923 को विजयादशमी के दिन राजकोट (गुजरात) में हुआ। आधुनिक अग्रगामी विचारों के समर्थक पिता श्री अश्विनीकुमार पाण्डे राजकोट स्थित राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जो कालांतर में माणबदर और रामपुर की रियासतों में दीवान भी रहे। माता और पिता दोनों ही विद्वान संगीतप्रेमी और कई भाषाओं के ज्ञाता थे। साहित्य और संगीत के प्रति एक गहरा रुझान ‘शिवानी’ को उनसे ही मिला। शिवानी जी के पितामह संस्कृत के प्रकांड विद्वान पं. हरिराम पाण्डे, जो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में धर्मोपदेशक थे, परम्परानिष्ठ और कट्टर सनातनी थे। महामना मदनमोहन मालवीय से उनकी गहन मैत्री थी। वे प्रायः अल्मोड़ा तथा बनारस में रहते थे, अतः अपनी बड़ी बहन तथा भाई के साथ शिवानी जी का बचपन भी दादाजी की छत्रछाया में उक्त स्थानों पर बीता, किशोरावस्था शान्तिनिकेतन में और युवावस्था अपने शिक्षाविद् पति के साथ उत्तर प्रदेश के विभिन्न भागों में। पति के असामयिक निधन के बाद वे लम्बे समय तक लखनऊ में रहीं और अन्तिम समय में दिल्ली में अपनी बेटियों तथा अमेरिका में बसे पुत्र के परिवार के बीच अधिक समय बिताया। उनके लेखन तथा व्यक्तित्व में उदारवादिता और परम्परानिष्ठता का जो अद्भुत मेल है, उनकी जड़ें, इसी विविधापूर्ण जीवन में थीं।

शिवानी की पहली रचना अल्मोड़ा से निकलनेवाली ‘नटखट’ नामक एक बाल पत्रिका में छपी थी। तब वे मात्र बारह वर्ष की थीं। इसके बाद वे मालवीय जी की सलाह पर पढ़ने के लिए अपनी बड़ी बहन जयंती तथा भाई त्रिभुवन के साथ शान्तिनिकेतन भेजी गई, जहाँ स्कूल तथा कॉलेज की पत्रिकाओं में बांग्ला में उनकी रचनाएँ नियमित रूप से छपती रहीं। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर उन्हें ‘गोरा’ पुकारते थे। उनकी सलाह, कि हर लेखक को मातृभाषा में ही लेखन करना चाहिए, को शिरोधार्य कर उन्होंने हिन्दी में लिखना प्रारम्भ किया। ‘शिवानी’ की एक लघु रचना ‘मैं मुर्गा हूँ’ 1951 में ‘धर्मयुग’ में छपी थी। इसके बाद आई उनकी कहानी ‘लाल हवेली’ और तब से जो लेखन-क्रम शुरू हुआ, उनके जीवन के अन्तिम दिनों तक अनवरत चलता रहा। उनकी अन्तिम दो रचनाएँ ‘सुनहुँ तात यह अकथ कहानी’ तथा ‘सोने दे’ उनके विलक्षण जीवन पर आधारित आत्मवृत्तात्मक आख्यान हैं।

1982 में शिवानी जी को पद्मश्री से अलंकृत किया गया। उपन्यास, कहानी, व्यक्तिचित्र, बाल उपन्यास और संस्मरणों के अतिरिक्त, लखनऊ से निकलनेवाले पत्र ‘स्वतन्त्र भारत’ के लिए ‘शिवानी’ ने वर्षों तक एक चर्चित स्तम्भ ‘वातायन’ भी लिखा। उनके लखनऊ स्थित आवास-66, गुलिस्ताँ कालोनी के द्वार, लेखकों, कलाकारों, साहित्य-प्रेमियों के साथ समाज के हर वर्ग जुड़े उनके पाठकों के लिए सदैव खुले रहे। 21 मार्च, 2003 को दिल्ली में 79 वर्ष की आयु में निधन हुआ।

 

दंड

 

 

सिंह नर्सिंग होम में बड़ा-सा ताला लटक रहा था। लोकप्रिय डॉ. सिंह के अकस्मात् इस तरह अलोप हो जाने पर, उनके कई मरीजों की अवस्था और बिगड़ गई थी। अब क्या होगा ? अपने हाथों का चमत्कार दिया, उन्हें मृत्युंजयी औषधि पिलानेवाला मसीहा ऐसे अदृश्य क्यों हो गया ? यह ठीक था कि कई दिनों से डॉ. सिंह ने अपने क्लीनिक में किसी भी नए मरीज को नहीं लिया था, फिर भी निराश मरीजों के असहाय आत्मीयों की एक लम्बी कतार, उनके सेक्रेटरी के चरणों पर सिर रखकर गिड़गिड़ाती रही थी। जैसे भी हो, एक बार डॉ. सिंह उनके मरीजों को देख-भर लें, पर सेक्रेटरी बेचारा क्या करता ? डॉ. साहब अपनी सजी कोठी के सबसे ऊपर के कमरे में स्कॉच लेकर बन्द थे। किसकी मजाल थी कि द्वार खटखटा दे। बीच-बीच में उनका गूँगा नौकर बदलू, काली तेज़ कॉफी की ट्रे वहीं पहुँचाता रहता। ‘साहब क्या कर रहे हैं ?...‘कैसा मूड है ?’-‘बेठे हैं या लेटे हैं ?’...किसी भी प्रश्न का उत्तर गूँगा नहीं दे पाता तो डॉक्टर सिंह का सेक्रेटरी सुशील रॉय झुँझला उठता। कैसी भी अटूट सम्पत्ति क्यों न हो, ऐसे भला कितने दिनों तक काम चलेगा ? बँधे मरीज क्या उनके लिए बैठ रहेंगे ? यही सब कहना चाहता था उनका युवा सेक्रेटरी डॉक्टर सुशील राय पर कठोर प्रभु का आदेश था कि सिवा गूँगे बदलू के उनके कमरे में कोई न आने पाए। न जाने कितने इष्ट-मित्र आ-आकर लौट गए। जब रँगे बालों और लम्बे नाखुनोंवाली विधानसभा की सदस्या रानी शिवसुन्दरी भी बड़ी देर तक व्यर्थ द्वार भड़भड़ाकर भुनभुनाती लौट गई, और शान्त स्वर में डॉक्टर सिंह को कहते सुशील ने सुन लिया, ‘शिवी मुझे कुछ दिन क्षमा कर दो, मैं शरीर और मन दोनों से अस्वस्थ हूँ’ तो वह समझ गया कि लौहद्वार अब किसी मिलनेवाले के लिए नहीं खुलेगा। पर दूसरे दिन आधी रात में कुछ पलों तक द्वार खुला था। नर्सिंग होम के जिस वी.आई.पी. मरीज को दूसरे दिन छुट्टी मिलनेवाली थी, उसे अचानक दिल का दूसरा दौरा पड़ गया। डरते-डरते डॉक्टर रॉय ने द्वार खटखटाया। न खटखटाता और इसी बीच मरीज को कुछ जाता तो शायद सिंह नर्सिंग होम की नींव ही हिल जाती। मरीज किसी जनसंघी मन्त्री का साला था, एकदम टाइम बम, कब घातक रूप से फट पड़े, ठीक नहीं ! देखभाल करने को साथ में निरन्तर बनी रहती उनकी समाज-सेविका साली। उसी ने डॉक्टर सुशील को एक प्रकार से कन्धा पकड़कर सीढ़ियों पर धकेल दिया था।

‘‘जैसे भी हो, डॉक्टर सिंह को नीचे खींच ले आओ। नहीं आएँ तो उनके हक में ठीक नहीं होगा। मरीज को जब यहाँ लाए हैं, तब उनके जीवन की जिम्मेदारी भी ठीक नहीं होगा। मरीज को जब यहाँ लाए हैं, तब उनके जीवन की जिम्मेदारी भी वहन करनी होगी...’’
डॉक्टर सुशील ने शायद घबराकर द्वार कुछ जोर से ही भड़भड़ा दिए थे, ‘‘सर, मन्त्रीजी के साले की हालत बहुत ख़राब है, एक बार चलकर देख लिया जाए...’’
‘‘भाड़ में जाए तुम्हारा मन्त्री का साला।’’ सौ दानव कंठ एकसाथ गरज उठे थे।
पर फिर कुछ सोचकर उन्होंने स्वयं ही द्वार खोल दिया।

प्रभु का स्याह चेहरा देखकर सुशील सहम गया था। लगता था, कई दिनों से कमरे में स्वेच्छा से बन्दी बने डॉक्टर सिंह ने शरीर पर मनमाना अत्याचार किया है। अव्यक्त व्यथा से चेहरा झुलसकर एकदम काला पड़ गया था। जिसे अपने दस वर्ष के साहचर्यकाल में एक बार भी बिना दाढ़ी बनाए नहीं देखा था, जिसका तीखा-सुडौल चिबुक, भरे कपोल सदा नवजात शिशु के नरम गालों-से ही दिखते, उन्हीं पर खुरदरी सफेद झाड़ी-सी दाढ़ी बनाए नहीं देखा था, जिसका तीखा-सुडौल चिबुक, भरे कपोल सदा नवजात शिशु के नरम गालों-से ही दिखते, उन्हीं पर खुरदरी सफेद, झाड़ी-सी दाढ़ी उग आई थी। जो व्यक्ति दिन में नित्य दो बार भड़कीले सूट बदलकर ही मरीजों की नाड़ी पकड़ता था, और जिसकी रोबीली पकड़ में आते ही नाड़ी स्वयं आश्वस्त हो ऐक्यूजर बनी, किसी अपराधी-से पक्के रोग दस्यु को पकड़ा, उसका पूरा इतिहास उगल देती थी, वही सुर्दशन व्यक्ति आज स्वयं कठधरे में खड़ा अभियुक्त-सा लग रहा था। केवल बनियान और पायजामा पहने ही वह मरीज देखने उतरने लगा तो सुशील के जी में आया उसे टोक दे, ‘सर, ड्रेसिंग गाउन डाल लीजिए, वहाँ उनकी साली भी है।’ वह जानता था कि स्वाभाविक मानसिक अवस्था होने पर ऐसी बेढंगी पोशाक में डॉक्टर सिंह शायद घर की जमादारिनी के सम्मुख भई नहीं खड़े होते।

मरीज की अवस्था सचमुच ही शोचनीय थी। पर डॉक्टर सिंह उसे देखते ही एक बार फिर पुराने डॉक्टर सिंह हो गए। मरीज की शोचनीय अवस्था ही तो उन्हें पुलकित कर उठती थी। शत्रुपक्ष के साथ ही ली गई टक्कर तब ही आनन्द दे सकती है जब दोनों ओर का पलड़ा समान हो। अपने कठिन शत्रु की दुर्बलता को उन्होंने इस बार भी पकड़ लिया। सिद्ध पहलवान की भाँति आत्मविश्वास का गंडा बाँधकर वह अखाड़े में कूदे, और पल-भर में शत्रु उनके चतुर दाँव-पेंच से उलटा पड़ा था।
‘‘ऑक्सीजन प्लांट लाओ...फलाँ इंजैक्शन, फलाँ दवा...’’

‘‘आप यहाँ क्या कर रही हैं ? जाइए बाहर।’’ उन्होंने हो-हल्ला मचाती मरीज की तेजस्वी साली को ऐसे टपट दिया, जैसे वह स्कूल की बच्ची हो।मरीज के कमरे में आत्मीय स्वजनों की भीड़ देखकर वह तुनकमिजाज डॉक्टर ऐसे ही भड़क जाता था। रात-भर वह मरीज की छाती पर अपने हाथों से ऐसे मालिश करता रहा, जैसे कोई स्नेही घोसी अपनी भैंस को रगड़-रगड़कर नहला रहा हो। पौ फटी तो मृत्यु-द्वार से प्रत्यावर्ती रोगी चैन की नींद सो रहा था। समाज-सेविका साली विधुर जीजा के धड़क रहे हृदय पर हाथ धर एक बार फिर आश्वस्त हो बैठ गई थी। इस अद्भुत डॉक्टर की कृपा से काल-कुठार इस बाद उसके वैधव्य कल्पतरु के तने का स्पर्श भी नहीं कर पाया था। धन्यवाद देती, इससे पहले ही वह रूखा डॉक्टर धड़धड़ाता अपने कमरे में चला गया था और उसने कुंडी चढ़ा ली थी। विधि की भी कैसी विचित्र विडम्बना थी कि सहस्त्रों मुर्दों में ऐसी जान फूँक देनेवाला यह अनोखा जादूगर आठ दिन पूर्व हाथ बाँधे खड़ा देखता ही रह गया था। और बलवती मृत्यु अपनी शत-सहस्त्र पराजयों का एक ही आघात में प्रतिशोध ले, उसे अँगूठा दिखाकर चली गई थी।

फ्रिज में धरे तरबूज के लुभावने रक्तिम अन्तस्तल में छिपी घातक कुटिल मृत्यु मुस्करा रही है, यह तब पिता-पुत्र क्या जानते थे ? तरबूज की एक फाँक तो पिता ने भी खाई थी, फिर मृत्यु पुत्र को ही क्यों ले गई ? पिता और पुत्र भी क्या ऐसे वैसे थे ? दोनों साथ-साथ खड़े होते तो लगता कि दो जुड़वाँ भाई खड़े हैं। डॉक्टर सिंह पचास से कुछ ऊपर ही थे, पर चाहने पर अब भी सेहरा बाँध सकते थे। न एक बाल सफेद, न एक झुर्री। दिल्ली के उच्चतर लबके के नारी-समाज की प्रौढ़ सदस्याएँ लुक-छिपकर डॉक्टर सुशील से भेद लेने की चेष्टा करतीं, ‘कौन-सा हेयर डाई यूज करते हैं डॉक्टर सिंह ? और जब हँसकर सुशील उनसे कहता कि डॉक्टर के व्यक्तित्व में किसी हेयर टॉनिक के विज्ञापन-से चमकते उनके सिर से लेकर स्त्रियों को भी लजानेवाले और गौर चरणयुगल तक सबकुछ विधाता प्रदत्त है, तो वे उसे अविश्वास से घूरकर चली जातीं ! दोष उनका भी नहीं था। डॉक्टर सिंह की मोती-सी दन्त-पंक्ति देखकर तो तीन-चार वर्षों तक स्वयं सुशील को ही धोखा हो गया था। यहाँ बत्तीस वर्ष की आयु में ही सामने के तीन नकली दाँत बनवाने में उसके डेढ़ सौ लग गए थे, उस पर भी दिल्ली के प्रसिद्ध डेंटिस्ट ने ऐसा ठगा कि जीभ का स्पर्श पाते ही तीनों दाँत कागजी शटल कार्क से उछलने लगते।

‘आप ही का-सा डेंचर बनवाना चाहता था सर, डेंटिस्ट कौन था आपका ?’ उसने लड़कियों की भाँति लजाकर पूछा था। ‘डेंचर ?’ डॉक्टर सिंह ठठाकर हँस पड़े थे, ‘किसने कहा, मेरा डेंचर है ? हिलाकर देखो।’ वह फिर ज़ोर-ज़ोर से अपने दाँत हिलाने लगे थे,‘किसी डेंटिस्ट के बाप की हथौड़ी भी इन्हें नहीं हिला सकती-जानती हो इस डेंचर का रहस्य ?’ टेढ़े होंठों की हँसी हँसने पर वह कठोर व्यक्ति कितना मधुर लगने लगता था ! चेहरे में अब भी न जाने कैसा नारी-सुलभ आकर्षण था !
‘मेरे जीवन के पचास वर्षों में आरम्भ के बीस वर्ष छोड़ शेष तीस वर्षों में चीनी के एक कण ने भी मेरे दाँतों का स्पर्श नहीं किया है।’ ठीक ही तो कह रहे थे वह। कृतज्ञ मरीजों के घर से आए न जाने कितने मिष्ठान्न-भरे टोकरे इधर-उधर पड़े रहते। कभी रानी शिवसुन्दरी अपनी कार में भरकर ले जाती, कभी नौकर-चाकर नाक-मुँह से ठूँसते।
‘अरे बेटा, अन्धाधुन्ध के राज में गदहा पँजीरी खाए।’ सुशील की माँ कहतीं, पत्नी होती तो ऐसा होता ?’

मृत पत्नी का बड़ा-सा तैलचित्र उनके विजिटिंग रूम में टँगा रहता। कुछ दिनों पूर्व उनका एक प्रतिभाशाली मरीज अपनी समस्त कृतज्ञता डॉक्टर-पत्नी की एक विराट् ताम्र मूर्ति में ढालकर उन्हें उपहार दे गया था। कैसी तेजस्वी महिला रही होंगी वह ! ताम्रतेज से घुल-मिल गया अद्वितीय गढ़न के चेहरे का गम्भीर तेज आँखओं को बरबस बाँध लेता था। बालों की एक घनी लट को चतुर मूर्तिकार ने सुडौल बक्षस्थल पर शायद जान-बूझकर ही उतार दिया था। उस मूर्ति का वही अंग उसके लिए मृत्यु का सन्देश लेकर आया था। पच्चीस वर्ष की अल्पावस्था में ही डॉक्टर-पत्नी की अकाल मृत्यु का कारण बना था असाध्य ब्रेस्ट कैंसर।
फिर उन्होंने पिता के लाख कहने पर भी विवाह नहीं किया।

अपनी अधूरी डॉक्टर पूरी कर वह कुछ दिनों विदेश में ही बसे रहे, फिर स्वदेश लौट आए। ताल्लुकेदारी बेचकर दिल्ली में ही उन्होंने अपना क्लिनिक खोल लिया था। पुत्र विदेश में ही पिता के पेशे की शिक्षा ग्रहण कर रहा था। पिछले ही वर्ष वह आश्चर्यजनक रूप से छोटी अवस्था में एस.आर.सी.एस. कर लौटा, और अनायास ही पिता की दक्षिण भुजा बन गया। पुत्र-प्रेम के लिए जिस अर्द्धागिनी के विरह की कफनी उन्होंने स्वेच्छा से ही ओढ़ ली थी, उस त्याग का पुरस्कार दे दिया स्वयं पुत्र ने। पिता लाखों में एक सर्जन था तो पुत्र लाखों में एक चिकित्सक। पिता वामहस्त से भी कठिन ट्यूमर चीरकर ऐसे रख देता, जैसे सुगृहिमी सधे हाथों से अचार का नींब चीरती है, और पुत्र उसी अनुभव के अन्दाज से औषधि के मसाले भर देता। फिर वर्षों तक शरीर के पारदर्शी काँच के-से बोयाम में भरे उस स्वरचित प्रिजर्व को पिता-पुत्र बड़े गर्व से देखते। अब वर्षों तक उसके सड़ने-गलने का प्रश्न ही नहीं उठ सकता था।

पर कभी-कभी नाम की भी कैसी व्यर्थ मरीचिका बनकर रह जाती है ! डॉक्टर सिंह के श्वसुर थे, रसिक कवि, अवध के सुप्रसिद्ध ताल्लुकेदार। उन्होंने नाती का नाम धरा था मृत्युंजय। पर मृत्यु को नहीं जीत सका बेचारा ! मृत्यु ने ही उसे जीत लिया। उसके क्लिनिक में बैठते ही मरीजों की संख्या में समृद्ध गृहों की सुन्दर किशोरियाँ ही स्वेच्छा से नकली रोगों का वरण कर डॉक्टर सिंह की पैनी छुरी पर गिरने बहुत बड़ी संख्या में आने लगीं तो डॉक्टर सिंह मुस्कराए थे। चंचल पतंग सुदर्शन पुत्र के पौरुष दीप पर ही जलकर झुलसने जुट रहे हैं, वह समझ गए। कुछ बीमारी नहीं जुटती तो अपने टौंसिल ही सुजा लेतीं। पुत्र के आते ही किशोरी रोगिणियों की संख्या ऐसी बढ़ी कि उन्हें अपने क्लिनिक में नया विंग बढ़ाना पड़ा। रिश्तों का तो पूछना ही क्या था ! पर पुत्र पिता से भी अधिक चतुर था।

विदेश की सुरा-सुन्दरियों ने क्या कभी उनके कार्तिकेय-से पुत्र को निरामिषभोजी रहने दिया होगा ? अपने अनुभव की डायरी खोल वह अपने विदेश प्रवास के रंगीन की स्मृति में घंटों तक डूब जाते। भारत के सुस्वादु छाया-ग्रास को विदेशी सिंहकाएँ किस स्वाभाविकता से ग्रस लेती हैं, वे खूब जानते थे। इंडियन करी की ही भाँति इंडियन पुरुष को देखकर भी उनकी लार अनायास ही बड़े गँवारू ढंग से टपकने लगती है, इसका उन्हें स्वयं अनुभव था। पुत्र के चेहरे को देखकर वे सन्तुष्ट हो गए थे। वह चेहरा अनुभवहीन युवक का नहीं था। ऐसा न होता तो अब तक वह न खाए-पिए भिक्षुक की भाँति उनके क्लिनिक की विमान-परिचारिकाओं-सी सुन्दरी नर्सों के इंगित मात्र से परसे जाने को तत्पर थालों पर कब का टूट पड़ा होता ! स्वयं विधुर पिता के मिलनेवालों में आकर्षक मिलनेवालियाँ ही अधिक संख्या में रहती हैं, यह संसारी पुत्र भी समझता था। माँ की आदमकद ताम्रमूर्ति की ओर कभी डॉक्टर सिंह आँख उठाकर भी नहीं देखते या शायद देख नहीं सकते, यह वह खूब समझता था, फिर नर्सिंग होम का नाम धरा था-‘सुधा नर्सिंग होम’। कभी-कभी दिवंगता माँ के चित्र को एकान्त में देखता तो युवा मृत्युंजय के होंठ व्यंग्य से टेढ़े हो जाते। पिता का यह कैसा खोखला प्रदर्शन था। उसी मूर्ति के पास ब्रिज-टेबल पर क्या वह उस विधानसभा की धूर्त सदस्ता के साथ पिता की ही-ही-ठी-ठी नहीं सुन चुका है ?
‘जिस पति को अपनी पत्नी से सच्चा प्रेम होगा, वह कम-से-कम अपनी कोठी, किसी कॉलेज या उद्यान-पार्क का नाम अपनी पत्नी के नाम पर कभी नहीं धरेगा सुशील !’ उसने एक दिन अपने मित्र डॉक्टर सुशील से हँसकर कहा था, ‘सच पूछो तो मुझे ताजमहल देखने की कभी इच्छा नहीं हुई। यह सब दिखावा भला क्यों ? अरे, अपनी बीवी को चाबते हो तो सारी दुनिया कर क्लीनिक से अपनी दिवंगता माँ का नाम हटा दिया था। पर पिता की समस्त दुर्बलताओं को जानने पर भी वह स्नेही पुत्र पिता से एक क्षण भी विलग नहीं हो पाता था। शॉयलॉक-सा क्रूर पिता, मरीज के प्राण जाने से पूर्व भी अपनी ऊँची फीस का बीमा करवा लेता है, यह मृत्युंजय से छिपा न था। पिता की आसव से आसक्ति, नारी-लोलुप चटोरी जिह्ना, कुछ भी उससे लुका-छुपा नहीं था, पर फिर भी स्वेच्छा से अनजान बना, वह डॉक्टर सिंह के समस्त दुर्गुणों को काला परदा डालकर ढाँप देता। पुत्र के इसी क्षमाशील व्यक्तित्व को देखकर पिता ने सन्तोष की साँस ली थी, पर ठीक तीसरे महीने ही वर्षों से मित्र बना पुत्र अचानक शत्रु बनकर कलेजे में खंजर भोंक देगा, वह क्या जानते थे ? पलक झपकते ही सबकुछ हो गया था। दो उल्टियाँ, दो-तीन और नैन-पुतलियाँ उलट गई थीं। केवल एक बार अरथी पर अबोध शिशु की भाँति पछाड़ खाकर डॉक्टर सिंह ने पूछा था, ‘यह मुझे कैसा दंड दे दिया प्रभो ?’ कुछ ही क्षणों को वह लौहपुरुष टूट गया था, फिर भागकर उन्होंने कमरा बन्द कर लिया था।

अरथी कौन ले गया, किसने कन्धा दिया, किसने मुखाग्नि दी ? उन्हें कुछ पता नहीं रहा।
कभी-कभी सुशील के जी में आता, उन्हें बाँहों में बाँधकर कहे, ‘सर, क्यों जी छोटा करते हैं, मैं अब आपका बेटा हूँ। वचन देता हूँ सर, जीवन-भर कुँआरा रहकर आपके पास बना रहूँगा। आपका पुत्र नहीं रहा तो दूसरों के पुत्र तो हैं। उन्हें असाध्य रोगों से मुक्त कर अपने पुत्र का अमर स्मारक बनाइए।’ पर वह मन-ही-मन सब समझता था। सगे पुत्र का धुँधला टिमटिमाता तारा जब टूटकर गिरता है तब फिर नक्षत्रखचित व्योम भी उस क्षतिग्रस्त शून्य की पूर्ति नहीं कर सकता। फिर भी रात-भर जागकर उसने कई बार रटकर वे वाक्य कंठ में साधे थे, जो वह डॉक्टर सिंह से कहेगा, जैसे भी होगा, वह उन्हें आज क्लीनिक में खींच ही लाएगा। वह जाने के लिए तैयार हो ही रहा था कि गूँगा बदलू डॉक्टर सिंह का पुत्र थमा गया :
‘सुशील,
लम्बी छुट्टी पर जा रहा हूँ-शायद लौटूँ और शायद नहीं। सारा एकाउंट और क्लीनिक तुम्हें सौंप गया हूँ, जी में आए तो चलाना और जी में आए तो ताला डाल देना।

 

तुम्हारा
डॉ. सिंह,

 

बदलू की आँखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी-कहाँ गए ? कब गए ? एक प्रकार से उसे हिला-हिलाकर सुशील ने झिंझोड़कर रखा दिया था, पर फलहीन ठूँठ वृक्ष-सा बदलू हिलाए जाने पर भी फल कैसे गिरा सकता था ? गूँगी जिह्ना को बड़ी चेष्टा से हिलाकर उसने कहा, ‘पफ पफ’। फिर विवशता से शून्य में फैले दोनों हाथओं के दुहत्थड़ माथे पर मार दिए। डॉक्टर सिंह, लूप लाइन की उसी गाड़ी में जाकर बैठ गए थे, जिसमें अट्ठाईस वर्ष पूर्व बैठे थे, यह कौन जान सकता था ? वीरभूम का युगपुरुष करवट बदलकर शायद बेसुध पड़ा होगा। जहाँ से एक बार साँस रोककर भाग आए थे, वहीं अब फिर साँस रोककर भारे जा रहे थे। क्या खींच रहा था उन्हें ? गाँगामाटी के बीच सर्पिणी-सी बल खाती कोपाय नदी या वर्षा से भीगी सन्थाल झोंपड़ियाँ की खस के भीगे पंखे-सी सुगन्ध या कच्ची सन्थाल ताड़ी की मादक स्मृति ? जीवन के रस के छलकती गागर, जब रीती होकर ढुलक गई, तब इस ग्राम की स्मृति ने उन्हें क्यों पुकारा ?

पिता के अंतरंग मित्र थे, वीरभूमि के जमींदार सुधीर रंजन रॉय चौधरी। पूजा की छुट्टियों में उन्हीं सन्तानहीन जमींदरा स्नेही दम्पति द्वय का अथिति बनकर वह गोआलपाड़ा गया था। अपने विदेशी मित्रों के लिए बनाए गए अतिथिगृह को, स्नेही जमींदार साहब ने उसे लिए खोल दिया था-‘एकान्त में तुम मन लगाकर परीक्षा की तैयारी कर सकते हो। यहाँ कोई व्याघात डालने नहीं आएगा।’ उन्होंने कहा था, वह स्वयं नित्य ही व्याघात डालने पहुँच जाएँ तो भला कोई क्या कर सकता था ?
मोटी-मोटी चिकित्सा विज्ञान की पुस्तकों में डूबा तरुण डॉक्टर जैसे ही खिड़की खोलकर बैठता, वैसे ही पास ही जमींदार साहब की पुत्री की स्मृति में बन रहे कन्या पाठशाला भवन का निर्माण कार्य आरम्भ हो जाता।
छत पीटती सन्थाल युवतियों की आकर्षक पदचाप का मृदु संगीत उसके अध्ययनशील चित्त को नीरस जीवविज्ञान की पुस्तकों से उत्कोच देकर, फुसला रहे किसी लम्पट व्यसनी मित्र की ही भाँति खींच ले जाता।

 

‘राजा गेलो सरके-सरके
रानी गेलो काँची सरके
ओ राजार छाता पड़े गेलो जले
रानी हाँसिलो मने मने।’

 

(राजा पक्की सड़क पर चल रहा है, रानी कच्ची सड़क पर।–राजा का छाता पानी में गिर पड़ा और रानी मन-ही-मन हँसने लगी।)

कभी-कभी सरल सन्थाल भाव-व्यंजना सुनकर युवा डॉ़क्टर मन-ही-मन हँसने लगता। फिर देखता, पतली रज्जुसोपान के टेपोज पर किसी सर्कस सुन्दरी की सहज भंगिमा से चल रही कतारबद्ध सन्थाल किशोरियाँ खिलखिलाती गारा-सीमेंट ढो रही हैं। साँचे में ढले अंग, चिकना मोहक मरोड़ में बँधा पंखे के आकार का सन्थाली जूड़ा काले कोबरा की-सी चिकनी काली खमकती नंगी पीठ, घुटनों तक बँधी धोती और चेहरे के काले रंग का विरोधाभास प्रस्तुत करता लाल जवा का फूल। कभी किसी सुडौल वक्षस्थल से अचानक ही उस युवा डॉक्टर की निर्दोष आँखें टकरा जातीं और वह सहमकर आँखें फेर लेता, पर जिन्हें देखकर वह लजाकर आँखें फेरता, उन्हें लजाने का न अवकाश था, न चिन्ता। शायद उसका चित्त पढ़-लिखकर सयाना हो गया था और उन अनपढ़,प्रकृति की निर्जन वनस्थली में जन्मी-पली वन-कन्याओं का चित्त था शिशु-सा निष्कपट, निर्दोष। अबोध शिशु को क्या कभी अपने नग्न अंगों की लज्जा डस सकती है ? कभी-कभी ठेकेदार के कर्कश स्वर में, एक ही नाम की बार-बार आवृत्ति होती, ‘अरी चाँदमनी, तू छोकरी अपने को समझती क्या है री ? अपने इस रूप का इतना घमंड क्यों है री तुझे ? अतिरूप से ही जनकसुता हरी गई थी, इतना याद रख छोकरी ! तब से बस एक ही तसला गारा लाई है !’


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