जिन्दगी के रंग - कृष्णा खन्ना Jindagi ke Rang - Hindi book by - Krishna Khanna
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जिन्दगी के रंग

कृष्णा खन्ना

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :112
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5201
आईएसबीएन :978-81-7043-709

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श्रेष्ठ कविता-संग्रह...

Jindagi Ke Rang

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

अपनी प्रथम काव्यकृति ‘ज़िन्दगी के रंग’ में मैंने सरल भाषा में अपने पाठकों को लिए रोज़मर्रा के जीवन से साधारण विषयों को लेकर काव्य का आनन्द उत्पन्न करने की कोशिश की है। ‘सर्वजन हिताय’ भावना से प्रेरित होकर इस पुस्तक द्वारा मैं इसके विद्वान पाठकों में सकारात्मक सोच भरना चाहती हूँ ! मैं स्वयं को खुशकिस्मत समझूँगी यदि मैं अपना यह लक्ष्य प्राप्त कर लूँ।

इस संग्रह की कविताओं को निम्नलिखित वर्गों में रखा जा सकता है-
1.    सामाजिक एकता व सद्भाव की कविताएँ
2.    देशभक्ति की कविताएँ
3.    बच्चों के ऊँचे इरादों की कविताएँ
4.    प्रकृति के चित्रण को मानवीय भावनाओं से जोड़नेवाली शिक्षाप्रद कविताएँ
5.    जीवन के द्वन्द्व, सुख-दुख व खट्टी-मीठी यादों पर कविताएँ
6.    सपनों के कमाल की कविता
7.    समय की अहमियत पर कविताएँ
8.    अच्छा इन्सान बनने को प्रेरित करती कविताएँ
9.    आधुनिक हालात पर कविताएँ

-कृष्णा खन्ना

कविता पर श्री चंचल जी द्वारा लिखा विचार


1.    चंचल उड़ान-‘यह उड़ान इसी तरह जारी रहे’
2.    अहसास-‘जब तक अहसास ज़िन्दा है, इन्सानियत ज़िन्दा है और जीवित हैं वो लोग जो मर तो गए पर अपने होने का अहसास करा गए।’
3.    काश ! कहीं यह मन न होता- ‘मन का न होना कई चिन्ताओं से मुक्ति अवश्य देता है पर मन का न होना भी तो चिन्ता का विषय ही है और यह भी तो मन ही है जिसने आपसे इस सुन्दर-सी रचना का निर्माण करवाया।’
4.    सपनों के रंग- ‘सपने सच होते हैं, यह तो नहीं जानता पर ‘‘सपनों के रंग’’ सपनों का सच है।’
5.    यादें- ‘काश-यह यादें न होकर सच होता और हम उसी काल में लौट जाते। आपकी कविता ने समय के चक्र को रोक दिया।’
6.    आँसू- ‘आँसू अपने आप में ही एक भाषा है और इस भाषा को आपने सहज में ही सरल बना दिया है।’
7.    अनुभूति- ‘शिक्षक की मन:स्थिति एक शिक्षक ही समझ सकता है और इस सम्बन्ध में आपकी लेखनी कामयाब है।’
8.    सच्चा मित्र- ‘कविता में पत्राचार की व्यवहारिकता बहुत रुचिकर लगी-पत्र भी पात्र हो सकते हैं, यह आज पता चला।

चंचल उड़ान


कैसी है अद्भुत, इस मन की गति,
क्या बनना चाहा, क्या बना गई नियति।
ख्यालों में ही बहला लेते हैं इसे (क्योंकि),
‘जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि’।

काश ! मैं होती ‘चंचल पँछी’
विचरण खुले गगन में करती।
अनुपम आनन्द की अनुभूति में,
देखती मैं हर ऋतु बदलती।

‘वर्षा’ बन धरा की प्यास बुझाती,
हो ‘वसन्त’ सुमन-सुगन्ध बिखराती,
जब गर्मी सबको झुलसाती
शीत ऋतु बन कर सहलाती।

होती ‘वृक्ष’ तो देती छाया,
और निज पत्तों से हरियाली,
जीवनडोर टूटने पर भी,
मानव को देती खुशहाली।

गर मैं होती ‘पावन नदिया’,
दर्दे-इन्सां मैं हर लेती,
बदी डुबो देती निज जल में,
धरती पर रह जाती नेकी।

पर्वत जैसे अडिग इरादे,
मेरे जल का साथ निभाते,
मानव का छल, वैर, द्वेष-सब,
मेरी लहरों में बह जाते।

सूर्योदय देता मुझे स्फूर्ति,
सूर्यास्त की लालिमा, खूबसूरती,
चन्दा की चाँदनी शीतल करती,
रात्रि कोलाहल को हरती।

काश ! मैं होती शान्तिप्रिय ‘भारत की धरा’
विदेशी जन देखते गुण जो मुझमें भरा।
मिली है इस मृदु-माटी में सभ्यता,
याद वे करते सदा, भारतीयों की ‘नम्रता।


हमारा भारत महान



हिन्दू मुस्लिम, सिख औ क्रिस्तान,
पहचान है सभी की प्यारा हिन्दुस्तान,
भारत है दिल हमारा और भारत ही ईमान,
भारतीय हैं हम, हमारा भारत महान।
सभी मिलकर प्यार से रहते हैं यहाँ,
भारत की पावन मिट्टी को करते हैं प्रणाम।
ईद पर मिलती सिवइयाँ, होली पर लगता गुलाल,
गुरुपर्व पर मिले प्रसाद, नया वर्ष लाए सान्ता क्लॉज।


भारतीयता



संस्कृति भारत की हर भेद मिटाने आई,
भारतीय हैं सभी-हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई,
धर्म भले हों जुदा हमारे पर हम हैं भाई-भाई,
हम सबके मिलकर रहने से भारत भूमि मुस्काई।

राष्ट्र-धर्म है सर्वोपरि, यही हमारी शान,
तत्पर रहते सभी देश पर, होने को कुर्बान,
भारतीयता ही है हम सब भाइयों की पहचान,
भारत ही आत्मा है हमारी, भारत ही है जान।

फूट डालने आए कोई, पल में लें पहचान,
चाल जानते ही उसकी, हो जाएँ सावधान,
प्रभु, खुदा, गुरु और यीशु-सबका यह फरमान,
‘सब मेरे बन्दे हैं’ जान ले ऐ भोले इन्सान।


भारत के नन्हें-मुन्ने (कव्वाली)



गर हमको इक मौका दो, हर काम करके दिखला देंगे,
भारत के हम नन्हें-मुन्ने, पूरा जोर लगा देंगे।

बाग की जिम्मेदारी दो, उसे फूलों से महकाएँगे हम,
बंजर भूमि को मेहनत से, हम उपजाऊ बना देंगे।

न समझो हमें नन्हें-मुन्ने, हमने तो मन में ठानी है,
दुश्मन कोई भी हो सन्मुख, हम उसके छक्के छुड़ा देंगे।

भारत का हित हर पल सोचे, सच्चा वह हिन्दुस्तानी है,
देश है जाति-धर्म से ऊपर, हम यह लहर बहा देंगे।

अनपढ़ न रहेगा कोई यहाँ, ऐसा होगा मेरा हिन्दोस्तान,
पढ़ने से ही मिलती है प्रगति, हम सबको समझा देंगे।

अपना प्यार लुटा हम पर, इस भूमि ने जो आशा की है,
उसको पूरा करने को, भारत खुशहाल बना देंगे।

हम सबकी लगन व मेहनत से, पहुँचे भारत सबसे आगे,
भारत माँ के इस सपने को, हम साकार बना देंगे।


सुनिए क्या कहती है कुदरत ?



बनो सूर्य सम तेजवान,
न करो कभी खुद पर अभिमान,
रंग-रूप का भेद न जाने
निज ऊर्जा करे सबको दान।

नदियाँ व झरने निज जल से,
हर प्यासे की प्यास बुझाएँ,
सबको सुख पहुँचाने को,
चाँद भी शीतलता बरसाए।

छू लो आकाश की ऊँचाई,
बनो पर्वत सम तुम उदार,
जड़ी-बूटी अपनी देकर जो,
करता मानव का उद्धार।

धन्य-धन्य ईश्वर की कुदरत,
सूर्य, चाँद, सावन की घटा,
दान करना सिखलाए सबको,
यही है इसकी अनुपम छटा।

आकाश दे रहा यह सन्देश,
मेरी तरह सब पर छाओ,
इन्साँ रूप में आए हो तो,
दूसरों को सुख पहुँचाओ।

देती है अनाज व फल,
जो भी इसमें बोया जाए,
सहनशील इतनी है धरा कि,
भला-बुरा सब बोझ उठाए।

परोपकार पेड़ों से सीखो,
फल इन्साँ के लिए गिराएँ,
छाया, हरियाली दें सबको,
वातावरण को शुद्ध बनाएँ।

गिरा फूल दे यह सन्देश,
दु:ख होते केवल अपने,
जब तक दम है बाँटों खुशियाँ,
सुख मिलते हैं ज्यों सपने।


अहसास



कई काम आता मानव के, कहलाता हूँ फूल।
रंग सुगन्ध बिखेरूँ मानव, देव धरा हो या धूल।।
व्यक्ति-विशेष से मिलना हो तो पड़े जरूरत मेरी।
पूजा खातिर मुझे ढूँढ़ते, चुनते करें न देरी।।

मान-प्यार का हूँ प्रतीक, मैं नारी केश सजाता।
प्रभु चरणों में शीश झुकाकर, मैं कोमल बन जाता।।
रंग-बिरंगी माला बनकर, मैं इतना इतराता।
प्रकृति और मानव का श्रम ही मेरा भाग्य विधाता।।

शादी ब्याह न होता मुझ बिन, मण्डप में हर्षाता।
अर्थी भी तो सजती मुझसे, नर जिस पल मर जाता।।
जैसा अवसर होता मानव वैसे हँसता रोता।
कोई न जाने कौन जागता, कौन कहाँ है सोता।।

कली टूट जाने पर जैसे बाग शून्य हो जाता।
नई कली खिलने पर माली है बेहद इतराता।।
मानव क्यों दु:ख में है रोता, क्यों सुख में मुस्काता ?
लेकिन मेरी हृदय-वेदना, कोई समझ न पाता।।

काम सभी के मैं आऊँ और खुशबू मैं बिखराऊँ।
लेकिन जब भी कुचला जाऊँ, यह अहसास दिलाऊँ।।
मुझे कुचलने से क्या होगा, कैसे मैं समझाऊँ।
नष्ट करेगा तुम्हें स्वार्थ, यह बात तुम्हें बतलाऊँ।।

अन्तर-व्यथा सभी से पूछे, रे मानव ! यह कैसा काम।
जो सबको सुख पहुँचाता है, उसका जीवन किया तमाम।।
नत मस्तक हो नमन करो, यह फूल सभी के आता काम।
निज सुगन्ध से कुछ क्षण तक जो महका देता सबकी शाम।।


काश ! कहीं यह मन न होता



अच्छा-बुरा अनुभव न होता,
दर्द के बाण न कोई चुभोता,
न कोई हँसता, न कोई रोता। काश ! कहीं...

इसके कारण ही हर उलझन,
नाग बनी डसती मानव को,
पीड़ा का कारण न होता ! काश ! कहीं....

दुख सब परेशां हो जाते,
कब, कैसे वो किसे सताते,
जब कोई क्रन्दन न होता ! काश ! कहीं...

सुख भी दूर खड़े मुस्काते,
किसी को वे कैसे बहलाते,
आनन्द का दर्पण न होता। काश ! कहीं...

इच्छाएँ सारी सो जातीं,
भावनाएँ भी खो जातीं,
ज़ज्बातों का सृजन न होता ! काश ! कहीं....

आशा की कोई चाह न होती,
निराशा की परवाह न होती,
मधुर-भयावह स्वप्न न होता ! काश ! कहीं....

ग़म व खुशी दोनों से दूर,
चैन की नींद यह मानव सोता,
काँटों भरा दामन न होता ! काश ! कहीं....

वश में करना चंचल मन को,
सबके बस की बात कहाँ,
चिन्ता का कहीं चरण न होता ! काश ! कहीं....


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