चुनी हुई कविताएँ - अटल बिहारी वाजपेयी Chuni Hui Kavitayen - Hindi book by - Atal Bihari Vajpai
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चुनी हुई कविताएँ

अटल बिहारी वाजपेयी

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :124
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5156
आईएसबीएन :81-7315-612-3

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स्वाभिमान, देशानुराग, त्याग, बलिदान, अन्याय के प्रति विद्रोह एवं आस्था, समर्पण को उजागर करती कविताएँ....

Chuni Hui Kavitayen

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कवि-हृदय राजनेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी संवेदनशील मन के ओजस्वी रचनाकार हैं। राजनीति में सक्रिय रहते हुए भी उनके संवेदनशील और हृदयस्पर्शी भाव कविताओं के रूप में प्रकट होते रहे। उनकी कविताओं ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई और पाठकों द्वारा सराही गईं। उनकी कविताओं में स्वाभिमान, देशानुराग, त्याग, बलिदान, अन्याय के प्रति विद्रोह आस्था एवं समर्पण का भाव है।

प्रस्तुत काव्य संकलन में संकलित कविताएं इस मायने में विशिष्ट हैं कि ये स्वयं अटलजी द्वारा चयनित हैं। इनका एक अन्य आकर्षक और विशिष्ट पक्ष है इनका प्रस्तुतिकरण। ये कविताएँ सुंदर और कलात्मक हस्तलिपि में तथा ललित-सुंदर भाव-चित्रों से आकंठ सज्जित हैं। कविताओं में स्थित समस्त भाव अपने चित्रों में इस कलात्मकता एवं कुशलता से रचित हैं कि चित्रों को देखकर ही कविताओं का भाव सहज दृष्टिगत हो जाता है।

अपनी बात


कविता मुझे घुट्टी में मिली थी।
मेरे पितामह संस्कृत भाषा तथा साहित्य के अच्छे विद्वान थे। घर की एक बैठक पुरानी पोथियों से भरी हुई थी। वे जहाँ जाते वहाँ से अच्छी-अच्छी पुस्तकें ले आते थे। ज्योतिष का उनका गहरा अध्ययन था। दूर दूर से लोग उन्हें जन्मपत्रियाँ दिखाने के लिए लाते थे।

एक बार गाँव का एक लड़का परिवार से रूठकर घर छोड़कर चला गया। कहाँ गया, किसी को पता नहीं था। उसके पिता बेटे की जन्मपत्री लेकर पितामह के पास आ गये। बाबा ने एक मंत्र कागज पर लिखकर दिया। यह हिदायत भी दी कि मंत्र उसके किसी कपड़े में बांध दिया जाए। दो तीन दिन बाद वह लड़का जब सचमुच वापस आ गया तो गाँव में बडी धूम मची। लेकिन पितामह का ध्यान ज्योतिष से अधिक साहित्य में था।
पिताजी श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी बटेश्वर से आकर ग्वालियर में बस गए थे। उन्होंने बदलते हुए वक्त को देखकर अंग्रेजी का पठन प्रारम्भ किया। खड़ीबोली के साथ ब्रजभाषा में लिखी उनकी कविताएँ और सवैये काफी पसंद किए जाते थे। बटेश्वर से ग्वालियर पहुँचकर साहित्य के लिए बड़ा क्षेत्र प्राप्त हुआ। रियासत के मुखपत्र ‘जीयाजी प्रताप’ में उनकी कविताएँ नियमित रूप से छपती थीं।

जब यह तय हुआ कि ग्वालियर रियासत का अपना गीत होना चाहिए तो यह काम पिताजी को सौंपा गया। गीत ऐसा होना चाहिए था जो सरलता से गाया जा सके। उसमें सिंधिया परिवार और ग्वालियर की कीर्ति का गान जरूरी था। पिताजी द्वारा लिखा गीत पूरी रियासत में प्रचलित था। उसका नियमित रूप से गायन होता था। उसकी दो पंक्तियां मुझे अभी तक याद हैं-

हम देश, विदेश कहीं भी हो, पर होगा तेरा ध्यान सदा।
तेरा ही पुत्र कहाने में होगा हमको अभिमान सदा।।


पिताजी ने और भी कविताएँ लिखी थीं, किंतु उनके प्रकाशन की ओर ध्यान नहीं दिया। वे इधर-उधर बिखर गईं।
पिताजी की हिंदी और अंग्रेजी के साथ उर्दू पर भी अच्छी पकड़ थी। उन दिनों बच्चों के लिए उर्दू अनिवार्य थी। रियासत में प्रतिवर्ष होनेवाले गणेशोत्सव में पिताजी के भाषण नियमित रूप से होते थे। पिताजी की विद्वता का आकलन इसी से किया जा सकता है कि वे स्वयं मैट्रिक पास होते हुए भी दसवीं कक्षा को पढ़ाते थे। बाद में उन्होंने बी.ए. की परीक्षा पास की। एम.ए. का ज्ञान भी प्राप्त किया। स्कूलों के इंस्पेक्टर के रूप में रिटायर होने के बाद कानून का अध्ययन करने की ठानी।

25 दिसंबर ! पता नहीं कि उस दिन मेरा जन्म क्यों हुआ। बाद में, बड़ा होने पर, मुझे यह बताया गया कि 25 दिसंबर ईसा मसीह का जन्मदिन है, इसलिए बड़े दिन के रूप में मनाया जाता है। मुझे यह भी बताया गया कि जब मैं पैदा हुआ तब पड़ोस के गिरिजाघर में ईसा मसीह के जन्मदिन का त्योहार मनाया जा रहा था। कैरोल गाए जा रहे थे। उल्लास का वातावरण था। बच्चों में मिठाई बाँटी जा रही थी।

बाद में मुझे यह भी पता लगा कि बड़ा दिन हिंदू धर्म के उन्नायक पं मदन मोहन मालवीय का भी जन्मदिन है। मुझे जीवन भर इस बात का अभिमान रहा कि मेरा जन्म ऐसे महापुरुषों के जन्म के दिन ही हुआ।
मुझे यह बात अभी तक अच्छी तरह से याद है कि  मेरे पिताश्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी मेरी अँगुली पकड़कर मुझे आर्य समाज के वार्षिकोत्सव में ले जाते थे। उपदेशकों के सस्वर भजन मुझे अच्छे लगते थे। आर्य विद्वानों के उपदेश मुझे प्रभावित करने लगे थे। भजनों और उपदेशों के साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम की बातें भी सुनने को मिलती थी।
क्या यह एक संयोग मात्र था ? क्या इसके पीछे कोई विधान था ? घर में साहित्य प्रेम का वातावरण था। मैंने भी तुकबंदी शुरू कर दी। मुझे याद है कि मेरी पहली कविता ‘ताजमहल’ कुछ इस तरह थी-


ताजमहल, यह ताजमहल,
कैसा सुंदर अति सुंदरतर।


किंतु ताजमहल पर लिखी गई यह कविता केवल उसके सौंदर्य तक ही सीमित नहीं थी। कविता उन कारीगरों की व्यथा तक पहुंच गई थी, जिन्होंने पसीना बहाकर जीवन खपाकर ताजमहल का निर्माण किया था। कविता की अंतिम पंक्तियां मुझे अभी तक याद हैं-


जब रोया हिंदुस्तान सकल,
तब बन पाया यह ताजमहल।


निश्चय ही उन दिनों मुझे आर्य विद्वानों के साथ-साथ कम्युनिस्ट क्रांति प्रभावित करने लगी थी। आज जब भी मैं उन दिनों की बात सोचता हूँ तो अपने अधकचरे मन की तसवीर मेरे सामने खड़ी हो जाती है।
मुख्य रूप से मैंने देशभक्ति से परिपूर्ण कविताएँ लिखी थीं। कवि सम्मेलनों में उनकी माँग थी। लोग उन्हें पसंद करते थे। वीर रस की कविताएँ पसंद की जाती थीं।
कविता के साथ उन दिनों नौजवानों में वक्तृत्व कला की प्रतियोगिताएँ हुआ करती थीं। ओजस्वी कवि श्रोताओं द्वारा पसंद किए जाते थे। आजादी के आंदोलन से ऐसे नौजवानों को प्रेरणा मिलती थी।

यह उन दिनों की बात है जब मैं विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर में पढ़ा करता था। पढ़ाई-लिखाई के साथ साहित्य में भी मेरी रुचि थी। मैं कॉलेज में छात्र संघ का पहला प्रधानमंत्री और फिर उपाध्यक्ष चुना गया था। अध्यक्ष उन दिनों कोई प्रोफेसर हुआ करता था। छात्र संघ की जिम्मेदारी थी कि वह वार्षिक उत्सव का आयोजन करे।
मुझे याद है कि छात्र संघ ने एक साल कॉलेज में कवि सम्मेलन करने का फैसला किया। ग्वालियर से बाहर के कवि भी आमंत्रित किए गए थे। यह तय हुआ कि कॉलेज के वार्षिक समारोह में महाकवि निरालाजी को आमंत्रित किया जाए। उन दिनों श्रीमती महादेवी वर्मा तथा श्री सुमित्रानंदन पंत की बड़ी धूम थी। निरालाजी को आमंत्रित करने का काम प्रो. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ को सौंपा गया। कॉलेज के लिए यह बड़े गौरव का दिन था।

जब हम निरालाजी को रेलवे स्टेशन से उनके ठहरने की जगह ले जा रहे थे, एक ऐसी घटना हुई जो जीवन भर प्रभावित करती रही। हुआ यह कि जब तांगा उस सड़क से निकला जिसपर महारानी लक्ष्मीबाई स्मृति चिह्न बना हुआ था, तो निरालाजी ने उस वीरांगना को नमन करने के लिए ताँगा थोड़ी देर रुकवा लिया। उनकी नजर लक्ष्मीबाई के स्मारक के निकट बैठी एक निर्धन महिला पर गई। वह महिला सर्दी से अपने को बचाने के प्रयास में लगी थी। जैसे ही निरालाजी की नजर उस महिला के ऊपर गई, तो महाकवि ने अपना कंबल उतारकर उस महिला को ओढ़ा दिया। हम सब यह देखकर दंग रह गए।
निरालाजी के महान् व्यक्तित्व की एक छोटी सी झलक पाकर हम लोग भाव-विभोर हो गए। घर पहुँचने पर हमने निरालाजी के लिए अलग से एक कंबल का प्रबंध किया। लेकिन निरालाजी द्वारा सर्दी से ठिठुरती हुई महिला को कंबल देने की घटना हमारे मानस-पटल पर सदैव के लिए अंकित हो गई।

विक्टोरिया कॉलेज से संबंधित और एक घटना मुझे याद आ रही है। छात्रसंघ की ओर से रात्रि में कवि सम्मेलन का आयोजन था। प्रतिवर्ष की भांति उस साल भी स्थानीय कवियों के साथ बाहर से कवियों को भी निमंत्रित किया गया था। विक्टोरिया कॉलेज के प्रिंसिपल प्रो. पियर्स सम्मेलन देखने के लिए स्वयं आए थे। हॉल खचाखच भरा था, लेकिन कुछ कवियों के मंच पर आने में विलंब हो रहा था। वे अवसर के अनुरूप सजने-धजने में लगे हुए थे।

जब ज्यादा देर होने लगी और छात्रों के धैर्य का बाँध टूटने लगा तो मैंने एक साहसपूर्ण निर्णय लिया। मैं मंच पर चला गया और घोषणा कर दी कि कुछ कवियों और शायरों के आने में देर हो रही है, श्रोता अधिक विलंब के लिए तैयार नहीं है, इसलिए कविता-पाठ स्थगित किया जाता है। श्रोता अपने घरों के लिए प्रस्थान करें। पूरे सभा-भवन में सन्नाटा छा गया। छात्र कविता के शौकीन थे। कवियों को सुनना चाहते थे। लेकिन कुछ कवियों द्वारा मंच पर आने में अत्यधिक विलंब किए जाने के कारण छात्र बिगड़ गए। तब तक कुछ कवि मंच पर पहुँच चुके थे। वे नौजवानों से अपील कर रहे थे कि वे अब कविता सुनकर ही जाएँ, किंतु छात्रों ने नहीं माना। मेरे यह कहते ही कि अब सम्मेलन भंग किया जाता है, सब छात्र सदन के बाहर चले गए। बाद में फिर जब कभी सम्मेलन होते थे तो कवि समय से आने का ध्यान रखने लगे थे।

मैंने विक्टोरिया कॉलेज ग्वालियर से स्नातक की परीक्षा पास की थी। आगे पढ़ने का इरादा जरूर था लेकिन साधनों का अभाव था। ग्वालियर की रियासत मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति दिया करती थी। इनमें दक्षिण से आए क्षत्रिय छात्र अधिक होते थे।

मैंने बी.ए. पास करते-करते अच्छा नाम कमा लिया था। मेरे भाषण शौक से सुने जाते। मेरी कविताएँ भी पसंद की जाती थीं। ग्वालियर रियासत में मेरा नाम भी हो गया था। जब उच्च शिक्षा के छात्रों का चयन होने लगा तो मुझे भी उसमें मौका मिल गया।

ग्वालियर के छात्र आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध होने के कारण कानपुर जाते थे। कानपुर में डी.ए.वी. कॉलेज और सनातन धर्म कॉलेज दोनों का बड़ा नाम था। मैंने डी.ए.वी. कॉलेज में प्रवेश लिया। कॉलेज का भवन काफी विशाल था। छात्रावास में उसके छात्रों के रहने की व्यवस्था सरलता से हो जाती थी। मैंने छात्रावास में रहने का निश्चय किया।

पिताजी ने जब यह सुना तो उनके मन में उच्च शिक्षा प्राप्त करने की जो इच्छा थी, वह फिर जाग्रत हो गई। उन्होंने ग्वालियर छोड़कर कानपुर के डी.ए.वी. कॉलेज में पढ़ने का फैसला किया। उनके लिए कॉलेज में भरती होना और कानून की पढ़ाई करना बड़ी चर्चा का विषय बना। पिता पुत्र साथ-साथ इस शीर्षक से अखबारों में खबरें छपीं।

डी.ए.वी. कॉलेज छात्रावास के वे दिन मुझे अभी भी अच्छी तरह याद हैं। पिता और पुत्र एक ही कमरे में रहते थे। पिताजी को हाथ का खाना पसंद था। इससे हमें भी अच्छा खाना मिल जाता था। रोज रात को सोने से पहले दूध निश्चत रूप से मिला करता था। अन्य छात्र दूध के प्रति प्रेम देखकर उसकी चर्चा किया करते थे।
दुग्धपान के संबंध में एक घटना स्मरणीय है। एक रात पं. दीनदयाल उपाध्याय भ्रमण करते हुए मेरे घर ग्वालियर पहुँच गए। मैं घर में नहीं था। पिताजी ने उनका स्वागत-सत्कार किया। रात को जब सोने का वक्त हुआ तो उपाध्यायजी के लिए पिताजी दूध से भरा एक गिलास लेकर पहुंचे। उपाध्यायजी आश्चर्य में पड़ गए। उनको रात में दूध पीने की आदत नहीं थी। पिताजी रात में बिना दूध पिए और पिलाए सो नहीं सकते थे। जिस प्रेम से पिताजी ने अतिथि को दुग्घपान कराया उससे यह छोटी सी घटना दूर-दूर तक फैल गई। जो रात में दूध पीना नहीं चाहते थे, उन्होंने ग्वालियर में मेरे घर पर रुकना बंद कर दिया।

दूध से संबंधित एक और घटना है, जो श्री यज्ञदत्त शर्मा से जुड़ी हुई है। उन्हें दूध पीने का बड़ा शौक था। प्रवास में जहाँ जाते, दूध की फरमाइश किए बिना नहीं रह सकते थे। लेकिन सब जगह दूध का मिलना मुश्किल था। दक्षिण भारत में प्रवास के दौरान एक घर में रात को सोने से पहले एक छोटे से गिलास में दूध पेश किया गया। यज्ञदत्तजी को पूरे पंजाबी गिलास की आदत थी। संकोचवश कुछ बोले नहीं। सुबह पानी बड़े गिलास में आया तो कुछ आशा जगी, शायद रात में दूध भी बड़े गिलास में आएगा, लेकिन दूध फिर उसी छोटे गिलास में लाया गया। सुबह फिर पानी से भरे बड़े गिलास को देखते ही करबद्ध होकर उसको प्रणाम किया और पूछा-भगवन् आप रात में कहाँ रहते हो ? सारा परिवार हँसने लगा। श्री यज्ञदत्त शर्मा का दुग्ध प्रेम अखिल भारतीय स्वरूप धारण कर बैठा। इस तरह के और भी विनोद व हास्य के प्रसंग चलते रहते थे।

आज बरसों बाद, ऐसी गुदगुदानेवाली घटनाएँ स्मृति-पटल पर उभरकर खड़ी हो जाती हैं।
डी.ए.वी. कॉलेज कानपुर से एम.ए. करने के पश्चात् मेरे सामने कई रास्ते खुले थे। मैं कानून की शिक्षा पूर्ण कर वकालत कर सकता था। ग्वालियर राज्य मुझे कॉलेज में प्राध्यापक का दायित्व देने के लिए तैयार था। तीसरा रास्ता यह था कि मैं पत्रकारिता के क्षेत्र को अपनाता और कलम के माध्यम से राष्ट्र की सेवा करता। ग्वालियर में प्राध्यापक का पद स्वीकार करने में एक कठिनाई थी। मेरी एम.ए की पढ़ाई पर राज्य ने जो खर्च किया था, वह धन मुझे लौटाना पड़ता।
यहाँ भविष्य का एक चौथा रास्ता खुलता हुआ दिखाई दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पत्रकारिता के जगत् में प्रवेश करना चाहता था। एक नया साप्ताहिक पत्र निकालने की उनकी योजना थी। संघ ने मुझे अपने पत्र में काम करने के लिए बुलाया।

मुझे पत्रकारिता का कोई अनुभव नहीं था। लखनऊ जाकर संपादन का दायित्व सँभालने की पूरी तैयारी भी नहीं थी। लेकिन यह कठिनाई भी हल हो गई। श्री भाऊराव देवरस ने पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। सहायता के लिए पं. दीनदयाल उपाध्याय तैयार थे। रीवा के श्री राजीव लोचन अग्निहोत्री साहित्य में रुचि रखते थे। उन्होंने बड़ी खुशी से लखनऊ आकर नए साप्ताहिक पत्र का भार सँभालना स्वीकार कर लिया।

श्री राजीव लोचन अग्निहोत्री और मैं नए पत्र ‘राष्ट्रधर्म’ को सँभालने के लिए तैयार हो गए। हम दोनों में से किसी को पत्रकारिता का अनुभव नहीं था। किसी विषय पर लेख लिखना सरल है, किंतु किसी नए पत्र के संपादन का भार सँभालना एक चुनौती भरा दायित्व था। प्रूफ पढ़ने से लेकर संपादन तक की जिम्मेदारी उठानी थी।

‘राष्ट्रधर्म’ के प्रथम अंक का साहित्य जगत् में स्वागत हुआ। हम पत्र के अच्छे स्तर को कायम रखने के लिए सजग थे। ‘राष्ट्रधर्म’ ने शीघ्र ही एक अच्छे साप्तहिक के रूप में स्थान ग्रहण कर लिया। पत्र की सफलता देखकर एवं एक और साप्ताहिक पत्र की आवश्यकता को देखकर राष्ट्रधर्म प्रकाशन मंडल ने साप्ताहिक ‘पाञ्चजन्य’ के प्रकाशन का फैसला किया। थोड़े ही समय में ‘पाञ्चजन्य’ ने भी पत्रकारिता जगत् में अपना स्थान बना लिया। ‘राष्ट्रधर्म’ विचार प्रधान था ‘पाञ्चजन्य’ ने प्रचार का मोरचा सँभाला। ऐसे पत्रों की आवश्यकता थी जो राष्टवाद के पोषक हों और जो समाज जीवन के सभी क्षेत्रों में अपना स्थान बना लें।

‘राष्ट्रधर्म’ ‘पाञ्चजन्य’ दोनों पत्रों को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था। जो वामपंथी थे वे हमें सांप्रदायिकता की श्रेणी में बिठाने के लिए तुले हुए थे। सांप्रदायिकता क्या है ? राष्ट्रीयता का सही मापदंड क्या हो ? इन प्रश्नों पर विवाद छिड़ गया। दोनों पत्रों ने अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखा। दोनों पत्र प्रखर राष्ट्रवाद के संबल बन गए।
सरकार नियमों का इस ढंग से पालन कराती थी कि पत्रों का छपना ही संभव न रहे। जिन दिनों मैं इन पत्रों का संपादन कर रहा था, उनमें प्रेस की स्वतंत्रता पर ऊपर से देखने में कोई अंकुश नहीं था, लेकिन जिन प्रेसों में वे छापे जाते थे उन पर ही ताला जड़ दिया गया। नतीजा यह हुआ कि एक पत्र के बंद होने पर दूसरा पत्र निकालने की होड़ लगी और सरकार के साथ यह आँख-मिचौली का खेल चलता रहा। इस सबका परिणाम यह हुआ कि पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्ध लोग राजनीति में आने के लिए विवश हुए। इस तरह छलावे की नीति से सरकार क्या प्राप्त करने में सफल हुई, इसकी मुझे अभी तक जानकारी नहीं मिली है।
एक पत्रकार के नाते यह मेरा अनुभव है कि सरकार पत्रों का गला घोंटने का मन बना ले तो उसके तरकस में ऐसे कई तीर आसानी से मिल जाएँगे जो साँप मरे और लाठी भी न टूटे की कहावत को चरितार्थ करें।

उस समय की परिस्थितियों में एक नया राष्ट्रवादी दल गठित करने का फैसला हुआ। यह एक लंबी कहानी है। नेहरू मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र देने के बाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी किसी ऐसे मंच की तलाश में थे जो कांग्रेस सरकार की बढ़ती हुई तानाशाही पर अंकुश लगाने के लिए तैयार हो और जिसके पीछे जनता सहज, स्वाभाविक रूप से खड़ी हो जाए।
डॉ. मुखर्जी ने सभी मंचों को एक साथ लाने का प्रयास किया। इसमें उन्हें सफलता भी मिली। अनेक दलों को अपनी-अपनी सीमा-रेखाएँ कायम रखते हुए एक सामान्य कार्यक्रम के आधार पर काम करने में कठिनाई नहीं थी।

देश की राजनीति कितने भागों में बँटी हुई है, इसकी थोड़ी अनुभूति पहले से हो रही थी किंतु यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जो दल देश-निर्माण और सांस्कृतिक निष्ठा से परिचालित थे, उनके लिए भी एक मंच पर आना एक मुश्किल काम था। टुकड़ों में बँटी हुई राजनीति एक संगठित शक्ति की अनुभूति कैसे देगी, यह सवाल सामने खड़ा था। डॉ .मुखर्जी के नेतृत्व में नेशनल डेमोक्रेटिव फ्रंट का निर्माण इस दिश में एक ठोस कदम था।
पाँच दशकों से अधिक राजनीतिक यात्रा के बाद भी देश की बँटी हुई राजनीति को जोड़ने की आवश्यकता स्पष्ट दिखाई देती है। जो केवल सत्ता के लिए नहीं अपितु विघटनकारी शक्तियों से लोहा लेकर राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के काम में आगे बढ़ सकें, उनके लिए ऐसे मंच की सार्थकता सदैव रहेगी।

-अटल बिहारी वाजपेयी


भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष और पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ओजस्वी कवि और प्रखर वक्ता हैं। राजनीति में सक्रिय रहते हुए भी उनके संवेदनशील और हृदयस्पर्शी भाव कविताओं के रूप में प्रकट होते रहे। उनकी कविताओं ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई और पाठकों द्वारा सराही गईं। उनकी कविताओं में स्वाभिमान, देशानुराग, त्याग, बलिदान, अन्याय के प्रति विद्रोह, आस्था एवं समर्पण का भाव है।
प्रस्तुत काव्य संकलन में संकलित कविताएँ इस मायने में विशिष्ट है कि ये स्वयं अटलजी द्वारा चयनित हैं। इनका एक अन्य आकर्षक और विशिष्ट पक्ष है इनका प्रस्तुतिकरण। ये कविताएँ सुंदर और कलात्मक हस्तलिपि में तथा ललित सुंदर भाव चित्रों से आकंठ सज्जित हैं। कविताओं में स्थित समस्त भाव अपने चित्रों में इस कलात्मकता एवं कुशलता से रचित हैं कि चित्रों को देखकर ही कविताओं का भाव सहज दृष्टिगत हो जाता है।

इस सुकृत के लिए इन चित्रों और लिपि के शिल्पी प्रतिष्ठित चित्रकार श्री राम कस्तुरे का हार्दिक आभार।

-प्रकाशक






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