फीजी यात्रा आधी रात से आगे - सत्या श्रीवास्तव Fiji Yatra Aadhi Rat Se Aage - Hindi book by - Satya Srivastava
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फीजी यात्रा आधी रात से आगे

सत्या श्रीवास्तव

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :131
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5117
आईएसबीएन :978-81-237-4546

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विभिन्न राष्ट्रों की सामाजिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थतियों का विश्लेषात्मक दस्तावेज

Fiji Yatra Aadhi Rat Se Aage

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

19वीं सदी के आखिरी व 20वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में पूर्वी उत्तर प्रदेश के आचंलिक क्षेत्रों में हजारों लोग रोजी-रोटी की तलाश में सात समुंदर पार गए। ये लोग ‘गिरमिटिया’ यानी अनुबंधित श्रमिक के तौर पर वहाँ गए थे। लंबी समुद्री यात्रा में कई लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े। जी तोड़ मेहनत के साथ पराए देश के लोक-संस्कार, आचार-व्यवहार में स्वयं को जैसे-तैसे ढालकर इन लोगों ने उन वीरान द्वीपों को आबाद कर दिया। फिर वे वहीं के हो गए। डेढ़ सौ साल से अधिक हो गए, फीजी उनका घर तो बन गया, लेकिन वे अभी भी अपनी मातृभूमि भारत को ही मानते हैं।

इस पुस्तक में ऐसे ही लोगों के अनुभवों-यादों को संकलित किया गया है। किसी स्थान को अपना घर कहने के लिए कोई किसी स्थान पर कितनी पीढ़ियों तक रहे ? फीजी में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को अभी भी विदेशी, जड़विहीन और असहाय समझे जाने की वेदना को उभारती इस पुस्तक के फीजी के इतिहास, संस्कृति और लोकजीवन पर भारतीय प्रभाव को दर्शाया गया है।
आत्मजीवनचरित की शैली में लिखी गई यह पुस्तक महज फीजी से जुड़े संस्मरणों का पुलिंदा नहीं है, अपितु यह विभिन्न राष्ट्रों की सामाजिक, राजनैतिक, एव सांस्कृतिक परिस्थितियों का विश्लेषणात्मक दस्तावेज भी है।

लेखक प्रो. ब्रिज वी लाल का जन्म फीजी में ही हुआ। उनके पूर्वज गिरमिटिया के रूप में भारत से यहाँ आए थे। वे आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी, केनबेरा में एशिया व प्रशांत क्षेत्र के इतिहास विषय के प्राध्यापक हैं। वे उन गिने-चुने लोगों में हैं, जिन्होंने फीजी के इतिहास पर काम किया है। लेखक ब्रिज वी. लाल की अन्य पुस्तकें हैं-‘मिस्टर तुलसीज स्टोर : ए फीजीयन जरनी’, ‘चलो जहाजी : आन ए जरनी थ्रू नडेनचुअर इन फीजी’, ‘गिरमिटिया : द ओरीजन आफ द फीजी इंडियंस’, ‘ब्रोकन वेब्स : ए हिस्ट्री आफ फीजी आईसलैंड इन द ट्वेन्टीएथ सेंचुरी।’
अनुवादिका डॉ. सत्या श्रीवास्तव महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय लखनऊ में इतिहास विभाग की विभागाध्यक्ष हैं। उन्होंने फीजी में प्रवासी भारतीय महिलाओं की सामाजिक आर्थिक स्थिति पर शोध कार्य किया है।

सम्मतियां


‘‘गिरमिटिया एक कल्पनाशील और बहुमूल्य योगदान है...उम्मीद की जाती है कि यह पुस्तक अन्य औपनिवेशिक अनुबंध श्रमिकों पर शोध के लिए आदर्श मानदंड के रूप में स्वीकार की जाएगी।’’
‘गिरमिटया : द ओरीजीन आफ द फीजी इंडियंस’ पुस्तक पर जर्नल आफ पैसिफिक हिस्ट्री
‘‘20वीं सदी का महान इतिहास....इसकी सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें फीजी के इतिहास के आधुनिक और अत्यधिक जटिल व बहुफलकीय पक्षों को एक साथ प्रस्तुत किया है।’’
‘ब्रोकन वेब्स’ पर द कंटेंपररी पैसिफिक : ए जर्नल आफ आईसलैंड अफेयर्स
‘‘विभिन्न जातीय समुदायों पर समृद्ध और मनोरंजक संकलन फीजी में विभिन्न जातियों के सामंजस्य पर-भारतीय फीजी साहित्य को बहुमूल्य योगदान।’’
‘मिस्टर तुलसीज स्टोर’ पर एंड्रयूज अरनो, नृशास्त्री यूनिवर्सिटी आफ हवाई

भूमिका


वर्तमान भारतीय शब्दावली का एक नया और सशक्त शब्द-‘डायस्पोरा’ है। तेज़ी से बढ़ते और विश्वस्तर पर अपनी छाप छोड़ते, भारतीय प्रवासी समुदाय को, भारतीय सरकारों, द्वारा, पहले से कहीं अधिक लुभाया जा रहा है। वार्षिक ‘प्रवासी भारतीय दिवस’-वाणिज्य और व्यापार में, रचनात्मक कलाओं और साहित्य में, सार्वजनिक सेवाओं और छात्रवृत्तियों में व खेलों में, प्रवासियों की उपलब्धियों का उत्सव मनाता है। अनिवासी भारतीयों के मामलों की देखरेख के लिए एक राज्य मंत्री को भी नियुक्त किया गया है। प्रवासी भारतीय भले ही पूर्वजों की संस्कृति के सांझे भागीदार हैं परंतु वे किसी भी तरह से एक समरूप समूह नहीं हैं। वे, शताब्दियों के भटकाव के, परिणाम हैं। उनके ऐतिहासिक अनुभवों, उनके सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोणों और भारत से तथा सभी भारतीयों के प्रति उनकी घनिष्ठता में, विभिन्नता, दृष्टिगोचर होती है।

एक-दूसरे से जुड़े हुए निबंधों का यह संग्रह, एक भिन्न प्रवासी संप्रदाय, फीजी-भारतीय जो, उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों में, शर्तबंध मज़दूरी के परिणामस्वरूप उभर कर सामने आए, के अनुभवों का संकलन है। फीजी के भारतीय शर्तबंध प्रवासी, उन लाखों भारतीयों की तरह थे जिन्हें अफ्रीका, हिंद तथा प्रशांत महासागर तथा कैरिबियन ‘किंग शुगर कॉलोनी’ में भेजा गया। गिरमिट या समझौते, जिसके अन्तर्गत वे गए थे, समाप्त हो गया और कुछ वापस आ गए, परंतु अधिकांश, जड़त्व के कारण, और भारत लौटने के लिए एक लंबी कठिनाईयुक्त यात्रा करने की अनिच्छा से, या नये अवसरों और नई स्वतंत्रताओं से प्रेरित होकर, अपने नये प्रवासों में ही बस गए। विषम और अधिकांशतः क्रूर परिस्थितियों में निचोड़े गए उनके श्रम ने, तृतीय विश्व के अनेक राष्ट्रों की आर्थिक व्यवस्था को सुधारा है।

शर्तबंध मजदूरी के अनुभवों के बारे में अधिकांशतः प्रवासियों के उत्तराधिकारियों द्वारा ही, बहुत कुछ लिखा गया है। सहानुभूति, समझ और कल्पना से युक्त, इनकी रचनाओं ने, गिरमिटियाओं को, जो एक समय में किसी छोटे ईश्वर की सौतेली सन्तान कहलाते थे, आवाज़, शक्ति और मनुष्यत्व प्रदान किया है। इन रचनाओं ने, उनके शर्तबंध अनुभवों को आधुनिक हिस्टोरियोंग्राफी अप्रत्यक्ष और निंदनीय सीमाओं से, सुरक्षित बचा लिया है। इस संग्रह में, मैंने अपने लोगों के-फीजी भारतीयों के कुछ गहन, जीवंत उदाहरणों को प्रस्तुत किया है-उनके डर और आशाएं, उनकी रीति-रिवाज़ जिनका पालन, वे संप्रदाय को बनाए रखने हेतु और उसे उद्देश्य देने के दृष्टिकोण से करते रहे थे, कैसे वे, जीवन का उत्सव और उसके समाप्त होने का दुःख मनाते थे और कैसे भाग्य द्वारा खेली गई क्रूर बाज़ी को उन्होंने अपने हित में करने का प्रयास किया। कहने के लिए क्या कहानी है !

यह एक ऐसा संप्रदाय था, जो अपने दासत्व के सायों से बचने का प्रयास कर रहा था, अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर, प्रतिकूल वातावरण में फंसा, अपनी सीमाओं में जीवनयापन का प्रयास करता हुआ, बिना सहायता अपने दम से नयी शुरुआत करता हुआ। इन गिरमिटियाओं ने, कटुता और एक प्रतिकूल वातावरण में हस्तान्तरण के बावजूद समय के साथ एक सुगठित और संबद्ध संप्रदाय निर्मित किया। इन लोगों ने, जिनकी शुरुआत ही, ‘कुछ नहीं’ से हुई थी, एक पीढ़ी के मध्य ही कितना कुछ पा लिया। कठिन से कठिन एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में मानवीय आत्मा की विजय, एक ऐसी विरासत है जो गिरमिटिया हमारे लिए छोड़ गए हैं।

अलिखित अतीत को शब्दबद्ध करना, जबकि स्मृतियों को भलीभांति संजोया नहीं गया हो और जिसके लिखित दस्तावेज़ भी उपलब्ध न हों, एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इतिहास मेरा विषय रहा है, पर जो इतिहास मैं जानता हूँ वह स्कूल और विश्वविद्यालय में पढ़े हुए इतिहास से भिन्न है। उस समय जोर रटने पर था, ताकि परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ जा सके। सही इतिहास को जानना आवश्यक नहीं था। पढ़ाया हुआ इतिहास लिखित दस्तावेजों में से ही लिया जाता। सत्य अपने को स्वतः बयान करता है। आज जो इतिहास, मैं पढ़ता और लिखता हूं, वह अलग है। मैं, इस विचार में सुखी हूं कि ज्ञान प्रायोगिक और आंशिक, दोनों है। और मैं यही स्वीकार करता हूं कि जो दोहरे विरोध, एक समय में परमपावन समझे जाते थे और पूरे तौर पर स्थापित समझे जाते थे, वास्तव में छिद्रिल और समस्यायुक्त हैं। मैं, यह भी मानने लगा हूं कि परमाणात अध्ययन की अपेक्षा रचनात्मक साहित्य अनुभव की सच्चाई को कभी-कभी अधिक सही रूप में पकड़ता है। जीवन के अनुभूत सत्य को, मैं, अर्ध-कल्पित साधनों द्वारा समझाने का प्रयास करता हूं। मैं, इसे प्रयोगात्मक कथा साहित्य कहता हूं।

इतिहास को रचनात्मक तरीके से, बिना फुटनोटों के, लिखने का विचार मुझे तब आया, जब एक वर्ष के लिए 1970 के दशक के अंतिम वर्षों में, मैं, अपने डॉक्टोरल थीसिस के लिए तथ्य संग्रहीत करने हेतु भारत आया था। मेरा शोध कार्य फीजी के शर्तबंध भारतीयों की पृष्ठभूमि का अध्ययन था। लगभग, छः महीनों के लिए, मैं उत्तरपूर्व भारत के एक ग्रामीण, अशक्त क्षेत्र में रहा जहां से शर्तबंध मजदूर आए थे। यहीं से मेरे दादा-दादी भी आए थे। मैंने धुएं से भरे ढाबों में, चिकनाईयुक्त खाना खाया, मिट्टी के कुल्हड़ों मैं चाय पी, खटमल से भरे बिस्तरों पर सोया, जर्जर बसों में यात्रा की और टूटी-फूटी ‘फॉरेन’ हिंदी में बातचीत की। मैंने शीघ्र ही खोज लिया कि भारत, फील्ड वर्क के लिए, न तो मात्र एक स्थान है और न मात्र एक देश है। फीजी में हम उसकी पौराणिक कथाओं और दन्तकथाओं उसके लोकप्रिय धार्मिक ग्रन्थों, उसके कुछ अधिक ही मिठास भरे हिंदी गानों और फिल्मों के साथ बड़े हुए थे। हमारे छप्पर छाये घरों की बांस की दीवालों पर प्रसिद्ध फिल्मी सितारों की तस्वीरें भरी रहतीं (देवानंद, दिलीप कुमार, राज कपूर, नर्गिस, वहीदा रहमान) और साथ ही कई रंगों वाली देवी-देवताओं की तस्वीरें भी। अपने दादा-दादी की भूमि को देखने जाना मेरे लिए एक अत्यधिक तीव्र और भावनात्मक रूप से झकझोर देने वाला अनुभव था।

मुझे लगा कि जिस अनुभव ने मेरे अतःकरण तक को हिला दिया है और मुझे अपने अस्तित्व से संबंधित प्रश्न पूछने लिए विवश कर दिया है उसे समझना नितान्त आवश्यक है। उस व्यक्तिगत खोज से ही मेरे पहले प्रयास ने जन्म लिया और मैं उन शक्तियों के समायोजन को समझने का प्रयत्न करने लगा। जिन्होंने मुझे गढ़ा है। परंपरागत अध्ययन इस कार्य में अधिक सहायक नहीं हुआ। प्रेरित होकर, अपने खाली क्षणों में, मैं अपने अलिखित अतीत का फिर से अध्ययन करने लगा। इस पुस्तक में संग्रहीत निबंध इन्हीं प्रयासों का प्रतिफल हैं।

यह मेरा सौभाग्य है कि शर्तबंध उत्प्रवास के सभी गंतव्यों पर मुझे जाने का अवसर मिला है : ट्रिनीडाड, गुआयना, सूरीनाम, मॉरिशस, और दक्षिणी अफ्रीका वर्षों से किए गए अपने वार्तालापों और शोध से, मैं, इस परिणाम पर पहुंचा हूं कि कुछ विशिष्ट बातों के विवरण अलग हो सकते हैं परंतु जो मैंने स्मृति के आधार पर कहा है उसकी प्रतिछाया, विश्वयुद्ध के उत्तरार्ध की पीढ़ी में, शर्तबंध, प्रवासियों के अन्य संप्रदायों में भी दृष्टिगोचर होती है। मेरी इस यात्रा में वे अपने व्यक्तिगत क्षणों की सूचक पहचान सकते हैं, अपने ही पदचापों की प्रतिध्वनि सुन सकते हैं। कम से कम, यह आशा तो कर सकता हूं। मैं, यह भी आशा करता हूं कि भारत के पाठक, ऐसे लोगों के दूरस्थ संप्रदाय; जिसने उप-महाद्वीप से बड़ी विषम परिस्थितयों में उत्प्रवास किया और जिनकी राजनैतिक दशा ने, हाल ही के वर्षों में, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मुख्य समाचार निर्मित किए, की विपदापूर्ण गाथा में कुछ रुचिकर और जिज्ञासापूर्ण तथ्य पाएंगे।

मैं गौरवान्वित हूं कि नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, यह पुस्तक प्रकाशित कर रहा है। इस सौभाग्य के लिए डॉ. ज्ञानेश कुदेसिया का आभारी हूं जिन्होंने प्रकाशन हेतु, सर्वप्रथम विचार दिया, और ट्रस्ट के प्रोफेसर बिपिन चंद्रा, जिन्होंने इसका स्वागत किया। मैं, इयान टेम्पिलमैन का भी आभारी हूं जिन्होंने कुछ सम्पादकीय संशोधनों के सहित इन निबंधों को छापने की अनुमति दी। ये निबंध सबसे पहले उन्हीं के प्रेस, पेन्डानस बुक्स, द्वारा प्रकाशित हुए थे-मिस्टर तुलसी का स्टोर: ए फीजियन जर्नी, और बिटर स्वीट : द इण्डो-फीजियन एक्सपीरियन्स’। इयान, सदैव एक मित्र और एक परामर्श दाता रहे हैं। साथ ही, मैं अपने उन सभी मित्रों और परिवारजनों का आभारी हूं जिन्होंने मेरे अकादमिक और लेखकीय जीवन में हमेशा सहयोग और प्रेरणा दी है और जिनके नामों से एक छोटी-सी टेलीफोन पुस्तिका भरी जा सकती है।
विनाका वाका लेवू, धन्यवाद,

ब्रिज वी. लाल, कैनबेरा

जड़े और रास्ते


जहां प्रेम है वहीं हमारी जड़ें हैं,
हम लौटते हैं, उन जगहों पर
जहां यादें हैं,
बंधनों एवं स्थायित्व तथा प्रेम की।

प्रेम माथुर
(हिंदी रूपांतर)

भारतीय शर्तबंध मज़दूरों का पहला प्रेषण 1879 में फीजी गया था। तब फीजी को इंग्लैंड का उपनिवेश बने केवल पांच वर्ष ही बीते थे। सर आर्थर गॉर्डन, फीजी के पहले गर्वनर ने भारत की ओर रुख किया क्योंकि उन्होंने फीजी श्रम का प्रयोग निषेध घोषित कर दिया था। उन्होंने देशी संप्रदाय को व्यावसायिक रोज़गार के बुरे प्रभावों से बचाने के लिए, ऐसा किया था। फीजी उपनिवेश, उस समय निर्धन बाग़ान मालिकों और असहिष्णु विधियों का भण्डार था। साथ ही पड़ोसी प्रशांत महासागर के द्वीपों से श्रमिकों की उपलब्धि अस्थिर और तथाकथित रूप से खून में रंगी रहती थी। फीजी आने से पहले, गॉर्डन, ट्रिनीडाड और मॉरिशस के गवर्नर रह चुके थे। इसलिए उनके शर्तबंध मज़दूरी का संपूर्ण ज्ञान था क्योंकि यह व्यवस्था 1837 से लागू हो चुकी थी। परिणामस्वरूप, गवर्नर ने उस उपनिवेश को, जो ब्रिटेन ने बड़ी ना नुकुर के बाद अपनाया था, पुनर्जीवित करने के लिए भारत और शर्तबंध मज़दूरी की प्रथा का सहारा लिया। ब्रिटेन चाहता था की फीजी में आर्थिक आत्मनिर्भरता जल्द से जल्द स्थापित हो।

‘लियोनिडास’, की पहली सामुद्रिक यात्रा और सतलज पंचम की 1916 में हुई आखिरी यात्रा के बीच में 87 जहाज़, जो मानव नौभार को ढोने के लिए विशेष रूप से निर्मित किए गए थे, ने कठिन परिस्थितियों में, अनन्त लंबी यात्राओं द्वारा, 60,000 पुरुष, स्त्री और बच्चों को कलकत्ता और मद्रास, से फीजी पहुंचाया। महानदियों एवं पौराणिक व्यक्तित्वों पर आधारित जहाज़ों के नाम बड़े आकर्षक और जादुई प्रतीत होते थे-डैन्यूब, एल्ब, गैन्जिस, जमुना, राईन, एवॉन, सिरिया, पेरिकिल्स, लियोनिडास, क्लाईड, इण्डस मेन, मॉय, मेरसी, विरावा। आश्चर्य की बात यह है कि केवल एक जहाज़ ‘सिरिया’, 1884 में लापरवाह नौ संचालन के कारण, सूवा के समीप, नासिलाई की समुद्री चट्टानों से टकरा कर दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। इस हादसे में 59 जानें गईं थीं।

तीन महीनों की लंबी जहाज़ी यात्रा और एक माह की भाप के जहाज की यात्रा, कई स्थायी जीवन शैलियों और पुरानी आदतों को तोड़ने में सफल हुई। प्राचीन भारतीय ग्रामीण प्रथाओं और रीतियों का अन्त हुआ। कालापानी को पार करने वाली समुद्री यात्राओं ने सामाजिक अनुक्रम को समतल करने में मदद की और सांस्कृतिक नयाचार का विध्वंस किया। परंतु विध्वंसता की प्रक्रिया में सृजनता के भी बीज छुपे थे। समान भाग्य और समान लक्ष्यों से, नये रिश्ते कायम हुए। इन सब में ‘जहाज़ी भाई’ का रिश्ता भावनात्मक रुप से सर्वाधिक शक्तिशाली था। यह रिश्ता खून के रिश्ते की तरह प्रगाढ़ और सुख प्रदान करने वाला था। इस रिश्ते को, लोग अपने जीवन के संध्याकाल में भी संजोये रहे। यह आपसी संबंध, अजनबी बाहरी दुनिया की अस्तव्यस्तता और जटिलता के बावजूद एकता का सूचक बना रहा।

अंत में लगभग 24,000 शर्तबंध मजदूर और उनके परिवार जिनमें से कुछ फीजी में ही जन्मे थे), भारत वापस चले गए। परंतु अधिकांश लोग रुक गए। उनमें से कई तो वापस जाने की बात, अपनी वृद्धावस्था तक करते रहे। परंतु जैसे-जैसे अतीत की यादें धूमिल होती चली गईं और नये जीवन की सच्चाइयां उनका स्थान लेती गईं, वैसे-वैसे निर्णय का दिन टलता चला गया और फिर कभी नहीं आया।

नया जीवन परेशानियों से युक्त था। पूर्वजों के ज्ञान को नई परिस्थितियों के हिसाब से ढालना था। नये व्यवहारिक, अन्तजीतीय संबंध स्थापित किए जाने थे। एक नये भूगोल को समझना था, एक नये शब्दकोष का ज्ञान अर्जित करना था। यह सब गिरमिटिया और उनके उत्तराधिकारियों ने कुछ प्रतिस्कंदन और कुछ आत्मसमर्पण की नीति अपनाते हुए किया।
बीतते समय के साथ उन्होंने फीजी अर्थव्यवस्था की नींव डाली। हरे गन्ने के लहरदार खेतों में अनपढ़, अंगूठा छाप, ही दृष्टिगोचर होते थे-अधिकांश रूप से बंजर भूमि पर, जिसे पहले कभी जोता नहीं गया था। रीवा और नावुआ के नमी से भरे धान के खेतों में वही गिरमिटिया दिखते, गन्ना क्षेत्रों में धीरे-धीरे उभरते बाज़ार-शहरों में, जो बाद में बड़े शहर बने, उनमें, हम उन्हीं को पाते, अगुआ प्राथमिक और सेकन्ड्री स्कूलों में, जो बाद में विशिष्ट स्कूलों में परिवर्तित हुए, में भी वही दिखते, गांवों से निकलती स्कूली बच्चों की अविरल धारा जो ग्रामों को छोड़ कर उन्हें ऐसे व्यवसायों की ओर ले गई जिसके बारे में उन गिरमिटिया बच्चों के माता-पिता सपने में भी सोच नहीं सकते थे, में भी वही दिखाई देते थे।

फीजी से मेरा सीधा संपर्क 1908 से आरंभ हुआ था। उस साल मेरे दादा (आजा), गिरमिटिया के रूप में, फीजी आए थे। आजा एक मामले में भाग्यशाली थे-वे फीजी में तब आए जब सिगरेट के सबसे बुरे दिन बीत चुके थे-1980 के दशक के वर्षों की, हृदयविदारक शिशु मृत्युदर, निर्धारित घंटों से कहीं अधिक घंटों के लिए श्रमिकों से काम कराने की प्रथा, चीनी बाग़ानों में हुए शारीरिक हिंसा, एक अनिश्चित एवं अत्यधिक असुरक्षित जीवन। 1907 में, फीजी में, 30,920 भारतीय रह रहे थे जिसमें से केवल 11,689 ही शर्तबंध थे। मुक्त या खुले भारतीय 17,204 एकड़ भूमि स्वयं जोत रहे थे। 5,586 एकड़ में गन्ना और 9,347 एकड़ में धान बोया जाता था। भारतीयों के लिए, धीरे-धीरे गन्ना ही प्रमुख उपज बन गयी।1 1911 तक, 40,286 भारतीयों में से 27 प्रतिशत उपनिवेश में ही पैदा हुए थे, और धीरे-धीरे यह संख्या समय के साथ बढ़ती ही चली गई, 1946 के आते-आते भारतीय, जनसंख्या का बहुसंख्यक हिस्सा बन गए और ‘भारतीय प्रभुत्व’ का डर फीजी में व्याप्त होने लगा-वह डर जिसने फीजी की जटिल राजनैतिक वार्ताओं को तब प्रभावित किया जब देश 1960 के दशक में स्वतंत्रता की ओर अग्रसर हो रहा था। (फीजी को 1970 में स्वतंत्रता प्राप्त हुई)।

छुटपन में हमने आजा और उनके अन्य, भूरे रंग के धोती पहने गिरमिटियाओं से गिरमिट की कहानियां सुनीं थीं-उषा की पहली किरण के साथ ही जान लेवा काम का शुरू होना, अच्छे बुरे ओवरसियर, खचाखच भरी हुई एस्टेट लाइनों में पारिवारिक ज़िंदगी की असीमित कठिनाइयां, सांस्कृतिक बिखराव और अतिक्रमण जो बाग़ानों की जिंदगी का हिस्सा था और अपनी दुर्दशा का अर्थ निकालने के उनके प्रयास भी। मैंने यह कहानियां विश्वविद्यालय में, शर्तबंध मज़दूरी की पुस्तकों को पढ़ने से बहुत पहले सुनीं थीं। इन किताबों ने हमारी कल्पना शक्ति को प्रभावित किया था, विशेषतौर पर ह्यू टिंकर द्वारा लिखित ‘अ न्यू सिस्टम ऑफ स्लेवरी’ ने।2 मैंने विश्वविद्यालय के स्नातकपूर्वक अध्ययन के आख़िरी वर्ष में इसे पढ़ा था। शर्तबंध मज़दूर निर्धन, ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए भोले-भाले लोग थे, जिन्हें धोखेबाज़ ‘आरकतियों’ ने प्रवसन करने हेतु फंसा लिया था। बाग़ानों की कठोर कार्य प्रणाली ने उन्हें एक क्रूर अनुभव दिया-पर उनकी परेशानियों की कहीं सुनवाई नहीं थी, ओवरसियरों और सरदारों द्वारा उनकी औरतों पर जुल्म होते, उनके परिवार टूटकर इधर-उधर बिखर जाते, उनकी ‘इज़्ज़त’ की धज्जियां उड़ा दी जाती।
मेरे लिए, गिरमिट की इस व्याख्या को 1979, में हुए भारतीयों के फीजी आगमन

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1. जे. डब्ल्यू. कोल्टर, द ड्रामा ऑफ फीजी : ए कॉन्टेमपोरेरी हिस्ट्री (रटलैण्ड, वर्मोण्ट, 1967) पृ.सं. 90-91
2. ह्यू टिंकर, ए न्यू सिस्टम ऑफ स्लेवरी : द एक्सपोर्ट ऑफ इण्डियन इन्डेनचर्ड लेबर अब्रॉड, 1834-1920 (लंदन, 1974)।
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के शताब्दी समारोह ने और सुदृढ़ कर दिया। तब मैं ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनीवर्सिटी में स्नातक कक्षा का छात्र था। मानी हुई बात है कि, उस समय, अधिकांश वातावरण बोझिल ही था। तब तक ‘गिरमिट’ शब्द फीजी के सामान्य भारतीय प्रवासियों के शब्दकोष का महत्त्वपूर्ण हिस्सा नहीं बना था। अधिकांश लोगों के लिए यह शब्द शर्मिदग़ी और गुलामी से जुड़ा था-ऐसे इतिहास से जुड़ा था जिसे भूलना ही बेहतर था। समारोह ने इस शब्द में एक नयी जान फूंकी और लोगों ने एक ऐसे अतीत के बारे में अध्ययन करने का प्रयास किया जो अनुमान पर अधिक, तथ्यों पर कम आधारित था। उस अतीत को वर्तमान कठिनाइयों के चश्मे से देखा गया-ऐसा वर्तमान, जिसमें फीजी-भारतीय, जाति संबंधित राजनीति के कारण, सार्वजनिक जीवन की मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ गए थे।

इतिहास की पश्चदृष्टि से अवलोकन किया रहा था। परिणामस्वरूप एक जटिल और विवादास्पद इतिहास का जन्म हुआ जिसने भारतीयों को इतिहास के शिकार के रूप में दर्शाया। उनकी न कोई अपनी आवाज़ थी न कोई अपनी शक्ति। ‘चाबुक़ और बेड़ियो’ की कहानी, आज भी, गिरमिट से संबंधित सार्वजनिक भाषणों और चिन्तन का प्रभावशाली हिस्सा है, यद्यपि शर्तबंध मज़दूर की आवश्यकता पर आधुनिक इतिहास लेखन, प्रश्नचिह्न लगाता है।3 शर्तबंध मज़दूरी गुलामी का दूसरा नाम था-इसमें कोई शक नहीं है। अत्याधिक काम ने कई गिरमिटियाओं की कमर तोड़ दी, बीमारियों ने उनकी जीवन लीला समाप्त की, मानवहिंसा और लोभ ने भी उनके जीवन को तहस-नहस कर दिया। दुःख और शर्तबंध मज़दूरी का एक अभिन्न अंग था। पर यह पूरी कहानी नहीं है। कठिनाइयां तो थीं परंतु यह भी सच है कि गिरमिटियाओं को अपने भाग्य निर्धारण का अधिकार भी प्राप्त हो गया था।


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