स्वयंसिद्धा - अंजली भारती Swayamsiddha - Hindi book by - Anjali Bharti
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स्वयंसिद्धा

अंजली भारती

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5103
आईएसबीएन :81-7043-702-4

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नारी जीवन देने वाली भिक्षुणी नहीं होती वह तो स्वयंसिद्धा है.

Svayamsidha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

स्वयं को सिद्ध करने की जद्दोजहद। और जब यह संघर्ष किसी औरत के आगे हो तो उसका तीखापन और बढ़ जाया करता है। अपने संघर्ष के लिए एक औरत को लगभग हर मोर्चे पर लड़ना पड़ता है।
स्वयं को सिद्ध करने का सिलसिला अनन्त से चला आ रहा है और अनन्त तक चलता भी रहेगा। उपन्यास की नायिका एक विधवा है, सुन्दर है। अजन्मे शिशु की माँ है, असहाय है।

पर क्या असहायता ही नारी के जीवन का प्रतीक बन कर रह जाएगा। शायद नहीं। क्योंकि स्वयंसिद्धा संघर्ष करती है। वह सब पाने के लिए, जो कि उससे छिन गया है। छीन लिया गया। लेकिन संघर्ष का यज्ञ सारे जीवन की आहुति मांगता है। हर आहुति लालसा की लपटों को और अधिक प्रज्वलित करती जाती है और अन्त में सारा जीवन होम हो जाता है।
स्वयंसिद्धा उस स्त्री की कहानी है जिससे उसके अपनों ने ही सब कुछ छीन लिया था, उसने वह कुछ वापस पाया। पर अन्त में लगा कि सब कुछ पाकर भी कहीं कुछ शून्य है। वह शून्य जो समय के बीत जाने पर भी ज्यों का त्यों खड़ा है लेकिन मान है जो खड़ा है कि अपनी सामर्थ्य भर जीवन को जीया, अपने मान की रक्षा का मान। अपने होने का मान।

अंजली भारती

स्वयम्सिद्धा


कलवापुर जमींदारी में आज चारों ओर धूम मची हुई थी। पूरी जमींदारी में मानों प्राणों का प्रवाह हो गया था। शायद कोई मेला या त्योहार हो। पर नहीं सुनो ! यह तो शायद किसी दुल्हन की डोली आ रही है, बाजे-गाजे और धूम-धाम से; डोली के आगे-आगे बाजे वाले और पीछे सफेद अरबी घोड़े पर सवार बड़ी-बड़ी मूँछों वाला सुन्दर-सजीला दूल्हा। रास्ते के दोनों ओर नर-नारियों के झुण्ड आ जुटे थे।

बच्चे कौतुहल से इस दृष्य को देख रहे थे, और नर-नारियाँ उल्लास से। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर करें तो किसकी तारीफ करें और क्या छोड़ दें। क्योंकि सभी कुछ अत्यन्त दुर्लभ औऱ मनभावन था। चाहे वह बाजे-वालों की पोशाक हो या बड़े-बड़े सजे हुए बाजे या फिर दूल्हे की गोटा लगी छतरी या सच्चे मोती और जवाहरों से टकी उसकी पगड़ी। कुछ बच्चों ने तो दूल्हे की मरोड़दार मूँछें ही लुभा रही थीं। पुरुषों के चेहरे पर जहाँ आदर था वहीं पल्ले की आड़ से झाँकती दासियों की रतनारी आँखें डोली के रेशमी परदों को कौतुहल से देख रही थीं। कुछेक अधीर हो इधर-उधर से झाँक रही थीं कि शायद कहीं से खुला हो और वे दुल्हन की झलक ही पा लें।

बड़ी चर्चा थी दुल्हन के रूप-गुण की। नामी वैश्य और नगर सेठ की लाड़ली बेटी है आखिर जो इस गाँव में ब्याहकर आई है। छोटे लाला जी के भाग्य की सभी ने सराहना की, सुना जा रहा था कि दुल्हन न केवल रूपवती वरन गुणवती भी है। सेठ ने अपनी एकमात्र पुत्री के ब्याह में मुक्तिहस्त से पैसा खर्च किया था। इस तरह की न जाने कितनी गाथाएं और वधू की कीर्ति पहले ही सारे गाँव में फैल चुकी थी। वधू कीर्ति कुमारी स्वयं यश, धन और सौभाग्य के बोझ तले दबी सिमटी सी बैठी थी। डोली के हिलोरे उसके ह्रदय की नव तरंगों के साथ लयताल मिला रहे थे।

 कन्या कीर्ति आज वधू बन कर पितृ-गृह से ससुर-गृह की ओर जा रही थी। कन्या कीर्ति के जन्म के समय पिता के घर में आशा और निराशा का-सा वातावरण बना हुआ था। पिता धनपाल गुप्त बड़ी व्यग्रता से हाथ मलते टहल रहे थे कि शिशु का रुदन गूँज उठा। सब जहाँ के तहाँ ठिठिक गये और तभी दायी ने कन्या के जन्म का समाचार सुनाया। और यकायक जैसे समस्त परिवार में हर्षोल्लास की लहर दौड गई। धनपाल जी ने अपने तीनों पुत्रों को हृदय से लगा लिया, उनकी आँखें तरल हो आयीं। आखिर देवी माँ ने उनकी सुन ही ली थी। सेठ धनपाल की हार्दिक इच्छा थी कि उनके घर कन्या का जन्म हो। एक नन्ही-सी बालिका उनके आंगन में खेले और अपने पिता और भाइयों के सौभाग्य को बढ़ाए। स्वयं धनपाल ने अपने जीवन में एक बहन का अभाव सदा महसूस किया था। तीन-तीन पुत्रों के लगातार जन्म ने उनके आशाकुसुम को क्लान्त कर दिया था। किंतु आज जैसे आकाश कुसुम उनकी झोली में आ गिरा था।

सेठ धनपाल ने पूरे सवा महीने तक निरन्तर दान-पुण्य किया था और अपनी प्रिय बालिका का नाम  कीर्ति रखा। वास्तव में बालिका के जन्म से सेठ की कीर्ति और धन में अपार वृद्धि हुई थी। सेठ जी पुत्री पाकर अत्यन्त निहाल थे। कन्या की मृदु आँखें सेठ जी के लिए अमृत समान थीं। सेठ जी ने अपनी कन्या का लालन-पालन अत्यन्त चाव से एवं प्रेमपूर्वक किया। भाईयों की तो लाडली और आँखों का तारा थी। घर-बाहर आते-जाते एक झलक देखे बिना कल न पड़ती।

माँ भीरू और धार्मिक थी, सदा अपने बच्चों के सौभाग्य के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती रहती। जितना स्नेह करती, उतना ही कड़ा अनुशासन भी। फलस्वरूप अपार धन होने के बावजूद भी बच्चे अपने-अपने कार्यों में कुशल थे। और कन्या रत्न को तो मानो जौहरी ने निखार ही दिया था। माँ ने अपनी प्रिय पुत्री को समस्त स्त्रियोचित गुणों से पूर्ण कर दिया था। सारे नगर में कन्या के रूप और धन ही नहीं गुणों की भी मुक्त कण्ठ से प्रशंसा होती थी। और देखते-देखते कन्या विवाह योग्य हो गयी। मात्र चौदह वर्ष की आयु में ही कीर्ति अप्रतिम सौन्दर्य की स्वामिनी बन चुकी थी। कीर्ति कुमारी को देखकर लोग भ्रम में पड़ जाया करते थे कि जिस कन्या को अभी कल तक गोद में खिलाया’ वह यकायक इतनी बड़ी कैसे हो गयी।
कीर्ति का कद अपनी सहेलियों के सामान्य कद से अधिक था।

यही नहीं रूप सौन्दर्य भी सीमाहीन सा हो रहा था। अप्रतिम सौन्दर्य के साथ ही उसके कांतिमय मुख पर सदा मृदु मुस्कान सजी रहती। राजहंसनी सी कीर्ति विवाह योग्य हो गयी पर सदा यह बात सभी लोग जानते थे किन्तु सेठ धनपाल को चिन्ता की आवश्यकता ही नहीं थी क्योंकि ज्यों-ज्यों कीर्ति की आयु बढ़ी त्यों-त्यों ही उनके पास उसके विवाह प्रस्तावों के ढेर लगते चले गए। किन्तु धनपाल जी का मन कहीं स्थिर नहीं हो पाता था। वे अपनी सुन्दरी कन्या के लिए वैसा ही सजीला दूल्हा चाहते थे, जो धन के साथ-साथ गुणशील सम्पन्न भी हो और परिवार भी वैभवशाली हो। और तब ही कलुवापुर के जमींदार घराने से जो विवाह प्रस्ताव आया तो मानों सेठ जी को मनचाही मुराद मिल गयी। सेठ जी, मँझले कुँवर प्रहलाद अग्रवाल से पूर्व परिचित थे। यही नहीं वे उनके रूप गुण से भी परिचित थे। प्रहलाद लखनऊ के क्रिश्चियन कालेज के मेधावी छात्र थे। और शिक्षा ही नहीं घुड़सवारी, खेलकूद एवं राजनीति में भी सक्रिय थे।

इसके साथ ही कुँवर जी में विशुद्ध व्यापारिक बुद्धि भी वंशानुकूल मौजूद थी। सेठ धनपाल का परिचय कुँवर जी से तब हुआ-जब वे कीर्ति कुमारी को इलाज के लिए लखनऊ मेडिकल कालेज ले गए थे। हुआ यूँ कि सेठ जी ने अपनी गुड़िया के लिए एक अत्यन्त सुन्दर रूसी गुड़िया लाकर दी थी। जो कीर्ति को प्राणों से भी प्रिय थी। कीर्ति की गुड़िया अब विवाह योग्य हो गयी थी तथा कीर्ति प्राण-प्रण से उसके वर की तलाश कर रही थी।

एक बार दशहरे के मेले में गई कीर्ति को अपनी गुड़िया के लिए सुन्दर सा वर मिल गया। वह सुन्दर माटी के गुड्डे को खरीद लाई और उसके विवाह की तैयारियाँ धूमधाम से शुरू कर दी। सभी सखियों को निमन्त्रण दिया गया और दो पक्ष बन गए। एक दुल्हन वाले और दूसरे दूल्हे वाले। स्वयं सेठ जी का पूरा परिवार इस विवाह में शामिल हुआ। सेठ जी को पुत्री का प्रत्येक उल्लासपूर्ण प्रयत्न आह्लादित करता, और इस प्रकार एक अच्छा खासा समारोह ही हो गया। पास-पड़ोसी भी आए और ढोलक भी  बजी’ मंगल गीत भी गाए गए तथा धूम-धाम से बारात चढी। बच्चों के इस खेल को देख माता-पिता भी निहाल होते रहे। यह धूमधाम कई दिन तक चली। नित्य ही सेठ जी के आँगन में बच्चे आ जुटते और दिन भर गुड्डे-गुड़ियाँ खेलते रहते।  

कीर्ति की गुड़िया के विवाह में मुहल्ले भर के गुड्डे-गुड़ियाँ भी शामिल हुए थे। अतः यह रंग-बिरंगी गुड़ियों का मेला दोपहर में माताओं को भी इकट्ठा कर देता।
एक दिन कीर्ति के छुटके भैया को एक नया खेल सूझा कि क्यों न गुड़िया का हरण किया जाए, जैसा की रामलीला में रावण ने किया था। बच्चे चट ही इस खेल के लिए तैयार हो गये। अतः यह तय हुआ कि बड़े भइया मारीच वाले गुड्डे को मंझले भैया गुड्डे राजा यानि श्री राम को और छुटके भैया रावण गुड्डे को चलाएँगे और कीर्ति की सखी नूतन गुड़िया रानी को।

रंगमंच तैयार हो गया, सब होशियार हो गए और आँगन में बैठी माताएँ भी चैतन्य हो गयी। खेल शुरू हो हुआ; बड़े भैया मारीच गुड्डे को हिरन बनाकर गुड्डे राजा के सामने से दौड़ाया; नूतन ने आग्रह किया गुड़िया रानी को यह सोने का हिरन चाहिए। मंझले भैया ने श्री राम गुड्डे जी को हिरन की तरफ चलाया, और बड़े भैया हिरन लेकर आँगन में दौड़ने  लगे। मंझले भैया जो कि काफी जोश में थे, उनका पीछा कर रहे थे; गुड्डे राजा उनके हाथ में थे। मंझले भैया की ललकारें, उपस्थित जनों को हँसा-हँसा कर लोट-पोट कर रही थीं। बच्चे खुशी से तालियाँ बजाते किलक रहे थे।

मँझले भैया बड़े भैया तक पहुँचने ही वाले थे कि बड़े भैया हिरन की तरह उछलकर बरामदे की पैड़ियाँ चढ़ गये। पीछे से मँझले भैया ने भी चौकड़ी भरी परन्तु यकायक ही उसका पैर फिसला और मंझले भैया नीच आ रहे।
बच्चे यकायक चुप हो गये और हतबुद्धि सी स्त्रियाँ बरामदे की तरफ। माता ने कराहते हुए अपने पुत्र को उठाकर उसके अंगों को मलना प्रारम्भ किया और कीर्ति हतप्रद सी अपने स्थान पर ठिठक गयी उसकी दृष्टि अपने चकनाचूर हो गये सुन्दर माटी के गुड्डे पर टिकी हुई थी।

अचानक लहराकर कीर्ति धड़ाम से फर्श पर गिर पड़ी, तब यकायक माता का ध्यान उधर गया, जल्दी से उन्होंने कीर्ति को गोद में उठाकर बिस्तर पर लेटाया और पानी के छींटे मारे।

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