कैदी की करामात - श्रीकान्त व्यास Kaidi Ki karamat - Hindi book by - Srikant Vyas
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कैदी की करामात

श्रीकान्त व्यास

प्रकाशक : शिक्षा भारती प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :80
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5011
आईएसबीएन :9788174830159

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अलेक्जेंडर ड्यूमा के प्रसिद्ध उपन्यास दि काउण्ट आफ मान्टे क्रिस्टो का सरल हिन्दी रूपान्तर....

Kaidi Ki Karamat

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

1

यहां फ्रांस देश की कहानी है। उस समय फ्रांस के पुराने राजवंश का पतन हो गया था। फ्रांस के निवासियों ने अपने देश में प्रजातन्त्र की स्थापना की थी। लेकिन प्रजातन्त्र ज्यादा दिन टिका नहीं। तुमने नेपोलियन का नाम तो सुना ही होगा। वह प्रजातन्त्र शासन में एक साधारण सेनापति था, लेकिन अपनी बुद्धि और साहस का प्रयोग करके देखते-देखते वह फ्रांस का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन गया और एक दिन उसने अपने को आपको फ्रांस का सम्राट घोषित कर दिया।
लोग उसके आतंक से डरते थे, लेकिन एक साधारण से सिपाही को एकाएक सम्राट बनता देखकर मन ही मन उससे जलते रहते थे। इसी बीच यूरोप के देशों में फ्रांस से युद्ध छिड़ गया। लोगों ने नेपोलियन का साथ देने से आनाकानी करना शुरू किया।
नेपोलियन अकेला क्या कर सकता था ! अन्त में उसे राजगद्दी छोड़कर अलग हट जाना पड़ा। वह अल्बो नाम के एक द्वीप में चला गया और वहीं रहने लगा। इस मौके का लाभ उठाकर उसके विरोधियों ने पुराने राजवंश के एक बुड्ढे को कहीं से खोज निकाला और उसे फ्रांस के राजसिंहासन पर बैठा दिया।
लेकिन फ्रांस की जनता इससे खुश नहीं हुई। लोग नेपोलियन से डरते थे, उससे जलते थे, लेकिन साथ ही उसे चाहते भी थे। उन्होंने गुप्त रूप से नेपोलियन को फिर से लाने का उपाय सोचना शुरू किया। जनता के खास-खास नेताओं ने नेपोलियन से चिट्ठी-पत्री शुरू कर दी। इनमें कई जगह के लोग थे, जो एल्बोद्वीप से नेपोलियन के पत्र लाते थे और फ्रांस के खास-खास नेताओं के पत्र नेपोलियन के पास ले जाते थे।

फ्रांस के दक्षिण में मार्सल्स नाम का एक प्रसिद्ध बन्दरगाह है। उस समय उस नगर में मोरेल नाम का एक आदमी रहता था। वह एक बड़ा व्यापारी था। दूर-दूर के देशों में उसका व्यापार चलता था। कई जहाज़ उसका माल लादकर देश-परदेश जाते थे। इनमें से एक जहाज़ का नाम ‘फराओ’ था। इस जहाज़ में एडमण्ड दान्ते नामक एक युवक काम करता था। उसके जीवन की यह कहानी है।
जिस जहाज़ में एडमण्ड काम करता था, उसका कप्तान भी चुपके-चुपके नेपोलियन के पास चिट्ठी-पत्री लाया-ले जाया करता था। एक बार की बात है, फराओ जहाज़ कलकत्ता से माल भरकर वापस लौट रहा था। रास्ते में जहाज़ का बूढ़ा कप्तान अचानक बीमार पड़ गया। जहाज़ में जो कुछ दवाई वगैरह थी उससे उसका इलाज करने की कोशिश की गई, लेकिन देखते-देखते उसकी बीमारी बढ़ती गई।
जहाज़ के कर्मचारियों और दूसरे लोगों को लगा कि कप्तान का अन्त समय निकट आ गया है और अब वह बच नहीं सकेगा। इस बात से सबसे अधिक खुशी जहाज़ के एक खलासी को हुई, जिसका नाम था डैंग्लर्स। उस बूढ़े कप्तान के बाद डैंग्लर्स ही कप्तान बनने वाला था, क्योंकि वही सबसे बड़ा खलासी था। लेकिन दुर्भाग्यवश उसकी इच्छा पूरी नहीं हो सकी। एक दिन बूढ़े कप्तान ने सब लोगों को बुलाकर कहा, ‘‘मेरा अब कोई ठिकाना नहीं। किसी भी दिन ऊपर से बुलावा आ सकता है। इसलिए जब तक अपने मालिक जहाज़ के लिए किसी दूसरे कप्तान का इन्तज़ाम नहीं कर देते, तब तक के लिए मैं एडमण्ड को कप्तान बनाता हूं। आज से वही मेरा काम संभालेगा।’
यह सुनकर डैंग्लर्स की सारी इच्छाओं पर पानी फिर गया। वह कप्तान बनना चाहता था, परंतु एक दूसरे खलासी को कप्तान बना दिया गया। उसे बहुत गुस्सा आया। फौरन वह कप्तान के पास से चला आया। एडमण्ड के विरुद्ध उसका मन ईर्ष्या से भर उठा। उसने मन ही मन उससे बदला लेने का निश्चय किया। उधर जहाज़ के दूसरे खलासी एडमण्ड को बहुत चाहते थे। उन्होंने एडमण्ड को खुशी-खुशी अपना कप्तान स्वीकार कर लिया।

बूढ़े कप्तान ने एडमण्ड को कप्तान बनाने के बाद अपने कमरे में बुलाया और वहाँ खड़े दूसरे खलासियों को हाथ के इशारे बाहर जाने को कहा। सब बाहर निकल आए। डैंग्लर्स फौरन ताड़ गया कि कप्तान एडमण्ड को कोई गुप्त बात बताना चाहता है, इसलिए उसने सबको वहाँ से हटा दिया है। सब लोग हट गए, लेकिन डैंग्लर्स वहीं एक दरवाज़े के पीछे छिपकर उनकी बातें सुनने लगा।
अन्दर कप्तान ने एडमण्ड के हाथ में एक मुड़ा हुआ कागज़ दिया और कहा, ‘‘एडमण्ड, तुम्हें मेरी एक बात माननी होगी। यह काम करना ही चाहिए। देखो, जब तुम देश लौटो तो पेरिस जाकर इस आदमी से ज़रूर मिलना और यह कागज़ उसे दे देना। लेकिन होशियार रहना, किसी को भी इस बारे में कुछ भी मालूम न हो।’
एडमण्ड को यह सब कुछ अजीब-सा लगा। लेकिन वह कप्तान का आदर करता था, इसलिए वह इस काम के लिए राज़ी हो गया। लेकिन उसे यह मालूम न था कि यह सब क्या है। सिर्फ़ कागज़ पर उसने नाम पढ़ा तो उस पर किसी मस्यू नोर्तिये का नाम लिखा था। साथ ही उसके घर का पता लिखा था। उसने कप्तान से कहा, ‘आप किसी बात की चिंता न कीजिए। मैं यह कागज़ ज़रूर ठीक पते पर पहुँचा दूँगा।’
कप्तान ने शान्ति की साँस ली। इधर बाहर खड़ा-खड़ा डैंग्लर्स सब सुन रहा था। उसे फरौन मालूम हो गया कि यह सब क्या मामला है। उसने ताड़ लिया कि नेपोलियन की चिट्ठी है और वह बूढ़ा कप्तान खुद नेपोलियन के पास से इस चिट्ठी को लाया है। वह मन ही मन हंसा और उसने एडमण्ड से बदला लेने की तरकीब सोचनी शुरू की। वह जानता था कि इस चिट्ठी की बात आधिकारियों को मालूम हो जाए तो एडमण्ड मुसीबत में पड़ सकता है।

2

 


ठीक समय पर जहाज़ बन्दरगाह में दाखिल हुआ। जहाज़ का मालिक मोरेल जहाज़ देखने आया। एडमण्ड ने उससे सारी बात बतला दी। मोरेल पहले से ही एडमण्ड से खुश रहता था। अब उसे पूरे जहाज़ का काम संभालते देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। और उसने बातचीत में यह इशारा किया कि एडमण्ड को ही जहाज़ का कप्तान बना दिया जाएगा।
मालिक से बातचीत करके फिर जहाज़ की ठीक से व्यवस्था करके एडमण्ड घर लौटा। घर पर उसका बूढ़ा पिता था तथा मर्सीदिस नाम की एक सुन्दर लड़की भी वहीं रहती थी जिसके साथ एडमण्ड का विवाह होने वाला था।
उधर डैंग्लर्स ने एडमण्ड और मालिक के बीच क्या बातचीत हुई, इसे मालूम कर लिया। यह जानकर कि मालिक एडमण्ड को ही कप्तान बनायागा, उसकी बची-खुशी आशा भी समाप्त हो गई। जब वह जहाज़ से बाहर आया तो एडमण्ड के खिलाफ ईर्ष्या से उसका मन भर उठा था। उसने कसम खाई कि वह एडमण्ड का सर्वनाश किए बिना चैन से नहीं बैठेगा। यह सब सोचते-सोचते एक शराबखाने में शराब पीने के लिए घुस गया। वहाँ एक कोने में उसे एक आदमी बैठा दिखाई दिया, जिसे वह पहचानता था। उसका नाम फर्नान्द था। डैंग्लर्स जानता था कि फर्नान्द मर्सीदिस का दूर का रिश्तेदार है और मर्सीदिस के साथ एडमण्ड की शादी होनेवाली है।

मर्सीदिस और फर्नान्द बचपन में साथ-साथ खेले-कूदे थे और एक-दूसरे को बहुत मानते थे। लेकिन फर्नान्द बाद में मन ही मन मर्सीदिस से शादी करने के मनसूबे बाँधने लगा। मर्सीदिस इसके लिए राज़ी नहीं हुई, क्योंकि वह उसे भाई की तरह मानती थी। इसके अलावा वह एडमण्ड को बहुत चाहती थी। कुछ दिनों बाद मर्सीदिस और एडमण्ड की विवाह की बात भी पक्की हो गई। लेकिन इतने पर भी फर्नान्द ने आशा नहीं छोड़ी। वह बराबर इसी कोशिश में लगा रहता था कि किसी तरह मर्सीदिस उससे शादी करने के लिए राज़ी हो जाए। उसे मालूम हो गया था कि एडमण्ड यात्रा से लौट आया है और उसकी कुछ दिन की छुट्टी भी है तथा इस बीच दोनों का विवाह होने वाला है। इसीलिए बहुत निराश होकर वह शराबखाने के एक कोने में बैठा था।

डैंग्लर्स उसके पास जा पहुंचा और बात ही बात में उसने फर्नान्द के मन का हाल जान लिया। उसे मालूम हो गया कि फर्नान्द एडमण्ड से बहुत नाराज़ है। बस, फिर क्या था, डैंग्लर्स तो इसी मौके की तलाश में था। उसने फर्नान्द से कहा, ‘‘देखो फर्नान्द, मैं तुम्हारी मुश्किल बड़े मज़े से आसान कर सकता हूँ और एडमण्ड को तुम्हारे रास्ते से हटा सकता हूँ। लेकिन एक शर्त है।’
डैंग्लर्स ने आसपास ध्यान से देखा और फिर चुपके से उससे कहा, ‘तुम्हें एक चिट्ठी लिखनी पड़ेगी।’
‘चिट्ठी ? किसके नाम ?’
‘तुम यह मत पूछो। बस, मैं जिस तरह कहता हूं लिखते जाओ।’

फर्नान्द की समझ में कुछ नहीं आया। वह इससे काफी घबरा गया। लेकिन फिर भी उसने एक नौकर से कागज़-कलम मंगाया और लिखना शुरू किया। चिट्ठी मार्सेल्स के मेयर के नाम थी। उसमें लिखा गया—एक राजभक्त नागरिक आपको सूचित करना चाहता है कि मोरेल की एक कम्पनी में फ़राओ नाम के जहाज़ में काम करने वाला एक खलासी-एडमण्ड दान्ते, जो अब उसका कप्तान बना दिया गया है, राजा के विरुद्ध चलने वाले षड्यन्त्र में भाग ले रहा है। वह एल्बो द्वीप से नेपोलियन के पास से एक खास चिट्ठी लाया है। अगर उसे गिरफ्तार कर लिया जाए और ठीक से जाँच-पड़ताल की जाए तो चिट्ठी उसके पास मिल सकती है। चिट्टी या तो उसके पास है या जहाज़ में उस कमरे में कहीं छिपाकर रखी गई है।’
यह चिट्टी गुमनाम थी और इसके नीचे किसी का दस्तखत नहीं था। डैंग्लर्स ने कहा, ‘कहो, क्या राय ? देखा तुमने ? अब तुम एडमण्ड से बड़ी आसानी से बदला ले सकते हो और उसे अपने रास्ते से हटा सकते हो।’
लेकिन फर्नान्द एडमण्ड का इतना बड़ा नुकसान करने से हिचक रहा था। उसने काफी आनाकानी की और इस षड्यन्त्र से दूर रहना चाहा। डैंग्लर्स बार-बार उससे कह रहा था कि यह चिट्ठी तुम मेयर के पास पहुंचा दो, बाकी तुम्हें और कुछ नहीं करना पड़ेगा। सब अपने-आप हो जाएगा। लेकिन फर्नान्द डर रहा था। डैंग्लर्स की समझ में नहीं आ रहा था कि किस तरह उसे एडमण्ड के खिलाफ भड़काए।

इतने में अचानक डैंग्लर्स की बाहर सड़क पर नजर पड़ी तो उसने देखा कि एडमण्ड मर्सीदिस के साथ सड़क पर चला जा रहा था। वह उसके साथ घूमने निकला था। डैंग्लर्स ने फौरन मौके का लाभ उठाया और सड़क की ओर इशारा करके फर्नान्द से कहा, ‘देखो, वे दोनों चले आ रहे हैं। एडमण्ड उसके साथ घूमने निकला है। अगर तुम चाहते हो कि तुम भी इसी तरह मर्सीदिस के साथ घूम-फिर सको और अन्त में एक दिन उसे अपनी बना सको तो तुम्हें एडमण्ड के खिलाफ कुछ न कुछ करना चाहिए। मैंने तुम्हें सबसे आसान रास्ता बतला दिया है।’
फर्नान्द पर इसका वही असर पड़ा जो आग में घी का पड़ता है। मारे ईर्ष्या के वह जल उठा और एडमण्ड के खिलाफ सब कुछ करने को तैयार हो उठा। उसने कागज़ जेब में रख लिया। थोड़ी देर बाद ही वह शराबखाने के बाहर निकल गया। फिर सबसे पहला काम जो उसने किया वह था, चिट्ठी का डाक के डिब्बे में छोड़ना।

डैंग्लर्स की खुशी की सीमा न रही। उसका काम पूरा हो गया था। वह मज़े में गुनगुनाता हुआ घर लौट गया।
कुछ दिनों बाद एडमण्ड के विवाह की तिथि आ पहुंची। विवाह की हँसी-खुशी में भाग लेने के लिए उसने जहाज़ के सभी खलासियों और अपने दूसरे ईष्ट-मित्रों को भी आमन्त्रित किया। फर्नान्द और डैंग्लर्स भी उसके मित्र की तरह उसे बधाई देने के लिए आ पहुँचे। जहाज़ के मालिक मोरेल भी अपने साथियों के साथ आए। सब लोग हंसी-मजाक और खाने-पीने में लगे थे कि इतने में अचानक पुलिस के कुछ आदमी वहाँ आ पहुँचे। दो-तीन सिपाही दरवाज़े पर रास्ता रोककर खड़े हो गए।
यह देखकर सभी लोग चौंक पड़े। मेहमानों में घबराहट फैल गई। लोगों की समझ में नहीं आया कि यह सब क्या हो रहा है। जो लोग खा-पीकर आनन्द मनाने में लगे हुए थे उनकी सारी हँसी गायब हो गई और डर के मारे उनका दिल धड़कने लगा। वहाँ एकदम सन्नाटा छा गया।
दारोगा ने ज़रा कड़कती हुई आवाज़ में पूछा, ‘‘एडमण्ड दान्ते’ किसका नाम है ?’
अपना नाम सुनकर एडमण्ड का चेहरा उतर गया, लेकिन किसी तरह अपने-आप पर काबू पाकर वह आगे आया और बोला, ‘एडमण्ड मेरा नाम है।’

दारोगा आगे बढ़कर बोला, ‘तुम्हें हमारे साथ चलना होगा।’
एडमण्ड यह सुनकर सन्न रह गया। उसके पैर लड़खड़ा गए।
उसकी आँखों के आगे अन्धेरा छा गया। दूसरे लोग भी मारे घबराहट के कुछ बोल न सके। एडमण्ड ने काँपती हुई आवाज़ में कहा, ‘आप लोग मुझे गिरफ्तार करने आए हैं ? लेकिन ऐसा लगता है कि शायद आप लोग गलती कर रहे हैं, क्योंकि मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया जिसके लिए मुझे गिरफ्तार होना पड़े....’
दारोगा बोला, ‘तुम मस्यू मोरेल के जहाज़ में काम करते हो न ? तुम्हीं तो ‘फराओ’ नामक जहाज़ पर तैनात हो ?’
एडमण्ड बेचारा चुप रह गया। उसने एक-आध बार और विरोध करने की कोशिश की, लेकिन दारोगा टस से मस होने को तैयार न था। एडमण्ड अपने पिता, मर्सीदिस तथा अपने मालिक की ओर घूमकर बोला, ‘ज़रूर इन लोगों से गलती हो रही है। लेकिन ये पुलिसवाले हैं, भला मेरी बात क्यों मानेंगे ! मैं ज़रा इनके साथ थाने तक हो आऊं। मैंने कोई अपराध तो किया नहीं है, भला फिर क्यों मुझे गिरफ्तार किया जाएगा। ? थाने में सब तय हो जाएगा। आप लोग कोई चिन्ता न करें। मैं अभी आ रहा हूं।’ फिर वह मर्सीदिस का हाथ दबाकर बोला, ‘घबराओ मत, मुझे कुछ नहीं होगा ? कहकर वह सिपाहियों के साथ वहाँ से चल पड़ा।

रंग में भंग पड़ गया। सारी हँसी-खुशी पर पानी फिर गया। लोगों के चेहरे उतर गए। धीरे-धीरे वहाँ से भीड़ छँटने लगी। जो लोग बच गए, वे एक-दूसरे की ओर उदास नज़रों से देखते हुए वहीं बैठे रहे। मोरेल सबको हिम्मत बंधाने की कोशिश करता रहा। वह कह रहा था, ‘घबराने की ज़रूरत नहीं है। पुलिसवालों से ज़रूर कोई गलती हुई है। आप लोग यहीं रहिए। मैं ज़रा एडमण्ड को छुड़ाने की कोशिश करता हूं। कोतवाल से मेरी जान-पहचान है।’’
यह कहकर मोरेल वहाँ से चला गया। मेहमान लोग बैठकर इन्तज़ार करने लगे। एक घण्टा बीता, दूसरा बीता, लेकिन न तो मोरेल ही लौटा और न एडमण्ड ही। इसलिए धीरे-धीरे बाकी बचे हुए लोग भी जाने लगे। सिर्फ एडमण्ड के पिता और मर्सीदिस बचे जो अपने दुर्भाग्य पर आँसू बहाते रहे।

फर्नान्द पहले से ही इस काम को करने से घबरा रहा था। फिर किसी तरह जोश में आकर उसने चिट्ठी डाल दी थी। लेकिन वह नहीं जानता था कि उसकी शरारत का इतना बुरा नतीजा निकल सकता है। वह यह सब नहीं देख सका और चुपचाप वहाँ से खिसक गया। लेकिन डैंग्लर्स मन ही मन प्रसन्न हुआ। वह वहाँ बैठा रहा। थोड़ी देर में केडरोसी नामक एक जहाज़ी उसके पास आया और बोला, ‘यह सब तुम्हारी शरारत है। मैं अच्छी तरह जानता हूं कि इसके पीछे तुम्ही हो। उस दिन शराबखाने में तुमने फर्नान्द से जो कुछ कहा था, वह सब मैंने सुन लिया था। मैं वहीं एक कोने में बैठा था। तुम्हें ऐसा काम नहीं करना चाहिए था।’
डैंग्लर्स पहले तो घबराया कि उसका भेद उस आदमी को कैसे मालूम हो गया; लेकिन उसने सोचा कि जब इसे मालूम हो ही गया है तो इससे ज़रा ढंग से पेश आना चाहिए। वह बोला, ‘जानते हो तो क्या हुआ ! जब तुम उस समय नहीं बोले, तो इस समय बीच में क्यों पड़ते हो ? जाओ, अपना काम देखो ! तुम्हारे इस तरह चीखने-चिल्लाने से हो सकता है, मैं भी पकड़ा जाऊं और तुम भी नहीं बच सकोगे। सब लोग यही मानेंगे कि तुम्हारा भी षड्यन्त्र में हाथ है।’
केडरोसी ज़रा डरपोक स्वाभाव का था। वह डैंग्लर्स की बात सुनकर डर गया और चुप्पी मार गया। उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि सबको बतला दे कि षड्यन्त्र के पीछे किसका हाथ है।
उधर सिपाहियों ने एडमण्ड को शहर के मेयर के सामने पेश किया। मेयर ने उससे तरह-तरह के सवाल पूछने शुरू किए। लेकिन इसी बीच एक सिपाही ने जहाज़ में एडमण्ड के कमरे से मिले एक कागज़ को उनके हाथ में रख दिया। कागज़ को देखते ही वे चौंक उठे, क्योंकि कागज़ जिसके पास जाने वाला था, और जिसका नाम उस पर लिखा हुआ था, वह और कोई नहीं, मेयर, मि. विलफोर्ट के अपने ही पिता थे। उन्हीं का नाम मस्यू नोर्तिये था।

देखते-देखते मेयर के माथे पर पसीना झलक आया। उन्हें मालूम था कि उनके पिता ने नेपोलियन के पक्ष में हैं। और राजा को नहीं चाहते हैं, लेकिन उन्होंने यह स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि उनके पिता और नेपोलियन के बीच गुप्त पत्र-व्यवहार चलता है। वे जानते थे कि अगर इस चिट्ठी की बात मालूम हुई और सारा भेद खुला तो न सिर्फ उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा, बल्कि उन्हें मौत की सज़ा भी हो सकती है और पिता की हालत क्या होगी, यह तो साफ ज़ाहिर है। उनके बचने की उम्मीद ही नज़र नहीं आ रही थी।
खूब सोच-विचारकर उन्होंने एक उपाय ढूँढ़ निकाला। उन्होंने सब लोगों को वहाँ से चले जाने को कहा, और फिर एडमण्ड को अपने पास बुलाकर पूछा, ‘एडमण्ड, तुम्हें यह कागज़ कहाँ से मिला ? डरो मत, मुझे साफ-साफ बताओ।’

एडमण्ड बड़ा भोला आदमी था। उसने मेयर की बात पर विश्वास कर लिया और उसे सबकुछ बता दिया। उसने यह भी बताया कि किस तरह कप्तान ने मरते समय उसे यह काम सौंपा था।
सब सुनकर मेयर ने उससे पूछा, ‘अच्छा, अब ज़रा यह बताओ कि उस कागज़ पर जिसका पता लिखा है उसे तुम जानते हो ?’
‘नहीं, मैं नहीं जानता।’
‘कभी तुमने उसका नाम सुना है ?’
‘नहीं।’
यह सुनकर मेयर ने शान्ति की सांस ली। उसने अपने मन की बात मन में रखी और कहा, ‘एडमण्ड, तुम्हें यह मालूम है कि अगर किसी को भी इस चिट्ठी के तुम्हारे पास होने की खबर मिली तो तुम गिरफ्तार किए जा सकते हो और तुम्हें कड़ी से कड़ी सजा मिल सकती है ? इस चिट्ठी को अपने पास रखना राजद्रोह है। इस अपराध की सज़ा में तुम्हें फाँसी तक दी जा सकती है।’

यह सुनकर एडमण्ड का चेहरा फक पड़ गया। वह बोला, ‘लेकिन हुजूर, मुझे तो कुछ पता नहीं। मैं बिलकुल निर्दोष हूं।’
मेयर ने बहुत गंभीर चेहरा बनाकर कहा, ‘ठीक है, मैं तुम्हारी बात समझ रहा हूं, लेकिन भला दूसरे लोग यह सब कैसे समझेंगे ? चिट्ठी तुम्हारे पास मिली है और तुम्हें इसके बारे में कुछ भी पता नहीं है, भला इस पर कौन विश्वास करेगा ?’
एडमण्ड हाथ जोड़कर बोला, ‘नहीं नहीं, मेरी बात पर विश्वास न कीजिए। ईश्वर जानता है, मैं जो कुछ कह रहा हूं, सच कह रहा हूं। मैं बिलकुल निर्दोष हूँ। जैसे भी हो। आप मेरी रक्षा कीजिए।’
मेयर ने उसे हिम्मत बँधाते हुए कहा, ‘‘मामला तो बड़ा संगीन है। फिर भी देखो, मैं कोशिश करूंगा। लेकिन इतना याद रखना कि किसी को इस चिट्ठी की बात मालूम न हो, और यह तो मालूम ही नहीं होना चाहिए कि यह चिट्ठी किसके नाम है, वरना तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकूंगा।

यह सुनकर एडमण्ड की जान में जान आई। वह गिड़गिड़ाकर बोला, ‘हुजूर, किसी तरह मुझे बचा लीजिए। मैं ज़िन्दगी-भर आपका गुलाम रहूँगा। मैं किसी से भी नहीं कहूंगा कि यह चिट्टी कैसी है और किसके नाम है। मेरी जान अब आपके हाथ में है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आप मेरी मदद ज़रूर करेंगे।’
मेयर ने गम्भीर स्वर में कहा, ‘‘मुझसे जो कुछ हो सकेगा, मैं करूंगा। यह चिट्ठी तुम्हारे खिलाफ सबूत की तरह पेश की जा सकती है। इसे मैं तुम्हारे सामने ही नष्ट किए देता हूँ।’ यह कहकर उन्होंने उसके सामने ही उस कागज़ के टुकड़ेटुकड़े कर उसे जला डाला। एडमण्ड यह जान ही नहीं सका कि मेयर ने उसे बचाने के लिए नहीं, बल्कि खुद अपने-आपको और अपने पिता को बचाने के लिए कागज़ नष्ट किया है।
कुछ सोचकर उन्होंने कहा, ‘तुम्हें कुछ दिनों तक जेल में रहना पड़ेगा। उसके बाद तुमको छोड़ दिया जाएगा।
एडमण्ड ने मेयर को धन्यवाद दिया और फिर वह सिपाहियों के साथ चला गया। उसके मालिक मस्यू मोरेल अदालत के बाहर बैठे थे। मेयर ने उससे कहा, ‘‘मामला बड़ा संगीन है, लेकिन मैं भरसक अपनी कोशिश करूंगा कि यह लड़का छोड़ दिया जाए। अब आप जाइए, किसी तरह इसके माता-पिता को समझाने की कोशिश कीजिए।’
मस्यू मोरेल निराश होकर घर लौट आए और एडमण्ड के पिता और मर्सीदिस को समझाने की कोशिश करने लगे।


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