अद्भुत द्वीप - श्रीकान्त व्यास Adbhut Dwep - Hindi book by - Srikant Vyas
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अद्भुत द्वीप

श्रीकान्त व्यास

प्रकाशक : शिक्षा भारती प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :80
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5009
आईएसबीएन :9788174830197

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जे.आर.विस के प्रसिद्ध उपन्यास स्विस फेमिली रॉबिन्सन का सरल हिन्दी रूपान्तर...

Abhiyan-1

दो बातें

 

दो बातें मैं दावे के साथ कह सकता हूँ।
मेरे लिए बहस का यह मुद्दा नहीं है कि साहित्य के द्वारा समाज में परिवर्तन लाया जा सकता है या नहीं। मुझे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि...अगर साहित्य का मेरे जीवन में प्रवेश नहीं होता तो मैं अपराधी होता। मैं बिहार सरकार के अस्पताल में फार्मेसिस्ट के पद पर काम करता हूँ, जिसे आम भाषा में कंपाउंडर कहते हैं। कुछ लोग इस शब्द का प्रयोग करते समय इसमें साहब भी लगा देते हैं, मगर साहबों जैसी कोई बात वास्तव में नहीं होती।

अपनी नौकरी के आरंभिक वर्षों में कमाई के लिए मैं लोगों की छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज किया करता था। चूँकि मैं डॉक्टर नहीं था, इसलिए फीस का प्रश्न नहीं था। मैं रोगी को दवा देता था और दवा की कीमत के नाम पर पैसे लेता था। दवा व्यवसाय से जुड़े लोगों ने मेरे पास अपने ऐजेंटों के माध्यम से ऐसी दवाओं का अंबार लगा दिया, जिनके प्राप्त होने वाले मूल्य और अंकित मूल्य में दसगुने का अंतर था। पूरे दो वर्षों तक बक्सर जिले के निहालपुर गाँव में मैं 50 रुपए का 500 रुपया बनाता रहा। मुझे देने के लिए जब एक गरीब विधवा को अपनी चाँदी की हँसुली बेचनी पड़ी- मेरा अंतर्मन चीत्कार कर उठा। और ठीक इसी समय साहित्य ने मुझे कठिन जीवन जीने की प्रेरणा दी। मैं आपराधिक कमाई से पिंड छु़ड़ा, कठिन जीवन जीने की ओर अग्रसर हुआ। इस तरह साहित्य ने मुझे इस कारोबार से, जिसमें आज भी लाखों लोग शरीक हैं-बाहर निकाला। और इसी बल पर मैं पहली बात दावे के साथ कह सकता हूँ कि साहित्य के द्वारा परिवर्तन घटित हो सकता है।

मेरा दूसरा दावा भी इस दावे से बहुत अलग नहीं है। कमाऊ पूत होने की शाबाशी से दूर निकाल मैंने अपना तबादला आरा करा लिया। आरा में वर्षों तक रहते हुए मेरे साथ दूसरी घटना हुई। एक स्वयंसेवी संस्था इस जिले में अपना साक्षरता अभियान चला रही थी। इसमें मेरे कई मित्र शरीक थे। मेरे एक मित्र ने मुझसे इसमें शरीक होने का आग्रह किया। मेरी स्वीकृति के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी ने मेरी सेवा को अभियान के लिए आवश्यक बताते हुए मुझे अभियान में प्रतिनियुक्त कर दिया।

अभियान के तौर-तरीकों को समझने के बाद मैंने अपने मित्र से कहा था कि मैं कुछ स्वतंत्रता लेना चाहूँगा और कुछ नए प्रयोग करूँगा। मेरे मित्र ने न सिर्फ सहमति दी, बल्कि उनमें शरीक होकर बल देने का भी वायदा किया था। मेरे लिए यह पहला अवसर था जब एक सामाजिक कार्यकर्त्ता के रूप में समाज में उतर रहा था। उग्रवाद से पूरी तरह प्रभावित, भाकपा (माले) और रणवीर सेना के हिंसक हादसों से जूझते प्रखंड उदवंतनगर का मुझे प्रभारी बनाया गया। वातावरण निर्माण से प्रशिक्षण और पहली किताब समाप्त होने तक मैं हर गाँव में गया। इस दौरान मैंने दो नारे दिए...‘आत्मनिर्भर भोजपुर’ और ‘स्वाधीनता संग्राम की दूसरी लड़ाई’। मैंने चार समितियाँ अलग से गठित कीं। ग्रामीण इतिहास लेखन, दुग्ध उत्पादन, कृषि विकास तथा कुटीर उद्योग समितियाँ अपना काम भी शुरू कर चुकी थीं। इसी दौरान मुझे सूचना दी गई कि मुझे जिला में वातावरण निर्माण प्रभारी बना दिया गया है। समिति ने यह निर्णय इस तर्क के साथ लिया था कि जिला केंद्र में सक्षम साथियों का अभाव हो गया है जबकि सच्चाई इससे अलग थी। मैंने समिति से इस पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया। मेरे प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया तो मैंने त्यागपत्र दे दिया। कुछ दिनों तक मान-मनौबल चला किंतु मैं अपनी जिद्द पर अड़ा रहा और वापस अस्पताल में आ गया।

अस्पताल में आ जाने के बाद प्रखंड के मेरे कार्यकत्ताओं का क्या हुआ ? साक्षरता अभियान का हश्र क्या हुआ ? यह बताने के लिए मेरे पास आज सुखद परिणाम नहीं है किंतु उन दिनों के सुखद अनुभव काफी मात्रा में हैं। गाँव के लोग जिस ललक के साथ मुझसे जुड़े थे, उनकी याद आज भी मुझे रोमांचित करती है। उनके भीतर धधकती हुई आग और ऊर्जा का मैं साक्षी हूँ। न सिर्फ पुरुषों में बल्कि स्त्रियों में भी घर की चारदीवारी पार कर कुछ नया करने की ललक और छटपटाहट से मेरी अच्छी जान-पहचान है। वे हालात को बदलने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। नकारात्मक शक्तियों से टकराकर विजयी होने की सामर्थ्य वहाँ है, यह मैं अच्छी तरह जान चुका हूँ।

आज बिहार को भले ही अराजकताओं का मधुछत्ता मान लिया जाए किंतु आजादी के पचास वर्षों के कठिन अनुभव के बाद यहाँ परिवर्तन के लिए सकारात्मक व्यग्रता है और वह महान परिवर्तनकारी घटनाओं की दहलीज पर खड़ा है। अगर उसे जरा-सा प्रोत्साहन मिला तो इसके परिणाम काफी सुखद होंगे-यह मेरा दूसरा दावा है।

इस उपन्यास में जितने भी पात्र हैं, जीवित पात्र हैं। इस कथानक में वे एक गाँव में दिखते हैं किंतु वास्तविकता यह है कि वे विभिन्न गाँवों के हैं। तमाम घटनाएँ वास्तविक हैं। एक गाँव में दिखती है लेकिन विभिन्न गाँवों की है। अपने प्रिय लोगों को एक साथ एक गाँव में लाकर कथा का सूत्र मैंने विकसित किया है-इतना भर झूठ है-बाकी सब कुछ सच है।

कथानक में पात्रों को गढ़ने या विकसित करने का दबाव कभी मुझ पर बना ही नहीं। मास्टरानी, उर्मिला, श्यामा, काकी, नीरज, रहमत-इनसे मेरी रोज की मुलाकात थी। ये वही लोग थे जो अपनी पूरी शारीरिक और मानसिक शक्ति का प्रयोग कर अपने समय को बदलने के लिए उसके कठिन आदेशों पर चलते रहे। कठिनाइयों पर काबू पाने में उनका दृढ़ निश्चय, लगन और जीत के प्रति अटूट विश्वास ने मुझे बेमोल खरीद लिया। मैं आज भी खुद को उनका ऋणी महसूस करता हूँ।
जब मैं अभियान से अलग हुआ- मेरे भीतर उभरे अपराधबोध ने उन्हें मेरे जीवन का अंग बना दिया। रोज आ जाते मेरे एकांत में और पूछते-हमने क्या बिगाड़ा था आपका ? मेरे पास कोई जबाव नहीं था। इस पराजय ने मुझे विवश किया कि मैं कुछ दिन और उनके साथ रहूँ। उनके इस नए साथ ने मुझे उन बिंदुओं की पड़ताल के लिए भी विवश किया जो सक्रियता और हड़बड़ी में छूट गए थे। आज के समाज में सकारात्मक ढंग से परिवर्तन ले आने के लिए जब भी कोई संस्था, व्यक्ति या समाज आगे बढ़ेगा इस तरह की चुनौतियाँ उसके समक्ष आएँगी। उन्हें मुखिया से लेकर प्रखंड विकास पदाधिकारी और तपेश्वर सिंह से जिला प्रशासन, राज्य सरकार, केंद्र सरकार और संयुक्त राष्ट्र संघ से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप में टकराना होगा। कई सीधे विरोध में खड़े होंगे..कई छुपे रूप में-मगर टकराहट स्वाभाविक है।

यदि यह पुस्तक परिवर्तन के लिए छटपटहाट से भरे असंख्य लोगों की पीड़ा, खुशी और चुनौतियों की गरम साँस का अनुभव करा सके तो मैं अपने को भाग्यशाली समझूँगा।

-निलय उपाध्याय

 

खंड-1

 

[1]

 

इस गाँव का नाम बेला है, जिला भोजपुर और प्रांत बिहार। इस गाँव की आबादी दस हजार के करीब है। इसकी सीमा पूरब में बेर के बगीचे से शुरू होती है। बाहर से आने वाले बेर का बगीचा सोचते हुए आते हैं। हालाँकि आज इस बगीचे में उँगलियों पर गिने जाने लायक पेड़ ही बचे हैं और उसका अधकिसांश हिस्सा कटाई के बाद खेत में तब्दील हो चुका है। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और बेर का बगीचा ही अधिकांश लोगों की जुबान पर जीवित है। इस बगीचे में प्रवेश के बाद मन में खास तरह का संतोष प्राप्त होता है कि अब हम गाँव की सीमा में प्रवेश कर चुके हैं।

भोजपुर से इस गाँव को जोड़ने वाली सड़क अब भी कच्ची है। बरसात में ट्रैक्टर उन्हें इस कदर बिगाड़ता है कि रास्ता चलने लायक नहीं रह जाता। पिछली बार मझवारी गाँव के लोगों ने जवाहर रोजगार योजना के पैसों से सड़क पर पत्थर डलवा दिए। बेडौल पत्थरों के साथ की मिट्टी बारिश में बह गई। और अब उस पर चलने का जो अनुभव है, वह किसी भोथरे ब्लेड से दाढ़ी बनाने जैसा है। किंतु लोगों की बुद्धि का जबाव नहीं। वे हर समस्या का समाधान आसानी से निकाल लेते हैं। खेतों की मेंड़ से होकर लोगों ने ऐसे रास्ते निकाले हैं जो सड़क की अपेक्षा नजदीक पड़ते हैं और उछल-कूद का सामना भी नहीं करना पड़ता। आने-जाने के क्रम में मेंड़ इतनी चौड़ी और चिकनी हो गई है कि साइकिल या स्कूटर से भी जाया जा सकता है। चूँकि ज्यादातर लोग अब भी पैदल ही जाते हैं इसलिए यह कहा जा सकता है कि बेर का बगीचा आने-जाने वाले लोगों के पाँव में बल भर देता है और उन्हें इस बात का अहसास करा देता है कि वे इस गाँव की सीमा में प्रवेश कर गए हैं।
इस बगीचे के बाद घूरी का बाग पड़ता है। यह बाग मुख्य रूप से आमों के लिए प्रसिद्ध है। इस बगीचे में इतने पेड़ थे कि दिन में भी अँधेरे का अहसास होता था। लोग इस बात को कहते नहीं थकते कि यहाँ सूरज जमीन पर नहीं उतरता था। घूरी का बाग अब उतना घना नहीं रहा किंतु एक से बढ़कर एक उत्तम किस्म के आम अब भी उस बगीचे में मौजूद हैं। आस-पास के गाँव के लोग इस गाँव के चरित्र को इस बाग के आमों के स्वाद के आधार पर परखते हैं। मौसम आम पकने का हो तो गाँव के लिए घर हो जाता है यह बगीचा।

घूरी के बाग का नामकरण यूँ ही नहीं हुआ था। घूरी के बारे में गाँव के बड़े-बूढ़े बताते हैं कि वह इसी गाँव के किसी दुसाध की लड़की थी। बचपन से इस बाग में आती...सहेलियों के संग ‘दोल्हा-पाती’ खेलती। यह उसकी नियमित दिनचर्या थी। जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ी-उसका सौंदर्य निखरता चला गया। उसकी शादी बगल के गाँव में तय हुई। अभी शादी की तिथि तीन माह बाकी थी और वह सोच रही थी कि इस बाग के बिना वह कैसे रह पाएगी। इसी बीच उसका खूबसूरत चेहरा और गठा हुआ बदन लाश की शक्ल में ‘इमरितवा’ आम के नीचे पाया गया। जिस तरह उसकी लाश पड़ी थी लोगों को उसके साथ हुए सलूक को समझने में देर नहीं लगी। गाँव में खबर फैली और पूरा गाँव उमड़ आया पर पुलिस नहीं आई। रोते-रोते उसका पिता बेदम हो गया। घूरी की माँ तो दो साल की उम्र में ही स्वर्ग चली गई थी। पिता ने ही माँ का स्नेह देकर उसे पाला-पोसा था।

उसी दिन वह घूरी की लाश जलाकर लौट आया। घर का सूनापन जैसे उसे काटने दौड़ता था। रात में बडी मुश्किल से थोड़ी देर के लिए उसे झपकी आई। उसने सपना देखा। घूरी उसके छप्पर से आँगन में उतर रही है। उसकी देह पर सफेद साड़ी है। हाथ में चूड़ियाँ नहीं हैं। चेहरा सफेद और सूनी माँग...वह परी सी आँगन में उतर रही थी। वह जैसे उड़ते हुए आई और पिता के पायताने खड़ी हो गई। घूरी के बाप को अचंभा हुआ, वह घूरी की ओर लपका, किंतु घूरी ने उसे मना कर दिया-‘‘बाबू; मुझे मत छूओ। मैं मर चुकी हूँ। और सुनो-मैं जानती हूँ जिस व्यक्ति ने मेरे साथ यह सलूक किया है-उसने कई और के साथ भी...किंतु मैं उसे छोड़ूँगी नहीं। कोई उसका नाम जुबान पर लाए न लाए किंतु मैं दिखाकर रहूँगी। बाबू, मुझे जोरों की प्यास लगी है...थोड़ा-सा पानी पिला दो...और सुनो-रोना मत। तुम रोओगे तो मैं कमजोर हो जाऊँगी। अपना बदला नहीं ले पाउँगी।’’

इस सपने के बाद कभी नहीं रोया घूरी का बाप। लोग कहते कि घूरी ने अपने बाबू को उसका नाम भी बताया है किंतु मना किया है कि कहना मत। यह दु:ख इतना बड़ा था कि वह पागल हो गया। एक मटका गर्दन में लटकाकर घूमता और जब भी कोई कुएँ पर दिखता-जाकर नम्रता से पानी माँगता-कहता, अपने लिए नहीं घूरी के लिए माँग रहा हूँ...उसे बहुत प्यास लगी है। मटके में पानी भर कर सीधा बगीचे में अमरितवा आम के नीचे जाता और घूरी-घूरी चिल्लाता।
एक दिन सोहनी कर लौट रही बुधिया ने देखा कि अमरितवा आम के पेड़ पर आग लगी है। उसने पूरे गाँव में इस खबर को पसार दिया कि घूरी का सत्त इस गाँव को छोड़ेगा नहीं। वह चिड़िया बन गई है। अब आग लगाएगी इस गाँव में। और उसी वर्


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