खजाने की खोज - श्रीकान्त व्यास Khajane Ki Khoj - Hindi book by - Srikant Vyas
लोगों की राय

मनोरंजक कथाएँ >> खजाने की खोज

खजाने की खोज

श्रीकान्त व्यास

प्रकाशक : शिक्षा भारती प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :80
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5005
आईएसबीएन :9788174830432

Like this Hindi book 5 पाठकों को प्रिय

30 पाठक हैं

आर.एल.स्टीवेन्सन के प्रसिद्ध उपन्यास ट्रेजर आइलैण्ड का सरल रूपान्तर....

Khajane Ki Khoj

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

1

बहुत दिन पहले की बात है, मेरे पिता की एक सराय थी। अक्सर उसमें दूर-दूर के मुसाफिर आकर ठहरा करते थे। सराय का नाम था ‘एडमिरल बेनवो’। एक दिन एक मुसाफिर वहाँ आया। देखने से वह कोई जहाज़ी मालूम होता था। उसके पीछे-पीछे एक कुली था। कुली ने अपने सिर पर लोहे का एक सन्दूक उठा रखा था। वह जहाज़ी लम्बा-तड़ंगा और बहुत तगड़ा था।
उस समय मेरी उम्र बहुत कम थी, लेकिन फिर भी मैं उस जहाज़ी की बात आज तक नहीं भूला हूं। मुझे अच्छी तरह याद है, उसके दाहिने गाल पर तलवार के घाव का निशान था। पहले दिन जब वह सराय में आया, वह कोई गाना गुनगुना रहा था। उसके हाथ में एक तलवार थी।

आते ही उसने दरवाज़ा खटखटाया। मेरे पिता ने दरवाज़ा खोला। दरवाज़े के खुलते ही वह बोला, ‘‘मुझे बड़ी प्यास लगी है। एक प्याला शराब ले आओ। मैं जहाज़ का कप्तान हूं। यहां कुछ दिन रहना चाहता हूं।’’
उसकी आवाज़ इतनी कड़ी थी कि सुनकर डर लगता था।
कुली ने अन्दर आकर एक कोने में उसका सन्दूक रख दिया। और पैसे लेकर चला गया। उसके जाने के बाद जहाज़ी ने मेरे पिता से कहा, ‘‘मेरे खाने-पीने के लिए तुम ज़्यादा झंझट न करना। जो कुछ मिल जाएगा, उसी से काम चला लूंगा।’’
वह जहाज़ी अकेले रहना पसन्द करता था। भीड़-भाड़ में उसे बड़ी तकलीफ होती थी। उसके पास पीतल की एक दूरबीन थी। दिन-भर दूरबीन लेकर वह इधर-उधर घूमा करता था। कभी किसी पहाड़ी पर चढ़ता और वहां से आस-पास का दृश्य देखता, तो कभी किसी पेड़ पर चढ़कर बैठा रहता था। शाम होते ही सराय में लौट आता था और एक कोने में बैठा रहता था। अगर कोई उसे तंग करता था, तो उसे इतना गुस्सा आता था कि उसकी नाक फड़कने लगती थी।

एक दिन कप्तान ने मुझे अपने पास बुलाया और कहा, ‘‘लो, यह एक रुपया लो। अच्छा बताओ, तुम मेरा एक काम कर दोगे ? अगर रास्ते में तुम्हें कोई लंगड़ा जहाज़ी दिखाई दे तो तुम फौरन आकर मुझे इसकी खबर कर देना मैं तुम्हें एक लंगड़े जहाज़ी को खोजने का काम सौंप रहा हूं। इसके बदले में मैं तुम्हें एक रुपया महीना दिया करूंगा। लेकिन याद रखना, यह बात और किसी को मालूम न होने पाए।’’
रुपया पाकर मैं बहुत खुश हुआ और चुपचाप उस जहाज़ी का काम करने लगा। रोज़ सड़कों पर इधर-उधर घूमकर मैं उस लंगड़े को खोजने लगा। उस लंगड़े का मुझे इतना ध्यान रहने लगा कि हर समय मुझे उसकी सूरत नज़र आने लगी।
कप्तान सराय में किसी-से मिलता-जुलता नहीं था, और न कोई उसके पास जाता था। रात में वह काफी देर तक सोता नहीं था। शराब पीता था और जहाज़ियों का कोई गीत गाता रहता था। उसकी आवाज़ बहुत मोटी थी। पूरी सराय उससे गूंजती रहती थी। सब लोगों को उसके साथ गाना पड़ता था, वरना वह नाराज़ हो जाता था। कभी-कभी वह गाते-गाते एकदम वह चीख पड़ता था, ‘‘बन्द करो ! बन्द करो ! तुममें से किसी को भी गाना नहीं आता।’’

सब लोग चुप हो जाते थे। कभी-कभी वह कहानी सुनाने लग जाता था। उसकी कहानियां भी बड़ी अजीब होती थीं।
कभी वह दूर देश की यात्राओं की कहानियां सुनाता था, तो कभी चोर, डाकू और लुटेरों की। अगर कोई बीच में बोलता था तो उसे वह फौरन डांट देता था।
इस तरह सराय में रहते हुए उसे काफी दिन हो गए। वह वहां से जाने का नाम नहीं लेता था। ऐसा लगता था, जैसे उसे वह जगह पसन्द आ गई थी। लेकिन उसका सारा हिसाब उधार चलता था। उस पर बहुत ऋण चढ़ गया था। मेरे पिता बड़े संकट में पड़े हुए थे। वे अगर कभी उससे पैसा मांगते थे, तो वह फौरन आंखें निकालकर उन्हें डांटने लगता था। पिताजी डरकर उसके कमरे से चले जाते थे।

कप्तान जिस संदूक को लेकर पहली बार हमारे यहां आया था, वह तब से बराबर बन्द था। हमने कभी उसे सन्दूक को खेलते नहीं देखा था। वह कभी किसी को चिट्ठी भी नहीं लिखता था। शायद उसका कोई सम्बन्धी नहीं था। किसीसे उसके बारे में शिकायत भी नहीं की जा सकती थी।
एक दिन की बात है, मेरे पिता को बहुत तेज़ बुखार आया। मैं जाकर पिता के एक मित्र डॉक्टर लिवेसे को बुला लाया। जिस समय डॉक्टर आया, उस समय कप्तान आंगन में शराब पीकर, नशे में चूर पड़ा था। डॉक्टर ने ऊपर आकर मेरे पिता को देखा और नुस्खा लिख दिया। लेकिन तब तक उसकी गाड़ी नहीं आई थी। इसलिए वह बाहर बैठकर इन्तजार करने लगा। इतने में रात हो गई। थोड़ी देर में कप्तान ने अपनी भद्दी आवाज़ में ज़ोर-ज़ोर से गाना शुरू किया।

डॉक्टर वहीं बैठा था। उसको कप्तान का गाना पसन्द नहीं आया। डॉक्टर नाराज़ होकर उसे घूरने लगा। यह देखकर कप्तान और भी ज़ोर-ज़ोर से चीख-चीखकर गाने लगा और उस मेज़ पर हाथ पटकने लगा । पहले तो कप्तान ज़ोर-ज़ोर से मेज पर हाथ पटकता रहा और फिर चीखकर बोला, ‘‘चुप रहो ! खामोश !’’
यह सुनकर डॉक्टर बोले, ‘‘क्या है, मुझे कुछ कह रहे हो ?’’
कप्तान बोला, ‘‘हां, हां, तुम्हें ही कह रहा हूं। क्या इतनी भी अक्ल नहीं है तुममें ?’’
उसकी यह बात डॉक्टर को और भी बुरी लगी। उसने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘तुम अपना यह भद्दा गाना बन्द करो और मेरी बात सुनो ! तुम शराब बहुत पीते हो। और ज़्यादा शराब पियोगे तो मर जाओगे !’’
लेकिन यह सुनकर कप्तान फौरन उछलकर खड़ा हो गया, और उसने अपनी जेब से एक छुरा निकाल लिया। लेकिन डॉक्टर घबराया नहीं। उसने उसे झिड़ककर कहा, ‘‘बेवकूफ, छुरा अपनी जेब में रख, वरना फांसी पर चढ़ना पढ़ेगा !’’
कप्तान आग बबूला हो उठा। उसका बस चलता तो वह डॉक्टर को कच्चा चबा जाता। लेकिन डॉक्टर बड़ा निडर आदमी था। उसने डांटते हुए कहा, ‘‘यह न समझना कि मैं सिर्फ डॉक्टर ही हूं, मैं यहां का मजिस्ट्रेट भी हूं। याद रखना, अगर तुमने कुछ गड़बड़ की, तो तुम्हें बहुत कड़ी सजा दी जाएगी !’’
कप्तान शायद सचमुच डॉक्टर से डर गया था। क्योंकि उस शाम वह शान्त रहा और बाद में कई दिनों तक उसने कोई उत्पात नहीं किया।

2

 


मेरे पिता की बीमारी बढ़ती ही जा रही थी। वे बराबर बिस्तर पर पड़े रहते थे। इसलिए सराय की देख-भाल का काम मेरी मां और मुझपर आ पड़ा। हम लोग जहां तक होता था, कप्तान से दूर रहते थे कि किसी तरह कप्तान से हमारा पिंड छूटे।
जाड़े के दिन थे। सवेरे का समय था। ठंडी हवा चल रही थी। हल्का-हल्का कोहरा भी था। रात को बर्फ भी गिरी थी। ऐसा लगता था, जैसे चारों तरफ रुई बिखरी हो ! ऐसे समय में कप्तान घूमने निकला। हमेशा की तरह उसके हाथ में आज भी दूरबीन थी। कमर में तलवार लटक रही थी। अक्सर ऐसा होता था कि वह काफी दिन चढ़ने के बाद ही घूमने निकलता था, लेकिन उस दिन न मालूम क्यों, मुंह-अंधेरे ही निकल पड़ा था।

उस समय मां पिताजी की देख-भाल कर रही थी और मैं नीचे ग्राहकों के खाने की मेज ठीक रहा था। उसी समय एक आदमी अन्दर आया। उसका चेहरा काफी दुबला-पतला-सा था। उसके बायें हाथ की दो अंगुलियां भी कटी हुई थीं। कमर में वह भी तलवार बांधे था। अन्दर आकर उसने इशारे से मुझे अपने पास बुलाया। मैंने यह देखने के लिए कि कहीं यह लंगड़ा तो नहीं है, झुककर उसके पैर देखे। लेकिन उसके दोनों पैर मुझे सही-सलामत मालूम हुए। अपने पास बुलाकर उसने मुझसे पूछा, ‘‘क्यों जी, क्या उस टेबल पर तुम मेरे दोस्त विल के लिए नाश्ता लगा रहे हो ?’’
मैंने कहा, ‘‘मैं किसी विल को नहीं जानता ! यहां तो अभी कप्तान आकर नाश्ता करेगा। मैं उसी की तैयारी कर रहा हूं।’’
वह आदमी बोला, ‘‘हां-हां, वही ! जिसे तुम कप्तान कह रहे हो, उसे ही हम लोग विल कहते हैं। उसके दाहिने गाल पर तलवार की चोट का निशान है। है न ?’’

‘‘ठीक है, लेकिन कप्तान इस समय अन्दर नहीं है। घूमने गया है।’’
‘‘घूमने ! इतने सवेरे ? किस तरफ गया है ? क्या तुमने उसे जाते हुए देखा था ?’’
‘‘हां, वह उधर पहाड़ियों की तरफ घूमने जाता है।’’
‘‘तुम बता सकते हो, वह कब तक लौटेगा।’’
मैंने कहा, ‘‘बस, अब लौटकर आता ही होगा।’’
यह सुनकर वह आदमी चौंका, और फिर मेरा हाथ खींचते हुए बोला, ‘‘आओ, हम लोग दरवाज़े के पीछे छिप जाएं।’’ यह कहकर वह मुझे एक किवाड़ की ओट में खींच ले गया। कुछ देर बाद कप्तान लौट आया। वह आकर अपनी टेबल पर बैठ गया और नाश्ता करने लगा। तब वह आदमी दरवाज़े से सिर निकाल कर बोला, ‘‘विल, मुझे पहचान रहे हो न ?’’
उसकी आवाज़ सुनकर विल चौंक पड़ा, और उसे देखते ही उछलकर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘कौन, ब्लैक डॉग ?’’
‘‘हां, मैं ब्लैक डॉग ही हूं। भला यहां तुमसे मिलने और कौन आ सकता है ! मैं तुम्हें एक बात कहने आया हूं।’’
कप्तान बोला, ‘‘देखो, तुम बेकार मेरे पीछे लगे हो। जो कुछ कहना हो, जल्दी कह डालो।’’
वह आदमी कप्तान के पास आकार कुछ डरते-डरते उसके सामने कुर्सी पर बैठ गया। मैं उन दोनों के लिए शराब ले आया लेकिन वे लोग कुछ बातें कर रहे थे।

मैं बाहर चला गया, लेकिन उन लोगों की बातचीत सुनने से अपने को रोक नहीं सका। दरवाज़े के पास ही कान लगाकर खड़ा हो गया। पहले तो वे लोग बहुत धीरे-धीरे बातें करते रहे, अतः मुझे कुछ सुनाई ही नहीं दिया। फिर दोनों ज़ोर से बोलने लगे। मैंने सुना, कप्तान कह रहा था, ‘‘नहीं-नहीं ! मुझे इससे कोई मतलब नहीं ! तुम जाओ यहां से।’’
अब दोनों चीख-चीखकर बोलने लगे और एक-दूसरे को गाली देने लगे फिर मुझे लगा कि वे आपस में हाथापाई भी कर रहे थे। टेबल-कुर्सी के गिरने और टूटने की आवाज़ आने लगी और फिर ऐसा लगा, जैसे दोनों ने तलवार निकाल लीं। सचमुच तलवारें खनकने लगीं। इतने में ब्लैक डॉग को मैंने जान बचाकर भागते देखा। उसके हाथ में तलवार थी और उसके बायें कन्धे से खून बह रहा था। कप्तान ने लपककर उसका पीछा किया, लेकिन ब्लैक डॉग बच गया और वहां से भाग निकला। कप्तान अपना मुंह पोंछता हुआ अन्दर आ गया। उसका सारा शरीर कांप रहा था। दीवार का सहारा लेकर उसने मुझे आवाज़ दी, ‘‘जिम !’’

मैं फौरन दौड़ता हुआ अन्दर पहुंचा और पूछने लगा, ‘‘क्या हुआ ?’’ तुम्हें चोट आई है क्या ?’’
लेकिन कप्तान ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया और कहा, ‘‘शराब लाओ, फौरन शराब लाओ ! अब मैं यहां नहीं रहूंगा। जल्दी ही चला जाऊंगा !’’
मैं उसके लिए शराब लेने अन्दर गया। इतने में बाहर ज़ोर की आवाज़ हुई। मैं लपककर बाहर आया और यह देखकर घबरा गया कि कप्तान मुंह के बल ज़मीन पर गिर पड़ा। मैं फौरन दौड़ा गया और मां को बुला लाया। हम लोगों ने कप्तान का चेहरा देखा और बुरी तरह घबरा गए। उसका रंग उड़ गया था। वह आंखें बन्द करके तेज़ी से सांस ले रहा था। मां बोली, ‘‘यह और एक नई आफत आई ! उधर तुम्हारे पिता बीमार पड़े हैं और यहां सराय का यह हाल है ! अब क्या होगा ?’’
हमारी समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। इतने में सौभाग्य से वहां डॉक्टर लिवेसे आ पहुंचा। वह मेरे पिताजी को देखने आया था। उसने आकर कप्तान की जांच की और कहा, ‘‘घबराने की कोई बात नहीं है। यह शराब बहुत पीता है ! मैं पहले ही जानता था कि किसी न किसी दिन इसका बुरा हाल होगा। जाओ, कोई बर्तन ले आओ। इसके हाथ की एक नस काटकर इसके शरीर से कुछ खून निकालना पड़ेगा, तब यह होश में आ जाएगा।’’

मैं दोड़कर एक तसला ले आया। तब तक डॉक्टर ने कप्तान के हाथ से कपड़े अलग कर दिए थे। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि कप्तान का हाथ बहुत तगड़ा था डॉक्टर ने अपने झोले में से एक छुरी निकालकर कप्तान के हाथ की नस काट दी। थोड़ा खून बहने के बाद ही और बोला, ‘‘कहां गया ? ब्लैक डॉग कहां गया ?’’
डॉक्टर ने उसे बोलने से मना करते हुए कहा, ‘‘बको मत, यहां कोई चीज़ नहीं है। मैंने तुमसे कहा था कि तुम शराब ज़्यादा न पिया करो, लेकिन तुमने मेरी बात नहीं मानी। अब भी मान जाओ, तो तुम्हारा लाभ होगा।’’ फिर उसने हमारी ओर मुड़-कर कहा, ‘‘इसे ऊपर ले जाकर इसके बिस्तर में सुला दो।

3

 


दोपहर का समय था। पिताजी को दवा पिलाने के बाद मैं कप्तान के कमरे में गया। वह बिस्तर में पड़ा था। मुझे देखकर वह बोला, ‘‘जिम, तुम तो मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो; जरा मेरा एक काम करो। जाओ, एक प्याला शराब ले आओ।’’
‘‘मैंने कहा, ‘‘लेकिन डॉक्टर ने तो....’’
मुझे बीच में ही रोककर वह डॉक्टर को गाली देने लगा और बोला, ‘‘तुम्हारा डॉक्टर बेवकूफ है। भला वह मेरे को क्या जाने ! शराब से मुझे कुछ नहीं होता, उलटे फायदा होता है। हम जहाज़ियों के लिए शराब बहुत ज़रूरी चीज़ है। अगर हम शराब न पिएं, तो अपना काम कैसे करें ! देखो न, शराब के बिना मेरी क्या हालत हो गई है। हाथ-पैर कांप रहे हैं। जाओ, एक प्याला ले आओ। जाओ, मैं तुम्हें सोने की मोहर दूंगा।’’
उस दिन मेरे पिता की हालत भी अच्छी नहीं थी। मैंने कप्तान को एक प्याला शराब लाकर दे दी।
कप्तान ने एक घूंट में ही उसे पी गया और बोला, ‘‘हां, अब कुछ ठीक लगता है। अच्छा, यह तो बताओ जिम, तुम्हारे, उस मूर्ख डॉक्टर ने मुझे कितने दिन तक बिस्तर में पड़े रहने को कहा है ?’’
‘‘आठ दिन तक।’’

‘‘आठ दिन तक ? यह कैसे हो सकता है ? मेरा तो सब-कुछ बर्बाद हो जाएगा। वे लोग मेरे पीछे पड़े हैं। उन लोगों से अपना माल तो बचाते बनता नहीं, दूसरे के माल पर मरे जाते हैं। मैंने अपना पैसा खर्च नहीं किया ? मुझे किसी का डर नहीं है।’’
थोड़ी देर तक चुपचाप पड़े रहने के बाद वह फिर बोला, ‘‘क्यों जिम, क्या आज तुमने उस आदमी को देखा था ? अरे, वह ब्लैक डॉग ! वह बहुत खराब आदमी है। अब मुझे यहां से चले जाना पड़ेगा, वरना वे लोग मुझे बर्बाद कर देंगे। असल में वे मुझसे मेरा संदूक छीनना चाहते हैं।’’ फिर कुछ देर रुककर उसने पूछा, ‘‘क्यों जिम, तुम घोड़े पर चढ़ सकते हो ? अच्छा, ठीक है, तो जाओ, तुम डॉक्टर को, जो यहां का मजिस्ट्रेट भी है, बुला लाओ। उससे यह कह आना कि अपने साथ अपने साथियों और दूसरे लोगों को भी लेता आए। मैं उसे बताऊँगा कि मैं ही फ्लिंट का पहला साथी था। मैं ही उस जगह को जानता हूं। मरते समय फ्लिंट मुझे नक्शा सौंप गया था। खैर, मुझे इस बात का कोई डर नहीं है कि ये लोग मुझे ‘काला निशान’ दे देंगे। सबसे ज़्यादा डर तो मुझे उस लंगड़े खलासी से लगता है।’’
मैंने उससे पूछा, ‘‘कप्तान ‘काला निशान’ क्या चीज़ है ?’’

‘‘यह असल में एक तरह का संदेश है। अगर यह मुझे मिला, तो मैं तुम्हें इसके बारे में कभी सारा किस्सा बताऊंगा। लेकिन इस बीच में चारों तरफ कड़ी नज़र रखना और जब भी कभी तुम्हें वह लंगड़ा दिखाई दे, तो मुझे आकर खबर देना। इतना मैं तुम्हें पहले ही बता दूं कि मैं आधा हिस्सा तुम्हें दूंगा।’’
इसके बाद काफी देर तक कप्तान तरह-तरह की बातें करता रहा। मैंने उसे दवा पिला दी। जब वह ऊँघने लगा तो मैं उसके कमरे से चला आया। उसी दिन मेरे पिता की तबीयत बहुत खराब हो गई। शाम को पिताजी चल बसे। घर में रोना-पीटना शुरू हो गया। दूसरे दिन कप्तान की हालत देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने देखा कि कभी वह सीढ़ी पर चढ़ता था और कभी नीचे उतरता था। कभी दौड़कर बाहर जाता था। और फिर अन्दर लौट आता था। एक क्षण भी वह चुप नहीं बैठता था। यहां तक कि एक बार तो उसने तलवार निकालकर टेबल पर रख दी और फिर जाकर दरवाज़े में खड़ा हो गया। थोड़ी ही देर में वह फिर अन्दर लौट आया। मुझे उसका चेहरा देखकर डर लगने लगा। वह बुरी तरह घबराया हुआ था।। इसी तरह दिन कट गया।

शाम को मैं यों ही सराय के दरवाज़े के पास खड़ा था और अपने पिता को याद कर रहा था। मेरा मन बहुत उदास था। उसी समय मैंने देखा कि रास्ते पर एक आदमी धीरे-धीरे चला आ रहा है। जब वह सराय के कुछ पास आया, तो मैंने देखा कि वह अंधा । ज़मीन पर लकड़ी खटखटाते हुए वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता था। उसने अपनी आंख और नाक के ऊपर एक हरा कपड़ा बांध रखा था। उसके जैसे बदसूरत और डरावना चेहरा मैंने आज तक नहीं देखा था।
वह सीधा आकर सराय के सामने खड़ा हो गया। फिर उसने एक अजीब-सी आवाज़ में पूछा, ‘‘अरे भाई, कोई अन्धे आदमी को बता सकता है कि यह कौन-सी जगह है ! मैं कहां आ पहुंचा हूं ? हाल ही में मैंने अपने देश की रक्षा करते हुए, अपनी आंखें खो दी हैं। कोई मेरी मदद कर दो।’’
मैंने उससे कहा, ‘‘अरे भाई, तुम तो मेरी सराय के सामने आ पहुंचे हो, सराय का नाम है एडमिरल बेनवो !’’
मेरी आवाज़ सुनकर वह अन्धा बोला, ‘‘आवाज़ से तो लगता है कि मैं किसी बच्चे से बात कर रहा हूं ! बेटा, जरा हाथ-थाम कर मुझे अन्दर पहुंचा दो।’’

मैंने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। उसने इस तरह कसकर हाथ पकड़ा कि मुझे लगा, मेरी हड्डी ही टूट जाएगी। फिर वह बोला, ‘‘बेटा, ज़रा मुझे एक बार कप्तान के पास पहुंचा दो !’’
मैंने कहा, ‘‘कप्तान का दिमाग आजकल ठीक नहीं है। उसके पास जाने की मुझमें हिम्मत नहीं होती।’’
अन्धे ने मेरा हाथ जोर से ऐंठते हुए कहा, ‘‘चुपचाप मुझे उसके पास ले चलो, वरना तुम्हारा हाथ तोड़ दूंगा।’’
मेरे मुंह से एक चीख निकल गई। उसकी पकड़ से छूट निकलना संभव नहीं था।
मैं अजीब मुसीबत में फंसा था। मजबूर होकर मुझे उसे अन्दर लाना पड़ा। वह बार-बार मेरा हाथ मरोड़कर कहता था, ‘‘चलो-चलो, रुको मत। सीधे कप्तान के पास चलो, और उसके कमरे में पहुंचते ही कहना, ‘विल तुम्हारा एक दोस्त आया है।’’

अन्त में मैं उसे विल के कमरे में ले गया। कप्तान एक कोने में शराब के नशे में चुपचाप पड़ा था। मैंने उसे पुकार कर कहा, ‘‘विल, तुम्हारा एक दोस्त आया है।’’
यह सुनते ही कप्तान का नशा उड़ गया। अब वह चौंककर उठने की कोशिश करने लगा, लेकिन वह इतना घबरा गया था कि उससे उठते भी नहीं बन पा रहा था। इतने में वह अन्धा बोला, ‘‘खबरदार, विल ! उठने की कोई जरूरत नहीं है। वहीं बैठो रहो। मेरी आंखें नहीं हैं, फिर भी मेरे कान इतने तेज हैं सब-कुछ जान लेता हूं। अगर तुम वहां से ज़रा भी हिले-डुले तो ठीक नहीं होगा। लाओ, अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाओ।’’ फिर वह मुझसे बोला, ‘‘अरे लड़के, ज़रा इसका हाथ मेरे हाथ में तो दे दे।’
कप्तान ने अपना हाथ बढ़ा दिया। मैंने कप्तान का हाथ उसके हाथ में पकड़ा दिया। पलक मारते ही अन्धे ने एक कागज कप्तान की मुट्ठी में रख दिया और कहा, ‘‘बस, हो गया। !’’ इतना कहकर वह मेरा हाथ छोड़कर, फौरन कमरे के बाहर हो गया और दौड़ता हुआ सराय से निकल गया। अब वह अन्धा था, लेकिन इसकी याददाश्त इतनी अच्छी थी कि जब वह एक बार किसी रास्ते से गुज़रता था, तो उसे उस रास्ते की पहचान हो जाती थी और फिर वह दौड़ते हुए उधर से निकल सकता था। सड़क पर उसकी लाठी की ‘खट-खट’ कुछ देर तक सुनाई देती रही।

कुछ देर तक हम दोनों चुप रहे। मैंने घबराहट में कप्तान का हाथ पकड़ रखा था। ज्योंही मैंने उसका हाथ छोड़ा, उसने कागज खोलकर उसकी तरफ देखा और कहा, ‘‘दस बजे ! खैर, अभी छह घण्टे की देर है। मैं उससे निबट लूंगा।’’
यह कहकर वह उछलकर खड़ा हो गया। लेकिन वह बीमारी के कारण इतना कमजोर हो गया था कि लड़खड़ाकर फिर से बैठने की कोशिश करने लगा। लेकिन बैठ नहीं सका। अजीब तरह से कराहते हुए वह मुंह के बल ज़मीन पर गिर पड़ा। मैं चिल्लाकर उसके पास पहुंचा। लेकिन सब बेकार ! पत्थर के फर्श पर गिरने से उसका सिर फट गया था और वह बेहोश हो गया था।
मैं अपनी मां को बुला लाया। उसने देखकर बताया कि कप्तान अब कभी होश में नहीं आएगा, वह मर चुका है। मैं कप्तान से बहुत घबराता था लेकिन फिर भी उसके मर जाने से मुझे बहुत दुःख हुआ और मैं रोने लगा।


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book