काला घोड़ा - अन्ना सेवेल Kala Ghoda - Hindi book by - Anna Sewell
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काला घोड़ा

अन्ना सेवेल

प्रकाशक : शिक्षा भारती प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :80
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5004
आईएसबीएन :9788174830098

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अन्ना सेवेल का प्रसिद्ध उपन्यास ब्लैक ब्यूटी का हिन्दी रूपान्तर....

Kala Ghoda

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

 

1

मुझे अपनी ज़िन्दगी की सबसे पहली जगह जो अच्छी तरह याद है, वह एक बड़ा-सा चरागाह था। उसके बीचोंबीच साफ पानी का एक तालाब भी था, जिसके किनारे कुछ छायादार वृक्ष लगे हुए थे और बीच में नरकुल व कुमुदिनी की बेलें थीं। अपने बचपन में, जब मैं घास नहीं खा पाता था और मां का दूध पीकर ही रहता था। उन दिनों दिन में मैं अपनी मां के साथ भागता रहता और रात में उसी से सटकर सो जाता। जब गर्मी और धूप से हम परेशान होते तो हम तालाब के किनारे वृक्षों की छाया में चले जाते। जाड़े के दिनों में ठंड से बचने के लिए हमारे पास एक खूबसूरत और आरामदेह घुड़साल थी।
जैसे ही मैं बड़ा हुआ और घास खाने लगा, मेरी मां दिन में काम पर जाने लगी। वहां से वह शाम को वापस आती। चरागाह में मेरे अलावा छः छोटे बछड़े और थे। वे उम्र में मुझसे बड़े थे। कुछ तो इतने बड़े थे जैसे बड़े घोड़े। ज़्यादातर मैं उन्हीं सबके साथ दौड़ता रहता था और बहुत प्रसन्न रहता था। मैदान में हम जितना भी दौड़ सकते, इधर-से-उधर दौड़ते रहते। कभी-कभी हम लोगों के बीच कुछ देहाती किस्म के खेल भी होने लगते, जैसे दुलत्ती मारना, एक-दूसरे को काटने दौड़ना आदि।
एक बार की बात है। हम लोग आपस में खूब दुलत्तियां झाड़ रहे थे। तभी मेरी मां की नजर हम पर पड़ गई। मां ने मुझे अपने पास बुलाया और कहा, ‘‘मेरी बात ध्यान से सुनो ! जिन बछेड़ों के साथ तुम खेलते हो वे वैसे तो बड़े अच्छे बछेड़े हैं लेकिन हैं पूरे देहाती ! उन्हें रहन-सहन के अच्छे तरीके नहीं सिखाए गए हैं जबकि तुम एक बड़े घराने के हो और तुम्हारे बाप-दादों ने बड़ा नाम कमाया है। तुम्हारे दादा ने दौड़ में लगातार दो साल तक इनाम जीते थे। मुझे भी तुमने कभी इस तरह के भद्दे खेल खेलते नहीं देखा होगा। मुझे उम्मीद है कि आगे से तुम इस तरह के बछेड़ों से दूर रहोगे और बड़े होकर अपने पुरखों की तरह नाम रोशन करोगे।’’
अपनी मां की वे बातें मैं कभी नहीं भूल सका। मैं जानता था कि वह बड़ी समझदार है और हमारा मालिक उसका बड़ा ध्यान रखता है। वैसे तो मेरी मां का नाम ‘डचेस’ था लेकिन मालिक ज़्यादातर उसे ‘पैट’ कहकर पुकारता था। हमारा मालिक एक अच्छा और दयालू आदमी था। वह हमें खाने को हमेशा अच्छा चारा-दाना देता था और हमारे रहने के लिए उसने अच्छी जगह बना रक्खी थी। वह हमसे इतने प्यार से बात करता था मानो अपने सगे बच्चे से ही कर रहा हो। जैसे ही हमारा मालिक फाटक के पास आता, मां खुशी से हिनहिना उठती और दौड़कर उसके पास चली आती। वह उसे प्यार से थपथपाता और कहता, ‘‘कहो पैट, तुम्हारा डार्की कैसा है ?’’ मेरा रंग कुछ-कुछ हल्का काला था। इसलिए वह मुझे ‘डार्की’ कहता था। इसके बाद वह मुझे अपने हाथों से बड़ी स्वादु रोटी का टुकड़ा खिलाता। कभी-कभी वह मां के लिए एकाध गाजर भी ले आता। हालांकि वैसे तो सारे के सारे घोड़े उसके पास आते थे, लेकिन हमें वह बहुत चाहता था। जिस दिन कस्बे का बाज़ार लगता उस दिन मेरी मां ही उसे बाज़ार ले जाती।
कभी-कभी हमारे चरागाह में डिक नाम का एक देहाती लड़का भी आता था। वह पेड़ों से बेर तोड़-तोड़कर खाता रहता और खा चुकने के बाद बछेड़ों को छेड़ता। उसे बछेड़ों की दौड़ अच्छी लगती थी। इसलिए वह उन्हें छड़ी और पत्थर मारकर दौड़ने को मजबूर करता। उसकी इन बातों की ओर हम ज्यादा ध्यान नहीं देते थे, क्योंकि दौड़ना हमें खुद अच्छा लगता था। लेकिन अगर किसी दिन पत्थर से हमें चोट लग जाती तो ?
एक दिन हमारे मालिक ने डिक की हरकतों को देख लिया। वह दौड़कर आया और डिक के कंधों को झकझोरते हुए बोला, ‘‘नालायक कहीं के ! हमारे बछेडों को फिज़ूल दौड़ाता है ! अगर फिर कभी तुझको ऐसी हरकत करते देख लिया तो तेरी खैर नहीं ! जा, भाग जा यहां से ? आइन्दा यहां कभी नहीं फटकना।’’
इसके बाद में डिक फिर कभी नहीं दिखाई दिया। घोड़ों का साईस एक बुड्ढा आदमी था, उसका नाम डेनियल था। वह हमारे मालिक की ही तरह एक सीधा आदमी था, इसलिए हम लोगों को कोई तकलीफ नहीं हुई।

2

 


मैं अभी पूरे दो साल का भी नहीं हो पाया था कि तभी एक ऐसी घटना घटी जिसे मैं कभी-भी न भुला सका। बसन्त ऋतु की शुरुआत के दिन थे। मैं अपने कई बछेड़ साथियों के साथ मैदान के निचले हिस्से में घास चर रहा था। तभी हमें कुछ दूरी पर कुत्तों की भौंकने की आवाजें सुनाई पड़ीं। उन आवाज़ों से सबसे पहले बड़ा बछेड़ा चौकन्ना हुआ। उसने अपना सिर ऊपर उठाया, कान खड़े किए और कहा, ‘‘यह शिकारी कुत्तों की आवाज़ है।’’ यह सुनते ही हम सब मैदान के ऊपरी हिस्से की ओर दौड़ पड़े। वहां हमारे मालिक के बूढ़े घोड़े के साथ मेरी मां खड़ी थी।
कुछ ही पल बीते होंगे कि मेरी मां ने बताया, ‘‘एक खरगोश उन कुत्तों को दिखाई दे गया है। वे उसके पीछे ही हाथ धोकर पड़ गए हैं। अगर वे इस तरफ आएं तो हम उन्हें शिकार करते हुए भी देख सकेंगे।’’
थोड़ी ही देर बाद कुत्तों ने एक गेहूं के एक खेत को रौंदना शुरू कर दिया। उनके पीछे-पीछे काफी तेज़ी से दौड़ते हुए बहुत-से घुड़सवार भी थे। इतने में मैंने देखा कि एक घबराया हुआ खरगोश तेज़ी से भागता हुआ जंगल की ओर जा रहा है। उसके पीछे शिकारी कुत्ते दौड़ रहे थे। और सबसे पीछे थे छलांगे भरते हुए घुड़सवार शिकारी। खरगोश ने बड़ी कोशिश की कि बाड़ के नीचे से निकल भागे, लेकिन वह निकल न सका।
इतने में ही शिकारी कुत्तों ने उसे आ दबोचा। बस, एक चीख के साथ खरगोश का काम तमाम हो गया। खरगोश का मरना था कि एक शिकारी आगे आया। अपने हंटर से उसने कुत्तों को दूर भगा दिया। तब उसने मरे हुए खरगोश की एक टांग पकड़कर उसे ऊपर उठा लिया। यह देखकर दूसरे शिकारियों के चेहरे भी खुशी से चमक उठे।
यह सब देखकर मैं भोचक्का सा रह गया। जब मैंने दुबारा उस ओर नज़र दौड़ाई तो मुझे एक बड़ा दर्दनाक दृश्य दिखाई दिया। दौड़ते-दौड़ते दो खूबसूरत घोड़े गिर गये थे, जिनमें एक पानी से निकलने की कोशिश कर रहा था और दूसरा घास पर पड़ा हुआ कराह रहा था। एक घुड़सवार बेहोश पड़ा था और दूसरा कीचड़ से सना हुआ पानी से बाहर आ रहा था।
यह सब देखकर मेरी मां काफी गम्भीर हो गई थी। उसने कहा, ‘‘मेरी समझ में नहीं आता कि इन लोगों को शिकार खेलने में क्या मज़ा मिलता है ? सिर्फ एक खरगोश या लोमड़ी या हिरन के लिए वे चोंटे खाते हैं, घोड़ों को परेशान करते हैं और खेतों को बुरी तरह रौंद डालते हैं।’’ एक क्षण रुककर उसने फिर कहा, ‘‘लेकिन हम लोग यह सब नहीं समझ सकते ! आखिर हम हैं तो घोड़े ही

3

 


अब मैं सुन्दर लगने लगा था। मेरे शरीर के बाल काफी कोमल थे और उसका कालापन चमकदार था। मेरा एक पैर सफेद रंग का था और माथे पर सफेद रंग का एक खूबसूरत तिलक था। मेरे मालिक का कहना था कि छोटे बच्चों से बड़ों की तरह यानी बछेड़ों से घोड़ों की तरह काम नहीं लेना चाहिए। इसलिए वह मुझे तब तक बेचना नहीं चाहते थे जब तक मेरी उम्र चार साल की न हो जाए।
और जब मेरी उम्र चार साल की हो गई तो स्क्वेयर गार्डन नाम का एक बूढ़ा आदमी मुझे देखने आया। उसने मेरी आंखों, टांगों और मुंह को अच्छी तरह देखा-भाला। फिर उसके सामने मुझे अपनी चाल और दूसरे करतब भी दिखाने पड़े। ऐसा लगा मानों मैं उसे पसन्द आ गया हूं। उसने कहा, ‘‘जब यह अच्छी तरह सध जाएगा तब और भी अच्छा दौड़ेगा।’’ मेरे मालिक ने कहा कि वह मुझे खुद सधाएगा और दूसरे ही दिन वह मुझे साधने लगा।
सधाया जाना किसे कहते हैं—यह हर एक को मालूम नहीं है। एक घोड़े को सधाए जाने का अर्थ है कि उसे जीन और लगाम पहनाकर अपनी पीठ पर सवार को बैठाकर चलना आ गया है। सवार को अपनी पीठ पर बैठाकर चलने में घोड़े की इच्छा का बड़ा ध्यान रखना पड़ता है। सधाते समय ही घोड़े को गाड़ी में जुतना भी सिखाया जाता है। एक सधाया हुआ घोड़ा यह अच्छी तरह जानता है कि उसे सवार की इच्छा के अनुसार ही अपनी चाल को तेज या धीमा करना है। उसे यह भी पता होता है कि न तो दूसरे घोडों से बात करनी चाहिए, और न ही काटना या दुलत्ती झाड़ना चाहिए यानी मनमानी बिलकुल नहीं करनी चाहिए—चाहे वह कितना ही भूखा और थका हुआ क्यों न हो। सधाए जाने के बाद हर घोड़े का फर्ज़ हो जाता है कि वह अपने मन पर काबू रखे और जैसा मालिक कहे वैसा ही करे।
एक दिन मेरे मालिक ने रोज की ही तरह मुझे दो मुट्ठी जौ के दाने खाने को दिए और मेरी पीठ थपथपाते हुए काफी देर तक बातें करता रहा। उसका इस तरह से बातें करना मुझे भी बहुत अच्छा लगा। जब मालिक को इस बात का पक्का विश्वास हो गया कि मैं अब भड़कूंगा नहीं, तो उसने मेरे मुंह में एक लोहे की लगाम कस दी। मैं कह नहीं सकता कि वह लगाम मुझे शुरू-शुरू में कितनी खराब लगी थी। यह बात सिर्फ वे घोड़े ही समझ सकते हैं जिनका लगाम से वास्ता पड़ता है। आप ही सोचिए कि लोहे के एक बड़े-से बेस्वाद टुकड़े को मुंह में डालने और डाले रखने पर कैसा लगता होगा ! सचमुच लगाम बड़ी ही बुरी चीज़ है ! कम से कम, मेरा तो यही विचार है। लेकिन जब मुझे यह याद आया कि मेरी मां को जब कहीं बाहर जाना होता है तो उसके मुंह में भी इसी तरह की लगाम कस दी जाती है, और सिर्फ मेरी मां ही क्यों, हर घोड़े के लिए यह एक ज़रूरी चीज़ है, तो फिर मैं भी अपनी तकलीफ को भूल गया।
लगाम के बाद आया पीठ पर ज़ीन-बाखर कसवाने का नम्बर ! लेकिन यह उतना कष्टदायक नहीं था। बूढ़े डेनियल ने मेरे सिर को पकड़ लिया और मेरे मालिक ने आहिस्ता से मेरी पीठ पर ज़ीन-बाखर कस दी। इसके बाद उसने मेरे शरीर को ‘तंग’ से कस दिया। वह मेरा शरीर थपथपाते हुए मुझे पुचकारता रहा। उसने मुझे थोड़े-से जौ के दाने और खिलाए। फिर मुझे लगाम पकड़कर थोड़ी देर टहलाया गया। इसके बाद मुझे रोज़ ही ज़ीन-बाखर कसकर थोड़ी देर तक टहलाया जाने लगा। धीरे-धीरे यह मेरी आदत पड़ गई।
ऐसा करते-करते जब काफी दिन बीत गये तो एक दिन सुबह, ज़ीन-बाखर, लगाम और तंग कसकर मेरा मालिक मेरी पीठ पर सवार हुआ और मुझे चरागाह की मुलायम घास पर घुमाता रहा। यह मुझे बड़ा ही अजीब लगा। फिर भी अपनी पीठ पर अपने मालिक को बैठाकर मैं अपने-आपको बहुत ही गर्वीला अनुभव करने लगा।
अब पैरों में लोहे की नाल ठुकवाने की बारी आई। यह भी एक बहुत कष्टदायक काम था। अब भी जब कभी मुझे नाल ठुकवाने की याद आती है तो मेरा मन कांपकर रह जाता है। हुआ यह कि, एक दिन मेरा मालिक मुझे एक लोहार की भट्ठी पर ले गया और उसने कुछ कहा। लोहार फुर्ती से मेरे पास आया और उसने एक-एक कर मेरे चारों पैरों को अपने हाथों में लेकर खुरों को थोड़ा-थोड़ा छील दिया। खुर छिलवाने में मुझे तनिक भी तकलीफ नहीं हुई और मैं आराम से अपनी तीन टांगों पर खड़ा-खड़ा बारी-बारी से खुर छिलवाता रहा। खुर छिल चुकने के बाद उस लोहार ने मेरे पैर के साइज़ की एक लोहे की नाल ली और उसे मेरे पैर में लगाकर कीलें ठोंकने लगा। इसमें मुझे बड़ी तकलीफ हुई, लेकिन मेरा कोई बस तो चल नहीं पा रहा था, क्योंकि कई लोगों ने मुझे चारों ओर से कसकर पकड़ लिया था। तकलीफ सहते हुए, मैं नाल ठुकवाता रहा। नालें ठुक चुकने के बाद कुछ दिनों तक मुझे अपने पैर काफी भारी और कड़े महसूस होते रहे। लेकिन फिर मैं इसका अभ्यस्त हो गया।
अब मालिक की इच्छानुसार मेरा गाड़ी में जुतने का समय आया। गाड़ी में जुतने के लिए मुझे और भी बहुत-सी चीज़ें पहननी पड़ीं। जैसे गले में चमड़े का मोटा-सा पट्टा, आंखों पर ब्लिंकर्स, यानी चमड़े के छोटे-छोटे पर्दे, और पूंछ के नीचे चमड़े की मोटी-सी दुमची (लम्बी पट्टी)। यह दुमची भी मुझे शुरू-शुरू में उतनी ही कष्टदायक मालूम हुई जितनी कभी लगाम अनुभव हुई थी। मेरी आंखों पर ब्लिंकर्स इसलिए लगाए थे, ताकि किसी सवारी में जुतकर चलते समय मैं, अगल-बगल नहीं, सिर्फ आगे को ही देख सकूं, यानी मैं एक तेली का बैल बना दिया गया ! जब मेरी दुमची लगाई गई तो ऐसा जी होने लगा कि मैं ‘अगाड़ी-पिछाड़ी’ खिसकना शुरू कर दूं। लेकिन तभी मालिक के सीधेपन का ध्यान आ गया और मैंने इरादा बदल दिया।
मेरा मालिक प्रायः मुझे मेरी मां के साथ जोतता था क्योंकि मां का स्वाभाव बड़ा ही शांत था और वह मुझे अच्छी तरह सिखा सकती थी। मेरी मां ने ही मुझे यह बताया कि मैं जितना अच्छा बर्ताव अपने मालिक से करूंगा उतना ही अच्छा बर्ताव मेरा मालिक मुझसे करेगा।
इसलिए अच्छा यही है कि मालिक को खुश रखने के लिए कोशिश करके काम को बढ़िया ढंग से किया जाए। आगे मां ने कहा, ‘‘लेकिन आदमी भी कई तरह के होते हैं। कुछ तो हमारे मालिक जैसे उदार और बुद्धिमान होते हैं, जिनको खुश रखने में सभी को खुशी होती है। लेकिन कुछ आदमी बड़े ही कठोर और निर्दयी होते हैं, जिन्हें किसी के भी साथ अच्छा बर्ताव करना ही नहीं आता। भगवान करे किसी घोड़े या कुत्ते को ऐसा मालिक न मिले ! इसके आलवा, कुछ लोग निहायत ही बेवकूफ, लापरवाह और घमंडी किस्म के होते हैं, जो अपने दिमाग से तनिक भी काम नहीं लेते। फल यह होता है कि उनके घोड़ों और कुत्तों की बड़ी दुर्गति होती है। मुझे उम्मीद है कि तुम अच्छे ही हाथ में जाओगे, हालांकि किसी भी घोड़े को यह नहीं मालूम होता कि वह कैसे हाथों में जा रहा है। यह भाग्य की ही बात होती है। फिर भी मेरा तुमसे यही कहना है कि जहां भी रहो अपनी कोशिश-भर मेहनत करो और खानदान का नाम रोशन करो।’’
मई महीने के शुरू दिनों की बात है कि स्क्वायर गार्डन का एक आदमी आया। वह मुझे बाहर हॉल में ले गया। उस समय मेरे मालिक ने कहा, ‘‘प्यारे डर्की, तुम आज से मुझसे अलग हो रहे हो ! जाओ, तुम अच्छा घोड़ा साबित होना ! मुझे उम्मीद है कि तुम जहां भी जाओगे खूब मन लगाकर काम करोगे !’’ अपने मालिक से अलग होते समय मेरा मन भी बहुत भारी-भारी सा हो गया। मेरे अन्दर से ममता उमड़ रही थी। मैं अपनी नाक मालिक के हाथ से रगड़ने लगा। मेरे ऐसा करने पर मालिक ने बड़े प्यार के साथ मेरी पीठ थपथपाई और मेरे माथे को चूमते हुए भरे गले से कहा, ‘‘अच्छा विदा !’’
इसके बाद मेरा वह पहला घर मुझसे छूट गया। चूंकि मुझे कुछ साल स्क्वायर गार्डन के साथ भी बिताने पड़े, इसलिए मुझे थोड़ा-बहुत उसके बारे में बताना चाहिए।
स्क्वायर गार्डन का बाग बर्टविक गांव के किनारे पर था। बाग के अन्दर जाने में सबसे पहले लोहे का एक फाटक पार करना होता था, जिसके बाद ही पहला मकान पड़ता था। उस मकान के बाद पुराने और लम्बे पेड़ों की झुरमुट से होकर एक रास्ता गया था जो एक और फाटक तथा मकान तक जाता था। उसके बाद एक मकान था और कई बगीचे थे। और सबसे बाद में अस्तबल, बाड़े और फलों की बाड़ियां।
मेरे अस्तबल में चार बड़े-बड़े थान थे, जिनमें पहला थान बड़ा और चौकोर था। और उसके सामने एक लकड़ी का फाटक था। मेरे थान में भूसा भरने के लिए एक नीची चरही और दाने के लिए एक नांद भी थी। मेरे उस थान को ‘आज़ाद कोठरी’ कहा जाता था, क्योंकि पहले उसमें जिस घोड़े को रखा गया था उसे बांधा नहीं जाता था। वह उसके अन्दर अपने मन-मुताबिक बैठ-लेट-टहल सकता था। कितनी सुंदर थी वह ‘आज़ाद कोठरी !’ उसी में मेरे साईस ने मुझे रखा। वहां सफाई थी, अच्छी हवा आती थी और मन नहीं ऊबता था। उतने सुन्दर थान में शायद मैं पहले कभी नहीं रहा था। साईस ने मुझे सबसे पहले खाने को जौ के दाने दिए, मेरी पीठ थपथपाई, प्यार से पुचकारा और फिर चला गया।
जब मैं अपना दाना खा चुका तो मैंने चारों ओर नज़र दौड़ाई। अपने बराबर के कठघरे में मुझे एक छोटी-सी भूरे रंग की घोड़ी दिखाई दी। उसकी गर्दन और पूंछ के बाल काफी घने थे। उसके सिर की बनावट बहुत ही खूबसूरत थी। उसकी नाक चपटी-सी थी।
मैंने अपने सिर को कोठरी के ऊपर लगी लोहे की सरियों तक उठाया और उससे पूछा, ‘‘कहिए, आप कैसी हैं ? क्या मैं आपका नाम जान सकता हूं !’’
वह जितना घूम सकती थी, उतना घूमकर मेरी ओर मुंह किया और कहा, ‘‘मेरा नाम मेरीलेग्स है। मैं खूबसूरत हूं ! घर की युवतियों की सवारियों के मैं काम में आती हूं। कभी-कभी मैं अपने घर की मालकिन को भी सैर कराने ले जाती हूं। इसलिए मेरी मालकिन और जेम्स मेरा बड़ा ध्यान रखते हैं। क्या तुम मेरी बगल में ही रहोगे ?’’
‘‘हां !’’ मैंने जवाब दिया।
‘‘चलो, यह अच्छा हुआ ! अब तो आसानी से समय बीत जाया करेगा, क्योंकि तुम सुलझे हुए मिज़ाज के हो।’’ मेरीलेग्स ने कहा।
तभी सामने की कोठरी से एक और घोड़ी झांकी। उसके कान खड़े थे और उसकी आंखों से गुस्सा झलक रहा था। उसका रंग गहरा भूरा था, उसकी गरदन भी लम्बी और खूबसूरत थी। उसे जिंजर (अदरख) नाम से पुकारा जाता था। मेरी ओर देखकर वह बोली, ‘‘अच्छा, तो तुम्हीं ने मुझे मेरी कोठरी से बाहर निकलवाया है। तुम्हारे जैसे बछेड़े का एक घोड़ी के साथ ऐसा सलूक ! बड़ी अजीब बात है यह !’’
मैंने जिंजर से माफी मांगते हुए कहा, ‘‘आप गलत समझ रही हैं। मैंने किसी को भी बाहर नहीं निकलवाया। मुझे जो आदमी लाया था वहा मुझे यहां छोड़ गया है। इसमें मेरी भला क्या गलती ? आपने मुझे एक बछेड़ा कहा है, मैं आपको बता देना चाहता हूं कि मेरी उम्र चार साल की है और मैं पूरी तरह जवान हो गया हूं।’’
दोपहर ढले जब वह चली गई तो मेरीलेग्स ने बताया कि हर किसी से झिड़क-झिड़ककर बातें करना और चीज़ों को तोड़ना-फोड़ना इसकी आदत-सी हो गई है। इसलिए लोगों ने इसका नाम जिंजर रख दिया है।
दूसरे दिन मुझे मेरे नये मालिक के सामने ले जाया गया। वह बड़ा अच्छा घुड़सवार और घोडों को ध्यान से रखनेवाला आदमी था। मुझे देखकर उसकी पत्नी ने कहा, ‘‘कहिए, आपको कैसा लगा यह घोड़ा ?’’
‘‘बिलकुल वैसा ही जैसा कि जॉन ने बताया था। इतना प्यारा है कि इस पर सवारी करने का मन ही नहीं होता। इसका क्या नाम ठीक रहेगा ?’’ मालिक बोला।
उसकी पत्नी ने कहा, ‘‘एबोनी (आबनूस) नाम कैसा रहेगा ? इसका रंग भी तो उसी तरह है !’’
‘‘नहीं, एबोनी अच्छा नाम नहीं है।’’ मेरे नये मालिक ने जवाब दिया।
‘‘तब फिर ब्लैकबर्ड कैसा रहेगा ?’’
‘‘नहीं, यह भी नहीं।’’ मेरे मालिक ने यह नाम भी नापसंद कर दिया।
तभी उसकी पत्नी ने खुशी से चहककर कहा, ‘‘अहा, एक औऱ प्यारा-सा नाम मुझे याद आ गया। ब्लैक ब्यूटी ! कैसा प्यारा नाम है। है न !’’
इस नाम को सुनकर मेरे मालिक का चेहरा भी खिल उठा। ‘‘हां, यह नाम इस खूबसूरत घोड़े पर बहुत फबेगा। तो फिर आज से हम इसे ब्लैक-ब्यूटी नाम से ही पुकारा करेंगे।’’ उसने कहा। इस तरह मैं डार्की से ‘ब्लैक ब्यूटी’ हो गया।
इसके कुछ दिनों बाद मेरी जिंजर से फिर मुलाकात हुई। मुझे एक गाड़ी में उसके साथ जुतना पड़ा। लेकिन तब उसका बदला हुआ स्वभाव देखकर मुझे बड़ा अचरज हुआ। ऐसे दो-तीन मौकों के बाद जिंजर से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई। मेरीलेग्स से पहले ही मेरी दोस्ती हो चुकी थी।
मेरे नये मालिक के पास दो घोड़े थे। उनमें एक का नाम था ‘जस्टिस’ और दूसरे का नाम ‘सर ओलिवर’ था। जस्टिस सवारी और सामान ढोने के काम आता था। सर ओलिवर को मेरा मालिक शिकार पर खेलने के लिए ले जाता था।

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