जादू नगरी - श्रीकान्त व्यास Jadu Nagari - Hindi book by - Srikant Vyas
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जादू नगरी

श्रीकान्त व्यास

प्रकाशक : शिक्षा भारती प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :80
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5001
आईएसबीएन :9788174830425

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लेविस कैरोल के प्रसिद्ध उपन्यास एलिस इन वण्डरलैण्ड का सरल हिन्दी रूपान्तर

Jadu Nagari

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

1

एक दिन एलिस अपनी बहिन के साथ नदी किनारे बैठी थी। लेकिन थोड़ी ही देर में वह ऊबने लगी। कोई काम ही नहीं था करने को। चुपचाप बैठे-बैठे आदमी ऊबे नहीं तो क्या करे ! एक-दो बार उसने झांककर उस किताब में देखा जिसे उसकी बहिन पढ़ रही थी। लेकिन उसमें न तो चित्र ही थे और न पात्रों की बातचीत ही। ‘भला ऐसी किताब किस काम की, जिसमें न चित्र हैं और न बातचीत !’ एलिस ने अपने मन में कहा।
इसलिए वह सोचने लगी कि क्या किया जाए, फूलों का माला गूंथी जाए तो कैसा रहे ? वह गुलबहार के फूल चुनने और उसी माला गूंथने के बारे में सोच रही थी कि अचानक एक सफेद खरगोश, जिसकी आंखें गुलाबी रंग की थीं, भागता हुआ उसके पास से निकल गया।

इस खरगोश में ऐसी कोई खास बात नहीं थी। यहां तक कि जब खरगोश ने यह कहा कि, ‘‘ओह, मुझे बहुत देर हो गई,’’ तब भी एलिस ने उसकी ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। लेकिन जब उसने देखा कि खरगोश कुछ दूर जाकर रुका और एक जेब-घड़ी निकालकर उसे देखने लगा, और फिर तेज़ कदमों से वहां से भाग पड़ा, तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही। यह कैसा खरगोश है ! उसने ऐसा खरगोश तो कभी नहीं देखा, जिसके जेब हो और जो अपने साथ जेबघड़ी भी रखता हो ! वह फौरन उठ कर उसके पीछे भागी। भागते-भागते उसने देखा कि खरगोश एक झाड़ी के पास अपने बिल में घुस गया। एलिस ने पास जाकर देखा कि उसका बिल काफी बड़ा है। उसका मन हुआ कि खरगोश का पीछा करना चाहिए। फिर बिना कुछ सोचे समझे वह भी उसके बिल में उतर गई।

कुछ दूर तक खरगोश का बिल सीधा एक सुरंग की तरह था। एलिस आगे बढ़ती चली गई, लेकिन फिर अचानक चलकर वह बहुत गहरा हो गया। एलिस को सोचने का और अपने को रोकने का मौका भी नहीं मिला, और वह उस कुएं की तरह गहरे बिल में जा गिरी। पहले तो वह कुछ समझ ही न पाई कि वह कहां जा गिरी है। जब उसने आसपास नज़र दौड़ाई तो अपने को एक कमरे में पाया। कमरे में चारों तरफ किताबों की अलमारियां रखी हुई थीं। खूंटियों पर नक्शे और चित्र टंगे हुए थे। लेकिन अभी उसका गिरना बन्द नहीं हुआ था। नीचे गिरते-गिरते उसकी नज़र अलमारी में रखी हुई एक शीशी पर पड़ी, जिस पर लिखा था-‘नारंगी का मार्मलेड’। एलिस को यह देखकर बड़ी निराशा हुई कि शीशी खाली थी। उसने नीचे गिरते-गिरते किसी तरह हाथ बढ़ाकर उस शीशी को फिर से एक अलमारी में रख दिया।

वह नीचे की ओर गिरती चली जा रही थी। अब उसे इस तरह एक अन्धे कुएं में गिरते हुए डर भी नहीं लग रहा था। मन में उसने सोचा कि मैं कितनी बहादुर हो गई हूं। घर के ज़ीने से गिरना तो इसके आगे कुछ भी नहीं है।
नीचे-नीचे, और भी नीचे ! उसके गिरने का कोई अन्त ही नहीं था। उसने सोचा कि कहीं मैं इस तरह गिरती हुई पृथ्वी के आरपार तो नहीं निकल जाऊंगी ? नीचे शायद मैं सीधे न्यूज़ीलैंड या आस्ट्रेलिया पहुंच जाऊं ! वहां मुझे लोगों से अदब से पेश आना चाहिए। और गिरते-गिरते बीच अधर में ही उसने झुककर किसी से अदब से सवाल पूछने की नकल की। फिर तुरंत उसने सोचा-‘नहीं, मैं वहां किसी से इस तरह का मूर्खतापूर्ण प्रश्न नहीं पूछूंगी, वरना लोग कहेंगे कि देखो, यह कैसी मूर्ख लड़की है ! इसे इतना भी नहीं मालूम कि यह कहां है। और मुझे किसी से पूछने की ज़रूरत ही क्या ? मैं कहीं पढ़ लूंगी कि मैं कहां आ पहुंची हूं। लेकिन इस गिरने का कभी अन्त भी होगा तो ? न मालूम कितने सौ मील मैं गिरती चली आई हूं।’

लेकिन उसके गिरने का कोई अन्त नहीं था। इसलिए उसने फिर अपने-आपसे बात करना शुरू किया, ‘मेरी प्यारी बिल्ली, डायना, आज मेरे बिना कितनी दुखी होगी ! आशा है, चाय के वक्त घर के लोग उसकी तश्तरी में दूध डालना नहीं भूलेंगे। आह डायना, कितना अच्छा होता अगर तुम भी मेरे साथ होती ! यहां तुम्हें चूहे तो मिल ही जाते।’ गिरते-गिरते एलिस को नींद आने लगी, और उसे लगा कि वह अपनी बिल्ली के हाथ में हाथ डाले टहल रही है और उससे बातें कर रही है, कि अचानक—धम्-धमाक् ! वह टहनियों और सूखी पत्तियों के एक ढेर पर आ गिरी। अब कहीं जाकर उसका गिरना खत्म हुआ।
एलिस को कोई चोट नहीं आई। वह फौरन उठ खड़ी हुई। उसने ऊपर देखा, लेकिन वहां बिल्कुल अंधेरा था। सामने एकरा्स्ता था जिसमें अब भी वह सफेद खरगोश भागता हुआ दिखाई दे रहा था। अब देर करना ठीक नहीं था। एलिस फौरन उसके पीछे भागी। एक मोड़ पर एलिस उसके काफी पास जा पहुंची थी। उसने सुना कि वह कह रहा था, हाय, बड़ी देर हो गई। अब क्या होगा ?’’

लेकिन जब एलिस उसका पीछा करती हुई मोड़ के दूसरी ओर पहुंची, तब खरगोश गायब हो चुका था। एलिस ने अपने को एक बहुत बड़े कमरे में पाया, जिसकी छत बहुत नीची थी। छत में दीये लटके हुए थे और कमरे में हलकी रोशनी फैली थी। कमरे में चारों तरफ दरवाज़े थे, लेकिन सब में ताला लगा था। एलिस एक-एक दरवाज़े के पास जाकर देखने लगी। सब बन्द थे। वह सोचने लगी कि अब यहां से निकला कैसे जाएगा।
कमरे में घूमते-घूमते वह तीन टांगों की एक छोटी मेज़ के पास पहुंची, जो शीशे की बनी थी। उस मेज पर सिवा एक छोटी-सी सुनहरी चाबी के और कुछ नहीं था। एलिस को लगा कि इससे कमरे का कोई दरवाज़ा खोला जा सकता है। लेकिन अफसोस, वह चाबी किसी भी ताले में न लग सकी। एलिस को बड़ी निराशा हुई। उसने एक बार फिर से कोशिश करने की सोची। इस बार उसने एक पर्दा टंगा हुआ देखा, जिस पर पहले उसकी नज़र नहीं पड़ी थी। उसने परदा हटाया। उसके नीचे एक छोटा-सा दरवाज़ा था। लेकिन वह भी बन्द था। दरवाज़े की लम्बाई पन्द्रह इंच से अधिक न थी। एलिस ने उसके ताले में चाबी लगाई। वाह ! ताला खुल गया।

एलिस बहुत खुश हुई। उसने दरवाज़ा खोला और नीचे झुककर उसमें देखा। वहां से चूहे के बिल जैसी एक संकरी-सी सुरंग जाती थी, जिसकी दूसरी ओर एक बड़ा ही खूबसूरत बाग दिखाई पड़ता था। उसमें बढ़िया-बढ़िया फूल खिले थे और फव्वारे चल रहे थे। इस अंधेरे से निकलकर उस बाग में घूमने के लिए एलिस का मन मचलने लगा। लेकिन कोई चारा ही नहीं था। वह फिर से मेज के पास लौट आई।
इस बार मेज़ पर उसने एक छोटी-सी शीशी रखी हुई देखी, जो पहले वहां नहीं थी। एलिस को बड़ा अचरज हुआ, पहले कैसे इस शीशी पर उसकी नज़र नहीं पड़ी ! शीशी की गरदन में एक कागज बंधा था। उसमें बड़े सुन्दर-सुन्दर अक्षरों में लिखा था-‘मुझे पी लो।’
वाह, यह खूब रहा ! ‘मुझे पी लो !’ लेकिन एलिस इतनी मूर्ख नहीं थी कि शीशी उठाकर उसे पी जाती। इसमें ज़हर भरा हो तो ? उसने इस तरह की कहानियां सुनी और पढ़ी थीं, जिनमें लालच में आकर बच्चे ऐसे काम कर बैठते थे जिसके लिए उन्हें बाद में पछताना पड़ता था। नहीं, एलिस एक समझदार लड़की थी।

उसने शीशी को अच्छी तरह देखा। उस पर कहीं भी ‘ज़हर’ या ‘खतरा’ नहीं लिखा था। उसने सोचा, ज़रा चखा तो जाए इसमें है क्या। चखने पर उसे लगा कि इसमें कोई बहुत ही स्वादिष्ट चीज़ भरी है। कुछ शर्बत जैसी चीज थी जो सचमुच बड़ी स्वादिष्ट थी। एलिस ने थोड़ी ही देर में शीशी खाली कर डाली।
‘अरे, यह मुझे क्या हो रहा है ?’ एलिस ने अपने आपसे कहा ‘मैं तो जैसे किसी दूरबीन की तरह सिकुड़ती जा रही हूं।’
और सचमुच यही बात थी। अब वह सिकुड़कर दस इंच की रह गई थी। अचानक यह सोचकर खुशी से उसका चेहरा दमक उठा कि अब वह आसानी से इस अंधेरे कमरे से बाहर निकल सकेगी और उस खूबसूरत बाग में पहुंच सकेगी। वह दौड़ी-दौड़ी उस छोटे से दरवाज़े के पास जा पहुंची।
लेकिन आह, उससे एक गलती हो गई। चाबी तो वह उसी शीशे के मेज़ पर भूल आई थी। वह फिर से लौटकर मेज़ के पास आई। पर अब क्या किया जाए ? वह इतनी छोटी हो गई थी कि उसका हाथ मेज़ तक पहुंच ही नहीं सकता था। अब तो सब चौपट हो गया। उसने बहुत कोशिश की, लेकिन मेज़ का पाया क्या था वह तो जैसे कोई बड़ा भारी खम्भा था और इतना चिकना कि वह बार-बार फिसल पड़ी। शीशे का पाया चिकना तो होगा ही। एलिस को रोना आ गया। वह साये के पास बैठकर आंसू बहाने लगी।

‘लेकिन अब इस तरह आंसू बहाने से क्या होगा ? बेकार रोओ मत !’ उसने अपने-आपसे कहा। अब वह मन ही मन अपने को इस लापरवाही के लिए डांटने लगी, ‘तुम्हें चाबी अपने पास रखनी चाहिए थी। अब बैठकर आंसू बहा रही हो ! बन्द करो यह रोना-धोना।’ इस तरह अपने को डांटने के बाद उसने अपने मन को समझाने की कोशिश की, ‘एलिस तुम तो समझदार लड़की हो। तुम्हें इस तरह रोना नहीं चाहिए। अब रोने से क्या होगा !’
अचानक उसकी नज़र एक छोटे-से डिब्बे पर पड़ी जो मेज़ के नीचे ही पड़ा था। उसने डिब्बा खोला। उसमें एक छोटी-सी केक थी। केक पर किशमिश से बहुत खूबसूरती से लिखा हुआ था-‘मुझे खा लो।’
बड़ी अजीब बात थी। लेकिन यहां की तो सभी चीज़ें अजीब थीं। एलिस ने सोचा, ‘मुझे इस केक को खा लेना चाहिए। मुमकिन है इसे खाने से मेरी लम्बाई फिर से बढ़ जाए। और अगर इसके खाने से मैं और छोटी हो गई, तब भी कोई बात नहीं। मैं उस दरवाज़े के छेद से निकलकर किसी तरह उस बाग में तो पहुंच जाऊंगी।’
यह सोचकर वह केक खाने लगी। धीरे-धीरे वह पूरा केक खा गई।

2

 

 

लेकिन यह क्या ? केक खाने के बाद एलिस की लम्बाई इतनी तेजी से बढ़ने लगी कि उसे लगा कि जैसे उसका सिर आसमान को छू रहा है। जब उसने झुककर अपने पैरों की ओर देखा तो उसके मुंह से चीख निकल गई, ‘हाय राम, मेरे पैर कितनी दूर रह गए ! अब मैं इनमें, मोज़े और जूते कैसे पहनूंगी, और यहां कौन है जो इस काम में मेरी मदद करेगा !’
वह यह सब सोच ही रही थी कि इतने में अचानक उसका सिर कमरे की छत से जा टकराया। अब उसकी लम्बाई नौ फुट थी। उसने फौरन वह सुनहरी चाबी उठाई और उस बाग वाले दरवाज़े की ओर बढ़ चली। लेकिन बेचारी एलिस ! उसकी लम्बाई-चौड़ाई इतनी बढ़ गई थी कि उस दरवाज़े में वह सिर्फ एक आंख लगाकर बाहर झांक सकती थी। उसमें से उसका हाथ तक बाहर नहीं निकल सकता था। एलिस को रोना आ गया। वह सिसक-सिसककर कहने लगी, ‘मैं इतनी बड़ी हो गई और अब भी मुझे रोना आता है। मैं चुप क्यों नहीं हो जाती !’ लेकिन उसके आंसू नहीं थमे। झरने की तरह उसके आंसू झर रहे थे। यहां तक कि थोड़ी देर में आंसुओं का पानी पूरे कमरे में फैल गया और छः इंच गहरा एक तालाब-सा बन गया।
अचानक उसे किसी के कदमों की आहट सुनाई दी। उसने फौरन अपनी आंख पोंछ ली और उत्सुकता से देखा कि कौन आ रहा है। यह वही सफेद खरगोश था, जो बड़े ठाठदार कपड़े पहने अकड़कर चल रहा था। उसके एक हाथ में दस्ताने थे और दूसरे में बड़ा भारी पंखा था। वह बहुत जल्दी में था और बड़बड़ा रहा था, ‘‘हे भगवान, कहीं बेगम साहिबा नाराज न हों, मैंने बहुत देर कर दी !’’ एलिस उस समय इतनी घबराई थी कि किसी से भी सहायता मांगने को तैयार थी। जब खरगोश उसके पास आया तो उसने बहुत ही धीमी और सहमी आवाज में कहा, ‘‘महाशयजी, जरा मेहरबानी करके....!’’ खरगोश यह सुनते ही चौंक पड़ा। उसके हाथ से पंखा और दस्ताने गिर पड़े और वह छलांग लगाता हुआ तेजी से अंधेरे कोने की ओर भाग गया।

एलिस ने पंखा और दस्ताने उठा लिए। कमरे में बड़ी गर्मी थी। वह पंखे से हवा करने लगी, और सोचने लगी, ‘आज सब बातें कितनी अजीब हो रही हैं। कल का दिन कैसे मजे से बीता था ! पता नहीं मैं कितनी बदल गई हूं। कहीं मेरी शक्ल-सूरत अपनी सहेलियों में से किसी की तरह तो नहीं हो गई ? ऐडा के बाल तो घुंघराले हैं, और नोबेल को कुछ आता नहीं। मैं तो बहुत कुछ जानती हूं, मुझे तो अब भी जोड़-बाकी याद हैं, गिनती भी याद है। देखो न, पांच चौके हुए बारह और छः चौके हुए तेरह और सौत चौके हुए...। खैर जाने दो, गिनती-पहाड़े में क्या रखा है ! कोई मुझसे भूगोल के पाठ सुन ले। लन्दन पेरिस की राजधानी है, और पेरिस रोम की राजधानी है और रोम.....नहीं-नहीं, यह सब मैं क्या बक रही हूं ? यह तो सब गलत है।’ और उसे फिर रुलाई आ गई।

वह अब भी पंखे से हवा करती जा रही थी और सिसक रही थी। उसने दस्ताने भी अपने हाथ में पहन लिए थे। अचानक उसे लगा कि अब उसकी लम्बाई घट रही है। वह फौरन अपने को नापने के लिए टेबल के पाये के पास जा खड़ी हुई। अब उसकी लम्बाई सिर्फ दो फुट रह गई थी। वह तेजी से सिकुड़ती जा रही थी। वह समझ गई कि इसका कारण वह पंखा था, जिससे वह हवा कर रही थी। उसने उसे फौरन दूर फेंक दिया और राहत की सांस लेकर कहा, ‘‘हे भगवान्, मैं तो बाल-बाल बची ! वरना थोड़ी देर में पंखा झलते-झलते मैं चींटी से भी छोटी रह जाती। चलो, अब बाग में चला जाए !’’ और वह फिर से उस छोटे-से दरवाज़े की ओर लपकी। लेकिन दुर्भाग्य ! दरवाज़ा तो बन्द था और उसकी चाबी उसने फिर से टेबल पर रख दी थी। एलिस अब फिर से इतनी छोटी हो गई कि उसका हाथ वहां तक पहुंच ही नहीं पाता था। वह खीझकर बोली, ‘‘हाय, यह सब क्या हो रहा है ? इतनी छोटी तो मैं कभी नहीं थी। यह तो बहुत बुरा हुआ।’’
इतने में अचानक उसका पैर फिसल गया, और—छपाक् ! वह गले तक नमकीन पानी में जा गिरी। पहले तो उसे लगा कि वह किसी समुद्र में गिर पड़ी है, लेकिन फिर जल्दी ही उसने समझ लिया कि वह उसके उन आंसुओं से बना तालाब है, जिन्हें उसने तब गिराया था जब वह नौ फुट लम्बी थी। ‘‘उफ, कितना अच्छा होता अगर मैं रोई न होती ! लगता है, मैं अपने आंसुओं में डूब मरूंगी। यह तो और भी अजीब बात होगी। लोग कहेंगे कि एलिस अपने आंसुओं में डूब मरी !’’
इतने में उसने अपने पास किसी की छटपटाहट सुनी। उसने सोचा कि कहीं दरियाई घोड़ा तो नहीं है। लेकिन जब वह उसके पास पहुंची तो देखा वह एक चूहा था जो उसकी तरह फिसलकर आंसुओं के तालाब में आ गिरा था।

एलिस ने सोचा कि इससे कुछ कहना-सुनना बेकार होगा, लेकिन फिर भी वह बोली, ‘‘ओ चूहे, इस तालाब से बाहर निकलने का कोई रास्ता तुम्हें मालूम है ? मैं तो तैरते-तैरते थक गई हूं। ऐ चूहे !’’ और उसे अपनी भाई की व्याकरण की पुस्तक का कारकवाला पाठ याद आ गया। वह बड़बड़ाने लगी-‘‘एक चूहे ने, चूहे को, चूहे से, चूहे के लिए...हे चूहे !’’ इस पर चूहे ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा और अपनी छोटी-सी एक आंख झपका ली। एलिस को शरारत सूझी। उसने पूछा, ‘‘चूहे साहब, बिल्ली आपकी कौन लगती है ?’’ यह सुनकर चूहा उछल पड़ा और बुरी तरह कांपने लगा। एलिस ने फौरन कहा, ‘‘माफ करना मैं बिलकुल भूल गई थी कि बिल्ली आपको पसन्द नहीं है।’’
‘‘ऊं, बिल्ली पसन्द नहीं है ?’’ चूहे ने अपनी पतली आवाज में कहा, ‘‘अगर तुम मेरी जगह होतीं तो क्या बिल्ली को पसंद करतीं ? बड़ा आई हो।’’
चूहा तैरता हुआ उससे दूर निकल गया। एलिस ने किसी तरह खुशामद करके उसे मनाया। लेकिन अब आंसुओं के तालाब में भीड़ बढ़ती जा रही थी। तरह-तरह के पशु-पक्षी भी उसमें आ गिरे थे और किसी तरह तैरकर किनारे लगने की कोशिश कर रहे थे। उसमें बतख थी; तोता और उल्लू थे; बड़ी भारी चोंच वाला डोडो और गरुण पक्षी थे। अब सब लोग एलिस के पीछे कतार बांधकर तैरने लगे। किसी तरह सब किनारे लगे।

3

 

 

आंसुओं के तालाब के किनारे अजीब-अजीब से जानवरों की भीड़ थी। एलिस भी उनके बीच बैठी थी। इस समय वह बतख से थोड़ी-सी बड़ी थी। सब भीगे हुए थे। कोई अपने पंख फड़फड़ा रहा था और कोई जीभ से चाट-चाटकर अपनी देह सुखा रहा था। इस समय सबका मन उदास था।
अब यह प्रश्न उठा कि अपने को सुखाया किस तरह जाए। सब आपस में इस सवाल पर बहस करने लगे। सब अपनी-अपनी बोली बोल रहे थे। एलिस को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वह सबकी बोली समझती है और सब उसकी बात समझ लेते हैं। गरमागरम बहस जारी थी। इतने में चूहे ने अपनी पतली आवाज में चीखकर सबको शान्त होने और चुपचाप बैठने का आदेश दिया। फिर उसने एक ऊटपटांग लेक्चर दिया, जिसमें वह बार-बार इतिहास के उदाहरण देता था।
एलिस ने चिढ़कर कहा, ‘‘लेकिन इससे क्या होगा, हम लोग अब भी वैसे के वैसे पानी में भीगे हुए हैं ! तुम्हारे लेक्चर से मेरा बदन बिलकुल भी नहीं सूखा।’’

इतने में डोडा खड़ा होते हुए गम्भीरता से बोला, ‘‘ऐसी हालत में हम लोगों को ‘कोकस दौड़’ लगानी चाहिए।’’
‘‘कोकस दौड़ से आपका क्या मतलब है ?’’ एलिस ने पूछा।
‘‘अभी बताता हूं। दौड़ को समझने का सबसे अच्छा तरीका तो यह है कि हम लोग उसे शुरू कर दें।’’ यह कहकर उसने एक घेरा बना दिया। सबलोग उसके आस पास खड़े हो गए। फिर जहां जिसके मन में आया दौड़ने लगा। दौड़ते-दौड़ते थोड़ी देर में लगभग सभी लोग सूख गए। यहां तक कि एलिस के कपड़े भी सूख गए। अचानक डोडो चिल्लाया, ‘‘ठहर जाओ ! दौड़ खतम हो गई।’’
सब लोग रुक गए। सब बुरी तरह हांफ रहे थे। उन्होंने पूछना शुरू किया, ‘‘लेकिन इस दौड़ में जीता कौन ?’’
डोडो बोला, ‘‘हर कोई जीता और सबको इनाम मिलना चाहिए।’’
‘‘लेकिन इनाम दे कौन रहा है ?’’ सब एक साथ बोले।
‘‘क्यों, वह देवी !’’ डोडो ने एलिस की ओर इशारा करते हुए कहा। फौरन सारे पशु-पक्षी एलिस को घेरकर खड़े हो गए और चिल्लाने लगे, ‘‘इनाम लाओ ! इनाम लाओ !’’

एलिस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। घबराकर उसने अपनी जेब में हाथ डाला तो मिठाइयोंवाली एक पुड़िया मिल गई। सौभाग्य से आंसुओं में भीगने पर भी मिठाइयां खराब नहीं हुई थीं। एलिस ने मिठाई बांटनी शुरू की। संयोग से मिठाइयां गिनती में बराबर निकलीं और हरेक को एक-एक मिल गई।
इतने में चूहा बोला, ‘‘लेकिन भाइयो, इस लड़की को भी इनाम मिलना चाहिए।’’
‘‘हां, हां, क्यों नहीं !’’ डोडो ने गम्भीरता से कहा, ‘‘लड़की तुम्हारी जेब में और क्या है ?’’
‘‘सिर्फ एक अंगुश्ताना है।’’ एलिस ने दुखी स्वर से कहा।

‘‘तो निकालो उसे, लाओ इधर दो !’’ डोडो ने आदेश के स्वर में कहा। फिर ये सब लोग एलिस को घेरकर खड़े हो गए। डोडो ने बड़ी शान से अंगुश्ताना लिया और उसे फिर से एलिस को भेंट कर दिया। सब लोगों ने खुश होकर तालियां बजाईं। एलिस को यह बड़ा भद्दा लगा। लेकिन सब लोग इतने गम्भीर थे कि एलिस को हंसने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। वह उनका मज़ाक नहीं बना सकी। झुककर उसने अपनी ही चीज़ को भेंट के रूप में स्वीकार कर लिया।
इसके बाद चूहे ने एक कविता सुनाई जो उसकी पूंछ की तरह लंबी थी। एलिस को बार-बार अपनी बिल्ली डायना याद आ रही थी। अचानक उसने उसका नाम ले लिया। बिल्ली का नाम सुनते ही वहां हड़बड़ी मच गई। सब लोग भागने का रास्ता ढूंढ़ने लगे। एक चिड़िया ने अपने पंखों को ठीक किया और कहा, ‘‘भाई अब रात बहुत बढ़ रही है, मुझे घर चलना चाहिए। रात की हवा से मेरा गला खराब हो जाता है !’’ इसी तरह सबने कोई न कोई बहाना बनाया। एक-एक करके सब वहां से चलते बने। थोड़ी ही देर में एलिस अकेले रह गई।
‘‘कितना अच्छा होता अगर मैंने डायना का नाम न लिया होता !’’ उसने बहुत दुखी स्वर में कहा, ‘‘ यहां कोई मेरी बिल्ली को पसंद नहीं करता। हालांकि इतना तय है कि मेरी बिल्ली दुनिया में सबसे अच्छी है। हाय, अब कब मैं अपना डायना से मिल पाऊंगी !’’ उसे रोना आ गया। लेकिन थोड़ी ही देर में चूहा वापस लौट आया और उसे अपनी कहानी सुनाने लगा।


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