धर्म विजय - भाग 1 - ओम् शिवराज Dharm Vijay - Part 1 - Hindi book by - Om Shivraj
लोगों की राय

बहुभागीय पुस्तकें >> धर्म विजय - भाग 1

धर्म विजय - भाग 1

ओम् शिवराज

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :352
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4951
आईएसबीएन :81-7043-426-2

Like this Hindi book 3 पाठकों को प्रिय

259 पाठक हैं

सम्पूर्ण महाभारत पर आधारित उपन्यास

इस पुस्तक का सेट खरीदें
Dharm Vijay - Part 1 - A hindi book by Om Shivraj

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यह महाभारत की आद्यन्त कहानी है। महाभारत-कथा को आधार बनाकर हिन्दी में तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनेक ग्रन्थ लिखे गये हैं, परन्तु यह ‘धर्मविजय’ उन सबसे भिन्न है और इस भिन्नता का आधार है धर्म। धर्म भारत का एक ऐसा शब्द है जिसका पर्यायवाची शब्द संसार की किसी भाषा में कोई नहीं है। धर्म भारत की एक ऐसी विशेषता है जो संसार में अन्य किसी देश के पास नहीं है। उसी धर्म की विजय की यह कहानी है। श्रीकृष्ण दै्वपायन व्यास ने महाभारत को ‘जय’ नाम से अभिहित किया है। यह जय किसकी है-यह भी बता दिया है-यतो धर्मस्ततो जयः-जिधर धर्म है उधर जय है। धर्मराज युधिष्ठिर की धर्मपरायणता, परन्तप अर्जुन की गुरुभक्ति, भगवान् श्रीकृष्ण की निश्छल राजनीति तथा पतिव्रता द्रौपदी एवं राजमाता कुन्ती की परिवार-निष्ठा आदि का यथार्थ स्वरूप पाठक इसमें देखेंगे। विश्वास है कि मुग्धकर भाषा-शैली, रोचक संवाद एवं मनोरम कल्पनाओं से अलंकृत यह उपन्यास पाठकों का स्नेह प्राप्त करने में सफल होगा।

यतः सत्यं यतो धर्मो यतो ह्रीरार्जवं यतः।
ततो भवति गोविन्दो यतः कृष्णस्ततो जयः।।

जहाँ सत्य है, जहाँ धर्म है, जहाँ ईश्वर-विरोधी कार्य में लज्जा है और जहाँ हृदय की सरलता होती है, वहीं श्रीकृष्ण रहते हैं और जहाँ भी श्रीकृष्ण रहते हैं, वहीं निस्सन्देह विजय है।

प्रार्थना

अपना यह उपन्यास धर्मविजय हम माता वैष्णवी देवी के चरणों में समर्पित करते हैं।

हे मात !
शरणागत-दीनार्त-परित्राण-परायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते।।
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।

-ओम् शिवराज

पावका नः सरस्वती।। ऋग्वेद 1/3/10 ।।
सरस्वती हमको पवित्र करने वाली है।

धर्म विजय
(1)

धर्मविजय महाभारत की कथा है।
महाभारत का एक नाम जय है। यह बात महाभारत के प्रारम्भिक श्लोक से ही प्रमाणित होती है-

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरात्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्।।

-श्री नारायण तथा श्री नर एवं भगवती सरस्वती और महर्षि वेदव्यास को नमस्कार करके जय का पाठ करना चाहिए।
आगे भी कहा है-
जयो नामेतिहासेऽयं श्रोतव्यो विजिगीषुणा। आदि पर्व 62/20।
-यह जय नामक इतिहास विजयेच्छु पुरुषों को अवश्य सुनना चाहिए।

युद्ध में एक पक्ष हारता है और दूसरा जीतता है। ऐसी स्थिति में जय नाम की सार्थकता क्या है ? जय किसकी ? इतना तो निश्चित है कि जय से कवि का तात्पर्य पाण्डव-जय नहीं था। क्योंकि यदि यही तात्पर्य होता तो कवि इसका नाम पाण्डव-जय रखता। तो फिर जय किसकी ? इसका उत्तर कवि ने स्वयं ही दिया है-

यतः सत्यं यतो धर्मो यतो ह्रीरार्जवं यतः।
ततो भवति गोविन्दो यतो कृष्णस्ततो जयः।।

-महाभारत-उद्योगपर्व 68/9।।

-जहाँ सत्य है, जहाँ धर्म है, जहाँ ईश्वर-विरोधी कार्य में लज्जा है और जहाँ हृदय की सरलता होती है; वहीं श्रीकृष्ण रहते हैं और जहाँ श्रीकृष्ण रहते हैं वहीं निःसन्देह विजय है।
जिधर धर्म है-उधर कृष्ण हैं। जिधर कृष्ण हैं-उधर विजय है।
अर्थात् धर्मविजय।

(2)
हम यह कथा क्यों कह रहे हैं ?

इस प्रश्न का उत्तर यह है कि हमारी यह मान्यता है कि नामकरण, उपनयन, विवाह, अन्त्येष्टि आदि संस्कारों की तरह जीवन मूल्य भी शाश्वत होते हैं। इन शाश्वत जीवन मूल्यों को ही भारत के प्राचीन संस्कृत-वाङ्मय में धर्म कहा गया है। धर्म का आदि स्त्रोत वेद हैं। महाभारत शाश्वत जीवन मूल्यों का सदा प्रफुल्ल रहने वाला सुरम्य उपवन है। यही कारण है कि महाभारत की कथाएँ आज भी जीवित हैं। इसीलिए हम इस महाभारत-कथा का पुनराख्यान कर रहे हैं।
पाश्चात्य विचारों से प्रभावित शिक्षित लोग आज प्राचीन जीवन मूल्यों का उपहास करने में गौरव का अनुभव करते हैं। एक ओर वे कहते हैं-जीवन मूल्य तेजी से बदलते जा रहे हैं। दूसरी ओर वे कहते हैं-जीवन मूल्यों में ह्रास हो रहा है। ये दोनों बातें एक ही नहीं हैं। सत्य तो यह है कि जीवन मूल्य शाश्वत होते हैं। उनमें जब भी कोई परिवर्तन होता है-वह उनका ह्रास ही होता है। धर्म का ह्रास होने पर जीवन मूल्यों का भी ह्रास होता है। जब जब धर्म का ह्रास होता है तब तब मुक्तात्मा महापुरुष धर्म की संस्थापना के लिए अवतार लेकर धर्म की संस्थापना करते हैं। इस प्रसंग में धर्म की व्याख्या करना यहाँ असंगत नहीं होगा।

धर्म क्या है ?

धर्म के विषय में आज बड़ा अज्ञान है। वेदव्यास कहते हैं कि जिधर धर्म है-ऊधर कृष्ण हैं तथा जिधर कृष्ण हैं-उधर विजय है। जब धर्म की ही विजय होती है तब यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि धर्म कोई साधारण वस्तु नहीं है। यद्यपि ऊपर हमने यह कहा है कि शाश्वत जीवन मूल्यों को धर्म कहते हैं तथापि सत्य तो यह है कि यह धर्म का संकुचित अर्थ ही है। तो फिर धर्म का वास्तविक अर्थ क्या है ?
धर्म-भारत का एक ऐसा शब्द है-जिसका पर्यायवाची या समानार्थक शब्द विश्व की किसी भाषा में नहीं है। इसलिए धर्म शब्द का संसार की किसी भी भाषा में अनुवाद नहीं किया जा सकता। भारत का संविधान अंग्रेजी में लिखा गया। अंग्रेजी के सैकुलर शब्द का अर्थ हिन्दी में धर्मनिरेपक्ष कर दिया गया। सैकुलर शब्द का अर्थ असाम्प्रदायिक होना चाहिए-धर्मनिरपेक्ष नहीं। अपेक्षा का अर्थ है-आशा या आकांक्षा। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ हुआ-धर्म की आशा या आकांक्षा न होना। जो धर्म नहीं-वह अधर्म है। इसलिए धर्मनिरपेक्षता अधर्म है।
धर्म संस्कृत भाषा का शब्द है। धृ धातु से मन् प्रत्यय लगाकर धर्म बनता है। धृ धातु का अर्थ है-धारण करना, आलम्बन देना, पालन करना। धर्म का अर्थ है-1. जो लोकों को धारण करता है अथवा जो पुण्यात्माओं द्वारा धारण किया जाता है। 2. वह कर्म जिसके करने से करने वाले का इस लोक में अभ्युदय हो और परलोक में मोक्ष की प्राप्ति हो (संस्कृत-शब्दार्थ-कौस्तुभ, पृष्ठ 549)। किन्तु इतना कहने से ही अर्थ स्पष्ट नहीं होता। लोकों को कौन धारण करता है ? पुण्यात्माओं द्वारा क्या धारण किया जाता है ? इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए हमको यह देखना होगा कि धर्म आया कहाँ से है ?
संसार के विद्वान यह स्वीकार करते हैं कि संसार में प्राचीनतम भाषा संस्कृत है तथा प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद है। ऋग्वेद में धर्म शब्द का प्रयोग हुआ है।

कविमग्निमुप स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे।
देवममीवचातनम्।।

ऋग्वेद 1/12/7।।

-(कविम्) कवि-मेधावी (सत्यधर्माणम्) सत्य को धारण करने वाले (अमीवचातनम्) रोगनाशक (देवम् अग्निम्) देव अग्नि की अर्थात् परमात्मा की (अध्वरे) हिंसा रहित यज्ञ में (उप स्तुहि) स्तुति कर।
इस मन्त्र में अग्नि का विशेषण सत्यधर्म है। अग्नि परमात्मा का नाम है। इसका प्रमाण स्वयं ऋग्वेद है। ऋग्वेद के एक (1/164/46) मंत्र में कहा गया है एक सत् है। उसी का ज्ञानी लोग अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं। उसी को इन्द्र-मित्र-वरुण और अग्नि कहते हैं। उसी को अग्नि-यम-मातरिश्वा कहते हैं। यह दिव्य सुपर्ण और गरुत्मान् है।
अस् (विद्यमान होना) धातु से शतृ प्रत्यय लगकर सत् शब्द सिद्ध होता है। सत् का अर्थ है-विद्यमान। सत् से यत् प्रत्यय लगकर सत्य शब्द बनता है। सत्य का अर्थ है-यथार्थ-वास्तविक।
वेद के अनुसार दो सुपर्ण (चेतन ईश्वर एवं जीव) तथा वृक्ष (अचेतन प्रकृति)-ये तीन सत्य हैं अर्थात् सदा विद्यमान रहते हैं। ईश्वर, जीव एवं प्रकृति इन तीनों में ईश्वर सदैव एक-सा रहता है-किन्तु प्रलयकाल में जीव एवं प्रकृति की सत्ता वैसी नहीं रहती-जैसी सृष्टिकाल में रहती है। प्रलयकाल में प्रकृति के सत्त्व-रजस्-तमस् तीनों गुण साम्यावस्था में आ जाते हैं तथा जीवात्मा सुप्तावस्था में पहुँच जाता है। किन्तु परमात्मा प्रलयकाल में भी उसी अवस्था में रहता है-जिस अवस्था में वह सृष्टिकाल में रहता है। इसीलिए वेदमंत्र में परमात्मा के लिए कहा गया है-एक सत् है-उसी का ज्ञानी लोग अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं।
हम कह चुके हैं कि अदिति (प्रकृति) एवं जीवात्मा दोनों सत्य हैं। इन दोनों को धारण करनेवाला परमात्मा सत्यधर्म है। परमात्मा प्रलयकाल में अदिति एवं अभोक्ता जीवात्माओं को धारण करता है तथा सृष्टिकाल में सम्पूर्ण लोकों को एवं भोक्ता जीवात्माओं को धारण करता है-इसलिए वह सत्यधर्म है। सत्यधर्म न कहकर यदि केवल धर्म कहें तो उसका अर्थ भी परमात्मा ही होगा-जो लोकों को धारण करता है वह धर्म। यदि धर्म का अर्थ परमात्मा है तो धर्मपालन का क्या अर्थ होगा ? धर्म की अर्थात् परमात्मा की आज्ञा का पालन करना धर्मपालन है। यह धर्म का द्वितीय अर्थ है-जो पुण्यात्माओं द्वारा धारण किया जाता है वह धर्म है।

प्रश्न यह है कि परमात्मा की आज्ञा क्या है ?

इस प्रश्न का उत्तर यह है कि भारतीय परम्परा में वेदों की उत्पत्ति परमात्मा से मानी गई है। वेदव्यास भी यही मानते हैं। ऋग्वेद ज्ञानकाण्ड है। यजुर्वेद कर्मकाण्ड है। सामवेद उपासना काण्ड है। अथर्ववेद विज्ञानकाण्ड है।
यजुर्वेद के प्रथम मंत्र में कहा गया है-देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे अर्थात् सम्पूर्ण विद्याओं का प्रकाशक तथा सम्पूर्ण जगत् का उत्पादक जगदीश्वर तुम्हारे प्राण और अन्तःकरण आदि को अत्यन्त श्रेष्ठ कर्त्तव्य कर्म से अच्छे प्रकार से संयुक्त करे। इसलिए श्रेष्ठतम कर्म का पालन ही धर्मपालन है।
वृत्त में एक ओर परिधि से केन्द्र बिन्दु को स्पर्श करती हुई जो रेखा दूसरी ओर परिधि को स्पर्श करती है-उसको व्यास कहते हैं। महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन चार वेदों में पारंगत होने के कारण वेदव्यास कहे जाते थे।
वेदव्यास का निश्चित मत था कि यदि लोग धर्म का आचरण करें तो मनुष्यों को अर्थ-काम और मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है-
ऊर्ध्वबाहुः विरोम्येष न च कश्चिच्छृणोति माम्।
धर्मादर्थश्च कामश्च स धर्मः किं न सेव्यते।।

-मैं हाथ उठाकर कहता हूँ-परन्तु मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्म से अर्थ और काम की प्राप्ति होती है-उस धर्म का सेवन क्यों नहीं किया जाता ?
यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि धर्म केवल धर्म है।
वेद संसार के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं तथा वेदवाक् संसार की प्राचीनतम भाषा है। कालान्तर में अनेक भाषाएँ बनीं और बिगड़ीं। इस विवेचन का तात्पर्य इतना ही है कि वेद और धर्म संसार में सबसे प्राचीन हैं।
आधुनिक विद्वान कहते हैं कि भाषा-ज्ञान मनुष्य ने विकसित किया है। प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य स्वयमेव विद्वान हो जाएगा ? मेरा जन्म विक्रम संवत् 1995 में हुआ। विश्वविद्यालय की सर्वोच्च परीक्षा एम.ए. उत्तीर्ण करके तथा पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त करके विगत तीस, वर्षों से मैं भाषा क्षेत्र में कुछ नया शोध करने का प्रयत्न कर रहा हूँ। तीस वर्षों के अविरत प्रयत्न से मैं केवल इतना ही जान सका हूँ कि जो प्राचीनतम है वह आज भी सर्वोत्तम है। वह प्राचीनतम धर्म आज भी हमारी समस्याओं का समाधान करने में समर्थ है। इसीलिए उपनिषद् में कहा गया है-प्राप्य वरान् निबोधत-श्रेष्ठ लोगों को प्राप्त करके उत्तम ज्ञान प्राप्त करो।

3

महाभारत को रचने में व्यास का उद्देश्य मनोरंजक कथाओं के माध्यम से लोगों को धर्म समझाना था। महाभारत में उन्होंने ऐसे कृष्ण का वर्णन किया है जो सज्जनों की रक्षा के लिए तथा दुष्टों के विनाश के लिए एवं धर्म की संस्थापना के लिए इस संसार में बार-बार जन्म लेना चाहते हैं। महाभारत में कहा गया है-

इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्।
बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रतरिष्यति।। आदि पर्व 1/267/।।

-इतिहास और पुराणों से वेदार्थ का विचार करना चाहिए। क्योंकि अधूरे ज्ञान वाले से वेद बहुत डरते हैं कि कहीं यह अर्थ का अनर्थ न कर दे।
कृष्ण द्वैपायान व्यास ने जो सत्य इतिहास जय नाम से प्रस्तुत किया था उसमें पीछे से बहुत-सी अनर्गल-असत्य बातें जोड़ दी गईं। महाभारत में जो भी वेद विरुद्ध अर्थात् धर्मविरुद्ध कथन हैं-वे व्यासजी के कदापि नहीं हो सकते। प्रश्न यह है कि उन असत्य-अनर्गल और वेद विरुद्ध बातों का पता कैसे लगाया जाए ? वह आधार क्या हो-जिससे इन अनर्गल-असत्य बातों को जाना जा सके ? सूक्ष्म-सतर्क दृष्टि से महाभारत का अध्ययन करने पर हम असत्य बातों को पकड़ सकते हैं। आवश्यकता पड़ने पर वहाँ वेद का प्रमाण उपस्थिति कर सकते हैं।
कुछ विद्वानों का विचार है कि व्यास ने मूल जय नामक महाकाव्य लगभग चौबीस सहस्त्र श्लोकों का लिखा था। उन्होंने अपने पाँच शिष्यों को जय पढ़ाया।
एक शिष्य वैशम्पायन ने सर्पसत्र के समय जनमेजय के सामने महाभारत की कथा सुनाई। इस प्रकार व्यास के मूल महाभारत में वैशम्पायन द्वारा परिवर्धन हुआ। इसके बाद दूसरा परिवर्धन सौति के द्वारा होता है। शौनक के द्वादशवर्षीय यज्ञ के अन्त में नैमिषारण्य में जाकर सौति महाभारत की कथा सुनाते हैं। इस प्रकार वर्तमान महाभरात के संग्रहकर्ता के रूप में हमारे सामने वेदव्यास-वैशम्पायन और सौति-ये तीन उपस्थित होते हैं। इसी दृष्टि से महाभारत के तीन नाम सुने जाते हैं। व्यास ने महाभारत को जय नाम से पुकारा है। इसके बाद जब इसमें परिवर्धन हो गया तब इसका नाम भारत पड़ गया। अन्त में जब दूसरी बार फिर परिवर्धन हुआ तब इसका नाम महाभारत पड़ गया। इन तीनों संस्करणों में श्लोक संख्या में भी बड़ी भिन्नता आ गई है। उसका कारण यह है कि ज्यों-ज्यों महाभारत के आख्यान की परम्परा बढ़ती गई त्यों-त्यों उसकी कलेवर भी बढ़ता गया। इस प्रकार अन्तिम संस्करण में महाभारत के एक लाख श्लोक हो गए।
किन्तु विद्वानों का उपर्युक्त विचार युक्तिसंगत नहीं है।
महाभारत का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह किसी एक ही व्यक्ति की रचना है। महाभारत में कहा गया है कि व्यास के आदेश से उनके सामने वैशम्पायन ने व्यास की रचना जनमेजय से कही (आदिपर्व-अध्याय 60 व 62) और वैशम्पायन ने जनमेजय को सुनाया था वही सौति ने शौनक को कहा (आदिपर्व-अध्याय 1)। महाभारत में प्रारम्भ से ही एक लाख श्लोक थे तथा उसके भारत और महाभारत ये दोनों नाम थे। पश्चात् उपकथाएँ निकालकर उसका एक लघु संस्करण विद्यार्थियों की सुविधा के लिए किया गया। आदि पर्व में सौति का कथन है-

इदं शतसहस्त्रं तु लोकानांम पुण्यकर्मणाम्।। आदिपर्व 1-101।
उपाख्यानैः सह ज्ञेयमाद्यं भारतमुत्तमम्।
चतुर्विंशति साहस्री चक्रे भारतसंहिताम्।।102।।
उपाख्यानैर्विना तावत् भारतं प्रोच्यते बुधैः।103।।
अस्मिन्स्तु मानुषे लोके वैशम्पायन उक्तवान्।।108
शिष्यों व्यासस्य धर्मात्मा सर्ववेदविदांवरः।
एकं शतसहस्रं तु मयोक्तं वै निबोधत।।109।।

-पुण्यकर्मा व्यक्तियों के (चरित्र का वर्णन करनेवाले) इन एक लाख श्लोकों को-उपाख्यानों के साथ-श्रेष्ठ आद्य भारत कहते हैं। उसके पश्चात् उपाख्यानों को छोड़कर (कवि ने) चौबीस हजार श्लोकों की भारत-संहिता तैयार की। विद्वान उसको (आद्य भारत से अलग बताने के लिए) भारत कहते हैं। इस मनुष्य लोक में व्यास-शिष्य सभी वेदज्ञों में श्रेष्ठ धर्मात्मा वैशम्पायन ने इसका प्रचार किया। वह एक लाख श्लोकों का काव्य मैं तुम्हें सुनाता हूँ।
आदिपर्व के 62 वें अध्याय में पुनः यही बात कही गई है-

इदं शतसहस्रं हि श्लोकानां पुण्यकर्मणा।
सत्यवत्यात्मजेनेह व्याख्यातममितौजसा।।62/14।

-अत्यन्त तेजस्वी सत्यवती-पुत्र व्यास ने पुण्यकर्मा व्यक्तियों की यह कथा एक लाख श्लोकों में कही है।
इस विवेचन से स्पष्ट है कि इस प्रचण्ड महाकाव्य की मूल रचना एक लाख श्लोकों की ही है तथा जो भारत है-वही महाभारत है और वही जय है।
इसी अध्याय में वैशम्पायन कहते हैं-
धर्मशास्त्रमिदं पुण्यमर्थशास्त्रमिदं परम्।
मोक्षशास्त्रमिदं प्रोक्तम् व्यासेनामितबुद्धिना।।62/23।।

-अमित बुद्धिमान व्यास ने इस पुण्यप्रद धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा मोक्षशास्त्र का कथन किया है।
जैसा कि हम पहले कह चुके हैं-इस धर्मशास्त्र महाभारत में अनेक बातें ऐसी हैं जो अनर्गल तथा धर्मविरुद्ध हैं। ये बातें अमित बुद्धिमान् व्यास जी की लिखी हुई तो हो नहीं सकतीं-उनके शिष्य वैशम्पायन और सौति की भी लिखी हुई वे नहीं है। अपनी दीर्घ कालयात्रा में विशालकाय महाभारत में अनेक बातें छूट गईं तथा अनेक बातें उसमें जोड़ दी गईं। इसका एक कारण अज्ञान-दूसरा कारण चमत्कार द्वारा कथा में रोचकता उत्पन्न करना तथा तीसरा कारण व्यक्तिगत विद्वेष हैं। ऐसे कुछ स्थलों का वर्णन हम आगे कर रहे हैं।

एक

यह सर्वविदित है राजा धृतराष्ट्र के सौ पुत्र एक पुत्री थी। महाभारत में एक स्थान पर लिखा है-
वैशम्पायन उवाच
अथ शुश्राव विप्रेभ्यों गान्धारीं सुबलात्मजाम्।
आराध्य वरदं देवं भगनेत्रहरं हरम्।
गान्धारी किल पुत्राणां शतं लेभे वरं शुभा।। आदिपर्व 1-3/9।।

वैशम्पायन बोले-ब्राह्मणों के मुख से सुना है कि शुभलक्षण युक्त सुबलपुत्री गान्धारी ने भगनेत्र के विनाशक एवं वर देने वाले महादेव की आराधना कर सौ पुत्र पाने का वर प्राप्त किया है।
महाभारत में ही दूसरे स्थान पर कहा गया है-
वैशम्पायन उवाच
क्षुच्छ्रमाभिपरिग्लानं द्वैपायनमुपस्थितम्।
तोषयामास गान्धारी व्यासस्तस्यै वरं ददौ।।
सा वव्रे सदृशं भर्तुः पुत्राणां शतमात्मनः।
ततः कालेन सा गर्भं धृतराष्ट्रादथाग्रहीत।। आदिपर्व 107/7-8।।

वैशम्पायन बोले-एक समय भगवान् द्वैपायन भूख और थकावट से कातर होकर गान्धारी के पास आए। गान्धारी ने सेवा से उनको सन्तुष्ट किया। तब व्यास जी ने गान्धारी- को वर दिया।
गान्धारी ने यह वर माँगा कि उसके पति से पति के समान ही सौ पुत्र हों। अनन्तर गान्धारी योग्यकाल में धृतराष्ट्र से गर्भवती हुई।

दोनों ही कथन वैशम्पायन के हैं।

हम यह स्वीकार करते हैं कि वरदान में असीम शक्ति होती है। परन्तु यहाँ पहली बात यह है कि जब महादेव से सौ पुत्रों का वर प्राप्त कर लिया तो फिर व्यास जी से सौ पुत्रों का वर क्यों माँगा ? क्या महादेव पर विश्वास नहीं हुआ ? यदि दोनों से वर मिले तो फिर दो सौ पुत्र होने चाहिए। दूसरी बात यह है कि व्यास जी महायोगी थे। वे अपनी इच्छा से चाहे जहाँ जा सकते थे। उनको भूख और श्रम नहीं व्यापते थे। तीसरी बात यह है कि क्या कोई स्त्री सौ पुत्रों का वर माँगेगी ? यदि कोई स्त्री प्रति वर्ष दो जुड़वाँ बच्चों को जन्म दे तब भी सौ पुत्रों के लिए पचास वर्ष चाहिए।
तो फिर सत्य क्या है ?
सत्य यह है कि गान्धारी की दस बहिनें और थीं। उनका विवाह भी गान्धारी के विवाह के साथ ही राजा धतराष्ट्र के साथ हुआ था। उन दस बहिनों के नाम स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती ने अपने सम्पादित महाभारत में दिए हैं। इनके अतिरिक्त धृतराष्ट्र की एक वैश्य वर्ण की पत्नी भी थी। इन सब बारह पत्नियों के वे सौ पुत्र थे। किसी कारण गान्धारी को छोड़कर अन्य सबके नाम विस्मृत हो गए तो सौ पुत्रों की उत्पत्ति की संगति बैठाने के लिए ये वरदानों की कथाएँ जोड़ दी गईं।

दो

कहा जाता है कि शूद्र-कुलोत्पन्न होने के कारण द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्वेद की शिक्षा देना स्वीकार नहीं किया। यह असत्य है। महाभारत में ही कहा गया है कि-

वृष्णयश्चान्धकाश्चैव नानादेश्याश्च पार्थिवाः।
सूतपुत्रश्च राधेयो गुरुं द्रोणमियात् तदा।। आदिपर्व 131/11।.

-वृष्णिवंशी तथा अंधकवंशी क्षत्रिय, नाना देशीय राजकुमार तथा राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण-ये सभी आचार्य द्रोण के पास अस्त्र विद्या की प्राप्ति के लिए आए थे।
जब सूत पुत्र कर्ण द्रोणाचार्य से शिक्षा ग्रहण करने के लिए उनके पास आया तथा आचार्य ने उसको शिष्य के रूप में स्वीकार किया तो एकलव्य को निषाद-कुलोत्पन्न जानकर उसको शिक्षा न देने की बात असत्य हो गई। इसका अर्थ यह है कि आचार्य द्रोण ने किसी अन्य कारण से एकलव्य को शिष्य के रूप में अस्वीकार किया होगा।
दूसरी बात यह है कि यदि कोई गुरु शिक्षा न दे- तो कोई शिष्य यदि उस गुरु की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करे तो वह विद्या में पारंगत हो जाएगा क्या ? तीसरी बात यह है कि जब द्रोण ने एकलव्य को शिक्षा दी ही नहीं तो उनको एकलव्य से गुरुदक्षिणा माँगने का क्या अधिकार था ? इस विवेचन से यह सिद्ध होता है कि एकलव्य का सारा आख्यान आचार्य द्रोण जैसे तपोनिष्ठ ब्राह्मण को लांछित करने के लिए लिखा गया है। यह वेदव्यास की रचना नहीं है।

तीन

यह सर्वमान्य धारणा है कि द्रौपदी पाँचों पाण्डवों की पत्नी थी।
एक स्त्री का एक समय में एक से अधिक पुरुषों से विवाह करना वेद-विरुद्ध होने से अधर्म है। इस बात को कुन्ती और राजा दुप्रद भी मानते थे। अब उन कारणों पर विचार करते हैं-जिनसे विवश होकर द्रौपदी को पाँचों पाण्डवों से विवाह करना पड़ा-यह कहा जाता है। महाभारत के अनुसार वह घटनाक्रम यों है।
जब अर्जुन द्रौपदी को लेकर कुम्भकार के घर पर आए तो बाहर से ही उन्होंने माता कुन्ती से कहा-मात ! मैं भिक्षा लाया हूँ।
कुन्ती ने समझा कि अर्जुन प्रतिदिन की सामान्य भिक्षा लेकर आए हैं। उन्होंने भीतर से कहा-वत्स ! तुम पाँचों भाई उसे समान रूप से बाँट लो।
तत्पश्चात् द्रौपदी को देखकर कुन्ती ने चिन्तित होकर कहा-हाय ! मेरे मुँह से बड़ी अनुचित बात निकल गई।
फिर कुन्ती युधिष्ठिर से बोली-बेटा ! ऐसा उपाय बताओ कि मेरी बात झूठी न हो और क्या किया जाए जिससे इस पांचाल राजकुमारी को न तो पाप लगे और नीच योनियों में भटकना पड़े ?
वह श्लोक यह है-
मया कथं नानृतमुक्तमद्य भवेत् कुरूणामृषभ ब्रवीहि।
पांचालराजस्य सुतामधर्मो न चोपवर्तेत न विभ्रमेच्च।।

आदिपर्व 190/5।।

तब बुद्धिमान युधिष्ठिर ने दो घड़ी तक विचार करके अर्जुन से कहा-अर्जुन ! तुमने द्रोपदी को जीता है। तुम्हारे साथ ही इस राजकुमारी की शोभा होगी। वीर ! तुम अग्नि प्रज्वलित करो और विधिपूर्वक इस कन्या का पाणिग्रहण करो।
अर्जुन बोले-नरेन्द्र ! आप मुझे अधर्म का भागी न बनाइए। बड़े भाई के अविवाहित रहते छोटे भाई का विवाह हो जाए-यह धर्म नहीं है। पहले आपका विवाह होना चाहिए-तत्पश्चात् भीमसेन का और फिर मेरा। तदनंतर नकुल और फिर सहदेव विचार कर सकते हैं।
अर्जुन के ये भक्ति भाव तथा स्नेह से भरे वचन सुनने के पश्चात् सभी पाण्डवों ने राजकुमारी द्रौपदी की ओर देखा।

तेषां तु द्रौपदी दृष्ट्वा सर्वेषाममितौजसाम्।
सम्प्रमथ्येन्द्रियग्रामं प्रादुरासीन्मनोभवः।। आदिपर्व 190/13।।

-द्रुपदकुमारी पर दृष्टि पड़ते ही उन सभी अमित तेजस्वी पाण्डु पुत्रों की सम्पूर्ण इन्द्रियों को मथकर मन्मथ प्रकट हो गया।
युधिष्ठिर ने भाइयों की मुखाकृति देखकर ही उनके मन का भाव जान लिया। द्रौपदी को लेकर हम सब भाइयों में फूट न पड़ जाए-इस भय से युधिष्ठिर ने अपने सभी बन्धुओं से कहा-कल्याणमयी द्रौपदी हम सबकी पत्नी होगी।
युधिष्ठिर ये बातें कह रहे थे कि वहाँ श्रीकृष्ण और बलराम पहुँच गए। पाण्डवों से वार्तालाप कर जब श्रीकृष्ण और बलराम चले गए तब भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव ने भिक्षा लाकर युधिष्ठिर को निवेदन की। तब कुन्ती ने द्रौपदी से कहा-भद्रे ! भोजन का एक भाग देवताओं को अर्पण कर ब्राह्मणों को भिक्षा दो। तत्पश्चात् जो शेष बचे उसका आधा भीमसेन को दो। फिर शेष के छह भाग करके चार भाइयों को एक-एक दो तथा एक मेरे लिए और एक अपने लिए रख लो।
द्रौपदी ने ऐसा ही किया।
सबने भोजन किया और विश्राम करने लगे।
उसी समय वहाँ पहुँचकर धृष्टद्युम्न ने उन सबको देखा और राजभवन में लौटकर पिता को सब बातें बतायीं। राजा द्रुपद ने पुरोहित को भेजा। पुरोहित के पश्चात् फिर एक दूत पहुँचा। दूत ने युधिष्ठिर से कहा-आप लोग सम्पूर्ण दैनिक कार्यो से निवृत्त हो जाएँ। राजभवन में आप लोगों के लिए भोजन तैयार है। आप राजकुमारी कृष्णा को भी विवाह-विधि से वहीं प्राप्त करें।
तब युधिष्ठिर भाइयों तथा माता एवं द्रौपदी के साथ राजभवन में आए।
विवाह की बात उठने पर युधिष्ठिर ने द्रुपद से कहा-महाराज ! हम लोगों में समय (शर्त) हो चुका है कि रत्न को हम सब लोग बाँटकर उपभोग करेंगे। अतः कृष्णा धर्म के अनुसार हम सबकी महारानी बनेगी। द्रुपद बोले-कुरुनन्दन ! एक राजा की बहुत सी रानियाँ हों-यह विधान तो देखा गया है। परन्तु एक स्त्री के अनेक पुरुष पति हों। यह कहीं नहीं सुना गया। अतः तुम्हें यह लोक और वेद विरुद्ध अधर्म नहीं करना चाहिए।
युधिष्ठिर ने कहा-महाराज ! धर्म का स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है। हम उसकी गति नहीं जानते । मेरी वाणी कभी झूठ नहीं बोलती और मेरी बुद्धि कभी अधर्म में नहीं लगती। हमारी माता ने हमें ऐसा ही करने की आज्ञा दी है। मेरे मन में भी यही ठीक जँचा है।
यह सम्पूर्ण घटनाक्रम इतनी विसंगतियों से भरा हुआ है कि यह वेदव्यास रचित हो ही नहीं सकता। विचारणीय है कि-
(क) पहली बात तो यह है कि भिक्षा का कथन तभी कहा जा सकता है जब कुन्ती को यह ज्ञात हो कि अर्जुन भिक्षा लेने गए हैं। एकचक्रा नगरी में एक ब्राह्मण से द्रौपदी के समाह्वय की अर्थात् स्वयंवर की बात सुनकर जब पाण्डव उद्विग्न हो गए तब माता कुन्ती ने स्वयं ही वहाँ जाने का प्रस्ताव रखा था। यहाँ दो बातें थीं। एक तो पाण्डवों को अपने पुरुषार्थ पर पूर्ण विश्वास था। दूसरे स्वयंवर में सफल होने पर महाराज द्रुपद जैसे शक्तिशाली राजा से उनका सम्बन्ध स्थापित हो जाता। इसलिए कुन्ती चाहती थी कि अर्जुन द्रौपदी के स्वयंवर में अवश्य भाग लें। कुन्ती को यह पता था कि उसके पुत्र स्वयंवर में गए हैं-भिक्षा लेने नहीं गए। महाभारत के ही वर्णन के अनुसार भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव स्वयंवर से कुम्भकार के यहाँ आकर तब भिक्षा लेने गए थे। इसलिए भिक्षा की बात बिलकुल असत्य है। स्वयंवर में लक्ष्यवेध होते ही युधिष्ठिर नकुल और सहदेव को साथ लेकर माता को सूचना देने तुरन्त आवास स्थान पर आए थे। वह श्लोक यह है-

तस्मिंस्तु शब्दे महति प्रवृत्ते युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः।
आवासमेवोपजगाम शीघ्रं सार्धं यमाभ्यां पुरुषोत्तमाभ्याम्।।
[महाभारत (भांडारकर) आदिपर्व 179/21 ।]

-जब वह भारी कोलाहल होने लगा तब धर्म को धारण करने वालों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर वेग से पुरुष श्रेष्ठ दोनों यमज भाइयों को लेकर आवास को चले गए।


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book