लोगों की राय

सामाजिक >> शेष प्रश्न

शेष प्रश्न

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :208
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4928
आईएसबीएन :81-7182-917-1

Like this Hindi book 10 पाठकों को प्रिय

228 पाठक हैं

दो विरोधी विचारधाराओं के टकराव से उत्पन्न प्रश्नों का उत्तर....

Sesh Prashan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारतवर्ष की पुरातन सभ्यता, पुरातन संस्कृति, पुरातन परम्परा और पुरातन रीति-रिवाजों में सभी उचित और श्रेष्ठ नहीं हैं। काल के बदलते परिवेश में आंखें मूंद कर अगर हम उनका अनुशरण करने लगे तो हम न देश का कल्याण कर पाएंगे, न भारतीय समाज का। काल परिवर्तन के साथ-साथ हमें उनमें से बहुतों को छोड़ देना पड़ेगा।
इसी प्रकार पाश्चात्य जगत का सभी कुछ बुरा नहीं है। पाश्चात्य सभ्यता की बहुत-सी देन और अच्छाइयां ऐसी हैं, जिनकी आज के युग में उपेक्षा नहीं की जा सकती। हमें देश और समाज के कल्याण के लिए उसकी अच्छाइयों और विशेषताओं को ग्रहण करना ही पड़ेगा।
बंगला साहित्य के अमर शिल्पी शरत्-चन्द्र का ‘शेष प्रश्न’ इन्हीं दो विरोधी विचारधाराओं के टकराव से उत्पन्न प्रश्नों का उत्तर है।

(1)

समय पर आकर बहुत से बंगाली परिवार स्थायी रूप से आगरा में ही बस गए थे। मुगलकालीन लगभग सभी किले और इमारतें उन्होंने देखी हैं। अमीर और नवाबों के टूटे-फूटे मजारों के भी सूची उन्हें याद हो गई है। ताजमहल अब उनके लिए सामान्य चीज बन गया है। आंखों में आंसू भरकर, सांझ की उदासी में, अंधखुली आंखों से चन्द्रमा की दूधिया चांदनी में, यमुना के दोनों किनारों से अंधेरी रातों में, आंखें फाड़-फाड़कर सारांश यह है कि ताजमहल के सौन्दर्य को देखने के जितने भी सम्भव उपाय हैं, उन सभी का वे लोग प्रयोग कर चुके हैं। किस विख्यात व्यक्ति ने ताजमहल देखकर क्या चाहा, किस कवि ने उसके बारे में कविता की भेंट चढ़ाई, कितने भावुक प्रेमी उसके सामने गले में फांसी लगाकर मृत्यु का आलिंगन करने पर विवश हो गए-इन सभी रहस्यों को ये लोग जान गए थे।
आज बंगाली समाज में बड़ी चहल-पहल थी। वहां प्रतिदिन देश-विदेश के यात्री आते हैं, यह कोई नई बात नहीं। आज एक बंगाली महाशय यहां आए थे। वे अकेले नहीं थे। साथ में उनकी रूप-गुण सम्पन्न कन्या भी थी, जिसे वह मनोरमा कहकर पुकारते थे। शहर के एक किनारे एक बहुत बड़ा मकान खाली पड़ा था। उन्होंने उसे किराए पर ले लिया। देखते-ही-देखते वह वीरान मकान जगमगा उठा। मानों उस निर्जीव पड़े मकान में इन बंगाली महाशय ने प्राण-प्रतिष्ठा कर दी हो। उनके साथ बैरा, बावर्ची, दरबान, नौकर, नौकरानी, रसोइया, घोड़ागाड़ी, मोटर, साइकिल-सभी चीजें आई थीं।

बंगाली महाशय का नाम आशुतोष बनर्जी है। इस ठाठ-बाट का स्पष्ट प्रमाण था कि ये लोग बड़े आदमी हैं। लेकिन बंगाली समाज की चहल-पहल का कारण इनकी सभ्यता न होकर उनका सरल और विनम्र स्वभाव था। बाप और बेटी ने शहर में रहने वाले सभी बंगाली परिवारों का पता मालूम किया और उनसे भेंट करने गए। जहाँ भी गए, बड़े स्नेह से कहा, ‘‘हम लोग बीमारी की दशा में यहां आए हैं। यहाँ आपके अतिथि भी हैं। यदि आप लोग हमें अपने दल में शामिल नहीं करेंगे तो हमें अपना निर्वासन काल बिताना दूभर हो जाएगा।’’ बेटी, घरों के अंदर जा-जाकर स्त्रियों से मिली और एक ऐसा सम्बन्ध बना लिया मानों वे यहीं के स्थायी निवासी हैं।
सभी लोगों को उनसे मिलकर प्रसन्नता हुई। जब किसी परिवार की स्त्रियां आशुतोष बाबू के घर आती थीं तो वे स्वयं अपनी गाड़ी भेज देते थे और गाड़ी से ही वापस पहुंचा देते थे। आशुतोष बनर्जी का मकान सप्ताह भर में ही सभी का इतना परिचित हो गया कि वहां हर समय-चहल-पहल रहने लगी और आगरा में रहने वाले बंगाली परिवार भी बिलकुल ही भूल गए कि ये लोग यहां केवल एक सप्ताह से ही आए हैं। हर समय गाने-बजाने, नाच-रंग और हंसी-मजाक की महफिलों से वह घर शोभित रहने लगा।

अभी तक संकोच के कारण किसी ने भी यह जानने का प्रयास नहीं किया था कि लोग सनातनी हैं या ब्रह्मसमाजी। इसकी कोई विशेष आवश्यकता भी नहीं थी। शिक्षित परिवार था, इसलिए सब जान गए कि खान-पान के बारे में यहां रूढ़िवाद का प्रभुत्व नहीं हो सकता। मनोरमा उच्च शिक्षा प्राप्त होने के कारण अभी तक कुंवारी थी। यह बात इसका स्पष्ट प्रमाण था कि धार्मिक रूढि़यों से यह परिवार कोसों दूर है। घर में मुसलमान बावर्ची थी, इसकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया था।
अविनाश मुकर्जी कॉलेज में प्रोफेसर हैं। बहुत दिन हुए उनकी पत्नी स्वर्ग सिधार गईं। फिर विवाह नहीं किया। दस वर्ष का उनका एक बेटा है। स्कूल में पढ़ता है। आर्थिक स्थिति अच्छी है। निश्चिन्त और निर्विघ्न जीवन है। दो वर्ष पहले विधवा साली मलेरिया से पीड़ित होकर जलवायु परिवर्तन के लिए यहां आई थी। बुखार ने छोड़ दिया, लेकिन बहनोई ने नहीं छोड़ा। इस समय वही घर की स्वामिनी है। लड़के की देखभाल करती हैं, घर-गृहस्थी संभालती है। मित्र लोग इस सम्बन्ध को आलोचना करके हंसी उड़ाते हैं। अविनाश हंस देता है। कहता है, ‘‘भाई व्यर्थ ही लज्जित मत करो। भाग्य है, भाग्य। कोशिश करने में तो कोई कमी नहीं छोड़ी।’’
अविनाश को अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम था। घर भर में कई-कई पोज के उसके अनेक फोटो टंगे हुए हैं। सोने के कमरे में मूल्यवान फ्रेम में जड़ी एक बड़ी ऑयल पेंटिग है। हर बुधवार को प्रातः अविनाश उस पर माला लटका देता है। बुधवार को ही उसकी पत्नी की मृत्यु हुई थी।

अविनाश हर समय खुश रहता है। ताश-चौपड़ में उसकी विशेष रुचि है। छुट्टी के दिन उनके घर के लोगों का जमघट रहता है। आज किसी त्योहार के कारण कॉलेज-कचहरी बंद है। खाने-पीने के बाद कुछ प्रोफेसर लोग आ धमके। दो जनों ने शतरंज की बिसात जमाई और दो जने औंधे लेटकर उसे देखने लगे शेष भिन्न-भिन्न प्रकार की गप्पों में उलझ गए।
इतने में एक बड़ी मोटरकार उनके दरवाजे पर आई। अपनी कन्या के साथ आशु बाबू ने प्रवेश किया। सबने सम्मान सहित उनका स्वागत किया। अविनाश ने हाथ जोड़कर कहा, ‘‘मेरा परम सौभाग्य है कि आपकी पग-धूलि इस घर में पड़ी। हां, अचानक असमय कैसे आना हुआ ?’’ इतना कहकर मनोरमा के लिए उसने एक कुर्सी बढ़ा दी।
आशु बाबू आराम कुर्सी पर अपने भारी बदन को टिकाकर उच्च हास्य से कमरे को गुंजाते हुए बोले, ‘‘आशु वैद्य के लिए असमय ? मेरी ऐसी बदनामी तो मेरे छोटे चाचा भी नहीं कर सके अविनाश बाबू।’’
मनोरमा हंसते मुंह से सिर झुकाकर बोली, ‘‘यह क्या कह रहे हो बाबूजी ?’’
आशु बाबू ने कहा, ‘‘तो जाने दो छोटे चाचा की बात। लड़की को आपत्ति है। लेकिन इससे बढ़कर कोई अच्छा उदाहरण बिटिया के बाप के पास नहीं है।’’ इतना कहकर वह फिर प्रसन्नता से मुंह फाड़कर हंस पड़े।

हंसी रुकने पर बोले, ‘‘लेकिन क्या कहूं साहब, गठिया से अपाहिज हूं। नहीं तो जिन चरणों की धूल को आपने इतना गौरव प्रदान किया है, आशु वैद्य के उन्हीं चरणों की धूल को बुहारने के लिए आपको एक नौकर रखना पड़ता अविनाश बाबू। लेकिन बैठने का समय नहीं है, अभी जाना होगा।’’
इतनी शीघ्रता का कारण जानने के लिए सभी लोग उनके मुंह की ओर देखने लगे। आशु बाबू ने कहा, ‘‘एक निवेदन है, स्वीकार कराने के लिए बिटिया तक को घसीट लाया हूं। कल छुट्टी का दिन भी है। शाम को घर पर गाने आदि का आयोजन है। सपरिवार पधारिए, उसके बाद भोजन....।’’

फिर लड़की से बोले, ‘‘मणि, भीतर से आज्ञा ले आओ बेटी। देर करने से काम नहीं चलेगा। एक बात और है मित्रों ! स्त्रियों के लिए न सही पुरुषों के लिए दोनों प्रकार के खाने-पीने की व्यवस्था है। समझ गए न ?’’-सभी समझ गए और एक स्वर से सभी ने कह दिया कि उनमें से किसी को कोई आपत्ति नहीं है।
आशु बाबू ने प्रसन्न होकर कहा, ‘‘यही होना चाहिए।’’ फिर लड़की से बोले, ‘‘मणि, खाने के बारे में स्त्रियों से भी राय ले लेना, भूलना नहीं। हर घर जाकर निमन्त्रण देने में शायद घर लौटने में हम लोगों को सांझ हो जायेगी। जरा जल्दी करो बेटी।’’
मनोरमा अंदर जाना ही चाहती थी कि अविनाश बाबू बोले उठे, ‘‘यह घर तो बहुत दिन हुए, सूना हो चुका है। मेरी साली हैं, लेकिन वह विधवा हैं। गाना सुनने तो अवश्य आएंगी लेकिन खाना....!’’
‘‘कोई बात नहीं अविनाश बाबू, हमारी मणि जो है। मांस-मछली, प्याज, लहसुन तो वह छूती भी नहीं है,’’ आशु बाबू कह उठे।

अविनाश ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘ये मांस-मछली नहीं खातीं ?’’
आशु बाबू ने कहा, ‘‘खाती सब कुछ थी, लेकिन दामाद साहब की इच्छा नहीं। वे कुछ संन्यासी ढंग के आदमी हैं।’’
मनोरमा का चेहरा रक्तिम हो उठा। बीच में बोल उठी, ‘‘यह क्या कह रहो हो बाबूजी ?’’
पिता अवाक् रह गए। बातें फिर शुरू हुईं। लेकिन फिर बातचीत जमी नहीं। दो-चार मिनट आशु बाबू ने और बातें कीं लेकिन मनोरमा बिलकुल शान्त जैसे एक गहरा अन्धकार छा गया।
किसी ने किसी से स्पष्ट कुछ नहीं कहा। लेकिन सभी सोचने लगे कि अचानक ही यह दामाद साहब कहां से आ टपके ? आशु बाबू की मनोरमा ही एकमात्र कन्या है-यह सभी जानते थे, और वह अभी तक कुंआरी है। विवाहित या विधवा होने का कोई चिह्न उसमें नहीं है। हालांकि स्पष्ट शब्दों में आशु बाबू से किसी ने नहीं पूछा था, फिर भी सन्देह का कोई कारण नहीं कोई समझता था। फिर सन्यासी ढंग के दामाद चाहे कोई भी हों, इतने बड़े वैभव-विलास सम्पन्न ऐश्वर्यशाली व्यक्ति की एकमात्र शिक्षित कन्या का मांस-मछली और प्याज-लहसुन खाना एकदम से बंद हो गया....?
फिर न जाने और रहस्य को छिपाने का कारण समझ में नहीं आता। क्यों उस बात को कहकर पिता स्तब्ध रह गए और क्यों लड़की के चेहरे पर एक विभिन्न प्रकार की लालिमा दौड़ गई। यह अनोखी घटना सबके मन में एक रहस्य बनकर रह गई। नए परिवार के आयोजन में सम्मिलित होने की जो निर्बाध विचारधारा बह रही थी, उसमें एक अनोखी अड़चन दिखाई देने लगी।

(2)

उस दिन बंगाली समाज के शिष्ट मंडल को ही आमंन्त्रित किया गया था। बंगाली प्रोफेसरों का समाज सपरिवार और समय पर उपस्थित हो गया। एक बहुत बड़ा कमरा, जिसमें एक सुन्दर गलीचा और कालीन बिछा था, अतिथि के लिए सजाया गया था। उस्ताद लोग एक ओर बैठे अपने साजों को मिला रहे थे। घर के स्वामी आगन्तुकों का बहुत ही अप-टू-डेट आधुनिक सभ्यता से स्वागत कर रहे थे। साथ ही उस्तादों की ओर संकेत करके संगीत के आयोजन का विवरण भी सुनाते जा रहे थे। इतना मधुर संगीत होगा कि आप लोग मुझे आशीर्वाद देते हुए जायेंगे’’-आशु बाबू ने कहा।
अविनाश बाबू ने उल्लसित स्वर में कहा, ‘‘भला आप भी क्या बात कह रहे हैं आशु बाबू ? आप तो अचानक ही यह रत्न पा गए हैं, अमूल्य रत्न।’’
‘‘नवीन आविष्कार है साहब, बिलकुल नवीन। आप लोग भी, जहां तक हमारा विचार है, भूले नहीं होंगे अभी। शायद आप भूल भी गए हैं। आखिर मैं आपको दिखाता हूँ’’-कहते हुए पर्दा हटा करके सबको अंदर ले गए। सांवला रंग होते हुए भी वह अपूर्व सुन्दर था। लम्बे छरहरे बदन में सभी अंगों का गठन जैसे सांचे में ढाल कर किया गया था। नाक, आंख होंठ की सौन्दर्य सीमाएं जैसे इसी मानव में आकर एकत्रित हो गई थीं। आयु लगभग बत्तीस की होगी, लेकिन देखने में इतनी मालूम नहीं होती थी। वह एक सोफे पर बैठे मनोरमा से बातें कर रहे थे। तनिक एक ओर को खिसककर मुस्कुराते हुए बोले, ‘‘आइए महाशय गण।’’ मनोरमा ने मेहमानों को मुस्कुराकर नमस्कार किया, लेकिन कुछ जड़ से दिखाई देनेवाले आगन्तुकों के मुंह से नमस्कार का प्रत्युत्तर ही नहीं निकला।

‘‘आगरे कब लौटाना हुआ शिवनाथ बाबू ? हमें सूचना तक नहीं दी, आगे बढ़कर अविनाश बाबू ने ही मौन भंग करने का साहस किया।’’
‘‘सूचना नहीं दी ? आश्चर्य की बात है। मुझे क्या पता था कि आप इस सूचना के लिए इतने व्याकुल होंगे,’’ हंसते हुए उन्होंने उत्तर दिया।
रूखा उत्तर सुनकर भी अविनाश बाबू ने हंसने की कोशिश की लेकिन उनके साथियों ने ईर्ष्या का अनुभव किया। उन सभी के चेहरों से स्पष्ट हो गया था कि इस सुन्दर व्यक्ति के प्रति सभी के मन में घृणा भरी है। इस बात से मनोरमा और उसके पिता ही नहीं, अविनाश का चेहरा भी स्याह पड़ गया। सहसा तभी उस्तादों के साज झंकृत हो उठे।
संगीत में पेशेवर उस्तादों की वही पुरानी झलक थी। लेकिन इस संगीत सभा में शिवनाथ बाबू का स्वर अद्वितीय था। ऐसा लगता था कि वही सरस्वती देवी का वरदान प्राप्त कर, सरल भावों की व्यजंना के साथ बाह्य आडम्बरों से मुक्त होकर, शुद्ध ताल और लय का सम्मिलित रूप इस सभा में आया है। सभी संगीत की मधुरिमा में मंत्र-मुग्ध से बैठे थे। बूढे अमीर खां ने निर्मल मन से धीरे से कहा, ‘‘वाह, वाह ! ऐसा संगीत आज से पहले कभी नहीं सुना !’’

मनोरमा ने बचपन से संगीत विद्या का अभ्यास किया। लेकिन आज पहली बार उसे अनुभव हुआ कि संगीत के छन्द-छन्द में हृदय को कसकाने वाली एक अनोखी शक्ति विद्यमान होती है। उसके नेत्रों में आंसुओं के मोती झलकने लगे और जब उन्हें रोक पाने में उसे सफलता नहीं मिली तो वह वहां से उठकर चली गई।
‘‘सचमुच अब तो शिवनाथ ने संगीत कला में कमाल प्राप्त कर लिया है। पहले भी कई बार हम सुन चुके हैं, लेकिन जो निपुणता...’’
‘‘यही बात है,’’ हरेन्द्र ने कहा।
इतिहास के अध्यापक अक्षय बाबू की ख्याति मित्र-मंडली में एक कठोर तथा सच्चे व्यक्ति के रूप में है। गाने-बजाने के अच्छा लगने को वे मन की निर्बलता मानते हैं। भगवान ने उन्हें साधु स्वभाव दिया है। इसलिए न केवल उनके चरित्र सम्बन्धी बल्कि औरों के चरित्र के सम्बन्ध में भी उनके मत को सच माना जाता था।
शिवनाथ के अचनाक वापस लौट आने के कारण शहर का वातावरण फिर से दूषित न हो जाए, इस भय से उनकी गम्भीर शान्ति को ठेस लगी। घर में स्त्रियाँ आई हैं, वे भी पर्दे की ओट से गाना सुनेंगी, मुंह देखेंगी। संगीत के साथ उसका चेहरा भी प्रिय लगेगा। वह बोले, ‘‘गाना तो सुना था मधु बाबू का। यह गाना आपको कितना ही मधुर लगा हो, लेकिन मुझे तो प्राणहीन-सा ही लगा।’’

सब चुप बैठे रहे। क्योंकि एक तो मधु बाबू का गाना किसी ने सुना नहीं था और दूसरे गाने की निर्जीवता की धारणा अक्षय के समान और किसी में स्पष्ट रूप से नहीं थी। मंत्र मुग्ध आशु बाबू उत्तेजित होकर तर्क करने वाले थे लेकिन अविनाश ने आंखों के इशारे से उन्हें रोक दिया।
संगीत की आलोचना होने लगी। किसने कब और कहां कैसे गाना सुना था, उसकी व्याख्या और वर्णन किया जाने लगा। बातों-ही-बातों में बात बढ़ने लगी। अंदर से सूचना आई कि सभी स्त्रियां भोजन कर चुकी हैं और उन्हें घर भेजा जा रहा है। वृद्ध साहब रात हो जाने के कारण, अजीर्ण रोग से ग्रस्त भी जल पीकर और पान लेकर उनके साथ चले गए। अब बाकी लोगों के जीमने की बारी आई। ऊपर वाले खुले बरामदे में सब के साथ आशु बाबू भी बैठ गए। स्त्रियों की ओर से फुर्सत पाकर मनोरमा देख-रेख करने के लिए वहां पहुंच गई।

शिवनाथ को भूख भले ही हो, लेकिन खाने में रुचि नहीं। वह बिना खाए ही घर लौटने वाला था, लेकिन मनोरमा उसे किसी भी तरह छोड़ नहीं रही थी। कह-सुनकर सबके साथ बिठा दिया। बड़े आदमियों जैसा ही आयोजन था।
आशु बाबू ने रेल में आते समय टूंडला में शिवनाथ के साथ कैसे परिचय हुआ और दो ही दिन में घनिष्ठ आत्मीयता में बदल गया, विस्तार से बताने के बाद कहा, ‘‘सबसे बढ़कर करामात है मेरे कानों की। इनके गाने की गुंजन से ही मैं निश्चिन्त हो गया कि अवश्य ही कोई गुनी व्यक्ति हैं।’’ फिर कन्या को साक्षी के रूप में मिलकर कहा, क्यों बेटी, कहा नहीं था तुमने, शिवनाथ बाबू भारी आदमी हैं ? कहा नहीं था मणि, कि इनसे परिचय होना जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य है।’’
लड़की का चेहरा भी आन्तरिक उल्लास से चमक उठा। बोली, ‘‘हां पिताजी, आपने कहा था। गाड़ी से उतरते ही बताया था कि...।’’
‘‘लेकिन देखिए आशु बाबू...!’’
वक्ता थे-‘‘अक्षय। सब चुप हो गए। अविनाश ने रोकने की कोशिश की, ओहो, रहने दो अक्षय, रहने दो। मत यह सत्य चर्चा...।’’

अक्षय ने आंखें मींच कर आंखों के लिहाज की बात टाल दी। कई बार सिर हिलाकर बोले, ‘‘नहीं अविनाश बाबू, दबाने से काम नहीं चलेगा। शिवनाथ बाबू की सारी बातें खोलकर बता देना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ। आप...!’’
‘‘कर्तव्य का ज्ञान तो हम लोगों को भी है अक्षय, फिर किसी दिन देखा जाएगा’’-अविनाश ने उसे धकियाकर रोकने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। धक्के से अक्षय का शरीर हिल गया लेकिन कर्तव्य नहीं डिगा। बोले, ‘‘आप लोग जानते हैं कि बेकार का संकोच मैं नहीं करता। अनीति को मेरे सामने बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।’’
हरेन्द्र बोला, ‘‘अरे, सो क्या हम ही बढ़ावा देना चाहते हैं। लेकिन उसके लिए क्या कोई और स्थान नहीं ?’’
अक्षय ने कहा, ‘‘नहीं। अगर यह शहर में फिर से न आते, अगर उच्च परिवार से घनिष्टता बढ़ाने की कोशिश न करते-विशेष रूप से कुमारी मनोरमा का अगर कोई सम्बन्ध न होता...।’’
उद्वेग से आशु बाबू बौखला उठे और अज्ञात भय से मनोरमा का चेहरा पीला पड़ गया।
हरेन्द्र ने कहा, ‘‘यह बहुत अधिक है।’’
अक्षय ने दृढ़ता से प्रतिवाद किया, ‘‘नहीं, अभी कुछ नहीं।’’
अविनाश बोल उठे, ‘‘ओहो...कर क्या रहे हो तुम लोग ?’’
अक्षय ने किसी बात पर ध्यान नहीं दिया। बोले, ‘‘यह भी किसी दिन यहां प्रोफेसर थे। आशु बाबू को बता देना चाहिए था कि वह नौकरी कैसे छूटी।’’

हरेन्द्र ने कहा, ‘‘अपनी इच्छा से छोड़ दी, पत्थर का व्यवसाय करने के लिए।’’
अक्षय ने खंडन किया, ‘‘झूठी बात है।’’
शिवनाथ चुपचाप भोजन कर रहा था। मानों इस विवाद से उसका कोई सम्बन्ध ही न हो। अब उसने मुंह उठाकर देखा और सहज स्वाभाविक स्वर में बोला, ‘‘बात तो झूठी है। अगर प्रोफेसरी अपनी इच्छा से न छोड़ता तो शायद आप लोगों की इच्छा से छोड़नी पड़ती और हुआ भी यही।’’
आशु बाबू ने साश्चर्य से पूछा, ‘‘क्यों ?’’
शिवनाथ ने कहा, ‘‘शराब पीने के कारण।’’
अक्षय ने प्रतिवाद किया, ‘‘नहीं, शराब पीने के बाद मतवाला होने के दोष से।’’
शिवनाथ ने कहा, ‘‘जो शराब पीता है, वही तो कभी-न-कभी मतवाला होता है। जो नहीं पीता, वह या तो झूठ बोलता है या शराब नहीं पानी पीता है’’ और यह कहकर हंसने लगा।

अक्षय क्रोध में भरकर बोला, ‘‘निर्लज्ज के समान तुम हंसना चाहो, तो हंस सकते हो। लेकिन हम क्षमा नहीं कर सकते।’’
शिवनाथ ने कहा, ‘‘मैं आपकी बदनामी नहीं करता कि आप मुझे क्षमा कर सकते हैं। इस सत्य को मैं स्वीकार करता हूं कि स्वेच्छा से नौकरी छुड़ाने के लिए आप लोगों ने बहुत परिश्रम किया था।’’
अक्षय ने कहा, ‘‘तो आशा है कि आप और भी एक सत्य इसी प्रकार स्वीकार कर लोगे। आपको शायद मालूम नहीं कि हम लोग आपकी बहुत सी बातें जानते हैं।’’

शिवनाथ ने गर्दन हिलाकर कहा, ‘‘मुझे मालूम नहीं। फिर भी इतना अवश्य जानता हूं कि दूसरों की बातें जानने का काम आपको बहुत अच्छा लगता है क्या स्वीकार करना होगा, कहिए।’’
अक्षय ने कहा, ‘‘आपकी पत्नी जीवित है। उसे छोड़कर आपने दूसरा विवाह किया, यह सच है ?’’
आशु बाबू को क्रोध आ गया-‘‘आप यह सब क्या कह रहे हैं अक्षय बाबू ? ऐसा भी कभी हुआ है या हो सकता है ?’’
शिवनाथ बीच में बोले, ‘‘यही हुआ है आशु बाबू ? पहली पत्नी को छोड़कर मैंने दूसरा विवाह किया।’’
‘‘कहते क्या है क्या हुआ था।’’
शिवनाथ ने कहा, ‘‘कोई विशेष बात नहीं। बीमार रहती है। उम्र भी तीस की हो गयी। स्त्रियों के लिए यही काफी है। लगातार बीमारी के कारण दांत गिर गए हैं। बिलकुल बूढ़ी हो गई है। इसलिए मुझे दूसरा विवाह करना पड़ा।’’
आशु बाबू विह्वल दृष्टि से उनके चेहरे की ओर देखते रह गये, ‘‘ऐं, केवल इस लिए ? उसका और कोई अपराध नहीं था ?’’
शिवनाथ ने कहा, ‘‘नहीं। झूठा दोष लगाने से क्या लाभ आशु बाबू !’’
उनके इस कठोर सत्य से अविनाश पागल हो उठा-‘‘क्या लाभ है...पाखंडी कहीं के। तुम्हारी हानि-लाभ चूल्हे में जाए। एक बार झूठ ही बोल जाते कि उसने गम्भीर अपराध किया था, इसी से उसे छोड़ दिया है। एक झूठ से तुम्हारा पाप बढ़ जाता ?’’

शिवनाथ क्रुध नहीं हुआ, बस इतना ही बोला, ‘‘लेकिन मैं झूठ नहीं बोल सकता।’’
हरेन्द्र सहसा जल-भुन गया, ‘‘विवेक जैसी चीज क्या आपके अंदर है शिवनाथ बाबू ?’’
शिवनाथ को इतने पर भी क्रोध नहीं आया। शान्त भाव से बोला, ‘‘ऐसा विवेक व्यर्थ है। झूठे विवेक की जंजीर पैरों में डालकर मैं नहीं चलना चाहता। दुःख भोगते चलना जीवन का उद्देश्य नहीं है।’’
आशु बाबू चोट खाकर बोले, ‘‘लेकिन अपनी पत्नी का दुःख तो जरा सोचिए। उनका ऐसी रहना दुःखदायी तो जरूर है, लेकिन केवल इसी कारण से...बीमार रहना तो कोई दोष नहीं। बिना किसी अपराध...।’’
‘‘बिना किसी अपराध के भला मैं ही क्यों दुःख सहता रहूं। ऐसा मेरा विश्वास नहीं है। एक का दुःख दूसरे के सिर पर लाद देना व्यर्थ है।’’

प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book