देविका - मनोरमा जफ़ा Devika - Hindi book by - Manoram Zafa
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कहानी संग्रह >> देविका

देविका

मनोरमा जफ़ा

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :176
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4918
आईएसबीएन :81-89859-06-4

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नारी जीवन पर आधारित कहानियां

Devika

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

लेखकीय

मनुष्य की इस पृथ्वी में लाखों, करोड़ों निजी पृथ्वियाँ है। जितने मनुष्य हैं उतनी पृथ्वियाँ। प्रत्येक मनुष्य अपनी ही बनायी पृथ्वी का एक छत्र सम्राट् है। सम्राट् मात्र ही दुःखी है। अपने राजकीय अहं के वलय में वह बन्दी है, एकाकी है। ‘मैं’-मय पृथ्वी में वह निस्संग है, भिन्न है। ‘मैं’-मय विश्व-ब्रह्माण्ड में वही ब्रह्म है और शेष सभी अपरिपक्व। वह श्रेष्ठ हैं और सब निकृष्ट। अपने जैसा ‘मैं’ वह नहीं ढूढँता। ढूँढने पर पाता भी नहीं। पा जाए तो स्वीकार नहीं करता । अपने विचार में वह ईश्वर की एक अन्नय सृष्टि, अबोध्य, अभेद्य, सन्दिग्ध जीव है। अपने अनजाने में उसने अपने चारों ओर एक अभेद्य दीवार खड़ी की है। दीवार के इस ओर ‘मैं’-मय वह है और दीवार के दूसरी ओर पृथ्वी के तमाम जड़-चेतन पदार्थ। इसलिए लिए वे एकाकी है। दूसरों की समझ से परे उसका चेतन, अवचेतन, अचेतन सत्ता की दीवारों से घिरा हुआ है। उसके अन्नमय पिण्ड, मनोमय पिण्ड व चैतन्यमय पिण्ड में भी किसी तरह का सम्बन्ध नहीं है। चारों ओर वियोग चिन्ह, अन्तराल, दूरी और संगतिशून्यता है। यह ‘मैं’-सर्वस्व अकेला जीव ही आधुनिक मनुष्य है।
प्रत्येक लेखक एक सामान्य मनुष्य है। हर मनुष्य की जो समस्याएँ हैं, उसकी भी वे ही समस्याएँ हैं। हर मनुष्य की तरह लेखक का भी अपना एक अस्तित्व है। लेखक के मन में जीवन, जगत्, समाज और समस्याएँ जो रूप धारण करती हैं, उसी की अभिव्यक्ति है साहित्य। इसलिए साहित्य लेखक के व्यक्तिव की अभिव्यक्ति है। व्यक्तित्व ही स्रष्टा को सृष्टि की प्रेरणा देता है। जहाँ व्यक्तित्व प्रेममय है, वहाँ सृष्टि प्रेममय है। जहाँ व्यक्तित्व विपन्न है, वहाँ सृष्टि के चप्पे-चप्पे में संकट के चित्र उभर आते हैं। साम्प्रतिक स्रष्टा-मानस साम्प्रतिक व्यक्ति समस्या से पूर्णत: जुड़कर एकाकी सन्दिग्ध और विपन्न है। इसलिए वह अबूझ मनुष्य अपनी अकेली पृथ्वी में दूसरों से अलग है। किन्तु संकट में भी प्रत्येक मनुष्य की भरपूर आशा की तरह स्रष्टा-मानस की भी एक अभिलाषा होती है। तीसरी आँख से वह शापमुक्त, संकटमुक्त एक और सुन्दर पृथ्वी का सपना देखता है। लेकिन सुन्दर पृथ्वी के सपने में यदि यथार्थ न हो तो वह मनुष्य तक नहीं पहुँच सकता । आज का मनुष्य निपट यथार्थवादी है। हर चीज में अपने ‘मैं’ को ही तलाशता है। इसलिए कहानी में मनुष्य के यथार्थ जीवन की समस्या प्रकट न हो तो वह कहानी मनुष्य को आन्नद नहीं देती ।

स्रष्टा-मानस का अहं भावुक हो तो साहित्य व्यक्ति-केन्द्रित हो जाता है और मनुष्य अपने ‘मैं’ को कहानी में ढूँढ़ नहीं पाता । इसलिए बिना अहंकार को त्यागे सृष्टि सार्वजनिक नहीं हो पाती। अहं भाव की जगह विश्वप्राणता और सार्वजनिकता सृष्टि को मनुष्य के हृदय के करीब लाते हैं और आनन्ददायक होते हैं। इसलिए स्रष्टा को अपने अहंकार को सिंहासन से उतरना होगा। अपने चारों ओर खुद की बनायी दीवार तोड़कर उस जगह उसे अपने निजी अस्तित्व व सार्वजनिक अस्तित्व के बीच सम्बन्धों का सेतु बाँधना होगा।
लेखक जब व्यक्ति-सीमा लाँघकर सार्वजनिक सत्य की तलाश करता है, तब साहित्य होता है महिमामय। ऐसा न हो तो आधुनिक कहानियाँ मनस्तात्त्विक अनुसन्धान केन्द्रों में अनुसन्धान की वस्तु बनकर रह जाएँ। लेखक का व्यक्तित्व युग का व्यक्तित्व है और लेखक का स्वर युगीन आत्मा का स्वर। स्थान-काल की यथार्थता और घटना की सामाजिक सत्यता ही स्रष्टा-मानस को सार्वजनिक अस्तित्व में शामिल करती है।

व्यासकवि फकीर मोहन सेनापति आधुनिक उड़िया कथा-साहित्य के जनक माने जाते हैं। उनकी कहानी (1868) तत्कालीन साहित्यिक पत्रिका ‘बोधदायनी’ में छपी थी। दुर्भाग्यवश वह पत्रिका और ‘लछमनिया’ कहानी आज इतिहास के गर्भ में समा गयी हैं। जिस दिन शोधकर्ताओं द्वारा इतिहास के गर्भ से ‘लछमनिया’ तलाश ली जाएगी, शायद उस दिन फकीर मोहन को आधुनिक भारतीय लघु-गल्प-जनक के रूप में स्वीकार किया जाएगा। वस्तुतः सन् 1898 में प्रकाशित फकीर मोहन की कहानी ‘रेवती’ उड़िया साहित्य की पहली मौलिक लघु-गल्प है। विश्व साहित्य के कथा-जगत् में लघु-गल्प के ‘रूप’ (Form) को लेकर तरह-तरह की चर्चाएँ चल रही हैं। लघु-गल्प का रूप-विधान कहानी और उपन्यास से बहुत भिन्न है। यह कहानी या उपन्यास का संक्षिप्त रूप नहीं है अथवा लघु-गल्प को बढ़ाकर लिख देने से वह उपन्यास नहीं बन जाता है।
आज के व्यस्त मनुष्य के लिए कहानी ही सर्वश्रेष्ठ बौद्धिक ज्ञानवर्द्धक मनोरंजक साहित्य है। किसी विशेष क्षण के सूक्ष्म भाव एवं हृदय की गहरी अनुभूति को प्रकट करना ही कहानी का सफल स्वरूप है। आज का साहित्य कल्पना पर आश्रित नहीं है, वह जीवनधर्मी है। मनुष्य के घटनाओं से भरे जीवन में भिन्न-भिन्न क्षणों में लेखक तरह-तरह की समस्याओं का सामना करता है। उसकी अनुभूति तीव्र होने पर कहानी बनती है। इस संग्रह की विभिन्न कहानियों की घटनाओं से मेरा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्बन्ध है। रेमों, यंग, चन्द्रभागा और चन्द्रकला, अँगूठी, ट्रालीवाली, नारंगी, अव्यक्त आदि कहानियाँ मेरी अन्तरंग अनूभूतियों से जुड़ी हुई हैं।

इस दृष्टि से यदि मुझसे कोई पूछता है कि अच्छी कहानी किसे कहते है तो मैं कहूँगी की अच्छी कहानी एक झटका होती है-बिजली का–सा झटका। व्यस्तता- भरी जिन्दगी के फुर्सत के क्षणों में वह झटका लगता है और उस झटके की अनुभूति हृदय में एक अमिट छाप छोड़ जाती है। ठीक बिजली के झटके की तरह यह झटका भी क्षणिक होता है पर अनुभूति का प्रभाव स्थायी होता है। जिस तरह पलक झपकते ही बिजली का झटका शरीर के समस्त स्नायु को स्पन्दित कर देता है, उसी तरह अच्छी कहानी भी छिन में चेतना की शेष सत्ता को झकझोर कर रख देती है।
अच्छी कहानी एक अच्छी ‘संकेत’ है, ‘रूप’ नहीं-कहानी के ‘रूप’ को लेकर तरह-तरह की चर्चाएँ चल रही हैं, किन्तु यदि ‘रूप’ में ‘संकेत’ छुपकर रहे तो ‘रूप’ कितना ही चौंकानेवाला क्यों न हो उसे अच्छी कहानी के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा। यदि ‘रूप’ कहानी की पोशाक है, तो ‘संकेत’ है कहानी का प्राण, उसकी आत्मा। अच्छी कहानी ‘पानी का भँवरा’ है जो पाठक के मन, ज्ञान, चैतन्य को, दृश्य से अदृश्य तक को, समतल से अन्त:स्थल तक को, जड़ता से लेकर चेतना की गम्भीरतम सत्ता तक को अपनी चपेट में खींच लेता है।

अच्छी कहानी एक ‘पतवार’ है-नाविक हो या यात्री, ‘पतवार’ दोनों के हाथों में एक-सी गहराई तक पहुँचती है, एक-सा कार्य करती है। पतवार की लम्बाई और लचक दोनों के हाथों में एक समान है। अच्छी कहानी लेखक को जहाँ पहुँचाती है, पाठक को भी यथा सम्भव वहीं पहुँचा सकती है।
अच्छी कहानी एक फ्री-साईज पोशाक की तरह है। कोई पहने, उसे ऐसा लगेगा जैसे कि वह पोशाक उसी के लिए बनी है। अच्छी कहानी भी जो पढ़ेगा वह उसमें सत्य को ढूँढ़ लेगा, खुद को, अपनी अस्थिमज्जा को ढूँढ़ लेगा। यहाँ साहित्यकार की भावना सार्वजनिक है, साहित्यकार का व्यक्तित्व युग का व्यक्तित्व हो जाता है। लेखक के अहंकार का दूर होना यहाँ उसके व्यक्तित्व व वक्तव्य को प्रभावकारी बना देता है।

अच्छी कहानी एक ‘सेतु’ है। यहाँ स्रष्टा अनगिनत जीवन के साथ एकान्तिक सम्बन्ध स्थापित करके अनगिनत जीवन के प्रति सहानुभूतिपूर्ण और संवेदनाशील हो जाता है। एक आदमी का किसी दूसरे आदमी के प्रति आग्रह उत्पन्न करना, एक आदमी का कहानी के प्रति आग्रह उत्पन्न करना, दिल से दिल जोड़ना ही अच्छी कहानी का उद्देश्य है।
अच्छी कहानी एक दर्पण है, जिसमें सत्य, शिव, सुन्दर प्रतिबिम्बित होते हैं। सत्य है यथार्थ। कहानी का जीवन है यथार्थ। जीवन के सत्य को प्रकट करते समय एक अच्छी कहानी जीवन की निष्ठुरता, बीभत्सता और पाप को भी प्रकट कर देती है। लेकिन सत्य को प्रकट करते-करते एक अच्छी कहानी ‘शिव’ की अवहेलना नहीं कर सकती। जो मंगलकारी है, वही ‘शिव’ है। यथार्थ के नाम पर कहानी में उद्दण्डता, हिंसा, अश्लीलता को प्रमुख स्थान देकर मंगलकारी सौन्दर्य भरे विश्व को गौण करना उचित नहीं। इसलिए यथार्थ के निष्ठुर साँचे में कल्याणकारी जग का सपना अच्छी कहानी में अंकित होता है। अच्छी कहानी फोटोग्राफ नहीं है, पेक्षंण्टग है, पर लगती फोटोग्राफ जैसी है। अच्छी कहानी में पेक्षंण्टग निश्चित ही सुन्दरता का अनुसरण करती है। यथार्थ की समस्या कितनी ही कठोर और निष्ठुर क्यों न हो, उसमें सौन्दर्यबोध न हो तो वह कतई एक अच्छी कहानी नहीं कही जा सकती।

अन्त में कहूँगी कि अच्छी कहानी एक साफ-सुथरी कहानी होती है। यहाँ पर मैं समरसेट मॉम के विचारों से सहमत हूँ-‘‘कहानी-उपन्यास कुछ सोचने के लिए प्रेरित कर सकते है, चरित्र निर्माण में मदत कर सकते है, चरित्र-निर्माण में मदद कर सकते हैं, लेकिन यदि कहानी-उपन्यास आनन्द (बौद्धिक आनन्द) न दे सका तो वह निम्न-स्तर की कहानी-उपन्यास होगा।’’
अच्छी कहानी कोई अदृश्य पोशाक नहीं है। यदि ऐसा होता है तो वह अदृश्य पोशाकधारी सम्राट् की तरह लेखक की आत्मप्रवंचना मात्र है।
इस कहानी-संग्रह में संगृहीत लगभग सभी कहानियाँ काफी पहले उड़िया की पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी हैं। बाद में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र द्वारा अनूदित होकर धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, नवनीत, जनसत्ता, हंस, गगनांचल, आजकल, सारंगा स्वर आदि हिन्दी पत्र- पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित हो चुकी हैं। हिन्दी भाषी पाठकों के बीच इन कहानियों को पहुँचाने में इन पत्रिकाओं की सहृदय भूमिका मुझ जैसी एक अन्य भाषा-भाषी (उड़िया) लेखिका के लिए अन्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मैं इन पत्रिकाओं के सम्पादक-मण्डल के प्रति अपना आभार व्यक्त करती हूँ। हिन्दी पाठकों में मेरी कहानियों का जिस उत्साह से स्वागत किया है, मैं समझती हूँ यही मेरा सबसे बड़ा पुरस्कार है। मैं इन असंख्य पाठकों की ऋणी हूँ।

मेरे अनुजतुल्य डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र ने बड़े आग्रह व पूरी निष्ठा के साथ मेरी कहानियों का सटीक अनुवाद किया है। यही वजह है कि आज मैं हिन्दी पाठकों के निकट पहुँच पायी हूँ। उनके प्रति अपनी कृतज्ञता और शुभकामनाएँ व्यक्त करती हूँ।
भारतीय ज्ञान पीठ हमारे देश की एक प्रतिष्ठित संस्था है। केवल हिन्दी ही नहीं, भारतीय साहित्य के प्रचार व प्रसार के लिए इसकी भूमिका अतुलनीय है। भारतीय भाषाओं के साहित्य के बीच यह एक सेतु का काम करती आ रही है। मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि भारतीय ज्ञानपीठ ने मेरी कहानियों का संग्रह प्रकाशित हो रहा है। इससे पहले ‘भारतीय उपन्यासकार’ श्रृंखला में मेरे उपन्यास ‘उत्तरमार्ग’ (हिन्दी अनुवाद) भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित कर चुका है। मैं इस संस्था के प्रति अपना आभार व्यक्त करती हूँ। देश की अखण्डता के लिए आज राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता सभी महसूस कर रहे हैं। भावनात्मक एकता के जरिये ही राष्ट्रीय एकता सम्भव है और साहित्य ही वह जरिया है जो भावनात्मक एकता स्थापित कर सकता है। जाति, धर्म, भाषा, पहनावा खान-पान, नृत्य-गीत तथा रंग-रूप की भिन्नता के बावजूद वैदिक सभ्यता की आधारभूमि पर बने भारत की आत्मा का स्वर एक है, अभिन्न है। भारतीय भाषाओं के अनूदित साहित्य में मनुष्य का यही चिरन्तन स्वर सुनाई देता है। इस दिशा में अनूदित साहित्य का प्रचार-प्रसार करने जैसा एक समयानुकूल, महत्त्वपूर्ण कार्य का बीड़ा उठाकर भारतीय ज्ञानपीठ राष्ट्रीय एकता स्थापित करने की दिशा में सहायक सिद्ध हुआ है। इसके लिए मेरी बधाई।

अँगूठी

वह आदमी निश्चिन्त हो अस्पताल के वार्ड के फर्श पर पड़ा सो रहा था। रोगियों से मिलने के समय का स्वाभाविक कोलाहल, नर्सों तथा परिचरों की लगातार आवाजाही का शोर, दवाइयों के कीटनाशक इत्यादि की तीखी गन्ध, यहाँ तक कि उस आदमी के स्थिर चेहरे पर लगातार बैठ रही भिनभिनाती मक्खियों की खीझ भरे उपद्रव भी उस आदमी की नींद में बाधा नहीं डाल रहे थे। बीमारी से परेशान जिन कुछ रोगियों को रात में भी ठीक से नींद नहीं आती, वे उस आदमी को दोपहर से ही गहरी नींद में सोते देख मन-ही-मन ईर्ष्या कर रहे थे।
जन्मस्थान से लेकर कब्रिस्तान तक आज हर जगह स्थानाभाव के बारे में कौन नहीं जानता ? इसलिए अस्पताल में खाट की कमी के कारण उस आदमी को खाट न मिलने की वजह से उसका फर्श पर सोना भला कोई मार-काट की बात तो नहीं। इतना ही मिल जाना क्या उस बुढ़िया के लिए कोई कम आश्वासन की बात है ! अधेड़ उम्र के बेटे को लेकर जब बुढ़िया ट्रक के डाले में बैठकर कटक शहर के बड़े अस्पताल के लिए चली, गाँव के सभी लोग जाने को मना कर रहे थे। ‘बड़े अस्पताल में जान-पहचान न हो तो आसानी से खाट नहीं मिलेगी’ कहकर डरा रहे थे। बुढ़िया सबकी बात अनसुनी कर दो काँसे के बर्तन गिरवी रख बेटे को लेकर नाक के सीध निकल आयी थी। खाट न मिलने पर भी वार्ड में नीचे फर्श पर एक आदमी के सोने-भर की जगह बिना जान-पहचान के आसानी से मिल जाने पर बुढ़िया को लगा मानो बिना पतवार के नाव से उसने समुद्र-पार कर लिया। खाट की भला क्या जरूरत ? घर पर ही कौन-सा उसका बेटा खाट पर सोता था कि यहाँ बिना खाट के उसे नींद नहीं आएगी ! बल्कि घर पर गीला-गीला-सा मिट्टी का फर्श है और यहाँ सिलेट-सा चिकना सीमेण्ट का फर्श, घर में फटे टाट पर मैली चिकटी कथरी बिछाता था, और यहाँ पर एक बित्ता मोटी रूई की फक्क साफ गद्दी मिली है। घर में चाँद सूरज घुस आने के लिए जगह-जगह छप्पर उड़ी चाल थी तो यहाँ पक्की मजबूत छत है। बुढ़िया के लिए इतना ही काफी था–ढाई दिन की सरकारी खाट के लिए इतनी लालच क्यों करे ? उसे भला यहाँ कौन-सा हमेशा के लिए घर बसाकर रहना है! लालच से ही न पाप होता है, पाप से....मृत्यु !!

‘मृत्यु’ शब्द आते ही बुढ़िया की जर्जरित छाती के पँजरे के नीचे खोखले कलेजे में धड़धड़-सी आवाज हुई। मौत नहीं आती उसे, जलकर भस्म नहीं हो जाता उसका पापी मन ! बुढ़िया ने खुदको मन-ही-मन कोसा, दुतकारा धिक्कारा। कौन-सी बात सोचते-सोचते वह मरने की बात सोचने लगी-धत्....औरत का मतलब कि मुँह में बुरी बात। पहले पाप फिर पुण्य....
बुढ़िया ‘मरण’ का खयाल दिल से निकालने के लिए इधर-उधर देखकर मन बहलाने की कोशिश करने लगी। वार्ड भर में लूले-लँगड़े मार-काट वाले रोगी पड़े हैं....। किसी के सिर पर पट्टी बँधी है, किसी के हाथ-पैर, कमर-पीठ, घुटने, पेट में पके हुए मक्के के छिलके-सी परत-दर-परत पट्टियाँ लपेटी हुई हैं। और किसी के खेत में खड़े बिजूके के मुँह-सा आँखों को छोड़कर पूरे चेहरे पर बैण्डेज हुआ है। कितने भयंकर लग रहे हैं तुम्हारे-हमारे जैसे लोग ! मानों नौटंकी-स्वाँग के लिए भेष बनाये हुए हैं। पर नहीं इन्होंने भेष नहीं बदला है, पट्टियों के नीचे वाकई टूटा-फूटा शरीर-सिर है। इनकी तुलना में तो उसके बेटे को कुछ भी नहीं हुआ है...पूरे शरीर में कहीं खरोच तक नहीं है, कहीं सूत भर का बैण्डेज नहीं लपेटा गया है। जिस तरह काँछ बाँधे, खुले बदन मजूरी के तौर पर चाल-छप्पर छाते-छाते पैर खिसकने पर मालिक के घर के पक्के आँगन में आ गिरा था, उसी तरह खुले बदन सो रहा है। इतनी जोर से गिरने पर भी देवी मैया की कृपा से शरीर पर कहीं भी चोट का कोई निशान नहीं है। सिर्फ घबराहट से बेहोश हो गया था। गाँव के कविराज की अथक कोशिश से भी होश नहीं आया, चन्नामृत, झाड़-फूँक, टोना-टोटका भी काम नहीं आये। निरा डरपोक है बचपन से। नीचे-ऊपर के दो भाई बहन नहीं रहे ना, इसीलिए डरपोक है। डर से घबरा गया है...। डर दूर होते ही उठ बैठेगा ! मालिक की बिटिया कटक में पढ़ती है। अपशकुन-सी तपाक से बोल पड़ी कि लोग तो महीनों बेहोश रहते है। फिर अपाहिज हो जाते हैं। उसी ने कहा कि बड़े अस्पताल ले जाओ तो ठीक हो जाएगा। पहले तो बुढ़िया तमतमा उठी थी। महीनों बेहोश रहने के बाद भला आदमी कहाँ बचता है, आदमी है या कुम्भकर्ण। बड़े लोगों को क्या जवाब देना। जब बात बुढ़िया के कानों में पड़ ही गयी थी, तब भला बुढ़िया बेटे को ले बड़े अस्पताल गये बगैर कैसे रह सकती थी। माँ का जो मन है ! हालाँकि बुढ़िया जानती है कि उसके बेटे के साथ कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ है। हाँ, सिर फटकर ढेर-सा खून बहता-हाथ, पैर, पँजरे की हड्डियाँ टूटतीं, कलेजा फटकर नाक-मुँह से खून की उल्टी से बेहोश हो जाता, तब वह समझती होश लौटेगा या नहीं लौटेगा। गाँव में जमीन-जायदाद को लेकर आपस में लाठी से एक-दूसरे का सिर फोड़कर तमाम लोगों को लहूलुहान हो होश वापस न आना उसने देखा है, देख क्या बल्कि भोगा है..इसी के बप्पा !

भाई-भाई में बँटवारे के समय आँगन में घेरा डालने की नौबत आने पर बित्ते-भर जमीन के लिए तू-तू, मैं-मैं, फिर हाथापाई, लाठी उठाकर मार-धाड़ फौजदारी। मैं नयी-नयी दुल्हन बीच-बचाव करने दोनों के बीच खड़ी हो गयी जाकर। कितनी चिरौरी करते हुए बोली, ‘‘बड़े होने के नाते जेठजी हर चीज में दस आना, छह आना बाँट ही चुके हैं, यदि आँगन की एक बित्ता जमीन भी अधिक ले रहे हैं तो उसमें जान क्यों निकल रही है ? धीमी-धीमी आग को जरा-सा ईधन मिल जाए तो हहाकर जल उठने-सी, मरद बेटे के घट (चोला) में जरा-सी जान पड़ी तो भाग्य लौटने पर सम्पत्ति अर्जित करना कौन-सी बड़ी बात है। बड़ा भाई बित्ता-भर मिट्टी ही ले जाएगा भाग्य तो कोई नहीं।’’ वास्तव में भला कौन किसका भाग्य ले जाता है
आँगन में लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गयी थी। कहीं कोई जोरू का गुलाम न कह दे ! ‘‘चल भाग जा..मेरे आगे से। चली आयी प्रवचन सुनाने, फिर कभी मरदों की बातों के बीच में मत आना, कहे देता हूँ, अपनी सीमा में रह’’ इतनी कहकर नयी-नवेली दूल्हन को इतने लोगों के आगे एक ओर धकेलते हुए भाई के आगे तनकर खड़ा हो गया। ‘‘मैं जहाँ लकीर खींच दूँगा यदि वहीं घेरा न पड़ा...’’अभी मुँह की बात खत्म भी नहीं हुई थी कि सिर पर बड़े भाई के डण्डे की तेज चोट पड़ी। मटका भरकर सिर पर डालने की तरह सिर से पैर तक खून से नहा लिया। गर्मियों की तपती जमीन न पी जाती तो आँगन में खून-ही-खून दिखाई देता। हट्टा-कट्टा आदमी पेड़ कटकर गिरने -सा भस्स से नीचे गिर पड़ा। बेहोश हो गया, बस ! फिर होश नहीं आया। दरवाजे से अरथी उठी। बीच आँगन में खून की लकीर खींच गया, उसी पर घेरा पड़ा। बिन बाप के बच्चे, इस बेटे को लेकर वह नववधू औरत उस दिन से अकेली है, जीवन मिटा डालने की सोचते-सोचते, किसके लिए और कैसे जी गयी, कौन-जाने बुढ़िया होने तक काफी दिनों तक जो जी गयी-फिर मरने की बात नहीं सोची, बल्कि तमाम दुःख-यातनाएँ झेलती हुई जीवन को कितनी हिफाजत से पोते का मुँह देखने तक सहेजकर रखा। छोड़ों, एक के लिए यदि दूसरा अपना जीवन खत्म करता होता तो संसार की लीला ही न चलती...धन्य है ईश्वर की महिमा..!
उसके बेटे के शरीर से खून तो नहीं बहा, बिना कारण किधर से प्राण निकलेगा जो होश नहीं आएगा। बुढ़िया ने फिर दाँतों तले जीभ दबा ली। छिः मैं मर क्यों नहीं जाती ! बेटे के पास बैठकर फिर वहीं मरने की चिन्ता !

पाप की चिन्ता भूलकर मन बहलाने के लिए अब बुढ़िया ने बैण्डेज बँधे रोगियों पर से अपनी निगाह हटाकर बेटे के चेहरे पर डाली। कितना मासूम नम्र- सा सोया है बेचारा ! जागते रहने पर भी भला उसके बेटे ने कब शैतानी की है...बेटे को सिर से पैर तक, मुँह-आँखें, सिर आदि बुढ़िया सहलाती जा रही थी। आज बेटे का चेहरा ठीक बचपन के चेहरे-सा लग रहा है, शायद सिर मुड़ा हुआ है इसलिए ! बाप के लिए सात साल के बेटे को सिर मुड़ाना जो पड़ता था, तब बप्पा के लिए जितना नहीं रोया था, अपने घुँघराले बालों के लिए उससे अधिक रोया था। रूपये-पैसों का इन्तजाम होने पर देवी मैया के पास बाल गिरवाने की सोच सात साल तक बेटा अपने घुँघराले बाल लटकाए बाल-गोपाल बना फिरता रहा। कौए, कबूतर के पंख खोंसकर, पिता की बैल हाँकने की औगी (डण्डी) को बाँसुरी की तरह फूँकते हुए, गाँव की जात्रा में देखे कृष्ण की तरह पैर उलझाये, त्रिभंगी मुद्रा में खड़े होकर कहेगा, ‘‘देखो मैं यशोदा की आँखों का तारा गले का हार हूँ...! माँ बाप दोनों हँसते हुए बेटे का स्वाँग देखते रहेंगे, पेट भरता रहेगा...। वाकई घुँघराले बाल बेटे को खूब सोभते थे। डॉक्टरों पर भूत सवार होने-सा एक अच्छे आदमी का सिर क्यों मुड़वा दिया ? कहते हैं कि सिर के भीतर दही में चोट लगने से खून तो खराब नहीं हो गया, फोटो खींचकर देखेंगे। अजीब बात है ! सिर के ऊपर तो कहीं चोट है नहीं, ना ही खून बहा है- मगज के भीतर कैसे खून बहेगा ! न जाने फोटो में क्या देखा, यहाँ लाकर लिटा दिया । दवा आदि का दर्शन नहीं नाक मुँह दबाकर दाँत अलग करके होश लौटाने की कोशिश तक नहीं कर रहे। उसके बेटे की बगल-से ही-डॉक्टर नर्स आ जा रहे हैं। दूसरे-दूसरे रोगियों को देख रहे है, दवा इंजेक्शन दे रहे हैं-फल बिस्कुट दूध दे रहे हैं उसके बेटे की ओर देखते तक नहीं, मानो उसे कुछ हुआ ही न हो ! अपनी खुशी से अस्पताल में आकर सो गया है। नींद खुलने पर अपनी राह चला जाएगा। ठीक है, जिसका कोई नहीं, उसका भगवान होता है। ऐसा ही हो। पर होश आने पर ही ना वह अस्पताल से जाएगा।
यही बात बुढ़िया सबसे पूछती है। नर्स दीदी का वही एक जवाब, ‘‘होश आने तक इन्तजार करना होगा, ठीक समय पर जो इलाज करना होगा, हम करेंगे। तुम घबराओगी तो कैसे होगा ?’’
‘‘वो तो ठीक है नर्स दीदी, पर एकाध खुराक दवा पिला देने से क्या होश नहीं लौट आएगा ? जरा-सा दूध पिला देने से नाड़ी में जान नहीं दौड़ने लगेगी...?’’बुढ़िया की गीली आँखों में करूण विनती है।
‘‘सबर कर मौसी ! बेहोश आदमी दवा, दूध निगलेगा कैसे गले में फँस नहीं जाएगा...? होश वापस आने पर, दवाई-खाना सब कुछ मिलेगा तेरे बेटे को...।’’

आहा ! कितनी दयालु है नर्स दीदी, उसके बेटे को होश आने पर फल, बिस्कुट दूध, डबल रोटी, सब जरूर देगी। अपनी बात से मुकरेगी नहीं नर्स दीदी, उसका चेहरा ही बता रहा है...। बिचारी के हाथ, गला कान सब नंगे ही है, तिस पर सफेद पोशाक ! करमजली राँड जो है ! भगवान उसके बेटे को लम्बी उम्र दे...।
बुढ़िया बेटे को फिर सहलाने लगी। देवी-देवताओं को टेरने लगी,‘‘प्रभु जल्दी होश लौटा दो, अच्छी-बुरी चीजों के खाने का स्वाद जरा अभागे की जीभ को मिले, पेट में जाए। भूख भी लगी होगी। होश नहीं है तभी न मुँह नहीं खुल रहा, पर पेट सट चुका है पीठ से। सुबह भात का पानी एक कटोरा पीकर घर छाने निकला था। हाँड़ी में भात भी नहीं था। जो मूठी-भर था, पोते-पोती दोनों सुबह कौआ बोलने से पहले ही खा चुके थे। ये राक्षस बच्चे भला कुछ खाने-पीने देते हैं...? बुढ़िया ने लम्बी साँस छोड़ी, बच्चों को दोष देने से क्या लाभ, गरीब के घर की भात-हाँड़ी तो हमेशा ही खाली रहती है, पर पेट तो कभी खाली नहीं रहता, पेट तो भरा रहता है, भर-पेट भूख से !
भगवान का फैसला कभी-कभी कितना उल्टा होता है। यदि हाँड़ी में भात नहीं दिया, पेट में भूख भी मत दो....। पेट ही के लिए तो यह नाटक है, इतनी मार-पीट, फौजदारी, चोरी, तस्करी, मेहनत- मशक्कत... वरना क्यों उसका बेटा तपती धूप में खाली पेट चाल पर चढ़ता और फिर नीचे गिरकर बेहोश होता...।

आहा ! खूनी-मवाद मक्खियों की बदबू में भी उसका बेटा किस तरह दीन-हीन-सा सोया हुआ है ! बुढ़िया ने फिर बेटे को सहलाया। अस्तूरे से खूब चिकने किये सिर सहलाते समय उसे बेटे का मासूम चेहरा और भी अधिक करूण दिखा। बाप के मरने पर सिरमुड़े बच्चे को देखते ही बुढ़िया का मन इसी तरह करूण, अधीर हो जाता था। मुड़ा हुआ सिर बार-बार पुराने पड़ गये पति-शोक को कल की घटना-सी याद करा देता था। माँ की छाती के घाव को कुरेद- कुरेदकर रक्त झराता था, निर्दयी-सा कान के पास घण्टा बजाने की तरह गूँजता रहता था, ‘‘बिन बाप का बच्चा, आभागा...अनाथ...’’ आज भी बेटे का मुड़ा सिर बुढ़िया की दबी आशंका, छुपे भय, भींची सिसकियों को कुरेद रहा है, कह रहा है ‘‘किस तरह अनाथ-सा पड़ा है तेरा बेटा, यहाँ कोई तेरा मददगार नहीं, अनाथ आभागा...।’’ बुढ़िया एक हाथ से बहते आँसुओं को पोंछती जा रही थी और दूसरे से बेटे को उसी तरह लगातार सहलाती जा रही थी। होश आने पर अपना मुड़ा सिर देख उसका बेटा खूब गुस्सा होगा। खाने-पहनने का शौक तो कर नहीं सका, बस उन बाल के गुच्छों का ही तो शौक था। पीठ ढ़कने को भले ही कपड़ा न हो, काम पर निकलने से पहले बालों को खूब सजा-सँवारकर निकलेगा। रास्ते में जाते समय लोग देखते रह जाते । बाल नहीं, मानों मुकुट लगा रखा हो । भूख, दुःख से असमय ही शरीर से मांस घटा, रक्त घटा, तेज घटा, पर बालों का गुच्छा जैसा था, वैसा ही है, कहीं-कहीं गरमी और तेल की कमी से एकाध बाल सफेद जरूर पड़ने लगे हैं, पर घनापन सूत-भर भी नहीं कमा है। सिर नहीं, मानों टोकरी हो । क्यों मूँड़ दिया अस्तूरे से...अस्पताल के नाई को भी दया-माया नहीं है...चुटिया-भर बाल भी छोड़ने को दैव ने नहीं कहा। छोड़ो, जो गया वह फिर नहीं लौटेगा। पर कुछ ही दिनों में घास की जड़ अंकुरित होने-सी उसके बेटे के सिर के बाल उग ही आएँगे। गरीब का सिर समझ बाल उगने में विधाता का न्याय विपरीत नहीं है....।

बुढ़िया फिर बेटे के शरीर-सिर सहला गयी। हाथों की मुठ्टियाँ बँध रही हैं या मुट्ठी बाँध रहा है -? क्या होश लौट रहा है ! बुढ़िया बेटे के हाथ की उँगलियाँ एक-एक करके सीधी कर रही है, बेटे की अँगुलियों में अपनी अँगुलियाँ फँसाकर, हथेली से हथेली मिलाकर ठण्डे हो रहे बेटे के बदन को अपनी सारी ऊष्मा संचरित करने की कोशिश कर रही है। बेटे के बायें हाथ की उँगली में बुढ़िया की उँगली रूक जाती है। न जाने कब से पड़ी है वह चाँदी की अँगूठी बेटे की बीच उँगली में, जैसे कि उँगली और अँगूठी में चोली-दामन का साथ हो। सोने की अँगूठी ससुराल से पाने की कितनी आस लगाये था, पर उसकी हाँड़ी में चावल डाला धान-कूटी घर की लड़की ने। विधवा माँ कहाँ से लाये दहेज ! बिन बाप की औलाद, बिन पति की औरत का दुःख जानती है बुढ़िया। बहू मन को भा जाने के बाद सोने की अँगूठी के लिए भला शादी कैसे तोड़ देता !
बेटे की शादी से पहले अपनी दो जोड़ी पुरानी बिछिया तुड़वाकर बेटे के लिए चाँदी की अँगूठी बनवा दी थी बुढ़िया ने। गहनों में उतना ही था उसके पास। सोने की अँगूठी पहनने का शौक चाँदी की अँगूठी से पूरा कर लिया था बेटे ने, बिना आपत्ति के। असहाय, अभाव भरे जीवन में ऐसे कई सोने के सपनों को मिट्टी, कंकड़, चाँदी, पीतल की वास्तविकता से पूरा किया जाता है । अड़कर बैठ जाने से भला जीवन कैसे बीतेगा ।
बेटे की काली-काली उँगली में चिपकी चाँदी की अँगूठी मणि की तरह चमकती है। गरीब के गन्दे, मैले, गाँठ पड़े, कमेरू हाथ की उँगली में सोने की अँगूठी चाँदी की तरह इतनी फक्क नहीं दिखती, दिखती है बासी तुरई के फूल-सी फीकी मानों पीतल हो ! पीतल से चाँदी लाख गुनी अच्छी है। चाँदी की दर भी आजकल कौन कम है ?
हर रोज दाँत माँजते समय अँगूठी को जरा-सी राख से माँज-मूँज लेता है उसका बेटा। कहीं घिस न जाए सोचकर हल्के-हल्के खूब सँभालकर माँजता है, सिर्फ मैल न जमने देने के लिए। कितनी ही सँभाल क्यों न करे जिस तरह उसका शरीर काम करते-करते पतला हो गया है, वह अँगूठी भी उसी तरह कमेरू की उँगली में घिस-घिसकर नीचे से पतली हो गयी है। नयी अँगूठी पर कुछ काम किया गया था, आज दिखाई नहीं देता, समय का हाथ लगकर वह काम कब का घिस चुका है, अब अँगूठी का ऊपरी हिस्सा इमली के बीज की तरह चिकना है, बिल्कुल सादा। खाँटी चाँदी की अँगूठी है न, इसलिए कुछ मुलायम है। उसका बेटा भी बिल्कुल खाँटी आदमी है। इसलिए आजकल की चोरी-चमारी भरी दुनिया में वह मुलायम पड़ गया है। ठेके के काम में दूसरे मजदूर काम से जी चुराते होंगे, उसका बेटा मर-जीकर दूसरे पाँच लोगों का काम भी करता जाएगा। जो जितना कमेरू होता है वह उतना ही पिसता है। उम्र से अधिक बूढ़ा हो जाता है। क्या जरूरत थी भूखे पेट चाल पर चढ़ने की। नीचे रहकर पुआल के गट्ठर ऊपर बढ़ाता रहता तो नहीं होता। और भी तो ढ़ेर सारे लोग थे.....कोई भी हट्ठा कट्टा जवान चाल पर चढ़ गया होता। जो झुक गया उसी के गले में तो सभी पगहा डालते हैं। उसका बेटा वाकई बहुत अच्छा है, अच्छा हुआ तो मरे ! बुढ़िया बेटे को, उसके हाथों को, उँगलियों को, अँगूठी को सहलाती जा रही थी।

रोगियों से मिलने वालों की भीड़ छँटने लगी थी। साँझ ढल जो चुकी थी ! कौन जाने अब गाँव लौटने को गाड़ी मिलेगी या भी नहीं ! उनके गांव का ट्रक ड्राइवर काला मियाँ माल लेकर बरगढ़ जा रहा था। उसी के गाड़ी में बुढ़िया बेटे को लेकर चली आयी । अस्पताल में बुढ़िया को छोड़कर काला मियाँ बरगढ़ चला गया। कह गया है कि उनके गाँव के जो एकाध साहब लोग कटक में नौकरी करते हैं, उन्हें खबर करता जाएगा। वे लोग आकर बुढ़िया की सुध लेंगे। अस्पताल में तो दवाई, खाना सब मुफ्त में मिलेगा। बुढ़िया को पैसों की क्या जरूरत है ? सिर्फ गाँव लौटने भर का किराया लगेगा माँ-बेटे का।
पोते-पोती दोनों के लिए चमकीले कागज में लिपटी मीठी-मीठी गोलियाँ और गुड़िया या एकाध पिपिहिरी ले जाने की इच्छा तो है, पर इतने पैसे कहाँ!
बुढ़िया के पल्लू में दो रूपये बँधे हैं। बस उतना ही। कुछ न ले गयी तो बच्चे रूठ जाएगें । आते समय दोनों दादी के साथ कटक आने के लिए खूब जिद करके रो रहे थे। ‘‘हम लोग कटक जाएँगे, मोटर-गाड़ी में बैठेंगे... ’’ चिल्लाते हुए कुछ दूर तक ट्रक के पीछे-पीछे दौड़े थे। नौ साल का पोता बड़ा शौतान है। बड़ा चुस्त भी है ! सात साल की पोती सुस्त है, इतनी की छूते ही गिर जाए। ट्रक के पीछे दौड़ते समय पोता उसे पछाड़कर आगे चला आया था, इसलिए जोत से दौड़ते-दौड़ते पछाड़ खाकर मुँह के बल गिर पड़ी थी। होठ फटकर लहूलुहान। रोते समय साँस नहीं लौट रही थी। बहू भी सीधी-सादी, भोली-भाली है। बच्ची को उठाकर समझाना तो दूर, खुद डबडबायी आँखों से ट्रक की ओर ताकती रही । सही- सलामत आदमी को कटक क्यों ले जा रहे हैं, कुछ समझ नहीं पा रही थी। ‘‘तेरे लिए लेमनचूस, गुड़िया लाऊँगी’’ कहकर बुढ़िया के ट्रक से चिल्लाकर कहते-कहते ट्रक रास्ते की मोड़ मुड़ गया। दोनों बच्चों का मुँह फिर दिखाई नहीं दिया। काफी दूर तक बुढ़िया का मन भीतर-ही-भीतर मथता रहा। बुढ़िया को छोड़कर पल-भर भी नहीं रह सकते दोनों बच्चे। घर में चावल भी नहीं था। कितना हाथ पसारेंगे दूसरों के घर में ! आज माँ बच्चे तीनों उपासे न होंगे। हमारे लौटने की राह देख रहे होंगे...।
बुढ़िया का पेट भी भूख से उमेठ रहा है हर रोज आधा पेट...कल रात से निर्जला उपास। बेटा आधे दिन की मजूरी करके चावल खरीदकर घर लौटता । छोड़ो...।

यहाँ रोगी को ही खाना मिलता है, रोगी के माँ-बाप, सगे-सम्बन्धियों को नहीं मिलता। उसका बेटा तो इस तरह सो रहा है कि कोई शोर-शब्द नहीं। आज दोपहर सभी रोगियों को भात, दाल, तरकारी, दूध दिया गया। अच्छे रसोईये हैं इस बड़े अस्पताल में। बुढ़िया ने चखा नहीं तो क्या, खाने की महक से जान गयी है। बेटे को कितना हिलाया डुलाया, उसने कोई जवाब नहीं दिया। होश में आता तो बेटे को भी भात तरक


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