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सदाबहार >> कर्बला

कर्बला

प्रेमचंद

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :155
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4828
आईएसबीएन :9788171828920

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मुस्लिम इतिहास पर आधारित मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखा गया यह नाटक ‘कर्बला’ साहित्य में अपना विशेष महत्त्व रखता है।

तीसरा दृश्य

[संध्या का समय– नसीमा बगीचे में बैठी आहिस्ता-आहिस्ता गा रही है।]

दफ़न करने ले चले जब मेरे घर से मुझे,
काश तुम भी झांक लेते रौज़ने घर से मुझे।
सांस पूरी हो चुकी दुनिया से रुख्सत हो चुका,
तुम अब आए हो उठाने मेरे बिस्तर से मुझे।
क्यों उठाता है मुझे मेरी तमन्ना को निकाल,
तेरे दर तक खींच लाई थी यही घर से मुझे।
हिज्र की सब कुछ यही मूनिस था मेरा ऐ क़जा–
एक जरा रो लेने दे मिल-मिल के बिस्तर से मुझे।
याद है तस्कीन अब तक वह जमाना याद है,
जब छुड़ाया था फ़लक ने मेरे दिलवर से मुझे


[वहब का प्रवेश। नसीमा चुप हो जाती है।]

वहब– खामोश क्यों हो गई। यही सुनकर मैं आया था।

नसीमा– मेरा गाना ख़याल है, तनहाई का मूनिस अपना दर्द क्यों सुनाऊं, जब कोई सुनना न चाहे।

बहब– नसीमा, शिकवे, करने का ह़क मेरा है, तुम इसे ज़बरदस्ती छीन लेती हो।

नसीमा– तुम मेरे हो, तुम्हारा सब कुछ मेरा है, पर मुझे इसका यकीन नहीं आता। मुझे हरदम यहीं अंदेशा रहता है कि तुम मुझे भूल जाओगे, तुम्हारा दिल मुझसे बेज़ार हो जायेगा, मुझसे बेतनाई करने लगोगे। यह ख़याल दिल से नहीं निकलता। बहुत चाहती हूं कि निकल जाये, पर वह किसी पानी से भीगी हुई बिल्ली की तरह नहीं निकलता। तब मैं रोने लगती हूं, और ग़मनाक ख़याल मुझे चारों तरफ़ से घेर लेते हैं। तुमने न-जाने मुझ पर कौन-सा जादू कर दिया है कि मैं अपनी नहीं रही। मुझे ऐसा गुमान होता है कि हमारी बहार थोड़े ही दिनों की मेहमान है। मैं तुमसे इल्तजा करती हूं कि मेरी तरफ से निगाहें न मोटी करना, वरना मेरा दिल पाश-पाश हो जायेगा। मुझे यहां आने के पहले कभी न मालूम हुआ था कि मेरा दिल इतना नाजुक है।

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