सदाबहार >> कर्बला कर्बलाप्रेमचंद
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मुस्लिम इतिहास पर आधारित मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखा गया यह नाटक ‘कर्बला’ साहित्य में अपना विशेष महत्त्व रखता है।
हुसैन– (सीने पर हाथ धरकर) आह! मुसलिम, वही हुआ, जिसका मुझे खौफ़ था। अब तक तुम्हें कफ़न भी नसीब नहीं हुआ। क्या तुम्हारी नेकनियती का यही सिला था? आह! तुम इतने दिनों तक मेरे साथ रहे, पर मैंने तुम्हारी कद्र न जानी। मैंने तुम्हारे ऊपर जुल्म किया, मैंने जान-बूझकर तुम्हारी जान ली। मेरे अजीज और दोस्त, सब के सब मुझे कूफ़ावालों से होशियार कर रहे थे, पर मैंने किसी की न सुनी, और तुम्हें हाथ से खोया। मैं उनके बेटों को और उनकी बीबी को कौन मुँह दिखाऊंगा।
[मुसलिम की लड़की फातिमा आती है।]
आओ बेटी, बैठो, मेरी गोद में चली आओ। कुछ खाया कि नहीं?
फातिमा– बुआ ने शहद और रोटी दी थी। चचाजान, अब हम लोग कै दिन में अब्बा के पास पहुंचेगे? पाँच-छः दिन तो हो गए!
हुसैन– (दिल में) आह! कलेजा मुंह को आता है। इस सवाल का क्या जवाब दूं। कैसे कह दूं कि अब तेरे अब्बा जन्नत में मिलेंगे। (प्रकट) बेटी, खुदा की जब मरजी होगी।
अली०– आह! तुम अब्बाजान की गोद में बैठ गई। उतरिए चटपट।
फातिमा– तुम मेरे अब्बाजान की गोद में बैठोगे, तो मैं अभी उतार दूंगी।
हुसैन– बेटी, मैं ही तुम्हारा अब्बाजान हूं। तुम बैठी रहो।
इसे बकने दो।
फातिमा– आप मेरी तरफ देखकर आंखों में आंसू क्यों भरे हुए हैं। आप मेरा इतना प्यार क्यों कर रहे हैं? आप यह क्यों कहते हैं कि मैं ही अब्बाजान हूं? ऐसी बातें तो यतीमों से की जाती हैं।
हुसैन– (रोकर) बेटी, तेरे अब्बा को खुदा ने बुला लिया।
[फातिमा रोती हुई अपनी मां के पास जाती है। औरतें रोने लगती हैं।]
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