सदाबहार >> कर्बला कर्बलाप्रेमचंद
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मुस्लिम इतिहास पर आधारित मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखा गया यह नाटक ‘कर्बला’ साहित्य में अपना विशेष महत्त्व रखता है।
जियाद– इस गुस्ताख को ले जाओ, और सबसे ऊंची छत पर क़त्ल करो।
मुस०– साद, तुमको मालूम है कि तुम मेरे कराबतमंद हो?
साद– मालूम है।
मुस०– मैं तुमसे कुछ वसीयत करना चाहता हूं।
साद– शौक से करो।
मुस०– मैंने यहां कई आदमियों से कर्ज लेकर अपनी जरूरतों पर खर्च किए थे। इस कागज़ पर उनके नाम और रकमें दर्ज हैं। तुम मेरा घोड़ा और मेरे हथियार बेचकर यह कर्ज अदा कर देना, वरना हिसाब के दिन मुझे इन आदमियों से शर्मिदा होना होगा।
साद– इसका इतमीनान रखिए।
मुस०– मेरी लाश को दफ़न करा देना।
साद– यह मेरे इमकान में नहीं है।
[जल्लाद आकर मुसलिम को ले जाता है।]
अश०– था अमीर, मुसलिम क़त्ल हुए अब बगावत का कोई अंदेशा नहीं। अब आप हानी की जानबख्शी कीजिए।
जियाद– कलाम पाक की क़सम, अगर मेरी नजात भी होती हो, तो हानी को नहीं छोड़ सकता।
अश०– लोग बिगड़ खड़े हों, तो?
जियाद– जब कौम के सरदार मेरे तरफ़दार हैं, तो रियाय की तरफ से कोई अंदेशा नहीं। (जल्लाद को बुलाकर) तूने मुसलिम को कत्ल किया?
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