सदाबहार >> कर्बला कर्बलाप्रेमचंद
|
448 पाठक हैं |
मुस्लिम इतिहास पर आधारित मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखा गया यह नाटक ‘कर्बला’ साहित्य में अपना विशेष महत्त्व रखता है।
अश०– अब अफसोस करने से क्या फायदा? यह तुम्हारे फेल का नतीजा है।
मुस०– आह! मैं अपने लिए अफ़सोस नहीं करता। रोता हूं हुसैन के लिए जिसे मैंने तुम्हारी मदद के लिए आमादा किया। जो मेरी ही मिन्नतों से अपने गोशे पर निकलने को राजी हुआ। जबकि खानदान के सभी आदमी तुम्हारी दग़ाबाजी का खौफ़ दिला रहे थे, मैंने ही उन्हें यहां आने पर मज़बूर किया। रोता हूं कि जिस दग़ा ने मुझे तबाह किया, वह उन्हें और उनके साथ उनके खानदान को भी तबाह कर देगी। क्या तुम्हारे ख़याल में यह रोने की बात नहीं है? तुमसे कुछ सवाल करूं?
अश०– हुसैन की बैयात के सिवा और जो सवाल चाहे कर सकते हो।
मुस०– हुसैन की मेरी मौत की इत्तिला दे देना।
अश०– मंजूर है।
[कई सिपाही मुसलिम को रस्सियों से बांधकर ले जाते है।]
|