केवट - श्रीरामकिंकर जी महाराज Kevat - Hindi book by - Sriramkinkar Ji Maharaj
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आचार्य श्रीराम किंकर जी >> केवट

केवट

श्रीरामकिंकर जी महाराज

प्रकाशक : रामायणम् ट्रस्ट प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :167
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4755
आईएसबीएन :00-000-00

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स्वामी रामकिंकर जी महाराज के द्वारा लिखी गई धर्म पर आधारित पुस्तक....

Kevat

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

निवेदन

केवट रामचरित्रमानस का वह पात्र है जो ‘रामराज्य’ की उपलब्धियों की आधारशिला है। प्रस्तुत ग्रन्थ मानस प्रवचन की श्रृंखला में ‘रामराज्य’ का प्रथम नागरिक केवट’ के नाम से प्रकाशित हो चुका है पर पाठकों को मानस प्रवचन की लम्बी श्रृंखला से जुड़ने के कारण ग्रन्थ का विषय स्पष्ट नहीं हो पाता था। इस धर्मसंकट से निकलने के लिए द्वितीय संस्करण के प्रकाशन से पूर्व रामायणम् ट्रस्ट ने इसको ‘केवट’ नाम देने का संकल्प किया।

इसका प्रथम संस्करण बिरला अकादमी ऑफ आर्ट एंड कल्चर के आधारस्तम्भ आदरणीय श्री बसन्त कुमार जी बिरला और डॉ. (श्रीमती) सरलाजी बिरला की ओर से प्रकाशित किया गया था। इनके द्वारा इसके अतिरिक्त भी रामचरितमानस और महाराजश्री के विचारों के प्रचार-प्रसार में अनेकों ग्रन्थों का प्रकाशन किया गया। और अब भी बिरला दम्पत्ति के सौजन्य से संगीत कला मन्दिर ट्रस्ट, कलकत्ता के तत्वाधान में श्रद्धेय मंदाकिनी रामकिंकर जी के प्रवचन आयोजित होते हैं जो उनकी उसी भावधारा को गतिमान रखने के उद्देश्य को साकार करती है।
आशा है पाठकों को ग्रन्थ के शीर्षक से प्रसन्नता होगी और वे अधिक सरलता से लेकर लाभान्वित हो सकेंगे।
-प्रकाशक

महाराज श्री-एक परिचय


प्रभु की कृपा और प्रभु की वाणी का यदि कोई सार्थक पर्यायवाची शब्द ढूँढ़ा जाए, तो वह हैं-प्रज्ञापुरुष, भक्तितत्त्व द्रष्टा, सन्त प्रवर, ‘परमपूज्य महाराजश्री रामकिंकर जी उपाध्याय।’ अपनी अमृतमयी, धीर, गम्भीर-वाणी-माधुर्य द्वारा भक्ति रसाभिलाषी-चातकों को, जनसाधारण एवं बुद्धिजीवियों को, नानापुराण निगमागम षट्शास्त्र वेदों का दिव्य रसपान कराकर रसासिक्त करते हुए, प्रतिपल निज व्यक्तित्व व चरित्र में श्रीरामचरितमानस के ब्रह्म राम की कृपामयी विभूति एवं दिव्यलीला का भावात्मक साक्षात्कार करानेवाले पूज्य महाराज श्री आधुनिक युग के परम तेजस्वी मनीषी, मानस के अद्भुत शिल्पकार, रामकथा के अद्वितीय अधिकारी व्याख्याकार हैं।

भक्त-हृदय, रामानुरागी पूज्य महाराज श्री ने अपने अनवरत अध्यवसाय से श्रीरामचरितमानस की मर्मस्पर्शी भावभागीरथी बहाकर अखिल विश्व को अनुप्राणित कर दिया है। अपने शास्त्रदर्शन, मानस के अध्ययन के लिए जो नवीन दृष्टि और दिशा प्रदान की है, वह इस युग की एक दुर्लभ अद्वितीय उपलब्धि है-

धेनवः सन्तु पन्थानः दोग्धा हुलसिनन्दनः।
दिव्य राम-कथा दुग्धः प्रस्तोता रामकिंकरः।।

जैसे पूज्य महाराजश्री का अनूठा भाव दर्शन वैसे ही उनका जीवन दर्शन अपने आप में एक सम्पूर्ण काव्य है। आपके नामकरण में ही श्री हनुमानजी की प्रतिच्छाया दर्शित होती है। वैसे ही आपके जन्म की गाथा में ईश्वर कारण प्रकट होता है। आपका जन्म एक नवम्बर सन् 1924 को जबलपुर (मध्यप्रदेश) में हुआ। आपके पूर्वज मिर्जापुर के बरैनी नामक गाँव के निवासी थे। आपकी माता परम भक्तिमती श्री धनेसरा देवी एवं पिता पूज्य पं. शिवनायक उपाध्याय जी रामायण के सुविज्ञ व्याख्याकार एवं हनुमानजी महाराज के परम भक्त थे। ऐसी मान्यता है कि श्री हनुमानजी के प्रति उनके पूर्व समर्पण एवं अविचल भक्तिभाव के कारण उनकी बढ़ती अवस्था में श्री हनुमत्जयंती के ठीक सातवें दिन उन्हें एक विलक्षण प्रतिभायुक्त पुत्ररत्न की प्राप्ति देवी कृपा से हुई। इसलिए उनका नाम ‘रामकिंकर’ अथवा राम का सेवक रखा गया।
जन्म से ही होनहार व प्रखर बुद्धि के आप स्वामी रहे हैं। आपकी शिक्षा-दीक्षा जबलपुर व काशी में हुई। स्वभाव से ही अत्यन्त संकोची एवं शान्त प्रकृति के बालक रामकिंकर अपने उम्र के बच्चों की अपेक्षा कुछ  अधिक गम्भीर थे। एकान्तप्रिय, चिन्तनरत, विलक्षण प्रतिभावाले सरल बालक अपनी शाला में अध्यापकों के भी अत्यन्त प्रिय पात्र थे। बाल्यावस्था से ही आपकी मेधाशक्ति इतनी विकसित थी कि क्लिष्ट एवं गम्भीर लेखन, देश-विदेश का विशद साहित्य अल्पकालीन अध्ययन में ही आपके स्मृति पटल पर अमिट रूप से अंकित हो जाता था। प्रारम्भ से ही पृष्ठभूमि के रूप में माता एवं पिता के धार्मिक विचार एवं संस्कारों का प्रभाव आप पर पड़ा। परन्तु परम्परानुसार पिता के अनुगामी वक्ता बनने का न तो कोई संकल्प था, न कोई अभिरुचि।

पर कालान्तर में विद्यार्थी जीवन में पूज्य महाराज श्री के साथ एक ऐसी चामत्कारिक घटना हुई कि जिसके फलस्वरूप आपके जीवन ने एक नया मोड़ लिया। 18 वर्ष की अल्प अवस्था में जब पूज्य महाराज श्री अध्यनरत थे, तब अपने कुलदेवता श्री हनुमानजी महाराज का आपको अलौकिक स्वप्नदर्शन हुआ, जिसमें उन्होंने आपको वटवृक्ष के नीचे शुभासीन करके दिव्य तिलक का आशीर्वाद देकर कथा सुनाने का आदेश दिया। स्थूल रूप में इस समय आप बिलासपुर में अपने पूज्य पिता के साथ छुट्टियाँ मना रहे थे। यहाँ पिताश्री की कथा चल रही थी। ईश्वर संकल्पानुसार परिस्थिति भी अचानक कुछ ऐसी बन गई कि अनायास ही, पूज्य महाराजश्री के श्रीमुख से भी पिताजी के स्थान पर कथा कहने का प्रस्ताव एकाएक निकल गया।

आपके द्वारा श्रोता के सम्मुख यह प्रथम भाव प्रस्तुति थी।
 किन्तु कथन शैली व वैचारिक श्रृंखला कुछ ऐसी मनोहर बनी कि श्रोतासमाज विमुदग्ध होकर, तन-मन व सुध-बुध खोकर उसमें अनायास ही बँध गया। आप तो रामरस की भावमाधुरी की बानगी बनाकर, वाणी का जादू कर मौन थे, किन्तु श्रोता समाज आनन्दमग्न होने पर भी अतृप्त था। इस प्रकार प्रथम प्रवचन से ही मानस प्रेमियों के अन्तर में गहरे पैठकर आपने अभिन्नता स्थापित कर ली।

ऐसा भी कहा जाता है कि 20 वर्ष की अल्प आयु में आपने एक और स्वप्न देखा, जिसकी प्रेरणा से गोस्वामी तुलसीदास के ग्रन्थों के प्रचार एवं उनकी खोजपूर्ण व्याख्या में ही अपना समस्त जीवन समर्पित कर देने का दृढ़ संकल्प कर लिया। यह बात अकाट्य है कि प्रभु की प्रेरणा और संकल्प से जिस कार्य का शुभारम्भ होता है, वह मानवीय स्तर से कुछ अलग ही गति-प्रगति वाला होता है। शैली की नवीनता व चिन्तनप्रधान विचारधारा के फलस्वरूप आप शीघ्र ही विशिष्टतः आध्यात्मिक जगत् में अत्याधिक लोकप्रिय हो गए।

ज्ञान-विज्ञान पथ में पूज्यपाद महाराज श्री की जितनी गहरी पैठ थी, उतना ही प्रबल पक्ष, भक्ति साधना का, उनके जीवन में दर्शित होता है। वैसे तो अपने संकोची स्वभाव के कारण उन्होंने अपने जीवन की दिव्य अनुभूतियों का रहस्योद्घाटन अपने श्रीमुख से बहुत आग्रह के बावजूद नहीं किया। पर कहीं-कहीं उनके जीवन के इस पक्ष की पुष्टि दूसरों के द्वारा जहाँ-तहाँ प्राप्त होती रही। उसी क्रम में उत्तराखण्ड की दिव्य भूमि ऋषिकेश में श्री हनुमानजी महाराज का प्रत्यक्ष साक्षात्कार, निष्काम भाव से किए गए, एक छोटे से अनुष्ठान के फलस्वरूप हुआ !! वैसे ही श्री चित्रकूट धाम की दिव्य भूमि में अनेकानेक अलौकिक घटनाएँ परम पूज्य महाराज श्री के साथ घटित हुईं। जिनका वर्णन महाराज श्री के निकटस्थ भक्तों के द्वारा सुनने को मिला !! परम पूज्य महाराज श्री अपने स्वभाव के अनुकूल ही इस विषय में सदैव मौन रहे।

प्रारम्भ में भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य लीला भूमि वृन्दावन धाम के परमपूज्य महाराज श्री, ब्रह्मलीन स्वामी श्री अखण्डानन्दजी महाराज के आदेश पर आप वहाँ कथा सुनाने गए। वहाँ एक सप्ताह तक रहने का संकल्प था। पर यहाँ के भक्त एवं साधु-सन्त समाज में आप इतने लोकप्रिय हुए कि उस तीर्थधाम ने आपको ग्यारह माह तक रोक लिया। उन्हीं दिनों में आपको वहाँ के महान् सन्त अवधूत श्री उड़िया बाबाजी महाराज, भक्त शिरोमणि श्री हरिबाबाजी महाराज, स्वामी श्री अखण्डानन्दजी महाराज को भी कथा सुनाने का सौभाग्य मिला। कहा जाता है कि अवधूत पूज्य श्री उड़िया बाबा, इस होनहार बालक के श्रीमुख से निःसृत, विस्मित कर देने वाली वाणी से इतने अधिक प्रभावित थे कि वे यह मानते थे कि यह किसी पुरुषार्थ या प्रतिभा का परिणाम न होकर के शुद्ध भगत्वकृपा का प्रसाद है। उनके शब्दों में-‘‘क्या तुम समझते हो, कि यह बालक बोल रहा है ? इसके माध्यम से तो साक्षात् ईश्वरीय वाणी का अवतरण हुआ है।’’
इसी बीच अवधूत श्री उड़िया बाबा से संन्यास दीक्षा ग्रहण करने का संकल्प आपके हृदय में उदित हुआ और परमपूज्य बाबा के समक्ष अपनी इच्छा प्रकट करने पर बाबा के द्वारा लोक एवं समाज के कल्याण हेतु शुद्ध संन्यास वृत्ति से जनमानस सेवा की आज्ञा मिली।

सन्त आदेशानुसार एवं ईश्वरीय संकल्पानुसार मानस प्रचार-प्रसार की सेवा दिन-प्रतिदिन चारों दिशाओं में व्यापक होती गई। उसी बीच काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से आपका सम्पर्क हुआ। काशी में प्रवचन चल रहा था। उस गोष्ठी में एक दिन भारतीय पुरातत्त्व और साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान एवं चिन्तक श्री वासुदेवशरण अग्रवाल आपकी कथा सुनने के लिए आए और आपकी विलक्षण एवं नवीन चिन्तन शैली से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति श्री वेणीशंकर झा एवं रजिस्ट्रार श्री शिवनन्दनजी दर से Prodigious (विलक्षण प्रतिभायुक्त) प्रवक्ता के प्रवचन का आयोजन विश्वविद्यालय प्रांगण में रखने का आग्रह किया। आपकी विद्वता इन विद्वानों के मनोमस्तिष्क को ऐसे उद्वेलित कर गई कि आपको अगले वर्ष से ‘विजिटिंग प्रोफेसर’ के नाते काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में व्याख्यान देने के लिए निमन्त्रित किया गया। इसी प्रकार काशी में आपका अनेक सुप्रसिद्ध साहित्यकार जैसे श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी, श्री महादेवी वर्मा से साक्षात्कार हुआ एवं शीर्षस्थ सन्तप्रवर का सान्निध्य प्राप्त हुआ।

अतः पूज्य महाराज श्री परम्परागत कथावाचक नहीं हैं, क्योंकि कथा उनका साध्य नहीं, साधन है। उनका उद्देश्य है भारतीय जीवन पद्धित की समग्र खोज अर्थात् भारतीय मानस का साक्षात्कार। उन्होंने अपने विवेक प्रदीप्त मस्तिष्क से, विशाल परिकल्पना से श्रीरामचरितमानस अन्तर्रहस्यों का उद्घाटन किया है। आपने जो अभूतपूर्व एवं अनूठी दिव्य दृष्टि प्रदान की है, जो भक्ति-ज्ञान का विश्लेषण तथा समन्वय, शब्द ब्रह्म के माध्यम से विश्व के सम्मुख रखा है, उस प्रकाश स्तम्भ के दिग्दर्शन में आज सारे इष्ट मार्ग आलोकित हो रहे हैं ! आपके अनुपम शास्त्रीय पाण्डित्य द्वारा, न केवल आस्तिकों का ही ज्ञानवर्धन होता है अपितु नई पीढ़ी के शंकालु युवकों में भी धर्म और कर्म का भाव संचित हो जाता है। ‘कीरति भनिति भूति भलि सोई’...के अनुरूप ही आपने ज्ञान की सुरसरि अपने उदार व्यक्तित्व से प्रबुद्ध और साधारण सभी प्रकार के लोगों में प्रवाहित करके ‘बुध विश्राम’ के साथ-साथ सकल जन रंजनी बनाने में आप यज्ञरत हैं। मानस सागर में बिखरे हुए विभिन्न रत्नों को संजोकर आपने अनेक आभूषण रूपी ग्रन्थों की सृष्टि की है। मानस-मन्थन, मानस-चिन्तन, मानस-दर्पण, मानस-मुक्तावली, मानस-चरितावली जैसी आपकी अनेकानेक अमृतमयी अमर कृतियाँ हैं जो दिग्दिगन्तर तक प्रचलित रहेंगी। आज भी वह लाखों लोगों को रामकथा का अनुपम पीयूष वितरण कर रही हैं और भविष्य में भी अनुप्राणित एवं प्रेरित करती रहेंगी। तदुपरान्त अन्तर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन नामक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था के भी आप अध्यक्ष रहे।
निष्कर्षतः आप अपने प्रवचन, लेखन और शिष्य परम्परा द्वारा जिस रामकथा पीयूष का मुक्तहस्त से वितरण कर रहे हैं, वह जन-जन तप्त एवं शुष्क मानस में नवशक्ति का सिंचन कर रही है। शान्ति प्रदान कर रही है, समाज में आध्यात्मिक एवं दार्शनिक चेतना जाग्रत कर रही है।

अतः परमपूज्य महाराज श्री का स्वर उसी वंशी के समान है, जो ‘स्वर सन्धान’ कर सभी को मन्त्रमुग्ध कर देती है। वंशी में भगवान् का स्वर ही गूँजता है। उसका कोई अपना स्वर नहीं होता। परमपूज्य महाराज श्री भी एक ऐसी वंशी हैं, जिसमें भगवान के स्वर का स्पन्दन होता है। साथ-साथ उनकी वाणी के तरकश से निकले, वे तीक्ष्ण विवेक के बाण अज्ञान-मोह-जन्य पीड़ित जीवों की भ्रान्तियों, दुर्वृत्तियों एवं दोषों का संहार करते हैं। यों आप श्रद्धा और भक्ति की निर्मल मन्दाकिनी प्रवाहित करते हुए महान् लोक-कल्याण कार्य सम्पन्न कर रहे हैं।
शुभम्।
प्रभु की शरण में
-मन्दाकिनी


।।श्रीरामः शरणं मम।।
प्रथम प्रवचन


बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए।।
मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना।।

चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई।।
छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई।।

तरनिउ मुनि घरिनी होई जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई।।
एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारु। नहि जानउँ कछु अउर कबारू।।

जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू।।
पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं।

मोहि राम राउरि आन दशरथ सरथ सब साँची कहौं।।
बरु तीर मारहुँ लखन पै जब लगि न पाँय पखारिहौं।

तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपा पार उतारिहौं।।
सुनि केबट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।
बिहंसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन।।2/100

भगवान् श्री राघवेन्द्र की महती अनुकम्पा से पुनः इस वर्ष यह सुअवसर और सौभाग्य मिला है कि, हम लोग भगवान् लक्ष्मीनारायण के पावन सान्निध्य में भगवत् चरित्र की कुछ चर्चा कर सकें। आयोजन का श्रेय ‘बिरला अकादमी आर्ट एण्ड कल्चर’ को है। पर संस्था तो व्यक्ति की शक्ति से ही चलती है, अतः सत्य तो यह है कि इसके पीछे श्रद्धामयी श्रीमती सौभाग्यवती सरला जी बिरला और श्री बसन्त कुमार जी बिरला की श्रद्धा भावना है। जिसमें निरन्तर उत्तरोत्तर वृद्धि होती जा रही है और इसी का प्रतिफल इस रूप में मिलता है जब वक्ता और श्रोता के रूप में हम लोग कथा रस का रसास्वादन कर पाते हैं। इसमें जैसा आपको सूचित किया गया कि रस की वृद्धि की दृष्टि से प्रातःकाल नवाह्न पाठ का स्वरूप भी सम्मिलित कर लिया गया है। अतः इन दम्पत्ति के अन्तःकरण में जो श्रद्धा भावना है, मैं भगवान् से यही प्रार्थना करूँगा कि वह निरन्तर बढ़ती रहे और विविध क्षेत्रों में इनकी सेवाएँ समाज को प्राप्त होती रहें।

प्रसंग के सन्दर्भ में अभी जो पंक्तियाँ आपके सामने पढ़ी गई हैं, एक तरह से देखें तो यह पीछे लौटने का प्रयास है। पिछले वर्ष श्री भरत के पावन चरित्र की चर्चा की गई थी, किन्तु अनेक लोगों ने मुझे उलाहना दिया कि श्री भरत का चरित्र तो अप्रतिम है ही, किन्तु भगवान् श्रीराम की वन यात्रा में जिन अनेक भावुक भक्तों का परिचय मानस में दिया गया है, उन प्रसंगों पर भी चर्चा की जानी चाहिए। तो इसमें आइए, हम लोग थोड़ा और पीछे लौट चलें और उस प्रसंग पर विचार करें जिसकी पंक्तियाँ आपके सामने अभी पढ़ी गई हैं। वैसे यह प्रसंग तो ऐसा प्रसंग है, जो अत्यधिक प्रचलित और चर्चित है। साधारण से साधारण व्यक्ति को भी इसमें विशेष रसानुभूति होती है। लेकिन इस प्रसंग का सही मूल्यांकन इतना ही नहीं है। इसमें जनरंजन के साथ-साथ, यदि गहराई से विचार करके देखें तो ऐसा लगेगा कि यह प्रसंग हमारे आज के युग के सन्दर्भ में भी महत्त्वपूर्ण है। और इसकी विलक्षणता यह है कि आपको सामाजिक सन्दर्भ में, राजनैतिक सन्दर्भ में, और ज्ञान, भक्ति तथा कर्म के सन्दर्भ में, विविध दृष्टियों से जब आप इस पर दृष्टि डालेंगे तो आपको नन्हा-सा यह केवट प्रसंग जितना मधुर प्रतीत होगा। उतना ही गम्भीर भी प्रतीत होगा। मैं आप लोगों के समक्ष इन आठ दिनों में संक्षिप्त रूप से केवट प्रसंग पर एक दृष्टि डालने की चेष्टा करूँगा। मुझे विश्वास है कि प्रतिवर्ष की भाँति आप अपने पूरे मनोयोग और प्रेम से इसे सुनेंगे।

जहाँ तक केवट प्रसंग के घटनाक्रम का सम्बन्ध है, शायद ही रामचरितमानस का कोई ऐसा पाठक या जानने वाला हो जो इससे परिचित न हो। प्रसंग की पृष्ठभूमि में संकेत इस रूप में प्रस्तुत किया गया है कि महाराज श्री दशरथ के आदेश से समन्त रथ ले करके आते हैं और भगवान् राम से यह अनुरोध करते हैं कि वे रथ पर बैठ जाएँ। श्रीराम ने उनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया, रथ पर आरुढ़ हो गए। लेकिन श्रृंगबेरपुर में पहुँच करके जब वे रात्रि को विश्राम करते हैं तो प्रातःकाल होते ही वहाँ बड़ा करुण दृश्य उपस्थित हो जाता है। जब श्री सुमन्त जी ने महाराज श्री दशरथ का अनुरोध श्री राघवेन्द्र को सुनाया कि मुझे आदेश मिला है, कि मैं रथ पर बैठा करके आपको चार दिनों तक वन में घुमाऊँ और अयोध्या लौटा ले आऊँ ! भगवान् श्री राघवेन्द्र ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। बड़े स्नेह से उन्होंने सुमन्त जी को समझाया। अन्त में सुमन्त जी इतना व्याकुल हो गए कि नन्हें बालक की तरह रोने लगे, पर श्री राघवेन्द्र ने बड़े विनयपूर्वक उनसे यह अनुरोध किया कि आप इस विषय में मुझसे आग्रह न करें। और इस प्रकार से सुमन्त जी से विदा लेकर उस करुण वातावरण के पश्चात् भगवान् श्रीराम गंगा के किनारे आकर खड़े हो जाते हैं। गंगा कि किनारे वे पार जाने के लिए नौका की याचना करते हैं, किन्तु गंगा के तट पर एक अनोखा व्यक्ति बैठा हुआ है नौका पर, जिसने प्रभु की बात को अस्वीकार करते हुए कहा कि मैं नाव नहीं ले आऊँगा। क्योंकि मुझे भय है कि कहीं आपको पार उतारने की चेष्टा में मेरी नौका ही समाप्त न हो जाए। और इस प्रकार बड़ी विलक्षण भाषा में अपनी अनोखी शर्त रखता हुआ अन्त में भगवान् श्री राघवेन्द्र को बाध्य करता है कि वे चरण प्रक्षालन की आज्ञा दें। और चरण प्रक्षालन के बाद केवट उन्हें पार उतार देता है।




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