उपदेशामृत - अक्षरब्रह्म गुणातीतानन्द स्वामी Updeshamrit - Hindi book by - Aksharbrahma Gunatitanand Swami
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उपदेशामृत

अक्षरब्रह्म गुणातीतानन्द स्वामी

प्रकाशक : अखण्ड ज्योति संस्थान प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :339
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4624
आईएसबीएन :81-7526-283-4

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अक्षरब्रह्म गुणातीतानन्द स्वामी के उपदेशों का वर्णन प्रस्तुत है इस पुस्तक में....

Updeshamrit

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ये बातें तो बड़ी-बड़ी बादशाहत को गौण करके भी सुनने योग्य हैं..सोने (स्वर्ण) की हवेलियों को जलाकर भी सुनने योग्य हैं। यद्यपि अन्न खाने को मिलता है, अगर वह भी खाने को न मिले तो भिक्षा के भोजन से निर्वाह करके, गिरनार में जितने वृक्ष हैं, उतने कल्पवृक्ष यदि हमारे पास हो तो भी उनका भी त्याग करके इस साधु की बातें सुनने योग्य हैं। अथवा कच्चे चने खाकर, नहीं तो उपवास रखकर या फिर नीम के पत्ते खाकर अथवा केवल वायु सेवन करके भी इस सन्त की बातें सुनने योग्य हैं। इन बातों से तो ब्रह्मरूप हो जाएंगे तथा बालिका, युवती और वृद्धा ये तीन प्रकार की स्त्रियाँ; कचरा तथा कंचन आदि सब एक समान हो जाएंगे, और सत्संग की बातों के सिवा कुछ भी प्रिय नहीं लगेगा।

-अक्षरब्रह्म गुणातीतानन्द स्वामी

अचिन्त्यानन्दवर्णिविरचितम्
श्रीगुणातीतानन्दमहिम्नस्तोत्रम्


यद्रोमविवरे लीना अण्डानां कोटयः पृथक्।
तदक्षरं गुणातीतं गुणातीतं नमाम्यहम्।।1।।


अर्थ: जिनके एक-एक रोम छिद्र में करोड़ों ब्रह्माण्ड अलग-अलग रहते हैं, सत्त्व रजस् तथा तमस् जो इन तीन गुणों से रहित है, अर्थात् जो हमेशा तीन गुणों से परे हैं, उन मूल अक्षरब्रह्म श्री गुणातीतानन्द स्वामी को मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ ।।1।।

महाध्यानाभ्यासं विदधतमजस्त्रं भगवतः
पवित्रे सम्प्राप्तं स्थितिमतिवरैकान्तिकवृषे।
सदानन्दं सारं परमहरिवार्ताव्यसनिनं
गुणातीतानन्दं मुनिवरमहं नौमि सततम् ।।2।।


अर्थ: निरन्तर भगवान का ध्यान करने का जिनको अभ्यास है, अतिशय श्रेष्ठ और पवित्र एकान्तिक धर्म में जिनकी दृढ़ स्थिति है, हरहमेश जो ब्रह्मानन्द का अनुभव करते हैं, फिर भी श्रीहरि की सर्वोत्तम बातें करना ही जिनका व्यसन है उन मुनिवर श्रीगुणातीतानन्द स्वामी की नित्य स्तुति करता हूँ ।।2।।

परं मायोपाधेर्विशदहृदये स्वे प्रतिदिनं
        निजात्मानं शान्तस्फुरदुरुमहोमण्डलवृतम्।
प्रपश्यन्तं शुद्धाक्षरमतितरानन्दनिलयं
        गुणातीतानन्दं मुनिवरमहं नौमि सततम् ।।3।।


अर्थ: अपने अतिशय निर्मल हृदय में, मायारूप उपाधि से परे और प्रकाशवान, विशाल तेज के मण्डल में स्थित, ऐसी अपनी शान्त आत्मा का जिन्हें निरन्तर साक्षात्कार है और सर्वोत्कृष्ट परमानन्द का जो परम आश्रय स्थान हैं, उन शुद्ध अक्षरब्रह्म मुनिश्रेष्ठ गुणातीतानन्द स्वामी को मैं नित्य नमन करता हूँ ।।3।।

शुभाविर्भावानां स्वहृदि सहजानन्दमनिशं,
        निदानं पश्यन्तं प्रकृतिपुरुषादेरधिपतिम्।
हरिं तैलसारप्रतिनिभमथाग्रे निजदृशो
        गुणातीतानन्दं मुनिवरमहं नौमि सततम् ।।4।।


अर्थ: जो प्रकृति तथा पुरुष आदि के अधिपति हैं और सर्व उत्तम अवतारों के आदि कारण हैं, तथा अपने दोनों नेत्रों के सम्मुख जो तेल की अस्खलित धारा के समान निरंतर भगवान स्वामिनारायण का दर्शन किया करते हैं, तथा उसी कारण जिनको श्रीहरि का निरंतर साक्षात्कार रहता है, उन मुनिवर श्री गुणातीतानन्द स्वामी को मैं निरन्तर वन्दन करता हूँ ।।4।।

हरिर्यस्योदारप्रणयरशनाबद्धचरणो
        यतो नैति प्रेष्ठात् क्वचिदपि पृथग्भावमजितः।
यथा शब्दादर्थो निजविमलचित्तादपि वियत्
        गुणातीतानन्दं मुनिवरमहं नौमि सततम् ।।5।।


अर्थ: भगवान श्रीहरि तो अजेय हैं, कभी किसी के वश नहीं हुए, फिर भी गुणातीतानन्द स्वामी के सर्वश्रेष्ठ प्रेमपाश से, अत्यन्त स्नेहरूपी डोरी से श्रीहरि के चरण चारों ओर से बंधे रहते हैं और इसी कारण जिस तरह शब्द से अर्थ पृथक् नहीं होता अथवा निर्मल चित्त से जैसे आकाश पृथक् नहीं होता उसी तरह श्रीहरि भगवान स्वामिनारायण अपने अतिशय प्रिय श्री गुणातीतानन्द स्वामी से कभी भी पृथक् नहीं रहते हैं—सदा उनके ही समीप रहते हैं, उन मुनिवर श्री गुणातीतानन्द स्वामी को मैं सदा नमन करता हूँ ।।5।।

स्थितो मातुर्गर्भे हरिमविरतं योऽक्षरपरं
        चिदानन्दाकरं ललितवसनालङ्कृतिधरम्।
अपश्यत्पुण्याक्षं विधुमिव चकोरः शुचिरुचिं
        गुणातीतानन्दं मुनिवरमहं नौमि सततम् ।।6।।


अर्थ: श्री गुणातीतानन्द स्वामी जब माता के गर्भ में थे, तब भी चकोर जैसे चन्द्रमा को देखता है, वैसे ही अक्षर से परे, सच्चिदानन्द स्वरूप और सुन्दर वस्त्रालंकार धारण करनेवाले श्रीहरि को अविच्छिन्न निरंतर दर्शन करते रहते थे, इसी कारण जिनके नेत्र अथवा जिनकी सब इन्द्रियाँ पवित्र ही रहती हैं, उन उज्जवल कान्तिवाले मुनिवर श्री गुणातीतानन्द स्वामी का मैं निरन्तर स्तवन करता हूँ ।।6।।

अनाकृष्टात्मा यो भुवनविषयैरप्यतिवरै
        रलिप्तत्वेनास्थादिह मतिमुषस्तानधिगतः।
यथा वायुश्चाभ्रं वडवदहनो वार्धिनिलयो
        गुणातीतानन्दं मुनिवरमहं नौमि सततम् ।।7।।


अर्थ: त्रिलोक के अति श्रेष्ठ विषयों से भी जिनका चित्त आकर्षित नहीं हुआ, और जैसे वायु आकाश में निर्लेप ही रहता है अथवा समुद्र का वडवानल सागर में रहते हुए भी समुद्र के जल से सदा निर्लेप ही रहता है, वैसे ही बुद्धि को मोहित करनेवाले श्रेष्ठ विषयों को प्राप्त करने पर भी जो निर्लेप रहते हैं, उन मुनिवर गुणातीतानन्द स्वामी का मैं निरन्तर गुणगान करता हूँ ।।7।।

जनौघेष्वेकान्तं वृषमखिलदोषार्तिशमनं
        सुभद्रं सच्छास्त्रप्रतिभणितनिर्वाणसरणीम्।
ततोनातिप्रेष्ठं पुरुकरुणया मोहदलनं
        गुणातीतानन्दं मुनिवरमहं नौमि सततम् ।।8।।


अर्थ: समग्र दोषों तथा दुःखों का शमन करनेवाला एकान्तिक धर्म अत्यन्त कल्याणकारी तथा सत्-शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित किया गया मोक्ष का एकमात्र मार्ग है, उस आत्मप्रिय तथा मोहनाशक एकान्तिक धर्म का जिन्होंने बहुत ही अनुराग से प्रचार किया है, उन मुनिवर श्री गुणातीतानन्द स्वामी का मैं नित्य स्तवन करता हूँ। ।।8।।

स्फु रत्स्फारज्ञानामृतविपुलवृष्टयातिसु खदो
        दुरापैर्युक्तो यः श्रुतिनिगदितैः सद्-गुणगणैः।
विधुं निन्ये लज्जां जनविविधतापोपशमने
        गुणातीतानन्दं मुनिवरमहं नौमि सततम् ।।9।।


अर्थ: अतिशय प्रकाशवान और विशाल ज्ञानरूप अमृत की अतिवृष्टि करके लोगों को अत्यन्त सुख दे रहे हैं ऐसे, वेदों में वर्णित दुर्लभ सद्गुणों के समुदायों से जो युक्त है और लोगों के विविध सन्तापों का शमन करने में जिन्होंने चन्द्रमा को भी लज्जित किया है उन महामुनि श्री गुणातीतानन्द स्वामी की मैं निरन्तर स्तुति करता हूँ ।।9।।

जनाज्ञानध्वान्तक्षपणकरणात्तीक्ष्णकिरणं
        ह्रियं निन्ये स्वेक्षादुरितदलनो यो मृदुमनाः।
महैश्वर्यैर्युक्तो हरिपरतरानुग्रहतया
        गुणातीतानन्दं मुनिवरमहं नौमि सततम् ।।10।।


अर्थ: जिन्होंने लोगों के अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करके सूर्य को भी लज्जित किया है, जिन्होंने अपने दर्शनमात्र से ही लोगों के पापों को नष्ट किया है, श्रीहरि के सर्वोत्कृष्ट अनुग्रह के कारण जो महान ऐश्वर्यों से युक्त हैं, फिर भी जिनका मन अति कोमल है उन मुनिवर श्रीगुणातीतानन्द की मैं नित्य स्तुति करता हूँ ।।10।।

प्रसंगं यस्यैत्याजगति ननु जाता जनगणा
        बृहद्रूपा भूपा हरिपुरुतरध्याननिरताः।
विरक्ता राज्यादौ शुभगुणयुताश्चातिसुखिनो
        गुणातीतानन्दं मुनिवरमहं नौमि सततम् ।।11।।


अर्थ: जिनके संग में आकर जगत के अनेक लोगों ने, सर्वाधिक रूपवान राजाओं ने तथा अन्य सभी ने अपने राज्य आदि वैभवों से वैराग्य ले लिया; उसी वैराग्य के कारण श्रीहरि के ध्यान में अत्यन्त आसक्त होकर तथा पवित्र गुणों से युक्त होकर बहुत लोग सुखी हो गए हैं, उन मुनिवर गुणातीतानन्द स्वामी की मैं निरन्तर स्तुति करता हूँ ।।11।।

यदुक्तां सद्वार्तां भवभयहरां श्रोतुमनिशं
        समायन् सद्व्राता बहुजनपदेभ्यो हरिजनाः।
मराला भूयांस समुदमिव सन्मानससरो
        गुणातीतानन्दं मुनिवरमहं नौमि सततम् ।।12।।


अर्थ: जिस तरह हंसों के झुण्ड के झुण्ड अति आनन्द से, उत्तम मान-सरोवर पर नित्य आते रहते हैं, उस तरह संसार का भय हरनेवाली, जिनकी श्रेष्ठ बातें सुनने के लिए सज्जनों का समुदाय अनेक देशों से जिनके निकट निरन्तर हर्षपूर्वक आते थे उन मुनिवर श्री गुणातीतानन्द स्वामी का मैं निरन्तर स्तवन करता हूँ ।।12।।

यदावासे मारप्रणयलोभादिरिपवः
        प्रवेष्टुं नो शेकुर्विजितविधिमुख्या बहुमदाः।
मुनीन्द्रैस्तं मान्यं शुभसकलतीर्थास्पदपदं
        गुणातीतानन्दं मुनिवरमहं नौमि सततम् ।।13।।


अर्थ: ब्रह्मा आदि मुख्य देवों को जीतनेवाले तथा उसी कारण से अहंकार करनेवाले कामदेव का प्रवेश गुणातीतानन्द स्वामी के निवासस्थान में कभी नहीं हुआ है। इसके उपरांत लोभादिक शत्रु भी जहाँ प्रवेश नहीं कर पाए, ऐसे जंगम तीर्थस्थान एवं श्रेष्ठ मुनियों को भी मान्य, जिनके चरणों में सब पवित्र तीर्थों का निवास हैं, ऐसे मुनिवर श्री गुणातीतानन्द स्वामी की मैं निरन्तर स्तुति करता हूँ ।।13।।

महाश्रद्धोपेतं मुनिगुरुवरं स्वक्षरतनुं
        हरेर्भक्त्यादौ द्राग्भवभयमिदं स्वेक्षणकृताम्
प्रशान्तं साधुत्वावधिमतुलकारुण्यनिलयं
        गुणातीतानन्दं मुनिवरमहं नौमि सततम् ।।14।।


अर्थ: श्रीहरि की भक्ति आदि में अत्यन्त श्रद्धा रखनेवाले, मुनियों के भी उत्तम गुरु, सुन्दर अक्षरमय (अविनाशी) शरीरवाले और दर्शन करनेवालों के जन्म-मरणरूप संसार के भय को तत्काल हरनेवाले, अत्यन्त शान्त, साधुभाव के सीमारूप तथा अपार कृपा के करुणा-स्थान मुनिवर गुणातीतानन्द स्वामी को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ ।।14।।

मुहुर्यस्मै प्रादात्पुरुमुदमितो यद्वरगुणै-
        र्हरिर्हारान् पौष्पान्निजतनुधृतानंगदमुखान्।
स्वभुक्तं सद्भोज्यं वरवसनमुख्यं स्वविधृतं
        गुणातीतानन्दं मुनिवरमहं नौमि सततम् ।।15।।


अर्थ: जिनके श्रेष्ठ गुणों से भगवान स्वामिनारायण अत्यन्त प्रसन्न हो जाते थे और जिस कारण अपने शरीर पर धारण किए हुए पुष्पों के हार तथा बाजुबंध इत्यादि अपनी प्रसादी एवं स्वयं धारण किए हुए वस्त्र इत्यादि को भी जिनको अर्पण कर देते थे; उन मुनिवरश्री गुणातीतानन्द स्वामी की मैं नित्य स्तुति करता हूँ ।।15।।

इति श्री अचिन्त्यानन्दवर्णिविरचितं
श्रीगुणातीतानन्दमहिम्नस्तोत्रं समाप्तम्।
महात्मय श्लोक


कमुखं रसकं विमुखं निगमं सगुणं ह्यागुणं दशकेन युतम्।
निखिलाण्डगणो यदितो विवरं तदनेकमजाधवधाम वदेत् ।।1।।


अर्थ: माया के अधिपति जो भगवान है उनका अक्षरधाम कैसा है ? तो सर्व प्रकार के सुखों के द्वार, सर्व रसों का आश्रयस्थान, कल्याण का मुख या आरम्भस्थान, अवश्य प्राप्त करने योग्य, सगुण फिर भी निर्गुण, मायिक तथा सर्वगुणों से रहित, दशांग परम धर्म से युक्त, समग्र ब्रह्माण्डों का समुदाय जहाँ से प्रकट हुआ है, अथवा समग्र ब्रह्माण्डों से ऊपर जो स्थित है और सर्व धामों से अति श्रेष्ठ है, ऐसा अक्षरधाम है।

तदजस्य महापुरुषानिलयं कचरन्ध्रमितं महतां च सताम्।
तदनेकमहाक्षरकोटिपदं न लयं प्रतिपत्ति महाप्रलये ।।2।।


अर्थ: अजन्मा भगवान का वह अक्षरधाम, मुक्त महापुरुषों का निवासस्थान है। बड़े सन्तों के रोम के छिद्रों जैसा सूक्ष्म तथा अमाप है; अनन्तकोटि मुक्तों का आश्रय-स्थान है और अनेक महाप्रलय होने पर भी वह नष्ट नहीं होता।

सगुणाद्यामितैश्च भगैः सहितं पुरुषोत्तमदास्यमितं हि परम्।
प्रणमामि गुणात्परनामधरं क्षरतारहितं मम प्रेष्ठतरम् ।।3।।


अर्थ: सगुण आदि अमाप ऐश्वर्य से युक्त, पुरुषोत्तम के सर्वोत्तम दासभाव को प्राप्त हुए, गुणों से परे, ‘गुणातीत’ नाम को धारण करने वाले, क्षरभाव से रहित और मेरे अतिप्रिय सद्गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।

अनेकेभ्यः सद्भ्यो विमलहरिविज्ञानरसदं
        भुवि ब्राह्मी विद्यां हरिवचनरुपां च ददतम्।
हरिध्यानासक्तं शुभगुणमनाद्यक्षरमहं
        गुणातीतानन्दं सकलगुरुमीडे मुनिवरम् ।।4।।


अर्थ: अनेक सत्पुरुषों को भी श्रीहरि के रूप का उत्तम ज्ञान अर्पण करनेवाले, तथा श्रीहरि के वचनामृत रूप ब्रह्मविद्या का इस पृथ्वी पर प्रचार करने वाले, भगवान स्वामिनारायण के ध्यान में आसक्त, शुभगुणों से युक्त, सर्व मुनियों में श्रेष्ठ और सभी (जगत) के गुरु, अनादि अक्षरब्रह्म श्री गुणातीतानन्द स्वामी की मैं स्तुति करता हूँ।

अक्षरब्रह्म

गुणातीतानन्द स्वामी
जीवन तथा कार्य


पवित्र आर्यभूमि भारतवर्ष का इतिहास भगवान के अवतार, ब्रह्मनिष्ठ ऋषिवर्यों और अनेक महापुरुषों के महान कार्यों से तेजोज्ज्वल दिखाई देता है।
अठारहवीं शताब्दी के मध्यभाग में ऐसी दो विभूतियों ने इस धरा-मंडल को विशेष तीर्थत्व प्रदान कियाः एक थे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान स्वामिनारायण और दूसरे थे उनके अनन्य भक्त अक्षरावतार सन्तवर्य स्वामी गुणातीतानन्द जी !
भारतीय आध्यात्मिक वाङ्मय ने जिन ब्रह्म-परब्रह्म का बृहत्तर महिमागान किया है, उसी के ये मूर्तिमंत अवतार थे।
अयोध्या के समीपवर्ती छोटे-से गाँव छपिया में सन् 1781 की चैत्र शुक्ला नवीं के दिन भगवान स्वामिनारायण प्रकट हुए। ग्यारह साल की उम्र तक उन्होंने वेद-वेदान्तों की शिक्षा पाई, अनेक ऐश्वर्य से अलंकृत उनका बचपन उनकी भगवत्ता के अनेक प्रमाण देता रहा है। आखिर ग्यारह साल की छोटी उम्र में उन्होंने गृहसंसार का त्याग किया। लोक-कल्याण की इस यात्रा में उन्होंने संपूर्ण भारत भूमि को पैदल विचरण करके विशेष तीर्थत्व दिया। अन्ततः गुजरात को आपने अपनी कर्मभूमि बनाई।
संसार में शास्त्रप्रबोधित एकांतिक धर्म का स्थापन उनका मुख्य उद्देश्य था। अपने उद्देश्य के विषय में उन्होंने अपने शिष्यों को लिखा था :
‘आज तो मैं अविद्यारूप जो माया है, तिसके नाश के वास्ते प्रकट हुआ हूँ। ज्यों वेदों के वचन ज्यों अविद्याकुं नाश करो, ऐसी जो मेरी स्तुति किया है, सो वचनकुं आज मैं सत्य करता हूँ। आज तो मेरा प्रयोजन यही है, ज्यों अविद्याकुं नाश करना, जीव कुं ब्रह्मरूप करना !’1

इसी उद्देश्य को सिद्ध करने के लिए वे अक्षरब्रह्म तत्व को
1. ‘श्रीजीना प्रसादीना पत्रों’ पत्र : 8, पृष्ठ 10, प्रकाशक : श्री माधवलाल दलसुखराम कोठारी। अहमदाबाद, सन् 1922।
गुणातीतानन्द स्वामी के रूप में अपने साथ लाए।2
भगवान स्वामिनारायण के स्त्री-धन के त्यागी, नैष्ठिक ब्रह्मचारी, त्यागीवृन्द में ब्राह्मीस्थिति के प्रेरक बल के समान, विशिष्ट प्रतिभा से युक्त सन्त थे अक्षरब्रह्म गुणातीतानन्द स्वामी।
गुजरात राज्य के सौराष्ट्र प्रांत में जामनगर जिले का एक छोटा-सा गाँव है लतीपुर। यहाँ स्वामी आत्मानन्दजी अपने कुछ शिष्यों के साथ निवास करते थे।
एक दिन उन्होंने अपने वरिष्ठ शिष्य वल्लभजी जानी से कहा : ‘वल्लभजी, महादेव शंभु की कृपा से तेरे घर एक पुत्ररत्न का जन्म होगा, उसका नाम तुम भोलानाथ रखना !’
उचित समय पर वल्लभजी के घर पुत्र का जन्म हुआ, यही भोलानाथ बड़े होकर अपने परिवार के साथ उसी जिले के भादरा गाँव में बस गए। उनके विवाह के अवसर पर स्वामी आत्मानन्दजी बिना निमन्त्रण सहज ही पहुँच गए और भोलानाथ तथा पत्नी साकरबाई को आशीर्वाद देते हुए कहा : ‘तुम्हारे घर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान का धाम स्वयं अक्षरब्रह्म पुत्ररूप होकर जन्म धारण करेंगे।’ इस आशीर्वाद से सब बहुत प्रसन्न हुए। और वह शुभ दिन आ गया।
17 अक्तूबर, सन् 1785 (संवत् 1841) की शरदपूर्णिमा की रात्रि को पूर्ण चन्द्र की भाँति देदीप्यमान पुत्र को साकरबाई ने जन्म दिया ! न केवल माता-पिता ही प्रसन्न हुए, पूरा गाँव हर्षोल्लास से झूम उठा। मंगल गीत-संगीत से वातावरण भर गया। स्वामी आत्मानन्दजी के ही समर्थ शिष्य स्वामी रामानन्दजी ने कुछेक दिनों के बाद इस बच्चे को गोद में लेते हुए आशीर्वाद दिया और बोले : ‘यह अक्षरब्रह्म का मूल स्वरूप है, अतः इसका नाम ‘मूलजी’ रखो ! फिर कहा : ‘इस बालक की प्रतिभा से लाखों लोग सहज आकृष्ट होंगे। यह तो बृहस्पति के समान महान वक्ता होगा, और ब्रह्मविद्या का प्रवर्तन ही इसका मुख्य उद्देश्य होगा। अपरंपार वैभव की प्राप्ति होने के बावजूद यह महायोगी पूर्णतः विरक्त रहेगा, तथा भगवान को अपनी वशवर्ती बनाएगा ! उसके उपदेश वाक्य अनेकानेक मुमुक्षुओं के मार्गदर्शक बन जाएँगे।’

2. वच. ग.प्र. 71.।
पुत्र की इतनी अलौकिक प्रतिभा से माता-पिता दोनों फूले न समाते। अति सौम्य, तेजस्वी और कुछ श्यामवर्ण के शरीर से फूटती तेजोज्ज्वल सन्तप्रतिभा मूलजी की अनन्य सम्पत्ति थी।
जड़ भरत के समान वैराग्य तथा संसार के प्रति सहज अनासक्ति के कारण मूलजी को दूध-मिठाई के बदले इमली या बेर के प्रति विशेष रुचि थी।
परमतत्व के साक्षात्कार की उनकी अनादि भूमिका उनके कुछेक प्रसंग से स्वाभाविक ही प्रतीत हो जाती है।
एक बार बालक मूलजी ने माँ से दूध माँगा। माँ ने कहा, ‘बेटा दूध ठाकुरजी को भोग लगाकर देती हूँ।’ तब मूलजी ने कहा, ‘माँ, ठाकुरजी तो मेरे हृदय में निरंतर विराजमान रहते हैं। वे मेरे साथ भोजन करते हैं, सोते हैं। मुझ से कभी बिछड़ते ही नहीं !’ माँ ने चकित होकर दूध दिया, मूलजी तुरंत दूध पीने लगे। उन्होंने जैसे ही दूध पी लिया, ठाकुरजी के होठों पर भी दूध की बारीक रेखा अंकित हुई दिखाई दी ! उन्हें परमात्मा की साधना करने की आवश्यकता नहीं थी, वे तो अनादि सिद्ध थे। उनके अनुज का नाम था सुन्दरजी। उसे पालने में झुलाते हुए वे कभी-कभी माता से कहते, ‘माँ, माँ, मैं तो साधु बनूँगा, और इसे भी साधु बनाऊँगा !’
एक बार पिता भोलानाथ ने भगवत् स्मरण में लीन मूलजी से कहा, ‘बेटा, भजन-स्मरण तो वृद्धावस्था में किया जाता है। अभी तो तुम्हारे हँसने, खेलने तथा आनन्द करने के दिन हैं। जाओ मौज करो।’ मूलजी तुरन्त उठे। सारे गाँव में घूमे, और लौटकर पिता से कहने लगे, ‘पिताजी, मैंने गाँव में देखा, कोई वृद्ध भगवान का भजन नहीं करते। चौराहे पर बैठकर गप्पे-ठहाके लगाते हैं। अतः वृद्धावस्था की आशा में जवानी की कमाई क्यों खोई जाएँ ?’
भजनमग्न मूलजी को भगवान स्वामिनारायण वर्णीवेश में जहाँ-जहाँ विचरण करते वह प्रत्यक्ष दिखाई देता। भक्ति की ऐसी उन्मादसभर क्षण में वे गाने लगते :


वनमां वहालो विचरे, ते आवशे आपणे गाम;
माता, मुजने जाणजो, एज प्रभुनुं धाम !


‘माँ, श्रीहरि वन में विचरण कर रहे हैं, वे जरूर हमारे गाँव आएँगे। मैं उन्हीं के रहने का धाम स्वयं अक्षरब्रह्म हूँ !’
उनकी इस प्रकार की बातें बालमित्रों में भी आश्चर्य जगातीं। उनके खेल में भी ब्रह्मज्ञान का झरना प्रवाहित होता रहता।
एक बार खेत तक जानेवाले रास्ते के बगल में एक कुएँ के पास मूलजी और उनके मित्र एकत्रित हुए। खेल-खेल में वे कुएँ में पत्थर डालने लगे। पानी पर लगी हुई काई हट गई और सभी के प्रतिबिम्ब पानी में दिखाई देने लगे। मूलजी ने कहा, ‘मित्रों, काई के हटते ही पानी कितना निर्मल हो गया ! उसी प्रकार माया के हटते ही हमें आत्मदर्शन हो जाता है। माया जीव को प्रभु का भजन करने नहीं देती।’ ऐसी गहन बातें वे ग्रामीण बालक भला क्या समझते ? वे तो इतना ही समझते कि मूलजी असाधारण हैं, अद्भुत हैं।
लगभग पन्द्रह वर्ष की आयु में मूलजी को पीपलाणा गाँव में भगवान स्वामिनारायण के प्रथम दर्शन हुए। मूलजी को देखकर वर्णीवेश भगवान नीलकंठ बोल उठे : ‘यह तो हमारे रहने का धाम साक्षात् अक्षरब्रह्म है।’ मूलजी ने छोटी आयु में ही प्रणामी, वैष्णव आदि सम्प्रदायों के रहस्यों को समझने का अभ्यास किया था, परन्तु रामानन्द स्वामी द्वारा प्रवर्तित भागवतधर्म उन्हें अधिक प्रतीतकर लगा और उन्होंने स्वामी का शिष्यत्व स्वीकार कर लिया। भागवती दीक्षा के पश्चा्त नीलकंठवर्णी स्वामी सहजानन्दजी नाम से पहचाने जाने लगे। उन्होंने जब ‘स्वामिनारायण’ महामंत्र दिया, तब से लोग उन्हें ‘भगवान स्वामिनारायण’ भी कहने लगे। उन्होंने केवल 21 वर्ष की आयु में संप्रदाय की धुरा धारण की थी। वे गाँव-गाँव विचरण करते हुए एकबार संवत् 1864, सन् 1808 में भादरा आ पहुँचे। मूलजी के साथ प्रेमभाव अनोखे अंदाज से प्रस्फुटित होता था। उन्होंने मूलजी की माता साकरबाई से कहा था, ‘माँ, मूलजी तो इतने विशाल हैं कि उन्होंने अपने विशेष सामर्थ्य से अनंत ब्रह्मांडों को धारण किया है। वह तो सच्चिदानन्द रूप हैं, सर्वत्र व्यापक हैं, हम उनके द्वारा ही सब कार्य करते हैं, तथा उनके बिना क्षणमात्र भी नहीं रह सकते।’
इन अद्भुत महिमा की बातें सुनकर माता के आनन्द का कोई पार न रहा।

       

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