शिरडी के संत श्री साँई बाबा - महेन्द्र मित्तल Shirdi Ke Sant Shri Sai Baba - Hindi book by - Mahendra Mittal
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शिरडी के संत श्री साँई बाबा

महेन्द्र मित्तल

प्रकाशक : दृष्टि प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :159
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4619
आईएसबीएन :81-89361-11-2

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शिरडी के महान सन्त श्री साँई बाबा का औपन्यासिक शैली में जीवन-वृत्त...

Shiradi ke shant shri saai baba

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारतीय संस्कृति की यह विशेषता रही है कि यहाँ जो भी महान आत्माएँ अवतरित हुई हैं, उन्हें भगवान के विशेष अवतारों के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता रहा है। शिरडी के संत श्री साँई बाबा को भगवान आशुतोष शिव शंकर का पूर्ण अवतार माना जाता है। परन्तु मेरा ऐसा मानना है कि इस धरती पर जो भी महान आत्माएँ अवतरित होती हैं, वे अपने महान लोकहिताय कार्यों से, स्वयं ही मनुष्य से भगवान होने तक का सफर तय करती हैं।

शिरडी के संत श्री साँई बाबा भी एक ऐसी ही महान आत्मा को धारण करने वाले थे, जिसने उन्हें मनुष्य से भगवान होने तक का सफर तय कराया था। लोग उन्हें जिस रूप में भी स्वीकार करें, यह उनकी आस्था के साथ जुड़ा है। हिंदू उन्हें भगवान शिव का अवतार मानते हैं तो मुसलमान उन्हें किसी महान पैगम्बर से कम नहीं मानते। यही दशा पारसियों, ईसाइयों और अन्य धर्मावलम्बियों के साथ भी है कि वे उन्हें किस रूप में स्वीकार करते हैं।

मानवीय दृष्टि से शिरडी का यह सन्त, उस महान परम्परा का अंग है, जिसके हृदय में प्राणी मात्र के प्रति गहरी संवेदना, स्नेह और प्यार होता है। जो जीव के दुःख से दुःखी होता है और उसके सुख से सुखी होता है। दुःख-सुख की यह समदर्शिता ही उसे मनुष्य से भगवान अथवा महान सन्त का दर्जा दिलाती है। ऐसे लोग किसी के नाम का सहारा लेकर अपना वर्चस्व सिद्ध नहीं करते और न अपने आपको किसी भगवान विशेष का अवतार कहलाना पसन्द करते हैं।

यह बात मैं इसलिए कह रहा हूँ कि पुटुपर्ती ग्राम में सत्य नारायण राजू ने स्वयं शिरडी के साँई बाबा का अवतार कहा है। उनका कहना यह है कि स्वयं शिरडी के साँई बाबा ने महासमाधि लेते समय यह कहा कि वे ठीक आठ वर्ष बाद सत्य नारायण राजू अथवा सत्य साँई बाबा के रूप में अवतार लेंगे। यह कथन सरासर असत्य है। शिरडी के साँई बाबा ने ऐसी कोई घोषणा नहीं की थी और इसका कोई प्रमाण भी नहीं है।

दूसरे, अवतार भगवान का होता है, न कि किसी सन्त का। सन्त के क्रिया-कलापों से उसके कार्य भले ही मिलते-जुलते हों, पर उसके सभी गुण उसमें विद्यमान हों, यह कदापि संभव नहीं है। आस्था के नाते आप किसी को भी भगवान की तरह पूजने लगें, उनके लिए आपको न तो रोका जा सकता है, न आपको दोष ही दिया जा सकता है। हर व्यक्ति अपने-अपने ढंग से अपनी अराधना का केन्द्र-बिन्दु निर्धारित करता है। दूसरे भी उसे उसी रूप में स्वीकार करें, यह कैसे संभव हो सकता है। जिस प्रकार राम, कृष्ण और विष्णु भागवान के अवतार माने जाने पर भी, गुण और स्वभाव में एक नहीं हो सकते थे, उसी प्रकार शिरडी के साँई बाबा और पुटुपर्ती के सत्य साँई बाबा भी एक नहीं हो सकते। अच्छा होता कि स्वयं को शिरड़ी के साँई बाबा का अवतार न कहकर, स्वयं को भगवान शंकर का ही अवतार कहते। शिरडी के साँई बाबा का स्वयं को अवतार बताकर वे भले ही कुछ लोगों को अपने चमत्कारों से अपनी ओर खीच लेने में सफल हो जाएँ, पर शिरडी के साँई जैसी करुणा और साधारण जीवन जीने की स्वच्छ और पवित्र जीवन-पद्धति, वे कहाँ से लाएँगे ?

नहीं, मैं उन्हें शिरडी के साँई बाबा का अवतार स्वीकार नहीं कर सकता, भले ही वे कितने प्रचार करें या कराएँ। शिरडी के साँई बाबा तो एक ही थे और आज भी जीवन्त किंवदन्ती के रूप में हमारे दिलों में विराजमान है।
सन् 1976-77 के आस-पास मुझे एक बार शिरडी जाने का अवसर प्राप्त हुआ था। तब मैं किसी भक्ति भाव से वहीं नहीं गया था। मैंने उनका नाम भर सुना था। उत्सुकतावश किसी के साथ मैं वहां गया था। उससे पहले सैकड़ों तीर्थस्थलों पर जाने का अवसर भी मुझे मिला था। परन्तु हर जगह स्वार्थ और लालच की ढकोसला पूरित दृष्टि का ही मुझे सामना करना पड़ा, जिसके कारण मन की आस्था अस्थिर हो जाती है। लेकिन पहली बार शिरड़ी में जाकर ऐसा लगा कि मैं किसी सन्त-भूमि में आ गया हूँ। एक अजीब सी शान्ति का एहसास मुझे तब वहाँ हुआ था। मैंने उस समय सोचा भी नहीं था कि साँई बाबा पर पुस्तक लिखने का कभी मुझे अवसर मिलेगा। वहाँ बिताए कुछ पलों का पावन एहसास, जैसे निरन्तर मेरा पीछा करता है और आज भी करता है।

आज सन् 2006 में जब मैं साँई बाबा पर पुस्तक लिखने बैठा हूँ, तो मुझे फिर से वही एहसास अपनी ओर खींच रहा है। साँई बाबा से संबंधित अनेक पुस्तकों को पढ़ने का सौभाग्य मुझे मिला। परन्तु सभी पुस्तकों में उनके जीवन के अनेक वर्ष पूरी तरह से अंधकार में हैं। तब मैंने इस पुस्तक को औपन्यासिक शैली में लिखने का संकल्प लिया; क्योंकि इस प्रकार मैं बाबा के जीवन के उन अँधेरे वर्षों में, अपनी कल्पनाओं के माध्यम से प्रवेश कर सकता था। मेरे कमरे में बाबा का एक फोटो टँगा हुआ है, जिसमें वे सिर पर सफेद कपड़ा बाँधे, काली टोपी पहने तीन व्यक्तियों और एक छोटी बच्ची के साथ हैं। पृष्ठभूमि में एक टूटी दीवार और छतर लिए एक व्यक्ति है। वह फोटोग्राफ सन् 1916 का ऑरिजनल फोटोग्राफ है। अर्थात् उनकी महासमाधि से दो वर्ष पूर्व का। बाबा के शरीर पर एक सफेद खादी का कुर्ता और घुटनों तक की धोती है। उनकी आँखों में एक अद्भुत आकर्षण है। सफेद दाढ़ी है और पैर नंगे हैं।

इस उपन्यास को लिखते समय बाबा का यह चित्र मेरी प्रेरणा का स्रोत रहा है। कभी-कभी लिखते समय यह कलम रुक जाती थी, तो ऐसा लगता था जैसे कोई अदृश्य शक्ति मेरी कलम में दम भर रही है और कागज़ों पर मैं कुछ नहीं लिख रहा हूँ, बल्कि जैसे बाबा ही मुझसे वह सब लिखवा रहे हैं। उन्होंने जो लिखवाया वही सत्य है और जो कुछ मैंने अपनी कल्पनाओं के माध्यम से उनके जीवन के अँधेरे कोनों में झाँकने का प्रयास किया, उसमें मुझसे त्रुटि होना स्वाभाविक है। उन त्रुटियों के लिए मैं उन सभी सहृदय भक्तों से क्षमा चाहूँगा, जिन्होंने बाबा के सन्त जीवन से सदैव प्रेरणा प्राप्त की है।
बाबा ने अपने जीवन में आत्म-साक्षात्कार करके भगवान के निकट होने की जो साधना की थी, बाबा सदैव अपने भक्तों को उस साधना-पथ पर ले जाना चाहते थे। परन्तु उनके भक्त सदैव बाबा से चमत्कार की आशा लिए उनके चरणों में बिछते रहे। अपने अन्तिम दिनों में बाबा को निश्चित रूप से इसका मलाल रहा कि उनके किसी भी भक्त ने आत्म-मन्थन के मार्ग को नहीं अपनाया। आज भी उनकी समाधि पर लोग अपने भौतिक सुख-दुःख की भूल-भुलैया को सुलझाने की कामना तो लेकर जाते हैं, पर कोई उनसे आत्म-साक्षात्कार की साधना का रहस्य पूछने नहीं जाता। अगर मैं गलत हूँ तो अपने हृदय पर हाथ रखकर अपने आप से ही पूछो, उत्तर मिल जाएगा। बाबा ने कहा था- ‘‘जिस परमात्मा का ढूँढ़ते हुए तुम बाहर भटक रहे हो, वह तो तुम्हारे भीतर बैठा है और पल-पल तुम्हारी भावनाओं का लेखा-जोखा लिखता रहता है। कुछ पाना है तो उसी से पाओं। वही सबका दाता है, वही सबका मालिक एक है।’’

इस पुस्तक को पूरा करने के बाद एक बार फिर इच्छा हुई कि बाबा के दर्शन करने शिरडी जाऊँ और उनका यह औपन्यासिक जीवन-वृत्त उन्हें ही समर्पित करूँ। देखों, बाबा कब बुलाते हैं। अन्त में, मैं आभारी हूँ अपनी धर्मपत्नी श्रीमती सरिता जी का, जिन्होंने इस पाण्डुलिपि को पढ़कर मेरी कितनी ही त्रुटियों को शुद्ध करनें में मेरी मदद की है। धन्यवाद।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 16.8.06

आपका शुभेच्छु
-डॉ. महेन्द्र मित्तल

शिरडी के संत श्री साँई बाबा


एक

मल्लाह गंगा भावड़िया ने नजर उठाकर आकाश की ओर देखा। आकाश में काले-काले बादल छाए हुए थे। उमड़ते-घुमड़ते बादल जब एक-दूसरे से टकराते तो जोर की गड़गड़ाहट होती और बिजली चमकती। साँय-साँय करती हवा तेजी से बहने लगी थी। नदी का जल उछाले ले रहा था। दूर-दूर तक घाट सूना पड़ा था। पानी के थपेड़े उसकी नाव से टकरा-टकराकर वहाँ एक अज़ीब-सा खौफ पैदा कर रहे थे।

घाट पर नदी किनारे खड़े एक मात्र पीपल के पेड़ के तने उसने अपनी नाव की रस्सी बाँधी हुई थी। पीपल के पत्ते तेज़ हवा के झोकों से खड़ाखड़ा रहे थे। डालियाँ झुक-झुक जाती थीं। लगभग एक घंटे से यही दशा चल रही थी। शाम हो चली थी। थोड़ी देर बाद अँधेरा भी पाँव पसारने वाला था। सुबह गंगा जिन सवारियों को परली पार से इस ओर अपनी नौका में लेकर आया था, उनमें से एक भी अभी तक नहीं लौटी थी। लगता था कि जैसे मौसम के बिगड़े मिजाज को देखकर उन्होंने नदी पार जाने का अपना इरादा बदल दिया था और आस-पास के गाँवों में रुक जाना ही बेहतर समझा था।

उसका अपना गाँव पाथरी, नदी से बहुत दूर नहीं था। परन्तु मनमाड का रेलवे स्टेशन वहाँ से लगभग चार कोस दूर था। मनमाड कस्बें में जो लोग आस-पास के गाँवों से काम की तलाश में आते थे, उन्हें नदी पार करके ही आना पड़ता था। इससे गंगा भावड़िया की रोजी-रोटी का जुगाड़ हो जाता था। घर में दो ही तो प्राणी थे। एक वह स्वयं और दूसरी उसकी पत्नी देवगिरी अम्मा। औलाद का मुख अभी तक उन्हें नसीब नहीं हुआ था। पर दोनों ही सन्तोषी थे और ईश्वर में विश्वास रखते थे। दोनों ही अपने सीधे-सादे जीवन से सन्तुष्ट थे और धार्मिक कर्म-कांडों का पालन करते थे। जाति से ब्राह्मण थे, परन्तु पंडिताई नहीं करते थे।

अँधेरा घिरने लगा तो वह उठा और बुदबुदाया- ‘‘अब कोई नहीं आएगा। ऐसे मौसम में भला कौन नदी पार करना चाहेगा। बरखा किसी भी समय चालू हो सकती है। मुझे भी अब घर लौट चलना चाहिए। देवगिरी चिन्ता कर रही होगी। इस बखत से तो काफी पहले नदी पार जाने वाले आ जाते थे। नहीं, अब कोई नहीं आएगा।’’

उसने एक बार नदी की ओर देखा और अपनी थपेड़े खाती डोलती नौका की रस्सी को खींचकर देखा। वह मज़बूती से बँधी हुई थी। तभी तड़ातड़ वर्षा शुरू हो गई और बादर जोर से गरजने लगे। गंगा ने तेजी से गाँव की ओर जाने वाली पगडंडी पर अपने पैर बढ़ाए और अपने कन्धे पर पड़े गमछे को सिर पर लपेट लिया। वर्षा की बौछारें उसे तेज़ी से भिगोने लगीं। उसी समय सामने की ओर से चलता हुआ एक बूढ़ा उसके सामने आ गया। उसकी लम्बी-लम्बी जटाएँ थीं। बाल सन जैसे सफेद हो चले थे। सफेद बालों की ही लम्बी दाढ़ी थी। चेहरा झुर्रियों से भरा हुआ था। आँखों के ऊपर मोटी-मोटी भौंहें थीं। उसकी नाक लम्बी और सुतवाँ थी। वह बारिश से पूरी तरह भींग गया था। उसने अपनी आँखों में याचना भरकर गंगा से कहा- ‘‘भाई ! मुझे नदी पार जाना है। क्या तुम मुझे नदी पार करा दोगे ?’’

गंगा ने चौंककर उस बूढ़े फकीर की ओर देखा और कहा- ‘‘बाबा ! इतने खराब मौसम में नदी में नाव उतारना, मौत को दावत देना है। आप देख नहीं रहे हैं कि बारिश कितनी तेज़ है और झोकों से फसलें कैसे बिछी जा रही हैं।’’
‘‘देख रहा हूँ भाई !’’ फकीर बोला- ‘‘नदी का जल भी उछाले ले रहा है। सब परिस्थितियाँ एकदम से विपरीत हैं। लेकिन इनसे घबराकर क्या हम अपना कर्म करना बन्द कर देते हैं ? जीवन-मरण तो सब ईश्वर के हाथों में है। उससे क्या घबराना। सुबह से मैं बहुत भूखा हूँ। आज सारे दिन चल-चलकर मैं पूरी तरह से थक गया हूँ। नदी पार गाँव में मेरे एक परिचित रहते हैं। आज की रात मैं उनके यहाँ विश्राम करना चाहता हूँ। वहाँ मुझे पेट भर भोजन भी नसीब हो जाएगा।’’


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