गांधी एक जीवनी - कृष्ण कृपलानी Gandhi Ek Jeevani - Hindi book by - Krishna Kriplani
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गांधी एक जीवनी

कृष्ण कृपलानी

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :199
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4615
आईएसबीएन :81-237-2020-3

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प्रस्तुत पुस्तक महात्मा गाँधी के जीवन और कृत्यों का एक रोचक और सम्मोहक विवरण प्रस्तुत करती है। ...

Ghandi Ek Jivani

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत पुस्तक महात्मा गाँधी के जीवन और कृत्यों का एक रोचक और सम्मोहक विवरण प्रस्तुत करती है। वे अपने देश के लिए जिए, कष्ट उठाए और जान दी, फिर भी उनके जीवन का महत्व केवल उनके अपने देश के संदर्भ में नहीं है। न ही वे केवल एक देशभक्त या क्रान्तिकारी सुधारक थे जिनको आनेवाली पीढ़ियाँ याद रक्खेंगी। वे मूलतया एक नैतिक बल थे, मानव की अंतरात्मा के लिए जिसका आकर्षण सार्वभौम भी है और शाश्वत भी। उनकी उपलब्धियाँ अनेक थीं। उन्होंने मानव जातियों के पाँचवे भाग को विदेशी दासता से मुक्ति दिलाई। भारत की स्वाधीनता एक प्रकार से दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों की स्वाधीनता का अग्रदूत थी। उनके जीवन का यह पहलू एक खुली किताब है।

कृष्ण कृपालिनी (1907-1992) एक स्वाधीनता सेनानी थे जिन्होंने अपनी सेनानिवृत्ति का आरम्भ शांतिनिकेतन में अध्यापक के रूप में काम किया। 1933 से 1941 तक वे गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के घनिष्ठ सहयोगी रहे और उनके द्वारा स्थापित पत्रिका विश्वभारती क्वार्टरली के संपादक रहे। वे 1954 और 1971 के बीच साहित्य अकादमी के पहले सचिव रहे। 1974 से 1980 तक वे राज्य सभी के मनोनीत सदस्य रहे। उन्हें पद्मभूषण से भी सम्मानित किया गया। 1981 से 1988 तक वे नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया के अध्यक्ष भी रहे। उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियां हैं : रवीन्द्रनाथ टैगोर : ए बायोग्राफी, गांधी : दि मार्डन महात्मा, टैगोर : ए लाइफ, द्वारकानाथ टैगोर, और मार्डन इंडिया : राममोहन राय टू रवीन्द्रनाथ टैगोर।

गांधीः एक जीवनी


भारतीय उपमहाद्वीप के लंबे और घटनाओं से भरे इतिहास में पहले किसी भी सदी में जनता के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन में इतने तीव्र परिवर्तन नहीं आए जितने उस सदी में जो गाँधी जी के जन्म के साथ शुरू हुई और अब समाप्त हो चुकी है। उनके जन्म के समय तक ब्रिटिश राज्य भारत में जड़ें जमा चुका था। सन् 1857 के उभार ने जिसे सिपाही विद्रोह, महाविद्रोह और प्रथम स्वाधीनता संग्राम भी कहा जाता है, एक व्यापारिक उद्यम को एक साम्राज्य में रुपांतरित मात्र किया था। यह अधीनता सिर्फ राजनैतिक न थी। बौद्धिक और सांस्कृतिक दासता भी इसे इतने कारगर ढंग से दृढ़ बनाती थी कि शिक्षित भारतीयों की नयी पीढ़ी इसके सभ्यताकारी मिशन को  स्वीकार करने के लिए उत्सुक थी। कोई भी अधीनता इतनी स्थायी नहीं होती जितनी इच्छापूर्वक स्वीकार की गयी अधीनता होती है। कोई भी जंजीर इतनी सख्त जकड़ नहीं रखती जितनी वह जिसे प्यार से जकड़ा जाता है। यह दासता इतनी स्थायी थी और समर्पण इतना चाकराना कि लगने लगा था कि ब्रिटिश साम्राज्य एक ईश्वरीय देन है और भारत में अब बना ही रहेगा।

जब गाँधी जी की मृत्यु हुई तो भारत ने उसका मातम एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में किया। वंचित लोगों को अपनी खोई हुई विरासत और गूंगों को आवाज मिल चुकी थी। भय के सागर में डूबे हुए लोग अब सिर उठा कर चल सकते थे। निहत्थों ने ऐसा हथियार पा लिया था जिसके आगे ब्रिटिश संगीनें भी असहाय थीं। यह दुनिया के शस्त्रागार में एक अनोखा हथियार था। किसी को मारे बिना भी यह विजय प्राप्त करने में सफल रहा।
इस चमत्कार की कहानी गांधी जी के जीवन की कहानी भी है। कारण की इस ऐतिहासिक संवृत्ति की रूपरेखा बनाने और इसे साकार करने में उन्होंने किसी भी अन्य व्यक्ति से बड़ी भूमिका निभाई। अगर उनके कृतज्ञ राष्ट्रवासियों ने उनको राष्ट्रपिता कहा तो यह अकारण नहीं था।

फिर भी यह दावा करना अतिश्योक्तिपूर्ण होगा कि यह रूपांतरण गांधी जी के कारण आया। कोई व्यक्ति चाहे कितना ही प्रतिभासंपन्न क्यों न हो, अकेले एक ऐतिहासिक प्रक्रिया का निर्माता होने का दावा नहीं कर सकता। उनके अनेक उल्लेखनीय पूर्वजों और वरिष्ठ समकालीनों ने भाले-गंडासे और तलवारें  लेकर वह जंगल साफ करने की कोशिश की थी जिसमें भय, अंधविश्वास और निष्क्रियता की जहरीली घासें उग आई थीं। उन्होंने वह जमीन तैयार करने में सहायता की थी जिसे गाँधी जी की प्रतिमा ने एक विशाल कुरुक्षेत्र बना दिया-ऐसा कुरुक्षेत्र जिससे गुजरकर उनके देशवासियों ने स्वतंत्रता की ओर महाप्रयाण किया। अगर वे सौ-एक साल पहले पैदा हुए होते तो शायद ही वह होते जो वे बने। न ही गाँधी जी के नेतृत्व के बिना भारत को उस प्रकार अपना भविष्य मिला होता जिस प्रकार अंततः मिला-इतने शानदार तरीके से जिसने उसे स्वतंत्रता भी दिलाई और गरिमा भी। यह इतना अजीबो-गरीब तरीका था कि लोग आज हैरान हैं कि क्या इस प्रयोग को दोबारा दोहराया जा सकता है।

गाँधी जी ने अपनी जनता के लिए जीवन बिताया, कष्ट झेले और मृत्यु को प्राप्त हुए। फिर भी उनके जीवन का महत्व केवल उनके देश के संदर्भ में नहीं है। न ही यह जीवन एक ऐसे देशभक्त और क्रांतिकारी रूपांतरकार के रूप में है जिसमें आनेवाली पीढ़ियाँ उनको याद करेंगी। गाँधी जी और चाहे कुछ भी रहे हों, मूलतया वे एक नैतिक बल थे, मानव की अंतर्रात्मा के लिए, जिसका आकर्षण सार्वभौम भी है और स्थायी भी। अगर उन्होंने मुख्य रूप से अपने देशवासियों की सेवा की तो इसलिए कि वे उन्हीं के बीच पैदा हुए थे और उन्हीं की तकलीफों और अपमानों ने उनकी नैतिक संवेदना और उनके राजनीतिक अभियान के लिए आवश्यक प्रोत्साहन प्रदान किए। इस प्रकार उनके जीवन की कथा सबके लिए पठनीय है।

अगर गाँधी जी की महानता पूरी तरह अपने देश के लिए उनके उत्कट प्रेम पर और एक सफल राजनीतिक संघर्ष में उनके नेतृत्व पर आधारित होती तो यह राष्ट्रपिता के रूप में उनके प्रति जनता  के आभार का पर्याप्त कारण अवश्य होती। लेकिन इससे शायद ही इस तथ्य की व्याख्या हो पाती कि बाकी दुनिया भी क्यों उनकी स्मृतियों का सम्मान करती है और उनके शब्दों में प्रोत्साहन पाना चाहती है। आज दुनिया में राष्ट्रपिताओं की कमी नहीं है और उनमें कुछ तो ऐसे हैं कि उनके बिना भी दुनिया का काम  चल सकता था। लेकिन धोती का एक टुकड़ा कमर पर लपेटे यह दुबला-पतला और काला व्यक्ति अपने देश का राष्ट्रपिता ही नहीं, और भी बहुत कुछ था।

उनकी उपलब्धियाँ अनेक थीं। हरेक उपलब्धि को पाने के ढंग या उसके परिणाम के आधार पर जांचें तो वह दुनिया में कहीं भी उनके नाम को सम्मान दिलाने के लिए काफी थीं। उन्होंने मानवजाति के पांचवें हिस्से को विदेशी शासन से मुक्ति दिलाई। और भारत की स्वतंत्रता एक प्रकार से दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों की स्वतंत्रता की अग्रदूत थी।  जिन लोगों को कभी ‘अछूत’ कहा जाता था उनके लिए गांधी  जी ने जो कुछ किया, वह भी कुछ कम महत्त्व का  अधिकारी नहीं है उन्होंने उनके जातिगत उत्पीड़न और सामाजिक हीनता के सदियों पुराने बंधनों को तोड़ा। उन्होंने जोर देकर कहा कि स्वाधीनता का मापदंड उन करोड़ों लोगों का सामाजिक, नैतिक और आर्थिक उत्थान है जो गांव में बसते हैं और यही यह साधन है जिसे उन्होंने इस स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए विकसित किया। इस प्रकार उन्होंने जीवन का एक ऐसा रास्ता दिखाया जो एक दिन एक निरंकुश और एक धनलोलुप समाज, दोनों के लिए विकल्प बन सकता है।
उनकी मौत भी अपने-आपमें एक उपलब्धि थी। कारण की उनकी शहादत ने उनके देशवासियों को शर्म दिलाकर नफरत और आपसी मारकाट के पागलपन से उबारा। उसने भारतीय संघ को इस योग्य बताया है कि वह नवोदित राजसत्ता के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक चरित्र को बल पहुँचा सके।

लेकिन कोई मानवीय उपलब्धि चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हो, वह हमेशा स्थायी नहीं रह सकती। न ही वह एक परिवर्तनशील जगत में स्थिर रह सकती है। जो कुछ गाँधी जी की उपलब्धि रही वह छिन्न-भिन्न हो सकती है, पथ से विमुख हो सकती है, या हो सकता है कि वह केवल एक याद बनकर रह जाए। लेकिन गाँधी जी अमर रहेंगे क्योंकि वे अपनी उपलब्धियों से कहीं बड़े थे। वे सत्य और नैतिक पूर्णता की शाश्वत खोज में रत सार्वभौम मानव के साकार रूप थे। जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा था,  ‘‘मेरी रूचि अपने देशवासियों के कष्टों का निवारण करने से अधिक मानव-स्वभाव को पाशविक बनने से रोकने में है...अगर हम सभी एक ही ईश्वर की संतान  हैं और हम सबमें एक ही ईश्वरीय तत्व पाया जाता है तो हमें हर व्यक्ति के पापों का भागी बनना होगा चाहे वह हममें से हो या किसी और नस्ल का हो।’’

सन 1938 में गुरूदेव रवींद्रनथ ठाकुर ने कहा था, ‘‘अन्य जनगणों की तरह भारत में भी ऐसे देशभक्त हैं जिन्होंने गाँधी जी जितना ही बलिदान किया है, और कुछ को तो उनसे भी भयानक कष्ट झेलने पड़े हैं; ठीक उसी तरह जैसे धर्म के क्षेत्र में भी इस देश में ऐसे संन्यासी हैं जिनकी तपस्या के आगे गांधी जी का जीवन अपेक्षाकृत अधिक सुखमय है। लेकिन ये देशभक्त मात्र हैं और इससे अधिक कुछ नहीं हैं; और ये संन्यासी भी मात्र आध्यात्मिक खिलाड़ी हैं जो अपने सदाचारों के ही कारण मनुष्य की सीमाओं में बंधे हैं; जबकि यह मनुष्य अपने महान सदाचारों से भी महानतर दिखाई देता है।’’

गाँधी जी ने किसी संप्रदाय की स्थापना नहीं की। हालांकि वे आस्था का जीवन जीते रहे मगर उन्होंने अपने पीछे कोई ऐसा पंथ नहीं छोड़ा जिसे लेकर उनके भक्त झगड़ते रहें। वे जिस धर्म में  पैदा हुए थे उसके प्रति (अपने खुद के अंग से) अत्यंत समर्पित और आस्थावान रहे। मगर उन्होंनें  निर्भयता के साथ और समझौता विहीन ढंग से हर उस मत या कर्मकाण्ड को त्यागा जो उन्हें उनकी धारणा की सार्वभौम नैतिकता और दयाभाव के नियम का निषेध करता दिखाई देता था। बहुत पहले, सन 1909 में ही उनके ईसाई दोस्त जोसेफ डोग ने उनके बारे में लिखा था, ‘‘कोई भी धर्म व्यवस्था उनको पूरी तरह बाँधकर रख सकती है, मुझे इसमें संदेह है। उनके विचार ईसाई धर्म के इतने करीब हैं कि वे पूरी तरह हिंदू नहीं हो सकते, और हिंदुत्व के रंग में इतने रंगे हुए हैं कि ईसाई नहीं कहे जा सकते जबकि उनकी हमदर्दियां इतनी व्यापक और सहिष्णुतापूर्ण हैं कि कोई यह भी सोच सकता है कि वे ऐसे बिंदु तक पहुँच चुके हैं जहां पंथों के सूत्र उनके लिए अर्थहीन हो गए हैं।’’

सत्ताइस साल बाद जब उनके कुछ सहयोगियों ने उनके आदर्शों के प्रचार के लिए एक संगठन बनाया तो उन्होंने उसको चेतावनी दी, ‘‘गांधीवाद जैसी कोई वस्तु नहीं है, और मैं अपने पीछे कोई पंथ छोड़कर नहीं जाना चाहता। मैं किसी नए सिद्धांत या मत के प्रतिपादन का दावा नहीं करता। मैंने तो केवल अपने ढ़ग से हमारे दैनिक जीवन और समस्याओं पर शाश्वत सत्य के व्यवहार का प्रयास किया है...जो मत मैंने बनाए हैं और जो निष्कर्ष मैंने निकाले हैं वे किसी भी प्रकार अंतिम सत्य नहीं हैं। अगर मुझे कल कोई बेहतर मत या निष्कर्ष मिल जाए तो मैं उनको बदल भी सकता हूँ। दुनिया को सिखाने के लिए मेरे पास कुछ भी नया नहीं है। सत्य और अहिंसा उतने ही प्राचीन है जितनी पहाड़ियां हैं। मैंने तो केवल यही प्रयास किया है कि जितने बड़े पैमाने पर और जितने अच्छे ढ़ग से संभव हो, दोनों के प्रयोग करूं। ऐसा करते हुए मैंने कभी कभी गलतियाँ की हैं और अपनी गलतियों से सीखा है...

‘‘ख़ैर मेरा अपना दर्शन, अगर उसे दर्शन जैसे दिखावे भरे नाम से पुकारा जा सके तो, उसमें है जो कुछ मैंने अभी अभी कहा है। आप इसे गाँधीवाद न कहें क्योंकि इसमें वाद जैसी कोई बात नहीं है। और इसकी व्याख्या के लिए किसी लंबे-चौड़े साहित्य या प्रचार की आवश्यकता नहीं है। मेरी मान्यताओं के खिलाफ धर्मग्रंथों के उद्धरण दिए गए हैं, लेकिन इससे मेरा विश्वास पहले से भी अधिक पुष्ट हुआ है कि किसी भी अन्य वस्तु के बदले सत्य का बलिदान नहीं किया जाना चाहिए। जो लोग मेरी बतलाई साधारण सच्चाइयों में विश्वास रखते हैं वे उसका  प्रचार केवल उनके अनुसार जीवन बिताकर कर सकते हैं।’’

गांधी जी ने सत्य को छोड़ ईश्वर का कोई और लक्षण नहीं बतलाया, और उसको पाने के लिए कोई कर्मकांड नहीं सुझाया सिवाय इसके कि ऐसे उपायों से उसकी ईमानदारी से और अनथक खोज की जाए जो किसी भी जीव को हानि नहीं पहुंचाते। इसलिए कौन है जो गांधी जी को सबको बतलाने की बजाय केवल अपना बतलाने का दावा कर सकता है ?
इससे कुछ कम सार्वभौम महत्व इस तथ्य का नहीं है कि गांधी जी जो कुछ बने उसी रूप में पैदा-नहीं हुए थे, और हालांकि उन्होंने खुद को अद्वितीय बनाया मगर अपने आरंभिक जीवन में उन्होंने किसी ऐसी असाधारण शक्ति का परिचय नहीं दिया जो उनकी आयु के दूसरे लड़कों में न हो। उनके कुछ उल्लेखनीय समकालीनों के विपरीत उन्होंने किसी ऐसी कला-भावना से प्रेरणा नहीं पाई जैसी रवींद्रनाथ पर छा गई थी; वे राम कृष्ण की तरह किसी आध्यात्मिक दृष्टि से पीड़ित नहीं थे और न ही विवेकानंद की तरह किसी घोर उत्साह से संचालित थे। वे हममें से अधिकांश की तरह एक सामान्य कोटि के बालक थे, अधिकांश बालकों की अपेक्षा कम उच्छृंखल थे और ऐसी असामान्य लज्जा-भावना से ग्रस्त थे जो एक लंबे समय तक उनके जीवन की बाधा बनी रही।

वे दब्बू और संकोची थे, देखने में घरेलू किस्म के लगते थे, अध्ययन में औसत दर्जे के थे और आमतौर पर किसी भी प्रकार से विशिष्ट नहीं थे। बचपन या युवावस्था में उनके शारीरिक गठन या मानसिक क्षमता में ऐसा कुछ भी नहीं था जो उनके अंदर सोए पड़े ज्वालामुखी का संकेत दे। इस शांत सतह से कोई दबी दबी आवाज भी नहीं सुनाई देती थी, कोई चमक या धुआं उठते कभी नहीं देखा गया कि उनके व्यक्तित्व के अंदर जो सुलगती तलवार गढ़ी जा रही थी उसका कोई हल्का-सा सुराग भी मिले।

यह सब ऐसे ही था गोया प्रकृति जिस दुर्लभ शस्त्र को चुपके चुपके गढ़ रही थी और जिसे वह बुरी नजर वालों से बचाने के लिए चिंतित थी उसे उसने ऐसी म्यान में छिपा रखा था जो इतनी साधारण किस्म की थी कि किसी कि नजर उस पर नहीं जाती थी यहाँ तक कि खुद म्यान को उस आग का कोई सुराग नहीं था जो उसके अंदर सुलग रही थी; उस भविष्य का कोई अहसास नहीं था जो आगे आने वाला था गोया किसी शिकार पर झपटने का इंतजार कर रहा हो। देखने में मामूली लगने वाले इस बालक में प्रतिभा की कोई चेतना नहीं थी; बल्कि उसकी कोई धुंधली सी हलचल भी नहीं दिखाई देती थी; एक घटनाविहीन बचपन की शांत सतह को किसी भी उच्छृंखल उत्तेजना ने नहीं झकझोरा; कभी किसी उत्कट लालसा ने अवचेतन की गहराइयों से निकलकर बाहर की दुनिया नहीं देखी।

परमानंदमय अबोध के सौभाग्य से परिपूर्ण इस बालक को समय से पहले पड़ने वाले उन तनावों का सामना नहीं करना पड़ा जो अनेक प्रतिभाशाली व्यक्तियों और पैगंबरों का निर्माण, और उनका विध्वंस भी, करते रहे हैं। उसे इन तनावों का सामना करना पड़ा तो तभी जब उसका मस्तिष्क परिपक्व हो चुका था, और जब आंतरिक विस्फोट हुआ तो वह बहादुरी और धीरज के साथ, अडिग रहकर, घमंड से चूर हुए बिना और किसी से झगड़ा मोल लिए बिना उसके दबाव को झेलने की क्षमता पा चुका था।

यह सही है कि इस छोटे से स्कूली लड़के में माता-पिता के प्रति भक्ति की, कर्तव्य के प्रति समर्पण की और असत्य से विपासा की एक स्पष्ट भावना देखी जा सकती थी। लेकिन जिस सामाजिक परिवेश में उसका लालन-पालन हुआ था उसमें ये गुण कोई बहुत असाधारण भी नहीं थे। जो कुछ सचमुच असाधारण था वह आत्मा में इतने गहरे छिपा हुआ था कि उस उम्र में शायद ही उसका कोई चिन्ह दिखाई देता था।

इसलिए हम इस ज्ञान से प्रेरणा और साहस भी पा सकते हैं कि ऐसा एक मामूली-सा लड़का आगे चलकर जो कुछ बना वह अपनी इच्छाशक्ति के अनथक व्यवहार से बना, और इसका कोई स्पष्ट कारण नहीं कि दूसरे भी वैसा करने में सफल न हों। एक ऐसा दब्बू लड़का जो अंधेरे में सोने नहीं जाता था- ‘‘मैं एक दिशा से भूतों के, दूसरी दिशा से चोरों के और तीसरी दिशा से किसी सांप के आने की कल्पनाएं करता रहता था’’-अगर ऐसा लड़का एक निर्भीकतम मनुष्य बन सकता था तो फिर तो सबके लिए आशा के द्वार खुले हुए हैं।

अगर प्रतिभा शब्द का प्रयोग करना ही हो तो हम कहेंगे कि गाँधी जी की प्रतिभा इसमें थी कि वे निरंतर, भयभीत हुए बिना और थके बिना, कष्ट उठाकर भी एक कभी न थमनेवाली नैतिक प्रेरणा का पालन करते रहते थे। युवावस्था की दहलीज लांघने के बाद उनका पूरा जीवन एक क्षण विश्राम किए बिना भी सत्य की खोज का एक लंबा अभियान था- ऐसे सत्य का जो ‘अनादि और अनंत’ था, जो अमूर्त या तत्वमीमांसी सत्य नहीं बल्कि ऐसा सत्य था जिसे मानव-संबंधों में ही साकार किया जा सकता था। वे एक-एक कदम आगे बढ़े और कोई कदम दूसरे मनुष्यों के कदमों से बड़ा नहीं था, और फिर हमने उन्हें ऐसी ऊंचाई पर देखा जहाँ वे महामानव दिखाई देते थे। अल्बर्ट आंइस्टाइन जो खुद अपने युग के एक महामानव थे, लिखते हैं ‘‘संभव है आगे आनेवाली पीढ़ियां शायद ही यह विश्वास कर सकें कि इस प्रकार का हाड़-मांस का मनुष्य भी कभी कभी इस धरती पर विचरण करता था।’’ अगर गाँधी जी आखिर में किसी भी दूसरे इंसान से भिन्न दिखाई देते थे तो हम यह भी याद रखें कि आरंभ में वे भी किसी भी दूसरे इंसान जैसे ही थे।

उनके जीवन और उनकी शिक्षा का अद्वितीय सौंदर्य इसी में निहित है। सौभाग्य से जब वह पूरी तरह सार्वजनिक जीवन में आए तब उनके जीवन में कुछ भी गुप्त नहीं रहा; उसके पहले की मुख्य घटनाओं को उन्होंने खुद दर्ज कर दिया है। उन्होंने बहुत विस्तार से और बिना किसी संकोच के अपनी नैतिक और राजनीतिक चेतना के विकाश का वर्णन किया है। अगर वे ऐसा नहीं करते तो हमारे इस सहज-विश्वासी देश में ऐसे भक्त कथावाचकों की कमी नहीं है जो उसके जन्म की पूर्व सूचना देने वाले रहस्यपूर्ण संकेतों का आविष्कार करते और जब वे अभी माँ के गर्भ में थे, उनके चारों ओर एक दैवी प्रभामंडल खींच देते। गुरुदेव ने कितनी सही बात कही थी कि –
आपकी भाषा आसान है स्वामी,
पर उनकी नहीं जो आपकी बातें करते हैं।

गांधी जी क्या एक राजनीतिज्ञ थे या एक संत थे ? क्या वे राजनीतिज्ञों में संत थे या संतों में राजनीतिज्ञ थे ? क्या व्यक्ति दोनों हो सकता है ? क्या वे राजनीति को आध्यात्मिक रूप देने में सफल रहे, जैसा कि उनके अनेक प्रशंसकों का दावा है ? क्या उनको राष्ट्रपिता कहने वाला राष्ट्र इस दावे की पुष्टि करता है ? ये ऐसे प्रश्न हैं जिन्हें आनेवाली पीढ़ियां भी पूछती रहेंगी।
इसी बीच हम कुल इतना कह सकते हैं कि वे जो कुछ भी रहे हों, अपने युग के किसी भी अन्य मनुष्य से भिन्न थे। गांधी जी की मृत्यु के दस साल पहले गुरूदेव ने लिखा था, ‘‘शायद वे सफल न हों; मनुष्य को उसकी दुष्टता से मुक्त कराने में शायद वे उसी तरह असफल रहे जैसे बुद्ध रहे, जैसे ईसा रहे। मगर उनको हमेशा ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जाएगा जिसने अपना जीवन आगे आनेवाले सभी युगों के लिए एक शिक्षा समान बना दिया है।

जन्म और लालन-पालन


मोहनदास करमचंद गाधी का जन्म 2 अक्तूबर 1860 को पोरबंदर में हुआ था। यह छोटा सा नगर भारत के पश्चिमी तट पर स्थित था और काठियावाड़ के अनेक रजवाड़ों में एक था। इसी को आज गुजरात का सौराष्ट्र क्षेत्र कहा जाता है। तीस हजार वर्गमील से कम क्षेत्रफल वाला यह लगभग आयताकार प्रायद्वीप पश्चिम में अरब सागर में घुसा हुआ है, ऊपर कच्छ की खाड़ी और नीचे कैंबे की खाड़ी से घिरा हुआ है, और उसके उत्तर में रेगिस्तान स्थित है।

यह क्षेत्र जो अभी हाल तक राजनीतिक दृष्टि से भारत के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में एक था, सदियों तक अनेक हमलावर गिरोहों की रणभूमि रहा। यहाँ तीन सौ से अधिक छोटी-छोटी रियासतें मौजूद थीं जिनमें से कुछ तो एक गांव से बड़ी नहीं थीं और कोई भी एक औसत आकार के जिले से बड़ी नहीं थी; जिसे तब ब्रिटिश भारत कहा जाता था। इनके शासक जिनको राणा या ठाकुर या नवाब कहा जाता था, छोटे-छोटे तानाशाह थे। वे एक दूसरे से जलते थे और आपस में भिडने के लिए बेचैन थे, लेकिन उनके साझे अधिराज अर्थात ब्रिटिश रेजिडेंट का भय उनको काबू में रखता था।

गहरी असुरक्षा, षड्यंत्रों और मनमाने न्याय के इस सामंती वातावरण में बहादुर मुजरिमों की चाँदी रहती थी। उनके कुछ कारनामें दंतकथाओं के रूप ले चुके हैं और अभी भी चारण-गीतों या लोककथाओं में याद किए जाते हैं। उथलपुथल भरे नागरिक जीवन के अनिश्चित वातावरण में पले-बड़े ये लोग हट्टे-कट्टे और स्वस्थ होते थे जिनकी समुद्रयात्रा और व्यापारिक उद्यमशीलता की एक परम्परा थी। वे भक्त और अंधविश्वासी होते थे जैसा कि इस प्रकार के वातावरण में रहनेवाले आमतौर पर होते हैं। इसका एक और कारण द्वारिका नगरी थी। पश्चिमी तट पर स्थित, हिन्दुओं की यह तीर्थस्थली उस राज्य की लोकप्रसिद्ध राजधानी थी जिस पर भगवद्गीता के उपदेशक श्रीकृष्ण ने शासन किया था। हिंन्दुत्व की इस वैष्णव परंपरा में जैन धर्म तथा आगे चलकर मुस्लिम सूफीवाद के प्रभाव ने अपने धार्मिक रंग जोड़े थे। रूढ़िवाद और सहिष्णुता, उदासीनता और करूणा, भोग और त्याग का एक विशेष प्रकार का भारतीय मिश्रण इसका परिणाम था।

ऐसा था वह सामाजिक परिवेश जिसमें एक मध्यवर्गीय वैश्य परिवार में मोहन का जन्म हुआ था कहते हैं उनके पूर्वज मूल रूप से बितासी थे मगर परिवार की सामाजिक स्थित निरंतर बढ़ती रही। फिर मोहन के दादा उत्तमचंद पोरबंदर के राणा के दीवान या प्रधानमंत्री बने। एक सच्चरित्र, ईमानदार और निर्भीक व्यक्ति होने के कारण उन्हें कष्ट भी उठाने पड़े और शासक की मृत्यु के बाद उनको राज-रानी के कोप का भाजन बनना पड़ा। सुरक्षा के लिए वे भागकर पड़ोसी जूनागढ़ राज्य में चले गए जहाँ के मुसलमान नवाब ने उन्हें शरण दी।

जब वे नवाब के सामने उपस्थित हुए तो उन्होंने उसे बाएँ हाथ से सलाम किया और इस धृष्टता का कारण यह बतलाया कि उनका दायां हाथ तो अभी भी पोरबंदर के प्रति निष्ठावान था। लगभग बीसवीं सदी तक उस पिछड़े इलाके में बाकी बचे सामंती युग में निष्ठाएं संकीर्ण होती थीं और उनके नियम बड़े कठोर होते थे। नवाब बहुत उदार था और उसने इस साहसपूर्ण उत्तर की प्रशंसा करते हुए न केवल उनको नाममात्र का दंड देकर छोड़ दिया बल्कि इस बहादुर शरणार्थी पर एक विशेष कृपा भी की। बाद में जब पोरबंदर में एक नए राणा ने शासन संभाला तो नवाब ने अपने प्रभाव का उपयोग करके उनको वापस पोरबंदर भिजवा दिया।

उत्तमचंद के बाद फिर उनके बेटे करमचंद गांधी पोरबंदर के दीवान बने। अपने पिता की तरह उन्होंने भी मामूली औपचारिक शिक्षा पाई थी। लेकिन वे सत्यप्रिय थे, साहसी थे, दृढ़ चरित्र के व्यक्ति थे और व्यावहारिक सहजबुद्धि से लैस थे, उनके अनेक सद्गुणों को याद करते हुए उनके और भी सत्यवान और योगी- प्रकृति बेटे ने आगे चलकर लिखा, ‘‘एक सीमा तक वे विषय-वासना के प्रेमी भी रहे होगें क्योंकि उन्होंने चौथी वार विवाह तब किया जब वे चालीस से ऊपर थे।’’ उनका ऐसा करना सौभाग्य का कारण था क्योंकि महात्मा का जन्म उसी चौथी पत्नी पुतलीबाई के गर्भ से हुआ। उनका नाम मोहन रखा गया मगर उनकी माता उनको स्नेह से मुनिया कहती थीं।

वे अत्यंत धार्मिक, सज्जन और निष्ठावान प्रकृति की महिला थीं, और व्रत या पूजा-पाठ के निर्धारित कर्मकांडों के पालन में कोई ढील नहीं देती थीं। उन्होंने अपने  बेटे के मन पर एक गहरी छाप छोड़ी जो उनको लगभग पूजता था। बरसों बाद पुणे की यरवदा जेल में गांधी जी ने अपने मित्र और सचिव महादेव देसाई से कहा था, ‘‘तुम्हें मेरे अंदर जो भी शुद्धता दिखाई देती हो वह मैंने अपने पिता से नहीं, अपनी माता से पाई है...उन्होंने मेरे मन पर जो एकमात्र प्रभाव छोड़ा वह साधुता का प्रभाव था।’’

मोहन को पोरबंदर के एक प्रारंभिक विद्यालय में भेजा गया जहां उन्हें पहाड़े याद रखना कठिन लगता था, ‘‘मेरी बुद्धि मोटी और याददाश्त कच्ची रही होगी।’’ जल्द ही उनका परिवार राजकोट चला गया जो काठियावाड़ की एक और छोटी-सी रियासत था। यहाँ भी उनके पिता को दीवान का पद मिला। राजकोट में मोहन एक प्राथमिक पाठशाला में और फिर एक हाईस्कूल में भेजे गए। वे परिश्रमी अवश्य थे, मगर एक ‘औसत दर्जे के छात्र’ अत्यंत शरमीले और दब्बू स्वभाव के थे, किसी के साथ से घबराते थे और खेलकूद से दूर रहते थे। उनके अन्यथा नीरस विद्यालय-जीवन की केवल एक घटना को महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। उनकी नैतिक भावना का संकेत देती है। यह घटना तब घटी जब विद्यालय निरीक्षक उसकी कक्षा में और वर्तनी (स्पेलिंग) की परीक्षा ली। उसके कक्षाध्यापक ने जब देखा कि मोहन ने ‘केटिल’(Kettle) शब्द की वर्तनी गलत लिखी है तो उन्होंने पांव के अंगूठे से मोहन को इशारा किया कि वे पास के लड़के की स्लेट से सही वर्तनी नकल कर लें। लेकिन मोहन ने रुखाई से इस संकेत की उपेक्षा की और बाद में अपनी ‘मूर्खता’ के लिए लताड़े भी गए। महात्मा ने आगे लिखा, ‘‘मैं कभी नकल की कला सीख ही नहीं सका।’’     



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