बर्नियर की भारत यात्रा - गंगा प्रसाद गुप्त Bernier Ki Bharat Yatra - Hindi book by - Ganga Prasad Gupt
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बर्नियर की भारत यात्रा

गंगा प्रसाद गुप्त

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :196
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4601
आईएसबीएन :81-237-3497-2

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विदेशियों में एक नाम बर्नियर का भी आता है जिन्होंने भारत की यात्रा के दौरान प्राप्त हुए अपने अनुभवों को इस पुस्तक के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास किया है

Burniar Ki Bharat Yatra

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सदियों से भारत का आकर्षण विदेशियों को लुभाता रहा है और यही कारण है कि विश्व के हर कोने से यात्री यहां भ्रमण को आते हैं। यहां आने वाले बहुत-से विदेशी यात्रियों ने एक इतिहासकार की दृष्टि से भारत को देखा और यहाँ के तत्कालीन शासक, शासन व्यवस्था, सांस्कृतिक, धार्मिक रीति-रिवाज, आर्थिक व सामाजिक स्थिति आदि का वर्णन किया। सत्रहवीं सदी में फ्रांस से भारत आए फैंव्किस बर्नियर ऐसे ही विदेशी यात्री थे। उस समय भारत पर मुगलों का शासन था। मुगल बादशाह, शाहजहां उस समय अपने जीवन के अन्तिम चरण में थे और उनके चारों पुत्र भावी बादशाह होने के मंसूबे बाँधने और उसके लिए उद्योग करने में जुटे हुए थे। बर्नियर ने मुगल राज्य में आठ वर्षों तक नौकरी की। उस समय के युद्ध की कई प्रधान घटनाएं बर्नियर ने स्वयं देखी थीं।

प्रस्तुत पुस्तक में बर्नियर द्वारा लिखित यात्रा का वृत्तांत उस काल के भारत की छवि हमारे समक्ष उजागर करता है। यूं तो हमारे इतिहासकारों ने उस काल के विषय में बहुत कुछ लिखा है, लेकिन एक विदेशी की नजर से भारत को देखने, जानने का रोमांच कुछ अलग ही है।

बर्नियर की भारत यात्रा

दुनिया की सैर करने की इच्छा से मैं पलेप्टाइन और ईजिप्ट गया, फिर वहाँ से भी आगे बढ़ने की मेरे मन में अभिलाषा हुई। लाल समुद्र को एक सिरे से दूसरे सिरे तक देखने का विचार होते ही मैं ईजिप्ट की राजधानी कैरो से, जहां एक वर्ष से कुछ अधिक काल तक मैं ठहरा था, चल पड़ा-और कारवां की चाल से बत्तीस घंटे में स्वेज नगर में आ पहुंचा। यहां से मैं एक जहाज पर सवार हुआ। जहाज किनारे किनारे चल रहा था। 17 दिन के बाद मैं जद्दे पहुंचा। जद्दे से मक्का पहुंचने में दो किनारे चल रहा था। 17 दिन के बाद मैं जद्दे पहुंचा। जद्दे से मक्का पहुंचने में दो पहर लगते हैं। यहां पहुंचना मेरी आशा के विरुद्ध था और उस प्रतिज्ञा के भी विरुद्ध जो मुझे लाल समुद्र के तुर्की अधिकारी की ओर से दी गई थी। अतएव लाचार होकर मुझे मुसलमानों की उस पवित्र भूमि पर जहाज से उतरना पड़ा जहां कोई ईसाई जब तक कि वह गुलाम न हो पांव रखने का साहस नहीं कर सकता।

यहां कोई पांच सप्ताह ठहर कर मैं एक छोटे जहाज पर सवार हुआ जिसने अरेबिया फेलिक्स के किनारे किनारे चलकर पंद्रह दिन में मुझे बाबुल मंदब की समुद्री धूनी के पास वाले मुखा नामक बंदर पर पहुंचा दिया। यहां पहुंच कर मेरा यह इरादा हुआ कि मसोआ और आर्कि के टापुओं को देखता हुआ हब्शियों की राजधानी अथवा इथोयोपिया राज्य की मुख्य नगर गोंडर को जाऊं, परंतु इनमें मुझे यह समाचार मिला कि राज माताके कपट प्रबंध के कारण जिस दिन से गोवा से जासूस पादरी को अपने साथ लाने वाले पाचुगीज लोग मारे गए अथवा देश से बाहर कर दिए गए उस दिन से रोमन केथलिक वालों का वहां उतरना सुरक्षा की बात नहीं है। और वास्तव में कुछ समय पूर्व इस राज्य में प्रवेश करने का प्रयत्न करने के अपराध में एक अभागे कृस्तान साधु का सवाकीने में वध भी किया गया था।

मैंने सोचा कि यदि मैं आर्मिनियन अथवा ग्रीक जैसा भेष बनाकर चलूंगा तो भय कम रहेगा औरसंभव है किबादशाह मेरी योग्यता और कानों को देखकरमुझे कुछ जमीन दे देगा जिसे यदि मैं उन्हें खरीद सकूंगा तो गुलाम जोते बोएंगे। परंतु साथ ही यह खटका हुआ कि इस वेष में मुझे वहां विवाह भी अवश्य ही कर लेना पड़ेगा, जैसे कि एक योरपीय संन्यासी को जिसने अपने को ग्रीक के बादशाह का वैद्य प्रसिद्ध किया था ऐसा करने के लिए विवश होने पड़ा था। और फिर इस अवस्था में मुझे इस देश के छोड़ने की आशा एक बार ही परित्याग करनी पड़ेगी।

मुगल वंश


इस तथा अन्य कई कारणों से जिनका हाल मैं आगे चलकर कहूंगा, मैंने गोंडर जाने का विचार परित्याग किया और एक जहाज की सवारी ली जो हिंदुस्तान को जाता था और बाईस दिन में बाबुल मंदब की समुद्री धूनी के मार्ग से सूरत में जो मुगल राज्य भारतवर्ष की बंदरगाह है आ पहुंचा। यहां पहुंचकर मुझे मालूम हुआ कि वर्तमान बादशाह का नाम शाहजहां है, जो जहांगीर का पुत्र और अकबर का पौत्र है। अकबर का पिता हुमायूं था। शाहजहां के पूर्व पुरुषों की वंशावली देखने से मालूम होता है कि वह तैमूर की दसवीं पीढ़ी में उत्पन्न हुआ ! तैमूर ने जिसके पराक्रम और विजय की बात सारे जगत में विख्यात है अपनी एक संबंधिनी स्त्री अर्थात् उस बादशाह की इकलौती पुत्री से अपना विवाह किया था जो उस समय तातारियों की मुगल नाम प्रसिद्ध जाति पर राज्य करता था। परंतु अब मुगल शब्द उन सब अन्य देश के निवासियों के लिए बोला जाता है जो वर्तमान समय में भारतवर्ष के राजकीय आसन पर विराजमान हैं। इससे यह न समझ लेना चाहिए कि भरोसे और मान मर्तबे के पद अथवा सेना के बड़े-बड़े ओहदे केवल मुगलों ही को दिए जाते हैं। परदेशियों में ईरानी, तुर्क और अरब हैं, उनको भी अच्छे-अच्छे पद प्राप्त होते हैं। जिन लोगों को आजकल यहाँ मुगल कहा जाता है उनको पहचानने के लिए इतना संकेत बहुत है कि उनका रंग गोरा होता है और वे मुसलमानी धर्म को मानते हैं। यूरोप के ईसाइयों की पहचान जिनको यहां फिरंगी कहते हैं यह है कि उनका रंग सफेद होता है और मत खष्टीय। और हिंदू यह देखकर पहचाने जा सकते हैं कि रंग उनका गेहुंआ और धर्म मूर्ति पूजा होता है।

मैंने सूरत में आकर यह भी मालूम किया कि शाहजहां की उमर इस समय सत्तर वर्ष के लगभग है और उसके चार पुत्र तथा दो पुत्रियां हैं और कई वर्ष हुए उसने अपने चारों पुत्रों को भारतवर्ष के बड़े बड़े चार प्रदेशों का जिनको राज्य का एक एक भाग कहना चाहिए संपूर्ण अधिकार प्रदान कर दिया है। मुझे यह भी विदित हुआ है कि एक वर्ष से कुछ अधिक काल से बादशाह ऐसा बीमार है कि उसके जीवन में भी संदेह है और उसकी ऐसी अवस्था देखकर शाहजादों ने राज्य-प्राप्ति के लिए मंसूबे बांधने और उद्योग करने आरंभ कर दिए हैं। अंत में भाइयों में लड़ाई छिड़ी और वह पांच वर्ष तक चली।

इस युद्ध की कई प्रधान घटनाएं मैंने स्वयं देखी हैं, उनका इस ग्रंथ में वर्णन करने का मैं यत्न करूंगा। राज्य के बड़े बड़े नगर आगरा और देहली हैं। वहां जाते समय रास्ते में लुटेरों के द्वारा लूटे जाने तथा सात सप्ताह की यात्रा के खर्च के कारण मैं तंगी में आ गया। इससे मुगल राज्य में मुझे नौकरी करनी पड़ी और आठ वर्ष तक मुगलों से मेरा संसर्ग रहा। पहले मैं राज्य का हकीम नियत हुआ परंतु थोड़े ही दिनों में भाग्यवशान दानिशमंदखां नामक एशिया खंड के एक श्रेष्ठ विद्वान का मुझे आश्रय मिला जो पहले मीरबख्शी अथवा घोड़ों के सरादर के पद पर नियुक्त था परंतु इस समय मुगल दरबार का सबसे शक्ति संपन्न और प्रतिष्ठित उमरा हो गया था।

शाहजहां के बड़े बेटे का नाम दारा शिकोह, दूसरे का सुलतान शुजा, तीसरे का औरंगजेब चौथे का मुरादबख्श, और दोनों पुत्रियों में बड़ी का नाम बेगम साहब, और छोटी का रोशनआरा बेगम है।
इस देश में राजकुटुंब के लोगों का ऐसा ही नाम रखने की रीति है जो राज्य का बड़प्पन प्रगट करे। इसलिए शाहजहां की बेगम का नाम जो अपनी सुंदरता के लिए जगत प्रसिद्ध थी ताजमहल था। ताजमहल की दर्शनीय समाधि के सामने जो आगरे में है ईजिप्ट व मिस्र देश के बड़े बड़े पिरामिड जो संसार के सात अद्भुत स्थानों में समझे जाते हैं, अनगढ़ पत्थरों के ढेर और बेढंगे पथरीले ढोकों के समान मालूम होते हैं, वैसे ही जहांगीर की बेगम का नाम पहले नूरमहल था पश्चात नूरजहां बेगम हुआ। इसने बहुत दिनों तक अपने पति की उस अवस्था में जब कि वह सब काम काज छोड़कर मद्यपान और विलासिता में लिप्त हो गया था राज्य को स्वयं संभाल लिया था।

भारतवर्ष में जो ये बड़े बड़े और प्रतिष्ठित नाम राजकुटुंब के लोगों और उमरा के रखे जाते हैं और यूरोप की भांति स्थान अथवा राज्य अधिकार का परिचय देने वाले नाम नहीं रखे जाते इसका कारण यह है कि यहां सब जमीन बादशाही समझी जाती है। अतएव यूरोप की तरह यहां कोई अर्ल मार्क्विस अथवा ड्यूक नहीं हो सकता क्योंकि दरबारियों को जो कुछ भूमि आदि दी जाती है वह केवल पेंशन की भांति और उनके निर्वाहग के लिए, और जो कुछ उनको दिया जाता है उसको बढ़ाना या उसे वापिस कर लेना बादशाह की इच्छा पर निर्भर रहता है। अतएव यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि राज्य के उमरा ऐसी प्रतिष्ठित पदावयों से भूषित किए जाते हैं, जैसे कोई राजंदाजखां, कोई सर्फकुनखां, कोई बरकंदाजखां, कोई दियानतखां या दानिशमंदखां, या फाजिलखां इत्यादि।


दारा शिकोह



दारा में अच्छे गुणों की कमी नहीं थी। वह मितभाषी, हाजिर जवाब, नम्र और अत्यंत उदार पुरुष था। परंतु अपने को वह बहुत बुद्धिमान और समझदार समझता था और उसको इस बात का घमंड था कि अपने बुद्धिबल और प्रयत्न से वह हर काम का प्रबंध कर सकता है। वह यह भी समझता था कि जगत में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो उसको किसी बात की शिक्षा दे सके। जो लोग डरते डरते उसे कुछ सलाह देने का साहस कर बैठते, उनके साथ वह बहुत बुरा बरताव करता। इस कारण उसके सच्चे शुभचिंतक भी उसके भाइयों के यत्नों और चालों से उसे सूचित न कर सके। वह डराने और धमकाने में बड़ा निपुण था यहां तक कि बड़े बड़े उमरा को बुरा भला कहने और उनके अपमान कर डालने में भी वह संकोच न करता था परंतु सौभाग्य की बात यह थी कि उसका क्रोध शीघ्र ही शांत हो जाता था।

दारा का जन्म मुसलमान जाति में हुआ था। इसलिए वह इस रीति-नीति के अनुसार चलता और लोगों पर ऐसा प्रकट करता कि जैसे उसकी धर्म पर बहुत आस्था है, परंतु वास्तव में हिंदुओं के साथ वह हिंदू बन जाता और ईसाइयों के साथ ईसाई। बहुत से हिंदू पंडित सदा उसे घेरे रहते और पुरस्कारों में उससे बहुत धन पाते। ऐसा भी कहा जाता है कि इन्हीं लोगों की संगति के कारण मुसलमानी धर्म के प्रति उसका विश्वास कम हो गया था। इस संबंध में आगे चलकर हिंदुओं के धर्म के विषय में लिखते समय मैं कुछ विस्तार के साथ लिखूंगा। कुछ काल तक उसने बुजी नामक एक पादरी की शिक्षा भी बड़े ध्यान से सुनी थी और उस शिक्षा की सत्यता पर उसे कुछ कुछ विश्वास भी उत्पन्न होने लगा था।

इतना होने पर भी लोग ऐसा कहते हैं कि असल में दारा नास्तिक था और यह दिखाऊ बातें केवल कौतुक और मनोविनोद के लिए थीं। कुछ लोगों को यह भी कथन है कि वह जो कभी ईसाईपन दिखाता उसका यह कारण है कि ईसाई लोग जो उसके तोपखाने पर नौकर थे और जिनकी संख्या बहुत थी उसे चाहें, और हिंदूपन प्रकट करने से उसका यह अभिप्राय था कि जिसमें राज्य के प्रतिष्ठित राजाओं और सरदारों की वह प्रीति संपादन कर सके, कि काम पड़ने पर दोनों जाति के लोग उसकी सहायता करें। परंतु इन दो तीन धर्मों के बीच में पड़कर वह न केवल अपनी युक्तियों में विफल ही हुआ बल्कि अंत में उसे अपने प्राणों से भी हाथ धोने पड़े। इस इतिहास में आगे चलकर पाठकों को मालूम होगा कि औरंगजेब ने उसे काफिर अथवा धर्मद्रोही और धर्मरहित कहकर ही उसके प्राण लिए।


सुतलान सुजा



शाहजहां का दूसरा पुत्र सुलतान शुजा बहुत सी बातों में अपने बड़े भाई दारा से मिलता जुलता था, परंतु उसकी अपेक्षा यह अधिक विनयी और दृढ़ विचार का मनुष्य था। सामान्य चरित्र और बोलचाल में भी यह दारा से बढ़कर था। किसी प्रकार का कपट प्रबंध भी यह बड़ी दक्षता से कर लेता था। गुप्त रूप से धन देकर बहुत से रईसों उमरा और (जोधपुर-नरेश) महाराज यशवंतसिंह जैसे बड़े बड़े प्रतिष्ठित राजाओं को अपना मित्र बना लेना भी खूब जानता था। परंतु इतने गुण होने पर भी शुजा के उस आनंद और विलास रस में जिस समय सुंदरियों के जमघट में वह बैठता उस समय नाच-रंग, गान-तान और मद्यपान में दिन दिन और रात रात भर बीत जाते। ऐसे समय उसका कोई मुसाहिब जो अपनी भलाई चाहता उससे कुछ कहने का साहस न करता। तरंग में आकर वह अपने प्रिय पात्रों को उत्तमोत्तम वस्त्रादि इनाम दे देता और अपने आश्रितों का वेतन भी घटा या बढ़ा देता। ऐसे रंगतान के दिन बीतने के कारण उसके प्रांत का राज्य संबंधी कारोबार बिगड़ने लगा और प्रजा की प्रीति उस पर से दिन पर दिन कम होती गई।

यद्यपि शुजा का पिता और उसके भाई तुर्कों के धर्म मानते (अर्थात् सुन्नी) थे, परंतु वह स्वयं ईरानियों के धर्म का अनुगामी (अथवा शिया) था। मुसलमानी धर्म में बहुत से भेद हैं जैसा कि पुस्तक गुलिस्तां- के रचयिता प्रसिद्ध शेखसादी के एक शेर के भावार्थ से जो आगे दिया जाता है जान पड़ेगा।

‘‘मैं एक घूमने फिरने वाला शराबी फकीर हूं मेरा कोई धर्म नहीं है, तो भी मैं बहत्तर जाति में गिना जाता हूं।’’
इन बहुत सी जातियों में दो मुख्य हैं और इन दोनों के लोग एक दूसरे के कट्टर शत्रु हैं। इनमें एक जाति तुर्कों की है जिनको ईरानी उसमान का अनुगामी बतलाते हैं। इस जाति के लोग उसमान को अपने पैगंबर मुहम्मद का सच्चा और योग्य प्रतिनिधि मानते हैं और कहते हैं कि खलीफा अथवा स्वतंत्र धर्माध्यक्ष और कुरान का अर्थ समझाने तथा धार्मिक वाद विवाद का समाधान करने वाला केवल वही था। दूसरी जाति ईरानियों की है जिनको तुर्क लोग राफजी वा शिया और अलीमर्दान अर्थात धर्मद्रोही और अली के धर्म को पक्षपाती कहते हैं। कारण यह कि ईरानियों को इस बात का विश्वास है कि उत्तराधिकारी और धर्मगुरु होने का स्वत्व केवल मुहम्मद के दामाद अली को ही था।

सुलतान शुजा ने जो शिया धर्म ग्रहण किया था इसमें उसकी चतुराई थी। शाहजहां बादशाह के दरबार में उस समय अधिकतर इसी धर्म के लोग बड़े-बड़े पदों के अधिकारी थे और दरबार में उनका बड़ा मान था। शुजा को आशा थी कि काम पड़ने पर इन लोगों से बहुत कुछ सहायता मिलेगी और लाभ पहुंचेगा।


औरंगजेब



तीसरा भाई औरंगजेब यद्यपि दारा के समान शिष्ट और उदार मन का नहीं था तो भी उसकी अपेक्षा अधिक दृढ़ विचार और ऐसे मनुष्यों को चुनने में अधिक चतुर था जो उसके कामों को भक्ति और योग्यता के साथ पूरा कर सकते। उसके इनाम आदि बांटने में यह विशेषता थी कि वह केवल उन्हीं लोगों को खूब इनाम देता जिनको प्रसन्न करना या प्रसन्न रखना उसके लिए अत्यंत आवश्यक होता है। वह अपने भेद को बहुत छिपा कर रखता, धूर्तता और कपटता उसमें कूट कूट कर भरी थी। जिस समय वह अपने पिता के दरबार में जाता उस समय जो भक्ति उसमें जरा भी न होती उसको भी दिखाने का प्रयत्न करता और सांसारिक सुख वैभव को धिक्कार बताता परंतु भीतर ही भीतर भविष्य में ऊंचा पद पाने का मार्ग तैयार करता जाता।

यहां तक कि जब उसे दक्षिण की सूबेदारी दी गई तब भी उसने बहुतों से यही कहा कि ‘‘अगर मुझे तर्क, दुनिया और दरवेशी की इजाजत मिल जाती तो मैं ज्यादा खुश होता क्योंकि मेरी दिली तमन्ना भी थी कि बाकी जिंदगी पारसाई और इबादत ही में सर्फ करता। अफकारे दुनियावी और उमूर सल्तनत की जिम्मेदारी में पड़ना मुझे नामरगूब और नापसंद है।’’ यद्यपि औरंगजेब का समस्त जीवन धूर्तता और कपटाचरण में ही बीता तथापि वह ऐसी बुद्धिमानी के साथ काम करता कि उसके भाई दारा शिकोह को छोड़ दरबार के सभी लोग उसकी चतुराई के समझने में धोखा खा जाते। शाहजहां बादशाह के औरंगजेब के विषय में ऊंचे विचार थे, इसमें दारा को ईर्ष्या होती और अपनी मित्र मंडली में बैठकर वह कभी कभी कहा करता कि ‘अपने सब भाइयों में मुझे सिर्फ एक ही का शुबहा और खौफ है। वह और किसी का नहीं इन्हीं हजरत दीनदार और नमाजी साहब का।’’


मुरादबख्श



शाहजहां का सबसे छोटा पुत्र मुरादबख्श विचार और विवाद में अपने तीनों भाइयों से उतर कर था। जिस तरह हो मौज करना ही उसका प्रधान उद्देश्य था और शिकार तथा भोजन के लक्ष्य में उसका अधिक समय बीतता था। तो भी वह उदार और सभ्य था। परंतु उसे इस बात का गर्व था कि वह कोई भेद की बात रखता ही नहीं छिपी सलाहों और छलबल से उसे घृणा थी और इस बात को वह लोगों पर प्रकाशित करना चाहता कि वह केवल तलवार और अपने भुजबल का भरोसा रखता है। वास्तव में मुराद साहसी था। यदि इस साहस और वीरता के साथ साथ उसमें चतुराई और बुद्धिमानी होती तो यथासंभव वह अवश्य अपने तीनों भाइयों से ऊपर हो जाता और निस्संदेह हिंदुस्तान की बादशाहत प्राप्त करता जैसा कि आगे चलकर मालूम होगा।


बड़ी शाहजादी बेगम साहब



बादशाह की बड़ी बेटी बेगम साहब अत्यंत रूपवती, प्रसन्न और अपने पिता की बहुत ही प्यारी थी। पिता का अपनी पुत्री के साथ ऐसा संबंध हो जाने की खबर थी कि जिस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। कहते हैं कि मुल्लाओं ने यह व्यवस्था दी थी कि बादशाह का उसी वृक्ष के फल का आनंद लेना जिसको उसने स्वयं लगाया है अनुचित और अन्याय नहीं है। शाहजहां को अपनी इस प्यारी पुत्री पर बेहद विश्वास था। यह भी अपने पिता की सुरक्षा का खूब ध्यान रखती और उसकी रक्षा करने में यहां तक सावधान रहती कि कोई भोजन जो स्वयं उसके सामने बना न होता वह बादशाह के लिए नहीं भेजा जाता। इसलिए बेगम साहब का शाहजहां से संबंध रखने वाली बातों में इतना अधिक अधिकार रहना और बादशाह के मिजाज की बागडोर उसके हाथ में होना तथा राज्य के बड़े और गंभीर विषयों में भी उसका पूरा दबाव माना जाता कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

बादशाह की ओर से मिलने वाली बंधी हुई वार्षिक रकम में से और अपने अधिकार में सौंपे हुए सहस्रों राजकीय कामों से तथा चारों ओर से आने वाली बहुमूल्य भेंटों से बेगम साहब ने बहुत धन इकट्ठा कर लिया था। दारा अपने कामों में सफलता प्राप्त करता, सुखी होता और बादशाह की उस पर अधिक प्रीति रहती, इसका यह कारण था कि बेगम साहब उसके कामों में बराबर भाग लेती, उसका हित चाहती और खुल्लमखुल्ला लोगों पर अपने को उसका पक्षपात करने वाली प्रकट करती। बेगम साहब की कृपा बढ़ाने का दारा भी निरंतर यत्न करता और यह भी कहा जाता है कि उसने उससे प्रतिज्ञा भी की थी कि जब मैं बादशाह हो जाऊंगा तब तुरंत तुझको शादी करने की अनुमति दे दूंगा। किंतु दारा की प्रतिज्ञा हिंदुस्तान के बादशाहों की नीति के विरुद्ध थी जिसके अनुसार शाहजादियों का विवाह बिल्कुल अनुचित माना गया है। इसका पहला कारण तो यह है कि कोई व्यक्ति राजकुटुंब का संबंधी होने के योग्य नहीं समझा जाता, दूसरा यह कि इस बात का खटका रहता है कि कहीं शाहजादी का पति किसी समय बलवान होकर राज्य लोभी न बन जाए और राज्य को अपने अधिकार में कर लेने का उद्योग न करने लग जाए।

बेगम साहब की प्रेम संबंधी दो बातें यहां पर लिखकर मैं आशा करता हूं कि इसके पढ़ने वाले मुझ पर किसी प्रकार का संदेह नहीं करेंगे। मैं जो कुछ लिखता हूं वह ऐतिहासिक है और हिंदुस्तान की रीति-नीति का पूरा पूरा विवरण लिखना मेरा मुख्य उद्देश्य है। प्रेम का जैसा भयंकर परिणाम एशिया में होता है वैसा यूरोप में नहीं होता। फ्रांस देश में ऐसी प्रेम घटनाओं को लोग हंसी और मनोविनोद का कारण समझते हैं और थोड़े दिनों में भूल जाते हैं। परंतु संसार के इस भाग अर्थात् हिंदुस्तान में कोई ही ऐसा अवसर आ पड़ता है जब ऐसी बातों का महाभयानक और दुखद परिमाण नहीं होता, नहीं तो बहुत बुरी दशा दिखाई पड़ती है।

शाहजादी बेगम साहब महल के अंदर रहती और दूसरी स्त्रियों की तरह उस पर भी पहरा रहता किंतु इतना होने पर भी कहते हैं कि किसी छिपी रीति से उसके पास एक नवयुवक का आना जाना आरंभ हो गया जो यद्यपि कोई ऊंचे दर्जे का मनुष्य नहीं था तथापि सुंदर बहुत था। परंतु ऐसी बातों का बेगम की सहेलियों और बांदियों से छिपा रहना संभव नहीं था। इस बात की खबर शाहजहां को लगी कि उसकी बड़ी बेटी छिपे किसी युवा पुरुष से मिलती है तब उसने धोखे और कुसमय में महल में जाकर इस बात की जांच करने का निश्चय किया। एक दिन बादशाह अकस्मात ऐसे समय महल चला गया और उसके आने की खबर इतने पीछे बेगम को मालूम हुई कि अपने प्रेमी के छिपाने का विचार करने तक का अवकाश उसे नहीं मिला। लाचार एक पानी गर्म करने की बहुत बड़ी देग जो रखी हुई थी उसी में उसने उस घबराए हुए प्रेमी को लिटा दिया। जिस समय बादशाह अंदर आया उस समय उसके चेहरे पर क्रोध और आश्चर्य का चिह्न नहीं था, बल्कि सदा की भांति आकर उसने बेगम से अपने प्रकार की बातें करना आरंभ किया। कुछ देर के बाद उसने कहा, ‘मालूम होता है तुमने आज हस्ब-मूम गुस्ल नहीं किया है। हम्माम गर्म करना चाहिए।’’ इतना कहकर ख्वाजासराओं को देग के नीचे आग जलाने की आज्ञा दी। फिर जब तक उसे इस बात का निश्चय नहीं हो गया कि वह व्यक्ति (अर्थात् शाहजादी का प्रेमी) जल कर प्राण रहित नहीं हो गया तब तक वह वहां से नहीं हटा।

कुछ दिन बाद शाहजादी एक दूसरे पुरुष के प्रेमजाल में उलझ गई और अंत में वह भी ऐसी ही शोकजनक दशा को प्राप्त हुआ। अब की बार उसने नजरखां नामक एक ईरानी नवयुवक को जो कि सुंदरता में प्रसिद्ध होने के अतिरिक्त सुयोग्य, बुद्धिमान, साहसी और वीर पुरुष था और जिसको दरबार के सब लोग बहुत मानते थे अपने खानसामा के पद के लिए पसंद किया। औरंगजेब का मामा साइस्तखां इसकी बहुत प्रशंसा करता यहां तक कि एक दिन भरे दरबार में उसने यह प्रस्ताव कर डाला कि, ‘‘यह ईरानी शख्स इस काबिल है कि बेगम साहब की शादी इससे कर दी जाए।’’ शाहजहां को यह बात बहुत बुरी मालूम हुई। उसे पहले ही से कुछ कुछ संदेह था कि नजरखां और शाहजादी में परम्पर कुछ अनुचित संबंध हो गया है। अब इस नवीन प्रस्ताव को सुनकर वह संदेह और भी पक्का हो गया फिर तो उसने उस नवयुवक को इस संसार से विदा करने के लिए कोई विशेष उपाय या सोच-विचार करने की आवश्यकता नहीं समझी वरन दरबारे आम में उसे बुलाकर कृपा दिखाने की रीति पर अपने हाथ से उसे पान का बीड़ा खाने को दिया।

पान लेने के समय युवक के मन में किसी प्रकार का खटका या संदेह नहीं हुआ क्योंकि इस राज्य में पान देना बड़े मान और प्रतिष्ठा की बात है। अतएव उसने बीड़ा लेकर मुंह में रख लिया। इस बात का उसे कुछ भी ध्यान नहीं था कि इस हंसमुख बादशाह ने धोखे से उसे विष दे दिया है। यह सोचकर कि अब बादशाह की कृपादृष्टि होने के कारण दिन पर दिन उन्नति होती जाएगी वह हर्षपूर्वक पालकी पर सवार होकर अपने घर की ओर चला परंतु विष का असर बहुत कड़ा होने के कारण अपने घर पहुंचने से पहले ही वह दूसरे घर पहुंच गया।


रोशनआरा बेगम



शाहजहां की छोटी बेटी रोशनआरा बेगम सुंदरता में अपनी बड़ी बहन से कम थी और बुद्धिमत्ता में भी कुछ ऐसी प्रसिद्ध नहीं थी। तो भी वह वैसे मौजवाली चंचला और विलासिनी थी। वह औरंगजेब का बहुत पक्ष करती और बेगम साहब तथा दारा से खुले आम ईर्ष्या रखती। कदाचित इसी कारण से वह बहुत धन इकट्ठा नहीं कर सकी और राज्य संबंधी कामों में भी उसका बहुत कम अधिकार रहा। परंतु फिर भी महल में रहने और धोखेबाजी तथा चतुराई में निपुण होने के कारण वह बराबर आवश्यक बातों की सूचना जासूसों के द्वारा औरंगजेब के पास पहुंचाती रहती।

भाइयों का राजलोभ- लड़ाई में कई पहले शाहजहां का चित्त अपने उपद्रवी स्वभाव के पुत्रों से दुखित और भयभीत हो गया था। यद्यपि उसके चारों पुत्र ब्याहे हुए और बालिग थे तो भी वे आपस में बंधुभाव नहीं रखते थे वरन राज्य के लोभ से एक दूसरे के कट्टर शत्रु हो रहे थे यहां तक कि दरबार में शाहजादों के भिन्न भिन्न पक्षपातियों के भी भिन्न भिन्न दल हो गए थे। शाहजहां स्वयं अपने प्राणों के भय से सदा कांपा करता और भविष्य में आने वाली आपत्तियों की चिंता में डूबा रहता। उसने अपने पुत्रों को ग्वालियर के सुदृढ़ और दुर्भेद्य पहाड़ी किले में जहाँ स्वच्छ जल और रसद आदि की कमी नहीं थी और जिसमें पहले भी अनेक बार राजकुटुंब के लोग नजरबंद रखे जा चुके थे, प्रसन्नतापूर्वक कैद कर दिया होता परंतु सोच विचार कर अंत में उसने इस बात को अपने मन में मान लिया कि वास्तव में अब वे इतने सबल हो गए हैं कि उनके साथ ऐसा बरताव नहीं किया जा सकता। बादशाह को निरंतर इस बात का भय लगा रहता है कि यदि यह परस्पर लड़ गए तो या तो अपने लिए अलग अलग स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लेंगे-या राजधानी में ही मार-काट मचाकर उसे एक घोर संग्राम की रंगभूमि बना डालेंगे।


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