आजाद हिन्द फौज की कहानी - एस. ए. अय्यर Aazad Hind Fauj ki Kahani - Hindi book by - S. A. Ayyar
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आजाद हिन्द फौज की कहानी

एस. ए. अय्यर

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :97
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4594
आईएसबीएन :81-237-0256-4

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आजाद हिन्द फौज की रोचक कहानी....

Azad Hind Fauj Ki Kahani A Hindi book by S. A. Ayyar - आजाद हिन्द फौज की कहानी - एस. ए. अय्यर

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आज़ाद हिन्द फ़ौज आज भी लाखों भारतवासियों के दिलों में अपना स्थान बनाए हुए है। अंग्रेजों ने भारत पर 190 वर्ष शासन किया। इस काल में महात्मा गाँधी के महान व्यक्तित्व, उनके संघर्ष, अहिंसावाद और असहयोग आंदोलन के दर्शन की छाप अमिट है। जब इंडियन नेशनल कांग्रेस ने ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन बड़ी शान्तिपूर्ण ढंग से चला रखा था उसी समय किसी दूसरी जगह इन विदेशी शासकों के विरुद्ध एक सुसंगठित युद्ध की तैयारी चल रही थी इसी उद्देश्य के लिए सुभाषचन्द्र बोस ने आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन किया था। प्रस्तुत पुस्तक में आज़ाद हिन्द फ़ौज की ऐसी रोचक कहानी का वर्णन किया गया है, जो पाठकों के दिलों को अवश्य चेतना प्रदान करेगी।

1.
युग पुरुष


द्वितीय विश्वयुद्ध के समय 17 जनवरी 1941 की पूर्व बेला में अपने कलकत्ता स्थित घर से नाटकीय ढंग से पलायन एवं दस सप्ताह पश्चात् जर्मनी आगमन सुभाष चन्द्र बोस के जीवन की अनेक घटनाओं में से एक महत्त्वपूर्ण घटना है। अपने अंग्रेज शासकों को आमरण अनशन का भय दिखाकर उन्होंने दिसंबर 1940 में कारागार से मुक्ति पाई। तत्पश्चात अपने एलगिन स्थित घर के एक कमरे में कुछ सप्ताह एकांतवास किया और मिलने वाले व्यक्तियों से भेंट करना वर्जित कर दिया। इस अवधि में उन्होंने अपनी दाढ़ी पर्याप्त बढ़ा ली। अब बढ़ी हुई दाढ़ी में और बिना चश्मा पहने उन्हें कोई पहचान नहीं सकता था।

अंग्रेज शासकों का गुप्तचर विभाग बहुत सतर्कता से, यहां तक कि उनके घर के आस-पास पेड़ों पर चढ़कर दिन-रात उनकी निगरानी कर रहा था। उन सबकी आँखों में धूल झोंककर मौलवी के वेशभूषा में सुभाष एक कार में बैठकर रात्रि के अंधकार में घर से बाहर निकल गये। उनका भतीजा शिशिर कुमार बोस कार चलाकर उन्हें कलकत्ता से दो सौ मील दूर स्थित गोमोह रेलवे स्टेशन ले गया।

गोमोह उन्हें इस कारण जाना पड़ा क्योंकि कलकत्ता के आस-पास स्थित अन्य स्टेशनों पर गुप्तचरों द्वारा बड़ी सतर्कता से उनकी निगरानी की जा रही थी। गोमोह से उन्होंने पेशावर के लिए गाड़ी पकड़ी और यात्रा के दौरान अपने आपको किसी कार्यवश पेशावर जाने वाला एक बीमा एजेंट बताया। सुभाष और उनका एक हिन्दू साथी अफ़गानिस्तान और भारत के मध्य स्थित जनजातियों के क्षेत्र को पार करते हुए पेशावर से काबुल पठान की वेशभूषा में पहुँचे। इस सीमा क्षेत्र में पासपोर्ट और चुंगी आदि अवरोधों से बचने के लिए उन्हें टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलने में बहुत-सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इन सब कठिनाइयों को सहन करते हुए अफगानिस्तान की शीत ऋतु में संध्या समय, जबकि तापमान हिमांक पर था, वे बहुत थके हुए काबुल जा पहुँचे।

काबुल प्रवास के समय उनके साथी ने उन्हें अपना मूक और बधिर भाई जिसे वह तीर्थ यात्रा पर ले जा रहा था बताया। वहाँ उन्होंने अपने प्रवास के अंतिम दिनों में पठानों की वेशभूषा अपनाई जिससे कि बाजार में वहां के नागरिकों का ध्यान उनकी ओर आकृष्ट न हो और उन्हें कोई पहचान न सके। दो मास की अनिवर्चनीय कठिनाइयों, गोपनीयता, दुविधा, चिंता, शारीरिक कष्ट और मानसिक क्लेश के पश्चात् वे 1941 की अप्रैल के प्रारंभ में मास्को होते हुए सुरक्षित बर्लिन पहुँचे।
सुभाषचंद्र बोस का भारत से यह रोमांचकारी निर्गमन योजनाबद्ध था। इसे भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ कहा जा सकता है। उनका यह दृढ़ विश्वास था अन्य देशों की सशस्त्र सहायता बिना भारत भूमि से अंग्रेजी शासन नहीं हटाया जा सकता। यही उनकी सुनिश्चित कूटनीति थी। इसी कूटनीति के अनुकूल उन्होंने भारत को स्वतन्त्र कराने की योजना अपने अन्तः मन में बनाई। सामयिक अंतर्राष्टीय परिस्थितियों के अनुसार उन्होंने अपनी योजना में परिवर्तन किये परंतु उनकी मूल नीति अपरिवर्तित रही।

वे रूस से ही कार्य आरंभ करना चाहते थे परंतु व्यवहारिक होने के नाते उन्होंने अपना कार्य जर्मनी से ही आरंभ करके संतोष किया। उन्होंने बर्लिन में आज़ाद हिंद केन्द्र की स्थापना की और जर्मन भूमि पर आज़ाद हिंद फौज आयोजित की। उनका यह कार्य उनकी पूर्व एशिया में भावी महान उपलब्धियों का पूर्वाभ्यास था। 1943 में जर्मनी से पनडुब्बी द्वारा 90 दिन की समुद्री यात्रा करके वे जापान पहुंचे। जापान सरकार द्वारा उन्हें सब प्रकार की सहायता का पूर्ण आश्वासन प्राप्त हुआ। उन्होंने पूर्व एशिया में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व ग्रहण किया तथा आज़ाद हिंद फौज की बागडोर सम्भाली और भारत-बर्मा के पार मुक्ति सेना की अगुआई की। आजा़द हिंद फौज (आई.एन.ए.) ने मार्च 1944 को सीमा पार करके मनीपुर में मोरांग स्थान पर 14 अप्रैल को तिरंगा फहराया। तत्पश्चात बर्मा में भारी वर्षा के कारण आई.एन.ए. के कार्य क्षेत्र में भारी बाढ़ आ गई और इस कारण भारतीय सेना सफलता विफलता में बदल गई। रसद मिलना बंद हो गई। ऐसी स्थिति में आई.एन.ए. के सैनिकों ने प्रत्यावर्तन करना आरंभ किया।

सैनिकों में मलेरिया और पेंचिश का रोग फैल गया। शत्रु सेना आई.एन.ए.की पंक्ति को पार करके रंगून की ओर बढ़ने लगी। अप्रैल 1945 में नेताजी रंगून से सिंगापुर चले गये। अगस्त मास में जब युद्ध समाप्ति की घोषणा हुई वे सिंगापुर से सैगोन पहुंचे। और वहां अपनी अंतिम यात्रा के लिए एक लड़ाकू विमान में सवार हुए। पूर्व एशिया में आई. एन. ए. के सैनिकों को अंग्रेज बंदी बनाकर भारत ले आये और उन पर लाल किले में ऐतिहासिक अभियोग चलाया। इस मुकदमे के कारण जो देशव्यापी हलचल हुई उससे अंग्रेजों के मन में घबराहट पैदा हो गई और अंत में उन्होंने भारत छोड़ने का निश्चय किया और 15 अगस्त 1947 को उन्होंने भारत छोड़ दिया। सिंगापुर छोड़ते समय 15 अगस्त 1945 को आई.एन.ए. के सुप्रीम कमांडर सुभाष चंद्र बोस ने अपने अंतिम दैनिक आदेश में सैनिकों से कहा, ‘‘दिल्ली पहुँचने के अनेक रास्ते हैं और दिल्ली अभी भी हमारा अंतिम लक्ष्य है।’’ उन्होंने इस विश्वास के साथ अपना आदेश समाप्त किया कि ‘‘भारत आज़ाद होगा और जल्दी ही आज़ाद होगा।’’

15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ परंतु साथ-साथ देश का विनाशकारी विभाजन भी हुआ।



2.

बचपन और विद्यार्थी जीवन



उड़ीसा के प्रसिद्ध नगर कटक में 23 जनवरी 1897 को पिता जानकीनाथ और माता प्रभावती बोस के घर सुभाष का जन्म हुआ। वे उनकी नवीं संतान एवं छठे पुत्र थे। सुभाष के परिवार में कुछ परंपरागत मान्यताएं थी। सत्ताइसवीं पीढ़ी में उत्पन्न उनके पूर्वज दशरथ बोस ने दक्षिणी बंगाल (दक्षिणी रहड़ी) में बोस उप-जाति की नींव डाली। उनके परिवार का एक सदस्य कलकत्ता के निकट महीनगर में निवास करने लगा। इसलिए वहां रहनेवाले परिवार के सदस्य महीनगर के बोस कहलाये। उनके एक पूर्वज महिपति तत्कालीन बंगाल के राजा के वित्त और युद्ध मंत्री थे। एक और पूर्वज गोपी नाथ बाद के शासक के वित्त मंत्री एवं नौ सेना के कमांडर थे। हरनाथ के चार पुत्र थे जिनमें सबसे छोटे पुत्र जानकी नाथ सुभाष चंद्र के पिता थे।

उनकी माता प्रभावती उत्तरी कलकत्ता में हथरोला के दत्त परिवार की कन्या थीं।
उनका परिवार कन्याओं के लिए सुयोग्य वर चयन करने के लिए प्रसिद्ध था। प्रभावती के पिता ने जानकीनाथ की कठिन परीक्षा ली और इस परीक्षा में उनके सफल होने पर ही उन्हें अपनी स्वीकृति दी।

जानकीनाथ की शिक्षा कलकत्ता और कटक में हुई और 1885 में उन्होंने कटक में वकालत आरंभ की। 1912 में जानकीनाथ बंगाल विधान सभा के सदस्य बने और उन्हें रायबहादुर की उपाधि मिली। जिलाधीश से मतभेद हो जाने के कारण जानकी नाथ ने सरकारी वकील और अभियोक्ता के पदों से त्याग-पत्र दे दिया। तत्पश्चात उन्होंने सरकारी दमन नीति के विरोध में रायबहादुर की उपाधि भी त्याग दी। जानकी नाथ कटक की शिक्षा संस्थाओं एवं सामाजिक कार्यों में सक्रिय रुचि लेते थे। वे मुक्तहस्त से दान देते थे। दान का अधिकांश भाग निर्धन और अभावग्रस्त विद्यार्थियों को जाता था। भारत की प्रमुख राजनैतिक संस्था भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों में अवश्य भाग लेते थे। परंतु वे संस्था के सदस्यों के विचार-विमर्श में सक्रिय भाग नहीं लेते थे। जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन आरंभ किया तो जानकीनाथ बोस ने राष्ट्रीय शिक्षा और खादी के कार्यक्रमों में रचनात्मक सहयोग दिया। उनकी मनोवृत्ति धार्मिक थी। निर्धनों के प्रति उनके हृदय में दयाभाव रहता था। स्वर्गवासी होने से पूर्व उन्होंने अपने आश्रितों और वृद्ध अनुचरों के लिए पर्याप्त साधनों की व्यवस्था कर दी थी।

विकासोन्मुख बालक सुभाष के लिए कटक का वातावरण बहुत अनुकूल था। उनका परिवार मध्यमवर्गीय संपन्न परिवार था, परंतु उनके माता-पिता बच्चों के लालन-पालन में सादा जीवन के सिद्धांत का पालन करते थे। परिवार में आठ भाई-बहन बड़े और पाँच छोटे होने के कारण सचेतन सुभाष पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा। वे स्वयं को नगण्य और कभी-कभी अपने को एकाकी अनुभव करते थे। कभी-कभी उनको इतने बच्चों के बीच अस्तित्वहीनता की अनुभूति होती थी। ज्येष्ठ भाई-बहनों के समकक्ष पहुंचना उनके लिए एक चुनौती थी। वे अपने माता-पिता के अत्यधिक सान्निध्य के इच्छुक रहते थे। परंतु उनके पिता स्वभाव से एकांतवासी थे और माता गृहस्थी के क्रियाकलापों में व्यस्त रहती थी।
एक बड़े परिवार में पालन-पोषण होने के कारण उनका मन तो निश्चय ही विशाल हो गया था। परंतु उनके स्वभाव में एकाकीपन आ गया और कुछ शर्मीले हो गये। उनकी स्वभावगत यह विशेषता जीवन-पर्यंत रही।

पांच वर्ष की आयु में सुभाष ने कटक में एक अंग्रेजी स्कूल में प्रवेश लिया। इस संस्था का संचालन यूरोपीय प्रणाली के अनुसार होता था। शनैः-शनैः सुभाष को दो विभिन्न संसारों का परिचय हुआ—एक तो उनके भारतीय घर और समाज में प्रतिबिंबित था दूसरे का प्रतिनिधित्व उनका स्कूल करता था, जिनका दृष्टिकोण इंग्लैंड के जीवन के समीप था। स्कूल में उन्होंने जातीय भेदभाव का भी अनुभव किआ क्योंकि वहां एंग्लो-इंडियन बच्चों को जो सुविधा उपलब्ध थी वह भारतीय विद्यार्थियों को प्राप्त नहीं थी। कुछ दिन पश्चात उन्हें एक भारतीय विद्यालय में प्रविष्ट किया गया जहां पर संस्था के प्रधान बेनीमाधव का प्रभाव उस अल्पायु में उन पर अत्यधिक पड़ा। यह विद्यालय भारतीय जीवन प्रणाली के अनुसार संचालित होता था। अब सुभाष अध्ययन में व्यस्त रहने लगे और खेल-कूद और अन्य शारीरिक व्यायाम त्यागने लगे। फलतः उनमें समय से पहले प्रौढ़ता आने लगी।

सुभाष के मन में गंभीर अंतर्द्वंद्व उठने लगे। वे अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित नहीं कर पा रहे थे। अपने माता-पिता के प्रति उनके दृष्टिकोण में महान अंतर आ गया और अब वे उनकी आज्ञा का अनुपालन बिना सोचे समझे नहीं करते थे। कभी-कभी तो उनके मन में आज्ञा उल्लंघन की भावना भी जाग्रत हो जाती थी। उनका समय दीर्घकालीन सैर और सम विचार के युवकों के साथ विचार-विमर्श में अधिक व्यतीत होता था।

सुभाष अभी केवल 15 वर्ष के ही थे जब उन पर दूसरा महत्वपूर्ण प्रभाव स्वामी विवेकानन्द और उनके स्वामी रामकृष्ण परमहंस की शिक्षा का पड़ा। स्वामी विवेकानन्द से उन्होंने यह शिक्षा ग्रहण की कि मानव जाति की सेवा ही देश सेवा है और स्वामी रामकृष्ण से उन्होंने आध्यात्मिक जीवन के लिए वासना और स्वर्ण के परित्याग का भाव ग्रहण किया।
इन दोनों महापुरुषों की शिक्षाओं ने किशोर सुभाष के अंदर आध्यात्मिक अंदोलन उत्पन्न कर दिया।
अंततोगत्वा सुभाष को मार्ग मिला। उनका अंतर्द्वंद्व समाप्त हुआ और उनकी आत्मा में एक नवीन आदर्श का प्रकाश उदय हुआ। वे सांसारिक एषणाओं का परित्याग करके मोक्ष प्राप्त करना चाहते थे। ऐसी स्थिति आ गई कि उनके माता-पिता उन पर जितने प्रतिबंध लगाते उतना ही अधिक वे उनका विरोध करते। अब वह साधुओं का सान्निध्य प्राप्त करने, योगाभ्यास करने एवं आध्यात्मिक शक्तियों पर विचार-विमर्श करने में अधिक रुचि लेते थे।

सोलह वर्ष की अवस्था में सुभाष ने ग्रामों में पुनर्निर्माण कार्य करने का अनुभव प्राप्त किया। अपने विद्यार्थी जीवन में सुभाष ने राजनीतिक परिपक्वता का परिचय नहीं दिया था। क्योंकि उनका झुकाव उस समय दूसरी दिशा में था। वे अपने बड़े भाइयों से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संबंध में बहुधा सुनते थे परंतु इसका उन पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ता था। वास्तव में उनके घर में राजनीति बच्चों के लिए परहेज की वस्तु समझी जाती थी परंतु उनके भाइयों ने अपने कमरों की दीवारों पर क्रांतिकारियों के चित्र लगा रखे थे।

अपने विद्यार्थी जीवन के अंतिम दिनों में उनकी धार्मिक मनोवृत्ति और अधिक तीव्र हो गई। इस कारण उनके लिए पाठ्य विषयों के अध्ययन का महत्त्व कम हो गया। धर्म और योग में निष्ठा के कारण वे अपने कार्य और दैनिक परिचर्या में स्वतंत्रता चाहते थे। अतः वे अपने माता-पिता के आदेशों का विरोध करने लगे। आज्ञा उल्लंघन का एक कारण यह भी था कि विवेकानंद की शिक्षा के अनुसार उन्हें यह विश्वास हो गया था कि विद्रोह के बिना आत्म-सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। अब वे उद्दंड, सनकी और जिद्दी प्रतीत होने लगे। अपने अध्ययन की उपेक्षा करना और विभूति रमाये साधुओं के पीछे दौड़ना उनकी परिचर्या बन गयी थी। अतः उनके अभिभावकों ने सोचा कि उनके वातावरण में परिवर्तन उनके लिए लाभप्रद सिद्ध होगा। इसके लिए कलकत्ता का वातावरण अच्छा समझा गया।

सोलह वर्ष की आयु में 1913 में सुभाष ने मैट्रिक की परीक्षा कटक से उत्तीर्ण की और कलकत्ता विश्वविद्यालय में द्वितीय स्थान प्राप्त किया। शीघ्र ही उन्हें कलकत्ता भेज दिया गया परंतु वे अपने भविष्य के संबंध में पहले ही निश्चय कर चुके थे।
घिसे पिटे सामान्य रास्ते पर चलना उनके लिए जीवन का उद्देश्य नहीं था अपितु उनका आदर्श था स्वयं की आध्यात्मिक उन्नति और मानवता के कल्याण की प्रक्रिया में अपने को उत्सर्ग करना।


3.

भारत और इंग्लैंड में कालेज जीवन



कालेज जीवन के प्रारंभ में ही सुभाष ने यह समझ लिया था कि मानव जीवन का कुछ विशेष अर्थ और उद्देश्य होता है जिसकी उपलब्धि मन और शरीर को नियमित अभ्यास द्वारा सुसंस्कृत करके एवं यथाशक्ति आत्म-नियंत्रण द्वारा हो सकती है। इन गुणों ने उन्हें जीवन-पर्यंत संबल दिया। कटक की जीवनचर्या में परिवर्तन की बात तो दूर रही, कलकत्ते में भी सनकी लड़कों का एक बड़ा समुदाय और कालेज में उनकी कक्षा का एक ग्रुप उनके विशुद्ध और सादे व्यवहार से आकृष्ट हुआ, परंतु अन्य लड़कों ने उनमें कोई सक्रिय रुचि नहीं दिखाई।

कालेज एक राजकीय संस्था थी परंतु उसमें शिक्षा ग्रहण करने वाला समस्त समुदाय के सर्वोत्तम विद्यार्थी होने के कारण राजभक्त नहीं था। स्वतंत्र चिंतन करने वाले इन विद्यार्थियों की ओर पुलिस का ध्यान आकृष्ट हुआ। पुलिस कालेज के छात्रावास को राजविद्रोह का अनुप्रेरक क्षेत्र एवं क्रांतिकारियों का निवास समझती थी। सुभाष के ग्रुप ने अपने को नवीन विवेकानंद ग्रुप के नाम से राष्ट्रीयता और धर्म में समन्वय स्थापित करने वाले समुदाय के रूप में प्रस्तुत किया। विवेकाननंद की इस शिक्षा के अननुसार कि शिक्षा क्षेत्र में राष्ट्रीय पुनर्निर्माण द्वारा समाज सेवा की जा सकती है सुभाष के दल ने अपनी योजना को क्रियान्वित करने से पूर्व ही उन सुयोग्य विद्यार्थियों की सूची बनाना आरंभ किया जो भावी जीवन में प्रशिक्षित आचार्य के रूप में कार्य करने को प्रस्तुत थे। ये विद्यार्थी आतंकवादी गतिविधियों एवं गोपनीय षड़यंत्रों के विरुद्ध थे। अतः वे उस समय बंगाल में व्याप्त आतंकवादी वातावरण में बहुत लोकप्रिय नहीं थे।

बंगाल के युवकों को अरविंद घोष ने बहुत प्रभावित किया था यद्यपि वे 1910 से पांडेचेरी में निष्कासित जीवन व्यतीत कर रहे थे। सुभाष अरविंद की पत्रिका ‘आर्य’ को नियमित रूप से पढ़ते थे और उस रहस्यवादी गहन दर्शन एवं उच्च भावना से बहुत प्रभावित हुए थे। सुभाष के मन पर अरविंद के इन सीधे-सादे शब्दों का गहरा प्रभाव पड़ा था ‘‘मैं तुममें से कुछ को महान व्यक्ति देखना चाहता हूँ, स्वयं के लिए महान नहीं अपितु भारत को महान बनाने के लिए जिससे कि वह संसार के स्वतंत्र राष्ट्रों में अपना मस्तक ऊंचा करके खड़ा हो सके। तुम में जो निर्धन एवं नगण्य हैं उन्हें अपनी निर्धनता और नगण्यता ही मातृभूमि की सेवा में लगानी चाहिए। कार्य करो, जिससे मातृभूमि समृद्ध बने, उसकी खुशी के लिए कष्ट झेलो।’’

सुभाष ने निर्धनों की सहायता के लिए घर-घर से दान लेकर खाद्य-सामाग्री एकत्र करके एक समाज-सेवी संस्था को सहयोग दिया और इस प्रकार स्वयं को समाज-सेवा योग्य प्रमाणित किया। कभी-कभी इस कार्य में उन्हें संकोच का अनुभव होता था। इस लज्जालु स्वभाव पर विजय पाने के लिए उन्हें पर्याप्त प्रयास करना पड़ा। उन्होंने विद्यार्थियों के क्रार्यक्रमों में, जैसे वाद-विवाद, बाढ़ और सूखा से पीड़ित जनता की सहायता हेतु धन एकत्र करना, एवं अधिकारियों से विद्यार्थियों के प्रतिनिधि के रूप में बातचीत करना आदि कामों में भाग लेना आरंभ किया। उन्होंने विद्यार्थियों की टोलियों में भ्रमण करने में भी अधिक रुचि ली और इस प्रकार अंतर्मुखी प्रवृत्ति से छुटकारा पाना आरंभ किया।

1914 के ग्रीष्मावकाश में वे यकायक कलकत्ता छोड़कर अपने माता-पिता को बिना सूचित किये तीर्थ-यात्रा पर निकल गये। उस समय उनकी आयु केवल 17 वर्ष की थी। वे आध्यात्मिक गुरु की खोज में ऋषिकेश, हरिद्वार, मथुरा, वृंदावन वाराणसी और गया गये। उन्हें इच्छानुकूल गुरु नहीं मिला और वे निराश होकर कलकत्ता लौट आये।

जब प्रथम विश्व-युद्ध आरम्भ हुआ सुभाष टाइफाड ज्वर से पीड़ित थे। अब सुभाष में राजनैतिक चेतना का उदय होने लगा। स्वतंत्र रूप से कार्यक्षेत्र में प्रवेश करने के लिए उन्हें दो बातों ने प्रेरित किया। उनमें से एक थी प्रथम विश्व-युद्ध के दौरान अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति आम व्यवहार और दूसरी बात ट्राम, रेल और सड़कों पर भारतीयों के साथ धृष्टता एवं असभ्यता का बर्ताव करना। उन्होंने अपने स्वचेतन स्वभाव के कारण इन घटनाओं के विरोध में प्रत्याघात किया। जब भारतीयों ने कानून व्यवस्था अपने हाथ में ले ली तो उसका प्रभाव महत्वपूर्ण पड़ा। सुभाष ने देखा कि अंग्रेज शारीरिक बल का आदर करते थे और इस शक्ति को अच्छी प्रकार समझते थे। प्रथम-विश्व-युद्ध से वे अच्छी प्रकार समझ गये कि सैनिक शक्ति के बिना कोई राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकता।

सुभाष ने इंटर की परीक्षा 1915 में सम्मान सहित उत्तीर्ण की और बी.ए. आनर्स में दर्शनशास्त्र विषय लेकर प्रविष्ट हुए। आगामी वर्ष के प्रारंभ में ही एक घटना ऐसी घटी कि उन्हें कालिज से निलंबित कर दिया गया। एक अंग्रेज प्राध्यापक जिसका नाम ई.एफ. ओटन था भारतीय विद्यार्थियों के साथ सदैव असभ्यता का व्यवहार किया करता था। विद्यार्थियों के प्रतिनिधि के रूप में सुभाष ने प्रधानाचार्य से इसकी शिकायत की इस प्रकार कुछ समय के लिए विवाद शांत हो गया। परंतु फिर एक बार प्रोफेसर ने एक विद्यार्थी के साथ हाथापई की। विद्यार्थियों ने बदले में कालेज की सीढ़ियों पर प्रोफेसर पर आक्रमण कर दिया। सुभाष आक्रमणकारियों में नहीं थे। वे केवल दूर के दृष्टा थे फिर भी उनको संस्था से निष्काषित कर दिया गया और उन्हें कटक में अपने माता-पिता के पास घर लौटना पड़ा। इस घटना ने सुभाष के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला और इसी से उन्होंने शहादत का प्रथम पाठ पढ़ा। उनके अभिवावकों ने उनकी स्थिति को समझकर सहानुभूति प्रकट की। यह बात उनके लिए आश्चर्य की थी। कालिज से हठात् अनुपस्थिति के समय उन्होंने अपने को आध्यात्मिक एवं सामाजिक कार्यों में लगाया।

अगले वर्ष कलकत्ता विश्वविद्यालय के वास्तविक एकमात्र शासक आशुतोष मुखर्जी के हस्तक्षेप से उन्हें स्कौटिश चर्च कालिज में प्रवेश मिल गया। इस प्रकार वे कलकत्ता आकर पुनः अध्ययन करने लगे। पुनः प्रवेश की प्रतीक्षा के दौरान सुभाष ने 49वीं बंगाली रेजीमेंट में भर्ती होने का प्रयास किया परंतु दृष्टि में दोष होने के कारण उन्हें अस्वीकृत कर दिया गया।
कालिज में प्रवेश लेने के पश्चात सुभाष ने विश्वविद्यालय के भारतीय सुरक्षा दल (प्रादेशिक सेना) में अपना नाम अंकित कराया और फोर्ट विलियम के समीप प्रशिक्षण शिविर में सम्मिलित हुए। उन्होंने खाकी वर्दी पहनी और उत्साह के साथ बन्दूक चलाने का अभ्यास किया तथा सैनिक जीवन का खूब आनंद लिया। फ़ोर्ट विलियम में अपनी रायफल उठाते समय गर्व से उनकी छाती फूल गयी। भारतीय होने के कारण वे वहाँ प्रवेश पा गये।

उन्होंने 1919 में दर्शनशास्त्र के साथ बी.ए. आनर्स की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और एम.ए. में मनोविज्ञान विषय में प्रवेश लिया। कुछ समय पश्चात् उनके पिता ने उनसे ज्ञात किया कि क्या वे इंग्लैंड जाकर आई.सी.एस. की परीक्षा में भाग लेंगे ? उन दिनों आई.सी.एस. की नौकरी सर्वोत्तम मानी जाती थी और प्रत्येक भारतीय युवक की इंग्लैंड में जाकर इस परीक्षा में सम्मिलित होने की तीव्र इच्छा रहती थी परंतु सुभाष इंग्लैंड जाकर इस परीक्षा में सम्मिलित होने के इच्छुक नहीं थे क्योंकि इसमें उत्तीर्ण होकर वे आई.सी.एस.अधिकारी के रूप में अंग्रेजी सरकार को सहयोग नहीं देना चाहते थे। उनका मन तो इसके विपरीत अन्य कार्यों में रमा था। अंततोगत्वा उन्होंने इस विचार से कि इंग्लैंड में आठ मास के प्रवास से वे आई.सी.एस.की परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पायेंगे उन्होंने इंग्लैंड जाने की समहति दे दी।


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