चुने हुए बाल एकांकी - भाग 1 - रोहिताश्व अस्थाना Chune Hue Bal Ekanki - Part 1 - Hindi book by - Rohitashva Asthana
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चुने हुए बाल एकांकी - भाग 1

रोहिताश्व अस्थाना

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :200
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 458
आईएसबीएन :81-7315-297-7

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बालकों के मनोरंजन, मार्गदर्शन एवं ज्ञानवर्धन के लिए बाल नाटकों एवं बाल एकांकियों का अद्वितीय संकलन...

Chune Hue Bal Ekanki (part 1) - A hindi Book by - Rohitashva Asthana चुने हुए बाल एकांकी (भाग 1) - रोहिताश्व अस्थाना

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दो शब्द

राष्ट्रपिता बापू ने अपने बचपन में ‘हरिश्चंद्र’ और ‘श्रवणकुमार’ नाटक देखकर ही सत्यवादी और मातृ-पितृ भक्त बनने की प्रेरणा ली थी। सचमुच नाटकों का बाल मन पर सीधा और स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। नाटक दृश्य काव्य की एक प्रमुख विधा है जिसके एकांकी, नौटंकी, प्रहसन, स्वाँग आदि अन्य रूप हैं।
आजकल रंगमंच पर नाटक और एकांकी का विशेष प्रचलन है। नाटक यदि जीवन के व्यापक परिदृश्य को प्रस्तुत करता है तो एकांकी उसके संक्षिप्त किंतु प्रभावोत्पादक अंश को प्रदर्शित करता है। दूसरे शब्दो में, एकांकी जीवन की किसी एक सशक्त घटना को संक्षिप्तता किंतु ऊर्जास्विता के साथ प्रस्तुत करता है।
शास्त्रीय दृष्टि में ड़ाँ. दशरथ ओझा के शब्दो में—‘जो नाटक एक अंक में समाप्त होने वाला, एक सुनिश्चित लक्ष्यवाला, एक ही घटना, एक ही स्थिति और एक ही समस्यावाला हो, जिसके प्रवेश में कौतूहल और वेग, गति में विघुत्वता और तेजी तथा विकास में एकाग्रता और आकस्मिकता के साथ चरम सीमा तक पहुंचने की व्यग्रता हो, जिसमे प्रासंगिक कथाओं का निषेध घटनाओं की विविधता का निवारण तथा चरित्र के प्रस्फुटन में आदि, मध्य, अवासन का वर्णन हो उसे एकांकी कहना चाहिए।’
कथावस्तु, चरित्र-चित्रण, संवाद, देश-काल, भाषा-शैली, उद्देश्य, अभिनेयता एवं संकलन-त्रय एकांकी नाटक के प्रमुख तत्व हैं। इनमें संकलन-त्रय का निर्वाह एकांकी नाटक के लिए अनिवार्य है। संकलन-त्रय से जो तात्पर्य स्थान, समय और कार्य की एकता से है।
बालकों के मनोरंजन, मार्गदर्शन एवं ज्ञानवर्द्धन के लिए बाल नाटकों एवं बाल एकांकियों का महत्व दिन-प्रतिदिन बढता जा रहा है।
बालकों में सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति आस्था जाग्रत करने के लिए बाल नाटक एवं बाल एकांकी प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं। बाल नाटकों में चूँकि जीवन के समग्र पक्षों को मंचित करना होता है, अतः उसमें जटिल मंच सज्जा-सामग्री एवं अधिक पात्रों की आवश्यकता पड़ती है। मंचन में अधिक समय भी लगता है। परंतु आज के मीडियाप्रधान युग में बच्चों के पास इतना समय कहां कि वे बड़े बड़े नाटकों में भाग ले सकें या उन्हें देख सकें।
आज के व्यस्तताप्रधान युग में बड़ों के पास ही नहीं अपितु बच्चों के पास भी इतना समय नहीं है कि वे बाल नाटकों से अपने को जोड सकें। अतः एक अंकवाले एवं जीवन की एक घटना को उसकी समग्र संवेदना के साथ प्रस्तुत करने वाले सोद्देश्य और तथ्यपरक बाल एकांकियों के प्रति बच्चों में अभिरूचि बढ रही है।
विद्यालयों के वार्षिक समारोहों, राष्ट्रीय पर्वो, विभिन्न उद्घाटन कार्यक्रमों एवं नाट्य प्रतियोगिताओं के लिए ऐसे बाल एकांकियो की आवश्यकता होती है, जो साधारण मंच सज्जा में कम-से-कम समय और कम-से-कम पात्रों द्वारा अभिनीत किए जा सकें।
यद्यपि अब तक बाल नाटकों एवं बाल एकांकियों के अनेक संग्रह प्रकाश में आ चुके हैं, परंतु बाल काव्य एवं बाल कथा की अपेक्षा बाल नाटक या बाल एकांकी इतने अधिक नहीं लिखे गए हैं कि उनसे नई बाल पीढी की माँग पूरी हो सके ।
अब तक बाल नाटकों एवं बाल एकांकियों के जो संग्रह प्रकाशित हुए हैं उनमें श्रीयुत श्रीकृष्ण एवं योगेंद्र कुमार लल्ला द्वारा संपादित ‘प्रतिनिधि बाल एकांकी’ (1962), प्रकाशन विभाग, भारत सरकार द्वारा प्रकाशित ‘चुने हुए एकांकी’ (1965), योगेंद्र कुमार लल्ला द्वारा संपादित ‘राष्ट्रीय एकांकी’(1964), ड़ाँ. हरिकृष्ण देवसरे द्वारा संपादित ‘बच्चों के सौ नाटक’(1979) तथा ‘प्रतिनिधि बाल नाटक’(1996) आदि प्रमुख है।
इन संकलन में सम्मिलित लेखको के मिले-जुले नाम है—गंगा प्रसाद माथुर, आनंद प्रकाश जैन, विष्णु प्रभाकर, मंगल सक्सेना, श्रीकृष्ण, देवराज दिनेश, रमेश कुमार माहेश्वरी, मनोहर वर्मा सरस्वती, कुमार दीपक, चिरंजीत, विमल लूथरा, सत्येंद्र शरत, कमलेश्वर, वेद राही, शान्त भटनागर, मस्तराम कपूर, उर्मिला, शैलेश मटियानी, स्वदेश कुमार, जयप्रकाश भारती, विश्वदेव शर्मा, मनमथ नाथ गुप्त, शचीरानी गुर्टू, नरेश मेहता, नारायण भक्त, मदन मोहन शर्मा, इंदु जैन,रमेश भाई, ललित सहगल, प्रफुल्ल चंद्र ओझा ‘मुक्त’, रामपाल सिंह, कणाद ऋषी भटनागर, विभा देवसरे, ड़ाँ. हरिकृष्ण देवसरे, रामनरेश त्रिपाठी, हरिकृष्ण प्रेमी, रामेश्वर दयाल दुबे, ड़ाँ रामकुमार वर्मा, वंशीधर श्रीवास्तव, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, नर्मदा प्रसाद खरे, युक्ति भद्र दीक्षित, उमाकांत मालवीय, केशव चंद्र वर्मा, कुदसिया जैदी, बालक राम नागर, राधेश्याम प्रगल्भ, ड़ाँ, प्रभाकर माचवे, सत्य जैसवाल, देववती शर्मा, महेन्द्र नाथ झा, ड़ाँ. चन्द्र प्रकाश वर्मा, रेखा जैन, गोविन्द शर्मा, ओम प्रकाश आदित्य, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, डाँ. लक्ष्मी नारायण लाल, के.पी. सक्सेना, श्याम व्यास, लक्ष्मी कांतवैष्णव, चंद्र किरण सोनरेक्सा आदि।
इनमें से अनेक लेखकों के स्वतंत्र बाल नाटक एवं बाल एकांकी संग्रह भी समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं।
इतना सब होते हुए भी आज ऐसे बाल एकांकी नाटकों के संग्रह की आवश्यकता अनुभव की जा रही है जिसमे साधारण मंच सज्जा तथा कम-से-कम पात्रों द्वारा कम समय में मंचित किए जा सकने वाले एकांकी संगृहीत हों।
निश्चय ही बच्चों, उनके शिक्षकों, अभिभावकों एवं बाल नाट्य संस्थाओं को विभिन्न समारोहों, पर्वो एवं प्रतियोगिताओं के लिए मंचित किए जा सकने वाले बाल एकांकियों की आवश्यकता रहती है। इसी उद्देश्य से हम बाल एकांकी नाटकों का यह संग्रह ‘चुने हुए बाल एकांकी’ शीर्षक के अंतर्गत प्रस्तुत कर रहे हैं।
इसमे जहा एक ओर मनोरंजन एवं हास्यपरक बाल एकांकी संकलित हैं वहीं दूसरी ओर ऐतिहासिक, राष्ट्रीय, नैतिक मूल्यों पर आधारित, प्रेरक, ज्ञानवर्द्धक एवं मार्गदर्शक बाल एकांकी भी संगृहीत हैं। इन बाल एकांकियों के पात्र प्रायः पौराणिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, पशु-पक्षियों, फूलों-फलों, सब्जियों, पेड़-पौधों, आदि की पृष्ठ भूमि पर आधारित हैं। इनमें बाल पात्रों की भी बहुलता है।
सभी बाल एकांकी नाटक अभिनेय तथा बाल परिवेश से संबद्ध है। इस संकलन के माध्यम से बाल एकांकी नाटकों के ऐतिहासिक विकास क्रम को भी रेखांकित करने का प्रयास किया गया है।
कुछ अन्य बाल नाटककारों का अभाव संकलन में है; परंतु इसके लिए वह स्वयं ही उत्तरदायी हैं, क्योंकि हमारे बार बार अनुरोध करने पर भी उसकी रचनाएँ हमे प्रकाशन हेतु प्राप्त नही हो सकी । इसका मुझे दुःख है। वस्तुतः साहित्य-सृजन सेवा का पथ है, व्यवसाय का नहीं।
जिन रचनाकारों ने हमरे अग्रह एवं अनुरोध को स्वीकार करके हमे अपने बाल एकांकी नाटक प्रदान किए उनके हम ह्रदय से आभारी हैं।
संग्रह के लिए सामग्री संचयन एवं संपादन में पूज्य गुरूवर डाँ. वंशगोपालजी का अभूतपूर्व सहयोग हमे प्राप्त हुआ, जो स्वयं भारतेंदु युगीन नाटकों के मान्यताप्राप्त शोध विद्वान् हैं। इसके लिए हम उनके प्रति समग्र मन से आभारी हैं। जिन विद्वानों की सम्मतियों ने संकल्प के कलेवर में चार चाँद लगा दिए हैं, हम उन विद्वान् लेखकों के आभारी हैं।
हमें विश्वास है कि प्रस्तुत संकलन बाल रंगमंच के क्षेत्र में एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति में सहायक बनेगा। बाल कलाकारों, बाल दर्शकों, बाल पाठकों, एवं बड़ों को भी इस संकल्प से संतोष होगा, ऐसा हमारा विश्वास है।
यदि प्रस्तुत एकांकी संग्रह अपने उद्देश्य की पूर्ति में तनिक भी सहायक हो सका तो हम अपने प्रयास को सफल एवं सार्थक समझेंगे।
खट्टी—मीठी पाठकीय प्रतिक्रियाओं की प्रतिक्षा में—


-रोहिताश्व अस्थाना

ऐकांतिका,
निकट बावन चुंगी चौराहा,
हरदोई-241001(उ.प्र.)


फलों की चौपाल


अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’




पात्र-परिचय

पात्रः कुल दस-बारह बच्चे-कुछ लड़के, कुछ लडकियाँ।
सामग्रीः अलग-अलग फलों के मुखौटे, जो गत्ते या मोटे कागज के बने हों।

[सभी बच्चे अपने-अपने चेहरे पर एक-एक फल का मुखौटा पहने हैं। आम का मुखौटा पहने एक बच्चा एक ऊँचे आसन(चबूतरे) पर बैठा है। उसकी बाई तरफ एक लड़का केले का मुखौटा पहने बैठा है।सामने दरी पर शेष बच्चे अमरूद, नींबू, अंगूर, गाजर, मूली, सेब, लीची, तरबूज आदि फलों के मुखौटे लगाए बैठे हैं।जो पात्र जिस फल का मुखौटा पहने है वह उसीका प्रतिनिधित्व कर रहा है। सर्वप्रथम केले खड़ा होता है]

केलाः (सामने दरी पर बैठे फलो की तरफ देखकर) साथियों, आप लोगों को शायद पता होगा कि फलों के राजा आमजी ने यह बैठक क्यों बुलवाई है! दरअसल आप लोगों मे से बहुतो के बारे में कई शिकायते मिली हैं। अतः आप लोगों से स्पष्टीकरण जानने और कुछ जरूरी निर्देश देने के उद्देश्य से हमारे राजा आमजी ने यह बैठक बुलाई है।( फिर आम की तरफ देखकर) महाराज! यह अमरूद का बच्चा बहुत शैतान हो गया है। इसने शास्त्री नगर वाले श्रीवास्तवजी के लड़के को खाँसी कर दी है। खाँसते-खाँसते बेचारे की बुरी हालत हो गई है। श्रीवास्तवजी ने दो रूपए की अमरूज क्या खरीदा, उन्हें बीस रूपए का कफ सीरप खरीदना पड़ गया।

आमः(अमरूद की तरफ देखकर ) हूँ, क्यो भाई अमरूद लाल! यह क्या सुन रहा हूँ मैं। अगर लोगों को ऐसे ही परेशान करोगे तो भला तुम्हें कौन पूछेगा?

[आम के चुप होते ही अमरूद खड़ा होता है।]

अमरूदः मेरी कोई गल्ती नहीं है, सरकार! यद्यपि यह बात सच है कि श्रीवास्तवजी के लडके बंटी को खाँसी मेरी ही वजह से हुई है; लेकिन इसमें मेरा रत्ती भर भी दोष नहीं। उस दिन श्रीवास्तवजी शाम के समय सब्जी लेने बाजार गए तो मुझे खरीद लाए। बंटी ने झट से मुझे झोले से निकाला और खाना शुरू कर दिया। अब आप ही बताइए, सर्दी के दिन में शाम के समय अमरूद खाने से खाँसी नहीं होगी तो और क्या होगा? अगर मुझे सवेरे, थोड़ा दिन चढने के बाद से लेकर दोपहर तक खाया जाय तो मैं कोई नुकसान नही पहुँचाता। नुकसान की कौन कहे, मैं तो बहुत फायदे की चीज हूँ। दाँतो और मसूड़ो के लिए भी मै बहुत फायदेमंद चीज हूँ। डाँक्टरो का कहना है कि मै दिमाग की गरमी और पागलपन दूर करने में भी सहायक हूँ। इसके अलावा पेट की कब्ज और बवासीर आदि में भी उपयोगी हूण। अब आप ही बताएँ. सरकार, अगर मुझे कोई सही तरीके से इस्तेमाल न करे तो इसमें मेरा क्या दोष। (अमरूद बैठ जाता है।)

[अमरूद के बैठते ही महाराज आम के दूसरे मंत्री संतरा प्रसाद खड़े होते है।]

संतराः(आम की तरफ देखकर)और इस गाजर की भी बहुत शिकायते आ रही हैं, सरकार। जो भी इसे खाते हैं, दस्त और पेट की गडब़डी के शिकार हो जाते है। इसको कई बार समझाया गया, लेकिन यह अपनी आदत से बाज नही आ रहा है।
आमः(गाजर की तरफ देखकर) क्यों भाई, गाजर जी, आप तो बुजुर्ग हैं। आप ऐसी गंदी हरकत क्यो करते हैं?
गाजरः(आम की तरफ देखकर) श्रीमान संतरा प्रसाद द्वारा मुझपर लगाए गए आरोप सच नही हैं,,सरकार। आप मुझपर विश्वास करें। उलटी, दस्त पेटदर्द आदि गडबडियाँ मेरे कारण नही बल्कि मुझको खाने वालो की लापरवाही के कारण होती हैं। दरअसल मेरे शरीर पर उगे लंबे-लेबे बालो में ‘एंटामीबा’ नामक जीवाणु होते हैं, जो पेट के अन्दर कीडे पैदा करते हैं तथा पाचन क्रिया को प्रभावित करते है । अतः लोगो को चाहिए कि खाने से पहले मुझको अच्छी तरह से रगड-रगडकर साफ पानी से धोले । बल्कि मैं तो विभिन्न प्रकार के विटामिनों का बहुत अच्छा और सस्ता स्त्रोत हूँ। मेरे अन्दर विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘बी’, ‘विटामिन डी’,विटामिन ‘के’ आदि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं और शरीर के विकास में मैं महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हूँ।

[गाजर बैठ जाता है। गाजर के बैठते ही मूली खड़ी होती है।]

मूलीः(आम की तरफ देखकर) अगर इजाजत हो तो मै भी कुछ
कहूँ, श्रीमान।
आमः हाँ-हाँ, कहिए मूली देवी, क्या कहना चाहती हैं आप?
मूलीः गाजर भाई ने जो कुछ भी कहा है वह बिलकुल सच कहा है, सरकार। गाजर भाई की बाते काफी हद तक मेरे ऊपर भी लागू होती हैं। मेरे शरीर पर रोएँ होते हैं और उनमें भी घातक जीवाणु होते हैं। अतः मुझको भी खाने से पहसे खूब अच्छी तरह धो लेना चाहिए।

[मूली बैठ जाती है। केला फिर खड़ा होता है।]

केलाः (आम की तरफ देखकर) उधऱ देखिए महाराज, अंगूर राम उधर कोने मे छिपकर बैठे हैं। वैसे तो अपने आपको ये बहुत फायदे मंद फल बताते हैं, लेकिन सूचना मिली है कि इनको खाने से भी कई लोग बीमार पड़े हैं। इनका स्पष्टीकरण आवश्यक है, महाराज।
आमः (उचककर इधर उधर देखते हुए) भई अंगूर राम, आप पीछे से उठ कर सामने आइए और श्री केलाजी की बातों का जवाब दीजिए।

[एक छोटा सा बच्चा, जो अंगूर का मुखौटा पहने है, पीछे से उठकर आगे आता है। वह आम की तरफ हाथजोड़ कर नमस्कार करता है।]

अंगूरः वैसे तो श्रीमान केला जी हमारे बुजुर्ग हैं, वह जो चाहे सो कहें; लेकिन सच्चाई यही है, सरकार, कि गुणो के मामले मेंमेरा कोई जवाब नही है। मै देखने में जितना छोटा हूँ उतना ही अधिक फायदे मंद हूँ। विटामिन ‘ए’,विटामिन ‘बी’,विटामिन ‘सी’, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाईड्रेट, कैलशियम, फास्फोरस, लोहा आदि—मनुष्य के लिए उपयोगी भला कौन सा ऐसा तत्व है जो मुझमें नहीं है? तभी तो शरीर में खून की सफाई करने, पाचन क्रिया ठीक करने, नेत्र-ज्योति बढाने में मेरी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कमजोर और रोगी लोगों के लिए तो मै अति उपयोगी हूँ।
केलाः (अंगूर की बात काटते हुए) अपने मुहँ से अपने गुणों का बखान आप बहुत कर चुके है। हम मानते हैं ,अंगूर राम आप बहुत गुणवान फल हैं, लेकिन क्या ये सत्य नहीं है कि आप को खाने से कई लोगो पेट की गडबडी के शिकार हुए हैं?
अंगूरः आपका आरोप बिल्कुल सच है; लेकिन लोगो के बीमार होने में मेरी रत्ती भर भी गलती नही है। होता यह है कि ठेले वाले मुझे खुला लेकर बेचा करते है। मेरे ऊपर तमाम धूल और गंदगी पडती है तथा मक्खियाँ भिनभिनाती रहती है। लेकिन मुझको खरीदने वाले इतना भी कष्ट नही करते कि खाने से पहले ठीक से धो ले। बस खरीदा और फटाफट खाने लगे। ऐसे में वे अगर बीमार पडते है तो फिर मेरा क्या दोष? एक दूसरी बात भी मुझको डाल से कच्चा तोड लिया जाता है और कार्बाइड आदि गैसो द्वारा मुझको पकाया जाता है। इन गैसो का कुछ अवशेष मेरी चमड़ी पर रह जाता है, जो लोगो को नुसान पहुँचाता है।

आमः (हसते हुए) ठीक है, ठीक है, अंगूर रामजी! हम मान गए कि लोगो के बीमार होने में आपका दोष नही है।लेकिन आप उपाय भी तो बताइए, ताकि लोग बीमार न पडे।
अंगूरः बहुक सीधा सा उपाय है, हुजूर। लोगों को चाहिए कि खाने से पहले मुझे अच्छी तरह से धो लें; बल्कि बेहतर होगा कि पाँच दस मिनट तक मुझे पानी में ही डालकर छोड़ दे, फिर खूब साफ धो पोछ कर ही खाएँ।

[अंगूर बैठ जाता है।अंगूर के बैठते ही सेब खड़ा होता है।]

सेबः (आम की तरफ देख कर) हम सभी फलो की स्थिति लगभग एक जैसी ही है, महाराज। अधिकांश लोग हमे खाने का तरीका नही जानते, इसलिअ हम लोग चाहते हुए भी उतना अधिक फायदा नही पहुँचा पाते जितना पहुँचना चाहिए; बल्कि कभी कभी उलटे उन्हें फायदा की जगह हमसे नुकसान हो जाता है। उदाहरण के लिए मुझको ही ले लीजिए। खनिज लवण और विटामिन की मैं खान हूँ, गुणों का मै खजाना हूँ। मेरे बारे में तो यहा तक कहा गया है कि जो व्यक्ति रोज एक सेब खाए उसे कभी डाँक्टर के यहाँ जाने की जरूरत नही पडती। लेकिन बुहत से लोग ऐसे है जो खाने से पहले मेरी चमडी,यानी छिकला उतार देते हैं। मेरे छिकले के ठीक नाचे विटामिन ‘सी’और ‘ए’ होता है, जो छिकला उतारने से नष्ट हो जाता है। लोगों को चाहिए कि मुझे छिकला सहित ही धोकर खाएँ।

[सेब बैठ जाता है।]

आमः आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं; सेब जी। आप सबकी बातो से यही निष्कर्ष निकलता है कि लोग फलो को खाने में आवश्यक सावधानी नही बरतते। लोगो को चाहिए कि खाने से पहले फलो को खूब अच्छी तरह से धो लें। कुछ फसो की तासीर गरम होती है जैसे मैं खुद हूँ। अतः लोगों को चाहिए कि खाने से पूर्व हमें कुछ देर तक पानी में भिगोए रखें। तीसरी बात यह कि फलो को उनके छिकले सहित खाना चाहिए। छिकले उतारने से फलो के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। अच्छा भाइयो, सभी को बहुत- बहुत धन्यवाद! अब सभा विसर्जित की जाती है।

[पर्दा गिरता है।]


भक्तराज प्रह्लाद


अजय प्रसून



पात्र-परिचय

हिरण्यकशिपुः प्रह्लाद का पिता एवं दैत्यों का राजा।
षंड
मार्क दैत्यों के गुरू शुक्राचार्य के पुत्र।
नृसिंह भगवानः भगवान विष्णु के अवतार, जिन्होने हिरण्यकशिपु
से प्रह्लाद की रक्षा की।
हिरण्यकशिपु के दरबारी, प्रह्लाद की
बाल्यावस्था के साथी, जो उसके साथ विद्यालय में
अध्ययन करते थे तथा सैनिक।

पहला दृश्य


[स्थानः हिरण्यकशिपु का दरबार। समयः दोपहर।
दरबार में हिरण्यकशिपु उसके प्रमुख दरबारी तथा
षंड एवं मर्क बैठे हैं।]

हिरण्यकशिपुः(गंभीर स्वर में) षंड एवं मर्क।
षंड एवं मर्कः (एक साथ) आज्ञा दे सम्राट।
हिरण्यकशिपुः तुम दोनों हमारे विद्वान शुक्राचार्य के पुत्र हो, इसलिए हमें प्रिय एवं आत्मीय हो। हम चाहते है कि तुम दोनो हमारे प्रिय पुत्र प्रह्लाद की शिक्षा-दीक्षा का दायित्व स्वीकार करो। उसे अपने ढंग से हमारे विचारो के अनुसार शिक्षित करो। साथ यह भी देखते रहो कि जैसा मैं चाहता हूँ उस तरह का आचरण कर रहा है अथवा नहीं। इसके साथ ही समय-समय पर यह भी सूचुत करो कि वह हमारे अनुकूल व्यवहार करता है अथवा नहीं।

षंडः अपराध क्षमा हो, सम्राट् ! कृपा करके यह भी बता दे कि हम दोनो को प्रह्लाद को किस प्रकार की शिक्षा देनी है और उसे किस प्रकार का आचरण भविष्य में करना है; ताकि हम उसी प्रकार आपके अनुसार प्रह्लाद को दीक्षित कर सकें?
मर्कः और महाराज! यह भी बताएँ कि यदि वह उस प्रकार का व्यवहार नहीं करता जैसा आप चाहते हैं तो हमें क्या करना होगा? क्योंकि प्रह्लाद राजपुत्र है और हमारी सीमा...

हिरण्यकशिपुः तुम दोनों प्रह्लाद को राक्षसी विद्या का ज्ञान कराओ और साथ ही उसे अस्त्र-शस्त्रों की भी शिक्षा देनी है। यदि प्रह्लाद ऐसी शिक्षा में मन नही लगाता है तो उसके साथ कठोरता का व्यवहार करो। उसे बताओ कि दुनिया में एकमात्र ईश्वर एवं स्वामी हम है, विष्णु नही; क्योंकि इस दुनिया में मेरा सबसे बड़ा शत्रु विष्णु है। उसने धोखे से मेरे भाई हिरण्याक्ष का वध कर दिया था। अतः जैसे भी हो, विष्णु से मुझे बदला लेना है। लोग उसे भगवान मानते हैं, लेकिन सबसे बड़ा भगवान् मैं हूँ। यही शिक्षा तुम्हें देनी हैं।








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