विश्व प्रसिद्ध लोककथाएँ - चित्रा गर्ग Vishwa Prasidh Lokkathyein - Hindi book by - Chitra Garg
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विश्व प्रसिद्ध लोककथाएँ

चित्रा गर्ग

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 447
आईएसबीएन :81-8133-451-5

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देश-विदेश की सभ्यता-संस्कति का सहज बोध कराने वाली लोककथाओं का अनूठा संकलन। हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि इन विश्व प्रसिद्ध कथाओं को पढ़कर बच्चों में नैतिक समझ तो आयेगी ही, वे बुद्धिमान भी कहलायेगे।

Vishva prasidhya lok kathayein

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

देश-विदेश की सभ्यता, संस्कृति, लोक-परम्पराओं और रीति-रिवाजों को जानने-समझने का यह सबसे सुगम मार्ग है - उन देशों की लोककथाएं। ये नैतिकता, सत्य कर्त्तव्यनिष्ठा, आपसी भाईचारे और विश्व-बन्धुत्व का भी संदेश देती हैं।
प्रस्तुत संकलन में हमने देश-विदेश की चुनी हुई, शिक्षाप्रद लोककथाओं को ही स्थान दिया है। इनसे बच्चों का मनोरंजन तो होता ही है, उनमें एक नई चेतना भी जाग्रत होती है। घर बैठे उन्हें दूर देश की सभ्यता-संस्कृति का भी ज्ञान होता है, जो उनका सामान्य ज्ञान बढ़ाकर उन्हें मेधावी बच्चों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देता है।
हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि इस विश्व प्रसिद्ध कथाओं को पढ़कर बच्चों में नैतिक समझ तो आयेगी ही, वे ‘जीनियस’ भी कहलायेंगे - यानी दुगुना लाभ।

दो शब्द

लोक कथाओं के इतिहास का संबंध मानव के अस्तित्व से जुड़ा है। लोककथाओं की यात्रा बिलकुल वैसी ही है, जैसी स्रोत से निकलते जलप्रवाह की होती है। जल अपने स्रोत से निकलकर अपनी राह की छोटी-मोटी धाराओं को समेटता हुआ नदियों में स्वयं को आत्मसात करता हुआ महासागर में जा मिलता है। इसकी यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती, वह बादलों पर सवार होकर बरसता है अपने स्रोत पर या फिर उसी के आसपास किसी पर्वत श्रृंखला पर।

लोककथाओं में संबंधित सभ्यता-संस्कृति की स्पष्ट झलक होती है। समय-समय पर इनमें काफी कुछ नया जुड़ता है। इसलिए लोककथाएं जहां मनोरंजन करती हैं, वहीं किसी भी सभ्यता-संस्कृति का उतार-चढ़ाव भी स्वयं में समेटे होती हैं। इनमें होता है—भावनाओं और विचारों का समावेश। ये जहां सपनों की दुनिया की सैर कराती हैं, वहीं उस यथार्थ की भी जानकारी देती हैं, जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में भोगता है। इस प्रकार आदर्शों और यथार्थ का अनूठा सम्मिश्रण होता है इन लोककथाओं में।

लोककथाओं के अपार सागर में से कुछ चुनना आसान काम नहीं था। चुनाव करते समय मैंने मनोरंजन और शिक्षा—दोनों पक्षों का ध्यान रखा है। प्रयास किया है कि भाषा-शैली सरल एवं सुगम हो, ताकि प्रत्येक आयु वर्ग के लिए यह पुस्तक उपयोगी बन सके। आपको यह पुस्तक कैसी लगी, इसे मैं जरूर जानना चाहूंगी।
-चित्रा गर्ग

1
चोरी की सजा

एक गांव में एक बूढ़ा किसान अपनी पत्नी के साथ रहता था। उसका एक छोटा-सा खेत था। उस खेत में ही कुछ सब्जियां बोकर और उन्हें बेचकर किसान अपना व अपनी पत्नी का गुजारा करता था।
एक बार किसान ने सोचा कि इस बार वह पूरे खेत में शलगम बोएगा। उसने अपनी पत्नी से पूछा—‘‘मैं सोचता हूं कि इस बार खेत में शलगम बो दूं, तुम्हारा क्या खयाल है !’’

पत्नी ने कहा, ‘‘शलगम की फसल अच्छी होगी, तब तो आराम से रह सकेंगे वरना भोजन के भी लाले पड़ जाएंगे।’’
‘‘मैं फसल को समय पर पानी दूंगा, खूब देखभाल करूंगा तो फसल जरूर ही अच्छी होगी,’’ किसान ने फिर कहा। फिर किसान ने अपनी फसल खेतों में बो दी।

किसान की किस्मत अच्छी थी कि इस बार शलगम की फसल बहुत अच्छी हुई। एक दिन एक बूढ़ा किसान खेत पर गया तो वह यह देखकर हैरान रह गया कि खेत में जगह-जगह शलगम के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। उसने झुक कर देखा कि ढेरों शलगम फैली पड़ी हैं, परंतु सभी छोटे-छोटे टुकड़े बचे पड़े हैं।

किसान की समझ में नहीं आया कि यह कैसे हो सकता है। वह सोचने लगा कि यदि कोई आदमी शलगम चुराता तो पूरी ही उठा ले जाता। शलगम के टुकड़े करके तो किसी ने मेरा नुकसान करने की कोशिश की है। यह काम जरूर किसी दुश्मन का है। सोचते-सोचते वह घर पहुंच गया और अपनी पत्नी से बोला ‘‘मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि हमारी दुश्मनी किससे है ?’’

उसकी पत्नी बोली—‘‘हमारी दुश्मनी तो किसी से नहीं, जरा खुलकर बताओ। बात क्या है ?’’
किसान बोला—‘‘किसी ने हमारा नुकसान करने की कोशिश की है। अपने खेत में ढेरों शलगम के टुकड़े पड़े हैं। अगर कोई चुराता तो शलगम ही निकाल कर ले जाता। यह तो किसी जानी दुश्मन की चाल लगती है जो उसने शलगम के टुकड़े कर डाले। भला हमारा दुश्मन कौन हो सकता है ?’’

उसकी पत्नी बोली—‘‘लगता है तुम्हारा दिमाग बूढ़ा हो गया है, तभी दुश्मन की बात सोच रहे हो। भला हमारा दुश्मन कौन हो सकता है ? जरूर कोई जानवर हमारी फसल खा रहा होगा।’’
बूढ़े किसान को बुढ़िया की बात जंच गई और वह रात को पहरा देने खेत पर चला गया। वह हाथ में कुल्हाड़ी लिए खेत के किनारे घास में छिप कर बैठ गया। आधी रात में अचानक भालू आया और शलगम निकाल कर कुछ खाने लगा और कुछ फेंकने लगा।

किसान ने आव देखा न ताव, अपनी जोर से कुल्हाड़ी भालू की तरफ मारी। कुल्हाड़ी भालू के पिछले पैर में लगी और उसका और उसका एक पैर कट कर गिर गया। भालू दर्द से चिल्लाता हुआ लंगड़ता जंगल की तरफ चला गया। उसके बाद किसान ने भालू की टांग उठाई और घर पर आ गया।
बुढ़िया टांग देखकर खुश हुई। बुढ़िया ने टांग को धोकर उसका खाल उतार दी। उसके बालों से ऊन बुन लिया और फिर टांग का मांस पकने रख दिया। किसान और पत्नी ने जम कर मांस का आनंद लिया।
उधर, टांग कटने से परेशान भालू किसान से बदला लेने की बात सेचने लगा। वह जंगल में गया और पेड़ से लकड़ी तोड़ कर इसकी चौथी टांग बना ली और ठक-ठक की आवाज के साथ चलने लगा। फिर एक दिन मौका देखकर वह सुबह को किसान के घर पहुंच गया। वह बाहर से गीत गुनगुनाने लगा—

मेरी टूटी टांग
मुझे तू पहचान,
तूने अपाहिज मुझे बनाया,
आजा आजा बाहर आजा,
मुश्किल में है तेरी जान !
भालू की आवाज सुनकर किसान और उसका पत्नी थर-थर कांपने लगा। वे जल्दी से दरवाजा बंद करने दौड़े पर भालू भीतर आ चुका था। दोनों लोग डर के मारे अलमारी में घुस गए।

भालू इधर से उधर लंगड़ता हुआ गाना गाता हुआ घूम रहा था। उसकी लकड़ी की टांग खट-खट की आवाज कर रही था। अचानक उसका लकड़ी की टांग निकल गई और वह अपना संतुलन खो बैठा।
भालू घर की सीढ़ियों के पास के तहखाने में जा गिरा। किसान को ज्योंही भालू के तहखाने में गिरने की आवाज आई, उसने अलमारी से निकल कर तहखाने का दरवाजा बंद कर दिया।
किसान की पत्नी घर से बाहर आकर शोर मचाने लगी। सारे पड़ोसी इकट्ठा हो गए। सबने मिलकर भालू को मार डाला। अब किसान चैन से रहने लगा।


2
मुसीबत का मारा

आसिफ शेख कपड़ा का बहुत बड़ा व्यापारी था। उसने ढेरों दौलत जमा कर रखी थी। उसका व्यापार आस-पास के देशों में भी फैल चुका था। वह कभी-कभी उन देशों की यात्रा भी किया करता था। जब उसका बेटा जवान हो गया तो वह अपने पिता के व्यापार में हाथ बंटाने लगा।
एक बार आसिफ शेख ने अपने बेटे खुर्रम से कहा—‘‘हमारे पास बांग्लादेश से बहुत बड़ा आर्डर आया है, तुम्हें सामान लेकर वहां जाना होगा।’’
खुर्रम ने अब तक किसी देश की यात्रा नहीं की थी। वह यह जानकर बहुत खुश हुआ कि उसके अब्बा उसे बांग्लादेश भेज रहे हैं। उसने तुरंत वहां जाने की तैयारी शुरू कर दी।
अगले दिन खुर्रम सामान लेकर बांग्लादेश के लिए रवाना हो गया। वह होटल में सामान रखकर वहां के बाजार में घूमने निकला। रास्ते में उसने एक निराला फल बिकते देखा। उसने इतना बड़ा फल आज तक नहीं देखा था। वह फल के पास गया और फल को हाथ में उठाकर देखा तो हैरान रह गया कि ऊपर से कांटों वाला यह फल बहुत ही भारी था।
खुर्रम ने पूछा—‘‘भाई जान, इसे क्या कहते हैं ?’
फल वाला हंसते हुए बोला-‘‘साहब, इसे कटहल कहते हैं।’’
खुर्रम ने कटहल को सूंघकर देखा तो उसे कटहल की खुशबू अच्छी लगी। वह सोचने लगा कि यदि इस कटहल की खुशबू इतनी अच्छी है तो स्वाद कितना अच्छा होगा ? परंतु मन ही मन खुर्रम यह सोच रहा था कि इतना बड़ा फल बहुत महंगा होगा।
उसने फल वाले से पूछा—‘‘भाईजान, कटहल कितने का है ?’’
फल वाले ने उत्तर दिया—‘‘दस आने का।’’
खुर्रम को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उसे लगा कि शायद उसने गलत सुना है या फल वाले का ध्यान कहीं और है, इस कारण उसने गलती से कटहल का दाम कम बता दिया है। उसने तुरंत जेब से पैसे निकाले और कटहल खरीद लिया। कटहल खरीद कर वह सीधे होटल पहुंचा। छुरी निकाल कर कटहल काट लिया और उसे खाने लगा। उसे कटहल का स्वाद बहुत अच्छा लग रहा था, इस कारण आधे से अधिक कटहल उसने खा लिया।
खाने के पश्चात वह नल पर हाथ धोने गया, परंतु उसके हाथ व मुंह बुरी तरह से चिपक रहे थे, इस कारण साफ नहीं हो सके। हाथ धोने की कोशिश में वे और भी ज्यादा चिपक गए। उसने हाथों को बार-बार साबुन से रगड़ा परंतु वे साफ नहीं हो रहे थे। उसने देखा कि कटहल का रस कपड़ों पर लग गया है। उसने कपड़ों को नैपकिन से साफ करने की कोशिश की, परंतु नैपकिन कपड़ो से चिपक गया। वह अकेला था इस कारण समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। वैसे भी खुर्रम अपने घर से पहली बार अकेला निकला था। इस कारण थोड़ा घबरा रहा था। उसने सोचा कि होटल के मालिक या किसी नौकर से पूँछ लूं कि इसे कैसे साफ किया जाए।

खुर्रम कमरे से बाहर निकल कर ज्यों ही किसी के सामने पड़ा वह व्यक्ति खुर्रम को देखकर हंसने लगा। खुर्रम की हिम्मत ही नहीं हुई कि वह किसी से कुछ पूछे। वह चुपचाप होटल के बाहर निकल गया। बाहर तेज हवा चल रही थी। सड़क के पत्ते उड़-उड़ कर खुर्रम के कपड़ों पर चिपकने लगे। उसकी मूछों के बाल भी चिपक कर अजीब से लग रहे थे। हवा के साथ धूल-मिट्टी, कागज, पंख आदि उसके कपड़ों व हाथों में चिपकते जा रहे थे। वह जिधर से निकलता, उधर से लोग उसे देखकर हंसने लगते। उसका चेहरा भी धूल से चिपकने से गंदा लगने लगा था।
कुछ लोग उसे पागल समझकर उसके पीछे चलने लगे। खुर्रम समझ में नहीं आया कि वह क्या करे। वह चुपचाप दुकान में घुस गया और एक कोने में छिपने का प्रयास करने लगा। संयोग से वह दुकान एक सर्राफ की थी। वहां ग्रहकों को दिखाए गए आभूषण एक मेज पर रखे थे। खुर्रम उस मेज से टकरा गया और कुछ आभूषण उसके कपड़ों से जा चिपके। ज्योंहि खुर्रम छिपने का प्रयास करने लगा दुकान के मालिकी निगाह उस पर गई। उसने चोर-चोर’ कह-कहकर शोर मचा दिया। दुकान के नौकरों ने खुर्रम को पकड़ लिया। भीड़ इकट्ठी हो गई।
पुलिस को खबर दी गई। खुर्रम ने लाख समझाया कि उसने चोरी नहीं की है परंतु उसके कपड़ों पर चिपके आभूषणों के कारण किसी को विश्वास न हुआ। उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया। पुलिस ने खुर्रम से चोरी का कारण जानना चाहा तो उसने सविस्तार से कटहल खाने की पूरी बात उन्हें बता दी। थानेदार हंसता हुआ बोला—‘‘अरे मियां, जब खाना नहीं आता था तो कटहल खाया क्यों ? अच्छा, यह बताओ कि तुम किस व्यापारी के यहां आए थे।’’
खुर्रम को उस व्यापारी के यहां ले जाया गया। परंतु उस व्यापारी ने खुर्रम के हुलिए के कारण उसे पहचानने से इन्कार कर दिया। तब खुर्रम ने अपना व अपने पिता का पूरा नाम बताया, साथ ही अपने साथ लाए सामान की पूरी जानकारी दी। इस पर व्यापारी ने उसे पहचानते हुए कहा—‘‘थानेदार जी, यह अपना ही बच्चा है। इसे छोड़ दीजिए। यह हालात के कारण मुसीबत में फंस गया है।’’
अब खुर्रम बोला—‘‘पहले मुझे इस मुसीबत से छुटकारा दिलाइए।’’
व्यापारी ने खुर्रम को बदलने के लिए कपड़े दिए। उसका चेहरा व हाथ-पैर साफ करवाए, फिर उसकी अच्छी खातिरदारी की और कहा—‘‘बेटा याद रख, किसी भी नई चीज को आजमाने से पहले उसकी थोड़ी जानकारी अवश्य ले लेनी चाहिए।’’



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