अभिज्ञान - नरेन्द्र कोहली Abhigyan - Hindi book by - Narendra Kohli
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अभिज्ञान

नरेन्द्र कोहली

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :232
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4429
आईएसबीएन :9788170282358

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कृष्ण-सुदामा की मनोहारी कथा...

Abhigyan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अभिज्ञान
1

‘‘इस बार बहुत दिनों पर चक्कर लगा बाबा !’’ सुदामा ने बाबा का झोला एक खूंटी पर टांग दिया।
सुशीला ने तिनकों का बना आसन-भूमि पर बिछा दिया,‘‘बैठिए बाबा !’’
बाबा ने सुदामा को कोई उत्तर नहीं दिया। आसन पर बैठकर पहले तो सांस को नियंत्रित-सा करते रहे और फिर सुशीला की ओर उन्मुख होकर बोले, ‘‘कैसी हो बेटी ?’’
सुशीला मुस्कराई, ‘‘हम कैसे होंगे बाबा ! जैसे आप छोड़ गए थे, वैसे ही हैं। वहीं हैं। यहां कुछ भी घटित नहीं होता ! न अच्छा, न बुरा। हमारा संसार तो अचल है न । आप सुनाइए, कैसे हैं ?’’
बाबा हंस पड़े, ‘‘तेरा-मेरा सोचना विपरीत दिशा में चलता है बिटिया ! तुम सोचती होगी कि जो कुछ घटित होता है, बाहर ही होता है। घर में कुछ नहीं घटता। घरों में व्यवस्थापूर्वक रहने वालों के जीवन में कोई विशेष आरोह-अवरोह नहीं है। उनका कुशल-मंगल एकरस ही रहता है...।’’
‘‘हाँ, बाबा !’’
‘‘और जो मुझ जैसे घुमक्कड़ लोग हैं, बाहर-ही-बाहर रहते हैं। घटनाओं के साथ वे ही चलते हैं। उनके कुशल की सूचना मिलनी ही चाहिए। वे किसी दुर्घटना के साथ न हो जाएं या उनके साथ कहीं कोई दुर्घटना न हो जाए...।’’ बाबा हंस पड़े।
‘‘अब बाबा का शब्दों के साथ खिलवाड़ और भी बढ़ गया है।’’ सुदामा धीरे-से बोले।
‘‘शब्दों का खिलवाड़ ही सही, पर बात तो ठीक कह रहे हैं बाबा !’’ सुशीला ने सुदामा का प्रतिवाद किया।

‘‘और मैं सोचता हूं बिटिया,’’ बाबा उन दोनों के विवाद से निरपेक्ष अपनी बात कहते गए, ‘‘जब तक ठीक हैं, चल रहे हैं जब ढीले हुए, रुक गए। मेरे साथ गृहस्थी का दायित्व तो है नहीं। तुम लोग गृहस्थ हो। हजार प्रकार के दायित्व हैं। बच्चे हैं..अरे, तुम्हारे बच्चे कहां हैं?’’ बाबा रुक गए।
‘‘यहीं कहीं खेल रहे होंगे।’’ सुशीला बोली,‘‘मैं अभी ढूंढकर लाती हूं।’’
सुशीला कुटिया से बाहर चली गई।
बाबा ने सुदामा की ओर देखा, ‘‘तुम कैसे हो ? पहले से भी दुबले हो गए हो। श्रम अधिक कर रहे हो, या यह चिंताओं का सुफल है ? तुम्हारा मित्र कृष्ण कहता है न कि कर्म का फल अवश्य मिलता है।’’ बाबा के स्वर में हल्की-सी उत्तेजना थी,‘‘चिंता भी तो एक कर्म ही है..।’’
सुदामा हंस पड़े, ‘‘अपना क्या है बाबा ! न सावन हरे न भादों सूखे। मोटा ही कब था कि दुबला होऊंगा ? और कृष्ण...।’’

‘‘काम अधिक कर रहे हो ?’’ बाबा ने बात काट दी।
‘‘काम का क्या कहूं।’’सुदामा का स्वर एकदम ठंडा था, ‘‘काम तो करता ही रहता हूं। उसे कम और अधिक करके तो कभी नापा नहीं।’’
‘‘तुम्हारे श्रम का फल तुम्हें मिलना आरंभ हो गया है।’’ बाबा स्निग्ध दृष्टि से सुदामा की ओर देखते हुए बोले। उनकी उत्तेजना जिस आकस्मिकता से आई थी, उसी आकस्मिकता से विलीन भी हो गई थी, ‘‘मैंने इधर-उधर घूमते-घूमते, कुछ विद्वानों के बीच, तुम्हारे नाम की चर्चा सुनी है।’’
‘‘किन विद्वानों के बीच ?’’ सुदामा उत्सुक हो उठे।

बाबा हंस पड़े, ‘‘किनके बीच होगी भाई ! राजदरबारों में तुम्हारी चर्चा होगी या आचार्य-कुलों में !...कुछ नए वय के बुद्धिजीवियों, चिंतकों-विचारकों में ही चर्चा सुनी है। वह भी उनमें, जो ईर्ष्या, घृणा और हताशा की आग में जल-जलकर हतबुद्धि नहीं हो गए हैं, जो ग्रंथियों से मुक्त हैं, प्रत्येक बुद्धिजीवी को अपना प्रतिस्पर्धी नहीं मानते, प्रत्येक उदीयमान दार्शनिक से द्वेष नहीं करते...।’’
सुदामा का उत्साह मंद पड़ गया। व्यर्थ ही पूछने की उत्सुकता दिखाई। क्या वे नहीं जानते कि विद्वत् मंडली का स्वाभाव क्या है। और जब उन्होंने निर्णय कर ही लिया है कि अपने मार्ग पर वे अपनी योग्यता और श्रम के भरोसे ही अग्रसर होंगे ! आगे बढ़ने के लिए वे किसी भी इतर क्षेत्र की बैसाखी लगाना नहीं चाहते हैं..तो फिर वे कैसे आशा करते हैं कि दो-चार छोटी-मोटी पुस्तकों, कुछ निबंधों और कुछ व्याख्यानों के आधार पर, इतनी कम वय में ही उन्हें इतना योग्य मान लिया जाएगा कि विद्वान् लोग अपने वार्तालाप में उनकी चर्चा करने लगेंगे। और जो कुछ उन्होंने लिखा भी है, उसका प्रसार-प्रचार कहां हो पाया है। उनके पास इतने साधन ही कहां हैं कि वे अपने ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ तैयार करवा उन्हें विद्वानों के अवलोकनार्थ भिजवाएं। न उनका कोई ऐसा समर्थ सहायक है, जो लेखनी-श्रमिकों को पारिश्रमिक देकर प्रतिलिपियां करवा दे। स्वयं सुदामा के पास नया लिखने और कहने को इतना अधिक है कि वे अपने पुराने लिखे को दोहराने तक का समय नहीं निकाल पाते...उनकी प्रतिलिपियां तैयार करने की कौन कहे...उनका प्रसार तो पाठकों के प्रेम के आधार पर ही होगा...हां ! यही कार्य किसी साधन-समर्थ व्यक्ति ने किया होता, या साधन-सम्पन्नों की सहायता से किया गया होता तो अब तक उन कृतियों की डोंडी पिट चुकी होती...।

‘‘इस बार आपका चक्कर बहुत दिनों में लगा बाबा !’’ सुदामा ने सहसा जैसे अपनी नींद से जागकर कहा।
पर बाबा भी शायद अपनी बात के बाद किसी नींद में खो गए थे। उन्होंने इस बार भी सुदामा की बात को उत्तर नहीं दिया। बोले, ‘‘तूने बड़ा कठिन मार्ग चुना है सुमाना ! ज्ञान-क्षेत्र बड़ा कठिन क्षेत्र है भाई ! जब बुढ़ापे के मारे सिर हिलने लगता है, आंखों से सुझता नहीं, कान ऊंचा सुनने लगते हैं; मुंह में जो दांत बच रहते हैं, वे सुविधा के लिए कम, पीड़ा के लिए अधिक होते हैं...ऐसी स्थिति में कहीं लोग, बड़े डरे-डरे कहते हैं कि हां ! वह भी थोड़ा-थोड़ा कुछ सोचता है। उदीयमान विद्वान है.. हा-हा-हा।’’ बाबा एक हथेली पर दूसरी हथेली पटककर हंसे, ‘‘जब यम सिर पर नाच रहा हो, तब वह उदीयमान विद्वान होता है। भाई ! तुमने गुरु सांदीपनि से दर्शनशास्त्र ही क्यों पढ़ा ? कृष्ण के समान शस्त्र-संचालन क्यों नहीं सीखा ?’’

सुदामा जैसे किसी स्वप्न में खो गए...अवन्ती में गुरु सांदीपनि का आश्रम..कृष्ण, बलराम और उद्धव भी थे वहां। वे लोग शस्त्र भी सीखते थे और वेद भी पढ़ते थे; पर सुदामा ने कभी शस्त्रशाला की ओर पग भी नहीं बढ़ाए। विचित्र स्थिति थी...यद्यपि युद्ध क्षत्रियों का कार्य था, फिर भी शस्त्र-विज्ञान के सभी आचार्य ब्राह्मण थे...परशुराम, द्रोणाचार्य सांदीपनि...
‘‘क्यों नहीं सीखा ?’’ बाबा ने फिर पूछा।
‘‘क्या कहूं !’’ सुदामा स्वयं ही नहीं जानते थे, ‘‘मैं उन विद्यार्थियों में से नहीं था, जो यह सोचते हैं कि किस विषय का अध्ययन करने से वे लाभ में रहेंगे। मैंने तो वही सीखा, जो मुझे सीखना था..जिसमें मेरी गति थी, या जिसकी पृष्ठभूमि मेरे पास थी। सामगान में मैं अपनी टोली में सबसे आगे था।’’

सुदामा की आंखों के सामने कुछ पुराने दृश्य घूम गए...अनेक विषयों और क्षेत्रों में कृष्ण, सुदामा से ही नहीं, सबसे आगे था। उसकी गति किसी एक विषय में नहीं प्रायः प्रत्येक विषय में थी। किंतु वेदों के प्राचीन पाठ समझने में कृष्ण को कहीं-कहीं कठिनाई होती थी। कृष्ण निःसंकोच सुदामा के पास आ बैठता था और सुदामा उसे कुछ बातें बता दिया करते थे। सुदामा के परिवार में, कई पीढ़ियों से वेद पढ़े जा रहे थे, उन पर चिंतन और मनन किया जा रहा था। सुदामा, वेदों के प्राचीन पाठों के अर्थों को समझते और याद रखते थे। यह विषय जैसे उनके रक्त में था। उसके लिए उन्हें अधिक प्रयास नहीं करना पड़ता था...पर कृष्ण की मानसिकता कुछ और ही थी। या तो वह उन पाठों और अर्थों को समझ नहीं पाता था और या फिर उनसे तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाता था। वह उन प्राचीन पाठों में भी नये अर्थ खोजता था...और आज उसी कृष्ण की चर्चा ऐसे होती है, जैसे वह कोई महामानव हो....कुल चौंसठ दिन गुरु के पास रहा और गुरु का पट्ट शिष्य बन गया।...गुरु का अपहृत पुत्र जो लौट आया...।
‘‘अच्छा होता, तूने भी छात्र धर्म अपनाया होता।’’ बाबा कह रहे थे,
‘‘यादव सेनाओं के साथ युद्ध में गया होता। किसी युद्ध में शरीर पर एक-आध घाव खाया होता। कुछ थोड़े-से शत्रुओं का वध किया होता। तब तुझे भी वीर की पदवी भरी जवानी में मिली होती। कोई पद भी मिलता और धन भी। तब तू न इस प्रकार अख्यात रहता और न धन के अभाव में पीड़ित होता।’’

‘‘धन का अभाव मुझे अवश्य है बाबा !’’ सुदामा बोले, ‘‘पर वह मेरा लक्ष्य ही नहीं है, तो उसके अभाव में मैं पीड़ित क्यों हूंगा ?’’
‘‘ठीक कहता है तू,’’ बाबा का स्वर उदास था, ‘‘पर प्रत्येक गृहस्थ को धन की आवश्यकता तो होती ही है तुझे धन नहीं चाहिए, क्योंकि तूने जीवन को देखने की एक ऐसी दृष्टि पाई है, जिसमें धन का आवश्यकता भर धन का भी कोई महत्त्व नहीं है। पर तेरी पत्नी ! तेरे बच्चे ! उन्होंने क्या अपराध किया है कि उन्हें वे सुविधाएं भी न मिलें, जो प्रत्येक घर में पत्नी और बच्चों को मिलती हैं ?’’
‘‘अपराध का प्रश्न कहां है बाबा !’’ सुदामा का स्वर गंभीर था, ‘‘जब मेरे साथ संबंध है, तो मेरे अच्छे-बुरे को भी उन्हें भुगतना ही होगा।
मेरे जीवन में यदि कोई उपलब्धि हुई..धन की बात नहीं कर रहा हूं; वैचारिक उपलब्धि, ख्याति या ऐसी ही कोई अभौतिक वस्तु...तो उसका लाभ वे पाएंगे या नहीं ? ऐसे में मेरे जीवन के अभावों में भी तो उनकी सहभागिता होगी ही।...और फिर सुदामा तो जीवन के भौतिक धरातल पर जीता ही नहीं है। कीचड़ में बिलबिलाते एक कीड़े और स्वच्छ वायु-मंडल में जीने वाले एक जीव में कोई अंतर तो होगा बाबा ?’’
‘‘तुमसे असहमत नहीं हूं।’’ बाबा बोले, ‘‘विवेकपूर्ण स्वच्छ जीवन जीने का पक्षपाती मैं भी हूं। इसलिए तो गृहस्थी के बंधन मुझे बांध नहीं पाए। अपने परिवार के साथ रहना तो दूर, टिककर एक स्थान पर ही नहीं रह सका...पर जब तेरी पत्नी और बच्चों को जीवन की आवश्यकताओं के अभावों की असुविधा झेलते देखता हूं तो मुझे कष्ट होता है। तू कोई दूसरा काम क्यों नहीं करता, जिससे कुछ धन अर्जित कर सके ?’’

‘‘वह मेरा स्वधर्म नहीं है बाबा !’’ सुदामा का स्वर पूर्णतः आवश्वस्त था, ‘‘मेरा सखा कृष्ण कहा करता था कि स्वधर्म के अनुसार जीना ही श्रेष्ठ है। शायद इसीलिए मैंने शस्त्र-विद्या नहीं सीखी, केवल दर्शनशास्त्र पढ़ा।..कृष्ण की बात तो है ही; पर अब तो मैं स्वयं ही अनुभव करने लगा हूं कि स्वधर्म में जीना असुविधाजनक हो सकता है, पर यह कष्टदायक नहीं है। असुविधा कोई सत्य तो है नहीं, एक अनुभूति ही तो है। मेरी प्रकृति, मेरा स्वधर्म धनापार्जन नहीं है। मैं अपनी अन्तःप्रेरणा से कार्य करता हूं। उस काम में रस पाता हूं। मुझे अपनी सार्थकता का बोध होता है। धनार्जन मेरा लक्ष्य हो जाए तो भौतिक असुविधाएं कदाचित् समाप्त हो जाएं, पर इनसे मेरे कष्ट बढ़ जाएंगे।’’
‘‘समझता हूं।’’ बाबा का स्वर स्नेह में छलछलाया हुआ था, ‘‘मुझसे अधिक कौन समझेगा। मेरी अन्त-प्रेरणा मुझे धक्के मार-मारकर चलाती, रही। एक स्थान पर टिककर रहना मेरी प्रकृति नहीं है। मेरा स्वधर्म, मेरी प्रकृति तो गति है, प्रवाह...चलते रहना। इससे मेरे परिवार को असुविधा नहीं होती क्या ? बहुत होती है। वे चाहते हैं कि मैं टिककर उनके साथ रहूं। पर यदि मैं उनके साथ रहा, मेरी गति रुक गई तो मेरा दम घुट जाएगा...।’’
सुशीला ने बच्चों के साथ कुटिया में प्रवेश किया।

‘‘बाबा को प्रणाम करो।’’
बाबा ने बच्चों पर दृष्टि डाली। दो दुबले-पतले लड़के उनके सामने खड़े थे। बड़ा विवेक, कोई बारह-तेरह वर्ष का था। शरीर पर घुटनों से ऊपर तक की एक स्वच्छ धोती थी। उसे लंगोटी का विस्तृत रूप कहा जा सकता था। शेष शरीर नंगा था। उसकी पसलियां सुविधा से गिनी जा सकती थीं। घुटनों की गांठें टांगों में से अलग दिखाई पड़ रही थीं। ज्ञान, सात-आठ वर्ष का रहा होगा। शरीर का गठन उसका भी वैसा ही था। पर अभी उसके शरीर का मांस कुछ कोमल था। वय के साथ उसका शरीर बढ़ेगा और पौष्टिक आहार नहीं मिलेगा तो उसकी भी वही स्थिति होगी।
बाबा ने दोनों को अपनी बांहों में घेरकर अपने निकट खींच लिया।
‘‘मुझे पहचानते हो ?’’
‘‘आप हमारे बाबा हैं।’’ विवेक ने भीरु स्वर में कहा।

‘‘हां ! तुम्हारे बाबा और मैं मित्र थे, इसलिए मैं तुम्हारा बाबा हूं।’’ बाबा हंसे, ‘‘अच्छा, यह बताओ, तुम दोनों अधिक खेलते हो या अधिक पढ़ते हो।’’
‘‘दोनों खिलंदड़े हैं।’’ सुदामा बोले, ‘‘अध्ययन में, दोनों में से किसी की भी रुचि नहीं है। मेरे पिता का ज्ञान आश्रम भर में फैला था, मेरा एक कुटिया तक सीमित रह गया है। इनके समय तक शायद वह एक झोले में समाने योग्य ही रह पाए।’’
‘‘कितना पढ़ेंगे अभी से ?’’ सुशीला ने सुदामा की बात काटकर, बाबा की ओर देखा, ‘‘ये तो चाहते हैं कि बच्चे अभी से इन्हीं के समान, इन्हीं के बराबर अध्ययन करें।’’
‘‘मेरे बराबर न करें।’’ सुदामा बोले, ‘‘पर उनकी प्रवृत्ति तो दिखाई पड़े।’’
‘‘प्रवृत्ति और कैसे दिखाई पड़ेगी ?’’ सुशीला के स्वर में रोष था, ‘‘उनका खेल भी ताल-पत्रों के ग्रंथ बनाने तक सीमित है।’’

‘‘नहीं । यह उचित नहीं है।’’ बाबा स्नेह भरे स्वर में बोले, ‘‘बच्चों का स्वस्थ शारीरिक विकास बहुत आवश्यक है। उन्हें खेल का पूरा समय मिलना चाहिए और पौष्टिक भोजन भी...।’’
‘‘स्वस्थ तो हैं बाबा !’’ सुदामा टालते-से-बोले, ‘‘दिन भर भागते-दौड़ते हैं। पतले हो सकते हैं, पर दुबले नहीं हैं। खड़े-खड़े चक्कर नहीं खा जाते और चलते-चलते गिर नहीं पड़ते।’’
‘‘आप उसी की प्रतीक्षा में हैं क्या ?’’ सुशीला की आंखें गीली हो गईं, ‘‘यदि आज तक ऐसा नहीं हुआ तो भगवान की कृपा के कारण; अन्यथा कौन नहीं जानता कि इन बच्चों को पौष्टिक भोजन तो दूर, दोनों समय भरपेट भोजन भी नहीं मिल पाता।’’
बाबा ने प्यार से दोनों बच्चों की पीठ पर हाथ फेरा, ‘‘तुम लोग जाओ-पुत्र अपने मित्रों के साथ खेलो।’’
‘‘खेल कर आएंगे तो आप हमें कहानी सुनाएंगे ना बाबा ?’’ ज्ञान पहली बार बोला।
‘‘क्यों नहीं सुनाऊंगा। अवश्य सुनाऊंगा।’’

‘‘पिछली बार के समान पिताजी से ही बातें करने में लीन तो नहीं रहेंगे न ?’’ ज्ञान भोली धृष्टता के साथ बोला।
‘‘चल भाग।’’ सुदामा ने प्यार-भरे स्वर में डांटा।
बाबा जोर से हंस पड़े, ‘‘तुझे अब तक याद है रे ! तू बड़ा दुष्ट है, फिर तो मैं तो समझता था कि तू मुझे पहचानता भी नहीं होगा, और तू उन घटनाओं को भी याद रखे हुए हैं।’’ बाबा हंसते चले गए, ‘‘सुदामा ! तेरा बड़ा बेटा तो कुछ बोलता ही नहीं। पता नहीं गंभीर है या चुप्पा है। देख ! छोटा मुझे भी बना गया। यह बड़ा होकर बड़े-बड़ों को शास्त्रार्थ में पराजित किया करेगा रे !’’
बाबा ने फिर से बच्चों के सिर पर हाथ फेरा।
बच्चे बाहर चले गए तो कुटिया में चुप्पी छा गई। शायद किसी की भी समझ में नहीं आ रहा था कि बात कहां से आरंभ की जाए।

अंततः बाबा ही बोले, ‘‘बहू ! क्या सचमुच स्थिति इतनी खराब है ?’’
सुशीला ने प्रयत्नपूर्वक, मुस्कान से अपने चेहरे की उदासी धो डाली। ‘‘कहां खराब है बाबा ! आप तो सचमुच ही चिंतित हो उठे। मैंने तो यूं ही कहा था...।’’
‘‘अब तुमने गृहिणी का रूप धारण कर लिया है बिटिया,‘‘बाबा हंस पड़े, ‘‘और गृहिणी अन्नपूर्णा होती है। पर बहू ! बच्चों को भरपूर भोजन का न मिलना..और मैं ठहरा तुम्हारा अतिथि। बोझ बढ़ाने वाला..’’
‘‘नहीं बाबा ! नहीं।’’ सुशीला बोली, ‘‘आप ऐसा कुछ मत सोचिए। कभी-कभी वैसा संयोग भी हो जाता है; पर आज कोई कमी नहीं है। आप स्वयं देख लेगें।’’
‘‘आप चिंता न करें बाबा !’’ इस बार सुदामा उत्साह से बोले। उन्होंने-सुशीला के चेहरे की मुस्कान से समझ लिया था कि आज घर में भोजन की कमी नहीं है।
‘‘आपने बताया नहीं कि इस बार कहां-कहां से घूमकर आ रहे हैं ?’’ बाबा ने क्षण भर सोचा शायद उन्हें भी यही ठीक जंचा कि वे विषय बदल दें। बोले, ‘‘इस बार द्वारका चला गया था। वहीं टिक गया। काफी समय वहीं लग गया।’’

‘‘द्वारका !’’ सुदामा के मुख से अनायास निकला, ‘‘कृष्ण की नगरी !’’
‘‘हां ! तुम्हारे कृ्ष्ण की नगरी।’’ बाबा मुस्कराए, ‘‘धनाढ्य नगरी थी। भई। बड़े-बड़े महालय, ऊंची-ऊचीं अट्टालिकाएं, चौड़े-चौड़े राजपथ, उद्यान-उपवन सजे-धजे मनुष्य, रथ, हाथी, घोड़े...लगता था, नगर नहीं है, कोई मेला है-जहां हास और विलास के सिवाय और कुछ नहीं है।’’
‘‘बाबा ! आप भूतकाल में बोल रहे हैं।’’ सुदामा बोले, ‘‘क्या अब द्वारका वैसी नहीं रही ?’’
‘‘शाल्व के आक्रमण के बाद वैसी नहीं रही।’’ बाबा धीरे-से बोले, वैसा नृशंस आक्रमणकारी और कोई क्या होगा। सागर तट के ग्राम के ग्राम उसने जला डाले। उद्यान उजाड़ डाले। न बच्चों को क्षमा किया, न स्त्रियों को, न शस्त्रहीन नारगिकों को। पशुओं तक को उसने नहीं छोड़ा। यादवों का सारा जीवन अस्त-व्यस्त कर डाला। द्वारका के अनेक सुन्दर भवन जला डाले।’’ बाबा क्षण भर रुके, ‘‘यादवों की जो दुर्गति जरासंध नहीं कर पाया था, वह शाल्व ने कर डाली।’’

‘‘यह शाल्व कौन है बाबा ?’’ सुशीला ने पूछा।
‘‘तो तुम लोगों तक द्वारका की दुखद कहानी नहीं पहुँची ?’’ बाबा ने आश्चर्य से पूछा।
‘‘कुछ हल्का-सा समाचार मिला तो था,’’सुदामा धीरे-से बोले, ‘‘पर विस्तार से मालूम नहीं हो सका।’’
‘‘ओह !’’ बाबा शून्य में घूर रहे थे, जैसे उन दृश्यों और घटनाओं को प्रत्यक्ष देख रहे हों।
‘‘कृष्ण ने उन्हें रोका नहीं ?’’ फिर सुशीला ने ही पूछा।
‘‘कृष्ण वहां था कहां।’’ बाबा बोले, ‘‘वह द्वारका में रहता ही कितनी देर है। उसका सारा ध्यान तो आर्यावर्त्त की घटनाओं में ही लगा रहता है।’’
‘‘कृष्ण भी आप ही के समान घुमक्कड़ हैं क्या ?’’


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