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आचार्य श्रीराम शर्मा >> अणु में विभु गागर में सागर

अणु में विभु गागर में सागर

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :112
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4281
आईएसबीएन :0000

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अणु में विभु गागर में सागर

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जो सशक्त है-वह सूक्ष्म है, स्थूल तो उसका आवरण मात्र है। काया को हम देख पाते हैं और मनुष्य को उसके कलेवर के रूप में ही पहिचानते हैं, पर असली चेतना तो प्राण हैं, जो न तो दिखाई पड़ता है और न उसका स्तर सहज ही समझ में आता है। जो सूक्ष्म है-वही शक्ति का स्रोत है, उसे समझने और उपभोग करने के लिए गंभीर लक्ष्य वेधक दृष्टि चाहिए।

छोटे से बीज में वृक्ष का विशालकाय कलेवर छिपा रहता है, एक शुक्राणु में मनुष्य का सारा ढाँचा पूरी तरह सन्निहित है, अणु की नगण्य सी सत्ता में एक पूरे सौर मण्डल की प्रक्रिया पूरी तरह विद्यामान है, यह सब जानते हुए भी हम ‘सूक्ष्मता की शक्ति’ से एक प्रकार अपरिचित ही बने हुए हैं।

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