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किस्मत की खोज

ओम प्रकाश सोंधी

प्रकाशक : स्वास्तिक प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :120
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4086
आईएसबीएन :81-88090-12-3

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एक रोचक उपन्यास..

प्रथम पृष्ठ

Kismat Ki Khoj

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

 

पिछले छह मास से रोहित जिस काम को करने का प्रयत्न कर रहा था उसमें अपना तन और मन लगा देता था और खूब मेहनत करता था। तब भी रोहित को काम में सफलता नहीं मिलती थी। वह जिस काम को हाथ में लेता उसमें उसे असफलता ही मिलती थी। इससे वह हतोत्साहित हो गया। निराशा ने उसे घेर लिया। जीवन से भी वह निराश हो गया था।

एक दिन उसे पता चलता है कि उसके शत्रुओं ने उसकी किस्मत को किसी अज्ञात स्थान पर कैद करके रखा हुआ है।
रोहित के धैर्य, दृढ़ निश्चय, हिम्मत और साहस का सहारा लेकर संघर्ष करने की कहानी है ‘किस्मत की खोज’।

 

-ओम प्रकाश सोंधी

 

किस्मत की खोज

 


बात बहुत समय पहले की है, बल्कि कहना चाहिए कि उस समय की है जब बिजली का अविष्कार नहीं हुआ था। लोग दीपक जलाकर अँधेरे को दूर भगाया करते थे। उस समय एक छोटा-सा गाँव था। उस गाँव का नाम किसनगढ़ था। उसमें कोई सौ घर होंगे। गाँव के लोग खेतों और घरों का काम दिन में ही कर लिया करते थे। इधर शाम आती और उधर लोग खेतों का काम छोड़कर और अपना काम समेटकर अपने-अपने घरों की ओर चल देते। अँधेरा होते-होते सारा गाँव घरों में बन्द हो जाता था। रसोईघर में चूल्हे में जलाने वाली लकड़ी से रोशनी हो जाया करती थी। उसी प्रकाश में बैठकर सारा घर खाना खाया करता था और बातें भी किया करता था। कमरों में छोटा-सा दिया प्रकाश बिखेरा करता था। खाना खाने के पश्चात सारे लोग सोने की तैयारी कर लिया करते थे।

किसनगढ़ गाँव में रोहित अपनी माँ के साथ रहा करता था। रोहित के पिता बचपन में ही स्वर्ग सिधार गए थे। माँ ने कठिनाइयाँ झेलकर रोहित का पालन-पोषण किया था। अब रोहित बड़ा हो गया था और खेतों में काम करता था और माँ की सेवा किया करता था। रोहित की माँ धार्मिक विचारों वाली स्त्री थी। वह नित्य भगवान की पूजा किया करती थी और मन्दिर जाया करती थी। उसने रोहित को शिक्षा दी थी कि लोगों की सेवा करने से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। जिससे भगवान मनुष्य का ध्यान रखते हैं। रोहित के मन में जनता की भलाई करने का विचार कूट-कूट कर भर गया था। गाँव वालों की कठिनाइयाँ दूर करने और उनकी सहायता करने के लिए वह सदा तैयार रहता था। बदले में गाँव के लोग उसे बहुत प्यार करते थे। जब भी किसी के सामने कोई समस्या आती तो वह सीधा रोहित का पास चला आता था और तब रोहित उसकी समस्या को अपनी बना लेता था और उसको सुलझाने के लिए तन-मन से जुट जाता था। ऐसा करते हुए उसको अपनी सुध-बुध भी नहीं रहती थी।

रोहित भी सांयकाल ही खाना खा लिया करता था। उस दिन खाना खाने के पश्चात् वह चारपाई पर बैठकर आराम कर रहा था। वह अपने विचारों में खोया हुआ था कि उसका मित्र घनश्याम आ गया। वह दौड़ता हुआ आया था इसलिए उसकी साँस फूली हुई थी। वह जोर-जोर से हाँफ रहा था। उसके माथे से पसीना बह रहा था। रोहित ने उसकी ओर देखा और समझने का प्रयत्न करने लगा कि घनश्याम को क्या हो गया था परन्तु वह समझ नहीं पाया।
उसने मुस्कराते हुए पूछा, ‘‘क्या हुआ भाई ! कोई भूत पीछे लगा हुआ है क्या ’’
घनश्याम अभी तक लम्बी-लम्बी साँसे ले रहा था। उसने घबराहट भरी आवाज में कहा, ‘‘अरे भूत नहीं बल्कि भूतों का साया पड़ा हुआ है सारे गाँव पर।’’
रोहित को चिन्ता होने लग गई। वह भी घबरा गया था, ‘‘क्या हुआ ?’’ झट से पूछा था रोहित ने।
‘‘कुछ सुना तुमने ?’’ घनश्याम आगे नहीं बोल सका। उसकी साँस फूली हुई थी और दुख के कारण भी उसके मुँह से बात नहीं निकल रही थी।

रोहित अधीर हो उठा था। उसके मन में डर, कौतूहल, उत्सुकता और भय जाग उठे थे।
उसने कहा, ‘‘क्या हुआ ? भागकर आने और पसीना-पसीना होने की क्या वजह है ? मुझको शीघ्र बताओ। मेरा धीरज छूटता जा रहा है।’’
घनश्याम ने रोनी सूरत बनाकर कहा, ‘‘क्या बताऊँ ? आज गाँव में एक और अनर्थ हो गया। भेड़िया रामदई चाची की एक भेड़ उठाकर ले गया है...’’ घनश्याम ने इस प्रकार कहा मानो भेड़िया उसकी ही भेड़ उठाकर ले गया हो।
घनश्याम की बात पूरी करने से पहले ही रोहित इस प्रकार उछल पड़ा मानो उसको किसी बिच्छू ने काट लिया हो। उसने कहा, ‘‘क्या कह रहे हो ?’’ उसकी आवाज में गुस्सा था जो धीरे-धीरे निराशा में बदल गया था। घनश्याम रोहित को उदास देखकर चिंतित हो गया। वह भी चुपचाप बैठा रहा और रोहित की आवाज सुनने की प्रतीक्षा करने लगा।
कुछ देर पश्चात् रोहित ने कहा, ‘‘मुझको विस्तार से बताओ कि क्या हुआ था।’’

घनश्याम अब तक सदमे से सँभल चुका था। उसने जान लिया था कि रोहित दुखी हो गया है और उसका दिल रो रहा था।
वह सहानुभूतिपूर्ण स्वर में बोला, ‘‘हाँ मित्र, भेड़िया भेड़ को ले गया अब तक तो उसको खा भी गया होगा। दुख तो इस बात का है कि रामदई चाची बहुत निर्धन है। उसके पास तो केवल दस भेड़ें थीं। उनसे वह रोटी-पानी का गुजारा बड़ी कठिनाई से कर रही थी। एक भेड़ के कम हो जाने से तो वह और अधिक निर्धन हो गई है। ऐसी स्थिति में वह अपना निर्वाह किस प्रकार कर सकेगी। अब तो उसको भीख ही माँगनी पड़ेगी। यह सोच-सोचकर तो मेरा दिल रोता है।’’
रोहित की मानो बोलती बन्द हो गई। उसके मन को आघात लगा था। वह निर्जीव सा चुपचाप बैठा रहा और पूरब में आकाश में निकल आए शाम के सितारों को एकटक देखने लगा। तब उसके मुख से ठण्डी साँस निकल गई। वह अपने को असहाय जो समझने लगा था।
घनश्याम ने कहा, ‘‘रोहित, तुम्हारे होते हुए पहले तो ऐसा अनर्थ कभी नहीं हुआ था। गाँव के सभी लोग जानते हैं कि जब भी गाँव पर कोई विपदा आई है तभी तुमने उसका सामना करके उसको दूर किया है। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि पिछले पाँच मास से तुमको क्या हो गया है। तुम्हारी वीरता, हिम्मत और साहस कहाँ गायब हो गए हैं। अब तुम विपत्तियों का सामना सफलतापूर्वक क्यों नहीं कर पा रहे।’’

रोहित की आँखों में आँसू आ गए। उसने निश्वास छोड़ दी और कहा, ‘‘मुझे स्वयं नहीं पता मित्र कि मुझको क्या हो गया है। पिछले पाँच मास में मैंने जिस काम में हाथ डाला है उसमें मुझे असफलता का मुख देखना पड़ा है। पाँच मास पहले ही एक घटना में मैंने अपने मित्र विट्ठल की जान बचाई थी। वह घटना मुझको आज भी याद है।’’ कहकर वह अतीत में खो गया।

उस दिन वह अपने प्रिय मित्र के साथ वन में घूमने के लिए गया था। वन में जाकर पक्षियों की बोलियाँ सुनने का बहुत चाव था उसको। विट्ठल वृक्षों को देखा करता था और उनके बीच में से आ रही सूर्य की किरणों को देखकर मन्त्रमुग्ध हो जाया करता था। इसीलिए उन दोनों को जब भी समय मिलता था वे वन में चले जाते थे। एक स्थान पर बैठकर बातें करते, पक्षियों की बातें सुनते और प्रकृति की सुन्दरता का आनन्द लेते। कभी-कभी वे तब तक घूमते रहते जब तक कि थककर चूर नहीं हो जाते। उस दिन भी वे पक्षियों की बोलियाँ सुनते और सुन्दरता का आनन्द लेते हुए गाँव से बहुत दूर निकल गए थे। दोपहर होते-होते गर्मी बहुत बढ़ गई थी। रोहित एक घने वृक्ष को देखकर रुक गया था। वृक्ष पर बैठे हुए पक्षियों का शोर मचा हुआ था। रोहित वृक्ष के नीचे बैठ गया। उसने कहा, ‘‘कुछ देर यहाँ विश्राम करते हैं। साथ बहती हुई नदी के किनारे यह वृक्ष कितना अच्छा लग रहा है। यहाँ पर गर्मी भी कुछ कम है। थोड़ी देर यहाँ बैठकर आराम करते हैं। उसके पश्चात् खाना खाएँगे। माँ ने बड़े प्यार से आलू के पराँठे बनाकर दिए हैं।’’

विट्टल ने अपने कमीज से अपने मुँह पर पंखा झलना आरम्भ कर दिया। उसने कहा, ‘‘ठीक कहते हो, रोहित। यह स्थान हमारे लिए नया लगता है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हम गाँव से बहुत दूर निकल आए हैं और कुछ देर के पश्चात् भूख भी जोर से लग जाएगी।’
रोहित आकाश में उड़ने वाले पक्षियों को देखने लगा। उसने विट्ठल की बात पर ध्यान नहीं दिया।

विट्ठल समझ गया कि रोहित प्रकृति की सुन्दरता में खो गया है। वह भी वृक्ष के साथ टेक लगाकर बैठ गया। दोनों अपने-अपने काम में व्यस्त हो गए। रोहित को कुछ समय पश्चात् ऐसा लगा मानो विट्ठल बहुत थक गया हो। उसने अनुभव किया कि उसको बहुत गर्मी लगने लगी है। उसने कमीज से पंखे का काम लेना आरम्भ कर दिया और नदी की ओर देखने लगा। कुछ देर वह बहती नदी को एकटक देखता रहा। बहते हुए निर्मल और ठण्डे पानी को देखकर उसका मन पानी में जाने को मचलने लगा। उसने रोहित पर दृष्टि डाली। रोहित ध्यानमग्न होकर प्रकृति का आनन्द ले रहा था। विट्टल कुछ क्षण उसकी ओर देखता रहा। वह रोहित के ध्यान को बाँट नहीं सका। अब वह कभी नदी के बहते हुए पानी को देखता तो कभी रोहित की ओर ध्यान लगाता। जब उससे और अधिक धैर्य नहीं हो सका तो उसने कहा, ‘रोहित, चलो नदी में नहाते हैं।’
रोहित ने पहले विट्ठल की ओर देखा। उसके पश्चात् नदी की ओर दृष्टि घूमाई। उसने कहा, ‘‘भाई, यह स्थान हमारे लिए बिल्कुल नया है। तनिक दूसरे किनारों की ओर देखो। उस किनारे पर दलदल है। मुझको लगता है कि उस किनारे पर मगरमच्छ रहते हैं। नदी में जाना हमारे लिए खतरनाक हो सकता है।’
विट्ठल उसको देखकर मुस्करा दिया।

रोहित ने कहा, ‘‘मैं हँसी नहीं कर रहा और तुम भी इस बात को हँसी में मत टालो।’
विट्ठल ने मुस्कराते हुए कहा, ‘तुम तो बिना बात के डर रहे हो। अरे, तुम तो बहुत अच्छे तैराक हो। तैरने में मगर हमारा क्या मुकाबला करेगा। और रहा दलदल का होना। वह तो नदी के किनारे पर होता ही है। जरूरी नहीं कि वहाँ पर मगर भी हों। और मित्र, तुम तो सदा खतरों से खेलते रहे हो।’
रोहित ने कहा, ‘‘खतरा यदि सामने आ जाए तो उसका डटकर मुकाबला करना चाहिए। ऐसा मैंने सदा कहा है परन्तु जानबूझकर मुसीबतों को आवाज देना मैंने कभी अच्छा नहीं समझा।’
विट्ठल ने कहा, ‘‘मित्र, सच बात तो यह है कि नहाने को तुम्हारा मन ही नहीं कर रहा है। इसीलिए बहाने बना रहे हो। अरे, स्पष्ट कह दो कि तुम नहाना नहीं चाहते। मुझको बेकार में क्यों डरा रहे हो।’
रोहित कुछ नहीं बोला। विट्ठल उसको निहारता रहा और उसके उत्तर की प्रतीक्षा करता रहा। रोहित नहीं बोला। वह प्रकृति के सौंदर्य में मस्त बैठा रहा। विट्ठल उठता हुआ बोला, ‘भई, अब हमसे तो रहा नहीं जाता। हम तो चले नहाने।’ उसने अपनी कमीज उतारी और रोहित के पास रख दी।

उसने कहा, ‘तनिक इसका ध्यान रखना।’ फिर वह नदी की ओर गया। कुछ क्षण वह किनारे पर खड़ा पानी को देखता रहा और क्षण-भर बाद छलाँग लगाकर नदी में कूद गया। रोहित विट्ठल को देखने लगा। वह उसको देखे जा रहा था। विट्ठल पानी में डुबकियाँ लगाने लगा। कभी वह तैरने लगता तो कभी गोता लगाकर पानी के नीचे चला जाता। तब रोहित साँस रोककर उसके पानी के ऊपर आने की प्रतीक्षा करता और तब ही उसको चैन मिलता जब वह पानी के ऊपर उसको दिखाइ दे जाता। तैरता हुआ वह नदी के बीच में पहुँच गया। रोहित विट्ठल को देखकर आनन्द का अनुभव करने लगा था। वह उसको एकटक देखे जा रहा था। उसकी आँखें उसका पीछा कर रही थीं। रोहित की दृष्टि विट्ठल से हटकर नदी के पानी के ऊपर घूमती हुई नदी के दूसरे किनारे पर जाकर जैसे ही रुकी वैसे ही उसके मुँह से चीख निकल गई। उसने देखा कि एक भीमकाय मगरमच्छ धीरे-धीरे पानी में उतर रहा था। मगर का आगे का आधा भाग पानी में था और पीछे का आधा भाग धीरे-धीरे पानी में सरकता जा रहा था। उसने शीघ्रता से विट्टल को देखा। विट्ठल अपनी धुन में मस्त पानी के बहाव के साथ-साथ बहता चला जा रहा था। रोहित ने उसको पुकारा। उसने बहुत ऊँचे स्वर में उसको पुकारा था परन्तु विट्ठल तक उसकी आवाज नहीं पहुँच सकी। रोहित ने मगर की ओर देखा, मगरमच्छ सारे का सारा पानी में उतर चुका था। रोहित उसको बड़े ध्यान से देखने लगा। उसने एक पल के लिए सोचा कि हो सकता है कि मगर केवल गर्मी से बचने के लिए ही पानी में गया हो और उसने विट्ठल को नहीं देखा हो। मगर को गर्मी भी बहुत सताती है। परन्तु तब उसके दिल की धड़कन बहुत तीव्र हो गई जब उसने देखा कि मगर ने विट्ठल की ओर जाना प्रारम्भ कर दिया था।

रोहित को अब पूरा विश्वास हो गया कि मगरमच्छ को विट्ठल की सुगन्ध आ गई है और कि वह उसको अपना शिकार बनाने के लिए उसकी ओर जा रहा था। ऐसा सोचते ही वह उछलकर खड़ा हो गया। कुछ क्षण वह सोचता रहा। तब उसने तीव्रता से इधर-उधर दृष्टि घुमाई। उसने एक टूटा हुआ वृक्ष देखा। वह उसके पास गया। उसने जाना कि वह एक सूखा हुआ तना था। उसने वृक्ष को हिलाया परन्तु वह नहीं हिला। अब वह उसको हिलाने के लिए जूझ गया। वह पूरी शक्ति लगा रहा था। उसके माथे पर पसीना आ गया था। पर उसने हिम्मत नहीं हारी। अन्त में उसने तने को हिला ही दिया। उसने हिला-हिलाकर तने को पृथ्वी से उखाड़ दिया था। अब वह पूरी शक्ति से तने को नदी की ओर घसीटने लगा। तना तो बहुत भारी था। रोहित पसीने से तर हो गया था। उसकी साँस फूल गईं और वह हाँफने लग गया था। तब भी उसने साहस नहीं छोड़ा। उसके मित्र की जान खतरे में थी और उसको उसे बचाना होगा। अन्त में वह तने के एक छोर को पानी के अन्दर डालने में सफल हो गया। पानी में पड़ते ही लकड़ी का वजन हल्का हो गया। वह पेड़ को पानी में ले गया। उसने देखा कि मगरमच्छ तीव्र गति से विट्ठल की ओर तैरता हुआ जा रहा था और विट्ठल खतरे से अनजान ठण्डे पानी का आनन्द लेते हुआ आगे बढ़ता जा रहा था। रोहित ने पानी में छलाँग लगा दी वह वृक्ष के तने को एक हाथ से पकड़कर घसीटते हुए आगे बढ़ने लगा। पानी को चीरता हुआ वह आगे बढ़ता जा रहा था।

 वह पानी के बहाव के साथ-साथ बहता जा रहा था। इसलिए उसको कठिनाई नहीं हुई। उसने देखा की विट्ठल और मगर का अन्तर बहुत कम रह गया है। रोहित उनसे थोड़ी दूरी पर था। भारी तने को खींचते हुए उसकी साँस फूल चुकी थी। परन्तु उसके पास तो साँस लेने तक का समय नहीं था। तभी उसके कानों में विट्ठल के गाने की आवाज आई। वह मस्ती में गाने लग गया था। उसको पता नहीं था कि मृत्यु उसकी ओर तीव्र गति से बढ़ती चली जा रही थी।

रोहित को लगने लगा कि थकावट के कारण उसका साहस टूटता जा रहा था। उसने अनुभव किया कि उसके शरीर में शक्ति कम होती जा रही थी, उसके हाथ धीरे-धीरे चलने लगे हैं, सारे शरीर में पीड़ा होने लगी है। उसको महसूस होने लगा कि उसकी ताकत किसी समय भी उसका साथ छोड़ सकती थी। वृक्ष को खींचकर ले जाना उसके लिए कठिन से कठिनतर होता जा रहा था। तब उसने मगर को देखा। उसने देखा कि मगर और विट्टल के बीच का अन्तर बहुत ही कम रह गया था। उसका मित्र मुसीबत में है। यह सोचकर उसने नए जोश और उत्साह के साथ हाथ मारने आरम्भ कर दिए। कुछ समय में ही वह मगर और रोहित के पास पहुँच गया था। तने का सहारा लेकर वह तने के पिछले भाग में पहुँच गया। वह तने को आगे को धकेलने लगा मगरमच्छ विट्टल के पास पहुँच चुका था। उसने विट्ठल को खाने के लिए मुँह खोल दिया। खुले हुए मुँह से वह आगे बढ़ने लगा। वह किसी क्षण भी विट्ठल को मुँह में डाल सकता था। तभी रोहित ने बिजली-की-सी तीव्रता से तने को एक ओर का झटका दिया और साथ ही वह तने के पिछले भाग से लटक गया। तना तब तक मगर के मुँह के पास पहुँच चुका था। रोहित के भार से तने के आगे का भाग ऊपर उठ गया था। रोहित ने तने को धकेल दिया। तना मगर के खुले मुँह में झट से चला गया। तने के मुँह में जाते ही मगर ने मुँह बन्द कर लिया। उसको विश्वास था कि उसके मुँह में शिकार आ गया। तना एक जोरदार आवाज के साथ टूट गया। आवाज सुनकर विट्टल चौंक गया। उसने पीछे मुड़कर देखा तो उसके होश उड़ गए। उसके बिल्कुल पास ही मगर था जिसके मुँह में तना फँसा हुआ था। तब उसकी दृष्टि रोहित पर पड़ी जो कि पास में तैरता हुआ हाँफ रहा था। उसकी साँस फूली हुई थी। विट्ठल ने झट से उसको पकड़ लिया और गले से लगा लिया। वह उसको सहारा देकर किनारे पर ले आया। इसके लिए उसने बचे हुए तने का सहारा लिया था।
घनश्याम ने मानो रोहित को सोते से जगाते हुए कहा, ‘‘क्या बात है, रोहित ! किस सोच में डूब गए ! लगता है कोई पुरानी घटना याद आ गई।’’

रोहित उदास हो गया, ‘‘हाँ मित्र, तुम सच कह रहे हो। पुरानी घटना ही याद आ गयी थी।’’
घनश्याम ने उठते हुए कहा, ‘‘अच्छा मित्र ! अब मैं चलता हूँ।’’
रोहित उसको जाते हुए देखता रहा।
रोहित एक बार फिर गहरी सोच में डूब गया। बीती हुई बातें एक-एक करके उसके सामने आने लगीं। वह गाँव के लोगों को मुसीबतों से छुटकारा दिलाता आ रहा था। परन्तु पिछले पाँच माह से वह असफल होता जा रहा था। किसी काम में उसको सफलता नहीं मिल रही थी। इस बार उसने खेतों में खूब मेहनत की थी। हल चलाकर बढ़िया बीज बोया था। तब भी उसकी उपज अच्छी नहीं हुई थी जबकि आस-पास के खेत हरी-भरी फसलों से लहलहा रहे थे। पिछले सात सालों में इस बार उसकी फसल बहुत खराब हुई थी। उसको अपनी असफलता का कोई कारण समझ नहीं आ रहा था। उसको लगा जैसे उसकी किस्मत उससे नाराज हो गई थी। परन्तु उसने तो कभी ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे भगवान उससे नाराज हो जाएँ। उसने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, कोई पाप नहीं किया। फिर भी भगवान उसको किस बात की सजा दे रहा था ! जैसे-जैसे वह सोचता जाता था वैसे-वैसे वह उदास होता जाता था। पिछले पाँच मास से वह लोगों के कटाक्ष सुनता आ रहा था। जो पहले उसकी प्रशंसा करते हुए नहीं थकते थे वही उसके शत्रु बन गए थे और अब उसकी आलोचना करते नहीं थकते थे।

वह चारपाई पर लेट गया। वह सोचने लगा कि सम्मान के बिना जीवन कैसा और किस काम का। ऐसे जीवन से तो मर जाना अच्छा है। वह सोचता रहा और सोचते-सोचते न जाने कब उसकी आँख लग गई और वह सुन्दर सपनों में खो गया।
रोहित को सोए हुए अभी थोडा समय ही हुआ था कि उसके कानों में शोर सुनायी पड़ने लगा। उसने सुना की गाँव के चारों ओर कोहराम मचा हुआ है। बहुत-से गीदड़ गाँव में आए हुए थे और उनकी दिल को हिला देने वाली आवाजें कान के पर्दों को फाड़ रही थीं। कुछ क्षण पश्चात् वे भेड़ों पर टूट पड़े और उनको मारने लगे। सारे गाँव में त्राहि-त्राहि मच गई। एक गीदड़ रोहित के कमरे के बाहर खड़ा होकर शोर मचाने लगा। दूसरा गीदड़ अपने पंजों से किवाड़ को पीटने लगा। बाकी के कुछ गीदड़ दूर खड़े होकर शोर मचा रहे थे। रोहित के कानों में गाँव के लोगों के चीखने-चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं। गीदड़ों का शोर सुनकर पहले तो वह घबरा गया था। किवाड़ को पीटने वाला गीदड़ भागकर दूर जा खड़ा हो गया। वह पैर पटककर आवाज निकालने लगा। रोहित को गाँव वालों के चीखने-चिल्लाने की आवाजें लगातार आ रही थीं।

उनको समझते देर नहीं लगी कि इन जानवरों ने पूरे गाँव में उपद्रव मचाया हुआ है और वे इनके पशुओं को मार रहे हैं। वह गुस्से के मारे काँपने लगा। उसने गीदड़ों का नाश करने का निश्चय कर लिया। वह तीव्रता से कमरे में आया, कोने में पड़ा हुआ भाला उठाया और बाहर चला गया। रोहित को देखकर बाकी गीदड़ तो भाग गए। परन्तु एक मोटा गीदड़ वहाँ खड़ा रहा। वह रोहित को घूरने लग गया। रोहित उसकी ओर लपका परन्तु वह उसके वार करने से पहले ही भागकर दूर चला गया और वहीं से रोहित को घूरने लग गया।


 

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