कलंदर - एस. आर. यात्री Kalandar - Hindi book by - S. R. Yatri
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कलंदर

एस. आर. यात्री

प्रकाशक : स्वास्तिक प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :200
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4034
आईएसबीएन :81-88090-00-x

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एक सामाजिक उपन्यास...

Kalender a hindi book by S. R. Yatri - कलंदर - एस. आर. यात्री

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

आजादी की वर्षगाँठ का औपचाराकि जश्न पूरा हुआ तो हम कई लोग एक साथ हो लिये। पहले सोचा गया कि किसी कॉफी हाउस में जाकर गरमागरम कॉफी और डोसा वगैरह खाएँ-पिएँ और आजादी की जुगाली करें। मगर सहयोगी का घर बीच में ही पड़ता था। अनजाने में ही सबके पाँव वहाँ ठहर गये तो उसने स्वयं ही हम सबको आमंत्रित करते हुए पेशकश की कि ‘‘यारो इतना महत्त्वपूर्ण मौका है-वैसे भी नाश्ते का समय है। जश्ने जम्हूरियत तो कुछ कायदे से ही मनाया जाना चाहिए मेरे यहाँ चलो। स्टोव जलाकर मैं चाय-पकौड़ियों का सिलसिला जमाता हूँ।’’
दरअसल वहाँ एक कमरे में दो अविवाहित सहयोगी साथ-साथ रहते थे। वह खाना तो होटल में खाते थे पर चाय और नाश्ते वगैरह की व्यवस्था स्वयं ही कर लेते थे। स्टोव के अलावा उनके पास काम भर लायक बर्तन भी थे जिन्हें इस्तेमाल के बाद कमरे में झाड़ू-पोंछा लगाने वाली महरी माँज-धोकर ओटे पर कलात्मक ढंग से सजा जाती थी जिसको लेकर हम लोग उन दोनों पर तरह-तरह की उकसाने वाली फब्तियाँ कसते रहते थे। वह हमारी बातों का बुरा नहीं मानते थे और हम सबको सहृदयतापूर्वक हमेशा आमंत्रित करते रहते थे। रमेश जिसने यह प्रस्ताव रखा था उसका दूसरा साथी कई दिनों से छुट्टी पर था। इसलिए वह इन दिनों निपट अकेला था और उसकी हार्दिक इच्छा थी कि हम सब थोड़ी देर उसके कमरे में बैठकर गपशप करें और कुछ खाएँ-पिएँ।

मेरे अलावा रमेश के कमरे पर जाने को कोई विशेष इच्छुक दिखाई नहीं पड़ा क्योंकि जलसा जल्दी खत्म हो जाने की वजह से सब अपने घर जाकर पूरे दिन की छुट्टी मनाने के मूड में थे। हालाँकि हम अध्यापकों को इतनी सारी छुट्टियाँ हमेशा ही मिलती रहती हैं कि छुट्टी के प्रति कोई अतिरिक्त आकर्षण बाकी नहीं रह जाना चाहिए तथापि छुट्टियों की भूख कभी कम नहीं होती।
रमेश से मैंने कहा चलो तुम्हारे साथ मैं चलता हूँ। मुझे न घर जाने की जल्दी है और न हाथ में ऐसा कोई खास काम है जिसे पूरा करने की मुझे चिन्ता हो।
इन सबको अपने घर जाने दो। फिर मैंने बादलों से घिरे आसमान पर नजर डालकर कहा, ‘‘चन्द मिनटों में वह बारिश आने वाली है कि यह सब घर पहुंचने से पहले ही भीग जाएँगे और किसी भले आदमी के बराण्डे में शरण लेने की विवश हो उठेंगे।’’
पर उनमें से किसी ने भी न घिरे आसमान की परवाह की और न मेरी चेतावनी की। सब ‘चलो-चलो’ करते हुए आगे बढ़ गए।
रमेश ने अपने कमरे पर पहुँचकर ताला खोला और मुझे कमरे में छोड़कर तुरन्त बाहर निकल आया। मैं समझ गया कि वह किसी ऐसे की तलाश में गया है जिससे पकौड़ियाँ बनाने का सामान मँगवा सके। बेसन, तेल और दीगर सामान निश्चय ही कमरे में नहीं होगा।
लेकिन जब कुछ ही मिनटों के बाद रमेश लौटा तो उसके हाथ में न कोई सामान था और न कोई ऐसा आदमी या छोकरा साथ था जिससे वह कुछ मँगाने की व्यवस्था करता। हाँ, उसके पीछे-तीस-बत्तीस के आसपास की उम्र छूते-एक सज्जन जरूर थे।

मैंने उन सज्जन को कालिज के निकट ही कई बार देखा ज़रूर था पर मेरा उनसे किसी प्रकार का परिचय नहीं था। रमेश ने उन महाशय को कुर्सी पर बैठने को कहा और मेरी ओर मुँह करके बोला, ‘‘दिनेश भाई ये मिस्टर नियोगी है। सोशियोलाजी के अध्यक्ष होकर महाविद्यालय में आये हैं। यहाँ से पहले इन्दौर के एक पी.जी. कालेज में थे।’’
उनका परिचय देने के बाद रमेश ने मेरे बारे में उन्हें बतलाया और हँसते हुए बोला, ‘‘दरअसल मौसम को सैलीब्रेट करने की मंशा से मैंने पकौड़ियाँ और चाय का प्रोग्राम बनाया था। लालच में और तो कोई फँसा नहीं, हाँ दिनेश जी ने मेरा साथ देने ही हिम्मत जरूर दिखाई।’’ फिर वह ज़रा ठहरकर बोला, ‘‘संयोग से नियोगी जी आते हुए दिखाई पड़ गए-अब ज़रा जमकर बातें भी होंगी और और खाने पीने का सिलसिला भी जमेगा।’’
रमेश की बात सुनकर नियोगी जी के चेहरे पर सहज मुस्कान उभर उठी और उन्होंने मेरी ओर दायाँ हाथ बढ़ाकर शालीनता से कहा, ‘‘आपसे मिलकर वाकई खुशी हुई। मैंने कालेज की सड़क पर यों तो आपको कई बार आते-जाते देखा था पर चाहते हुए भी आपसे तार्रुफ (परिचय) नहीं कर पाया।’’
मैंने उसके बढ़े हुए हाथ को गर्मजोशी से दबाया और बोला, ‘‘मुझमें ऐसा तो कुछ भी नहीं है जो परिचय की इच्छा जगाए। यह तो आपका बड़प्पन ही है जो मुझसे परिचित होने की बात आपके मन में पैदा हुई।’’
‘‘हाँ, आपकी यह दिलकश ड्रेस देखकर ही मैं सोचा करता था कि यह कोई खास आदमी है जो हमेशा दूध जैसा सफेद लिबास पहनता है। वाकई खद्दर पहनना मेरी नज़र में एक बहुत अलग तरह की फीलिंग पैदा करता है। जहाँ यह हमारे थॉट को प्रोवोक (उत्तेजित) करता है वहीं इसकी सादगी का असर भी कुछ कम नहीं है। जो हो आपकी तरफ मैं हमेशा एक खिंचाव महसूस करता रहा हूँ।’’ फिर वह रमेश की ओर देखकर बोले, ‘‘आयम वैरी मच ग्रेट फुल टु मिस्टर श्रीवास्तवा हू प्रोवाइडेड ए गुड चांस फार दीस होनरेबुल मीटिंग (मैं मिस्टर श्रीवास्तव का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने आपके मिलने का सम्मानजनक अवसर जुटाया)।’’

मैंने सिर झुकाकर नियोगी जी के प्रशंसा भरे उद्गारों के प्रति कृतज्ञता का भाव दर्शाया और बोला, ‘‘ऐसी तो कोई खास बात न इस खद्दर के लिबास में है न मुझ जैसे मामूली आदमी में। स्कूल में एक अदना-सा मुदर्रिस हूँ। खादी अन्य महँगे कपड़ों के मुकाबले अब भी काफी सस्ती है इसलिए बहुत सालों से इसी को पहनता चला आ रहा हूँ। यह तो मेरा परम सौभाग्य है कि आपकी नजर मेरी ओर उठ जाती थी और मुझ ‘न कुछ’ से परिचय करने की सोचते थे।’’
‘‘नहीं, नहीं, यह बात नहीं है दिनेश जी। यह नेचर का अजब करिश्मा है कि आप जिस आदमी की तरफ पहली नजर में ही एटरेक्ट होते हैं उसमें कोई न कोई खास बात जरुर होती है।’’ नियोगी जी ने बहुत प्रभावोत्पादक ढंग से अपनी बात कही।
मैं बोला, ‘‘प्रोफेसर साहब आप महाविद्यालय में समाजशास्त्र के अध्यक्ष हैं और मैं बड़े कालिज के साथ लगे स्कूल में सहायक अध्यापक हूँ, मेरा आपका क्या साथ। यह तो प्रबंधकों की उदारता ही है कि वह सालाना जलसे दोनों संस्थाओं के एक साथ ही करते चले आ रहे हैं और बड़े पदों पर आसीन प्रोफेसर हमें दुरदुराते नहीं हैं। लम्बे समय से एक अनकहा भाईचारा चला आ रहा है वरना तो हम छोटे अध्यापकों की आप जैसे वरिष्ठों के सामने औकात ही क्या है ? न रुतबे में मुकाबला न वेतनमान में। यही वजह है कि मेरे जैसे लोग बड़े कालिज की तरफ मुँह भी नहीं करते।’’ मैं फिर ज़रा ठहरकर बोला, ‘‘रमेश जी न बतलाते तो मुझे पता नहीं कब तक इस बात की जानकारी ही न होती कि आप इसी कालिज में विभागाध्यक्ष हैं।’’

नियोगी जी के चेहरे पर एक सहज मुस्कान उभर उठी और उन्होंने मेरे कंधे पर अपनी हथेली रखकर कहा, ‘‘मिस्टर दिनेश आप यह सब क्या कहने लगे ? तनखा या पद से ही क्या छोटा-बड़ा हो जाता है कोई। अरे साहब यह सब तो मुलम्मे है। आदमी अपने कैरेक्टर और ‘थॉट लेविल’ (सोच का स्तर) से बड़ा-छोटा बनता है।’’
पता नहीं नियोगी जी क्यों मुझपर इतने सदय हो उठे थे और मेरे प्रति अत्यधिक विनम्रता का रुख अपनाये हुए थे। मैंने कहा ‘‘मुझे गहरा सन्तोष है कि आज भी ऐसे लोग हमारे आस-पास हैं जो आदमी को उसके डेकोरेशंस (अलंकरण) से नहीं परखते और आदमी को आदमी समझने को ही प्राथमिकता देते हैं।’’
रमेश ने प्रसंग बदलते हुए कहा, ‘‘सज्जनो ! लगता है अब आगे एक-दूसरे को महज एप्रिशिएट करते चले जाने से काम नहीं चलेगा। सुबह इतनी जल्दी घर से निकलना हुआ था कि सिर्फ एक प्याला चाय ली जा सकी थी। अब कुछ ठोस इन्तजाम होना चाहिए। मैं पास की दुकान से डबलरोटी मक्खन वगैरह ले आता हूँ जिससे कि चाय के साथ कुछ कायदे से खाया जा सके।’’
नियोगी जी ने दोनों हाथ आगे करके रमेश को बाहर जाने से रोका और बोले, ‘‘सुनो मिस्टर श्रीवास्तव, हम दोनों पड़ोसी लोग हैं। यहाँ तुम छड़े छाँटे आदमी क्या चाय वाय की चकल्लस फैलाओगे। आइये चलते हैं घर आमलेट बनवाकर चाय या कॉफी के साथ लेंगे। हमको भी तो कभी मौका दिया करो। आखिर तुम्हारे फर्स्टडोर नेबर हैं। फिर जैसे नियोगी को भूली बात याद आ गई हो। आप पकौड़ियों का झाँसा देकर दिनेश जी को अपने घर लाये थे-चलो हम आज आपको पकौड़ियां ही खिलायेंगे।’’

नियोगी जी के प्रस्ताव पर रमेश ने सहमति के लिए मेरी ओर देखा। मैंने सोचा कि यही बेहतर होगा कि हम लोग नियोगी जी के घर ही चले चलें क्योंकि रमेश के लिए बाजार जाकर नास्ते का सामान लाना और फिर उसे तैयार करना बखेड़े का काम ही था।
मैंने संकोचपूर्वक कहा, ‘‘प्रोफेसर साहब की इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए।’’
मेरे यह कहते ही प्रोफेसर नियोगी ‘ऑल राइट दैन कम अलोंग’ कहकर कुर्सी छोड़कर उठ गये। मैं और रमेश भी उनके पीछे चलते हुए कमरे से बाहर निकल आये।
नियोगी जी रमेश श्रीवास्तव के कमरे के पीछे वाली सड़क के किनारे वाले घर में ही रहते थे। चारदीवारी से लगा हुआ खूब बड़ा बराण्डा था और एक बड़ा कमरा था। छोटा-सा स्टोर था।
मैं और रमेश उनके पीछे-चलते हुए बड़े कमरे में दाखिल हो गए। एक कोने में अंडाकार डाइनिंग टेबिल पड़ी थी जिसके इर्द-गिर्द जो चार कुर्सियाँ पड़ी थी उन सबकी बेंत ढीली हो गई थी। कुर्सियों को बैठने लायक बनाये रखने के लिए उनके नीचे छोटी-छोटी मूढियाँ रखकर उन पर कई-कई गद्दियाँ डाल रखी थीं।

दीवार से लगा एक लम्बा-चौड़ा पलंग पड़ा था जिस पर मोटे-मोटे गद्दे और चार-छः तकिए पड़े थे। दीवार के एक कोने में साबुन की खाली पेटी के बीच में दो तीन फट्टे लगाकर उसमें जनानी-मर्दानी जूते-चप्पलें ठुँसी हुई थीं।
कमरे और छोटे से स्टोर के पीछे की तरफ एक तंग सा सहन था जिसको पार करने के बाद शौचालय, गुसलखाना और किचन नजर आते थे।
मैंने वहाँ एक पालना भी देखा जिसमें एक दो-ढाई साल का बच्चा सोया पड़ा था। कुल मिलाकर उस कमरे में अच्छी-खासी अव्यवस्था और अराजकता के दर्शन होते थे। मुझे यह जानकर अचम्भा हो रहा था कि एक महाविद्यालय का विभागाध्यक्ष इतने तंग मकान में कैसे रह रहा था। फिर मैंने सोचा कि हो सकता है कालेज समीप होने की वजह से ही नियोगी इतने तंग से मकान में रहने को तैयार हो गए हों।
डाइनिंग टेबिल के आस-पास पड़ी कुर्सियों के अलावा कहीं और बैठने का ठिकाना न होने पर मैं और रमेश उन्हीं कुर्सियों पर टिक गए। एक बार असावधानी में मैंने कुर्सी को थोड़ा-सा हटाने की सोची पर फौरन ही मुझे ध्यान आ गया कि यदि कुर्सी अपने स्थान से ज़रा भी हिल गई तो उसके नीचे रखी मूढ़ी और उस पर रख रखी गद्दियाँ तुरन्त बिखर जायेंगी। स्थिति यह थी कि न कुर्सी पर बैठने वाला हिल-डुल सकता था न कुर्सी को उसके मूल स्थान से इधर-उधर हटाया जा सकता था।

जब मैं और रमेश बैठ गए तो नियोगी जी कमरा पार करके पीछे की ओर गए और किसी स्त्री का नाम लेकर उसे बुलाने लगे। सहन के उस तरफ के गुसलखाने अथवा किचन से एक मीठी आवाज आई, ‘‘आम कमिंग डीयर इन ए मिनेट।’’
‘‘कमिंग डीयर...’ कहने के एक-डेढ़ मिनट बाद जो महिला कमरे में दाखिल हुई उसे देखकर मैं चौंक पड़ा। दूध में हल्का सिन्दूर मिला देने से जो रंग बनता है वही वर्ण उसकी पारदर्शी दिखती त्वचा का था। उसकी देहयष्टि एकदम साँचे में ढली हुई लगती थी। बड़ी-बड़ी गहरी काली आँखें, पीठ पर लहराते हल्का सुनहरापन लिये बाल तथा इकहरी होने के बावजूद भरी-भरी देह सभी अनायस अपनी ओर ध्यान खींचते थे।
वह महिला स्लीवलैस ब्लाउज और सिल्क की साड़ी धारण किए हुए थी। पूरी खुली सुडौल बाँहों पर हठात् आँखें ठहर जाती थीं। उम्र में वह सत्ताइस-अट्ठाइस से अधिक की नहीं लगती थी।
यों कपोलों की हड्डियाँ हल्की सी उभरी हुई थीं लेकिन उसके चेहरे की तराश के साथ उनके उभरेपन का एक खास साम्य दिखाई पड़ता था जो चेहरे को और भी ज्यादा हसीन और आकर्षक बनाता था।

परिचय न होने पर भी वह हम लोगों के सामने आई तो उसने हल्के से झुककर ‘हलो गुडमार्निंग टु एवरीबडी’ कहा और सहज मुस्कान से उसके अधर खिल उठे। उसके पतले-पतले होठ गहरे लाल गुलाब की पत्तियों जैसे लगते थे। होठ खुलने से श्वेत समतल दन्त पंक्ति की झलक मिली। उसकी आँखों में या तो हल्की सी काजल की रेखा थी या फिर हो सकता है घनी पलकों की सघनता में छिपी श्यामलता ही काजल का भ्रम पैदा करती हो।
मैंने उस सुन्दर महिला को देखकर जो चौंक उठने की बात कही है उसका एक विशेष कारण है। ऐसी बात नहीं थी कि मैंने उससे पहले कोई अनिंद्य सुन्दरी नहीं देखी थी। वैसा अनुपम सौन्दर्य पहले भी अनेक बार आँखों के सामने से गुजरा होगा मगर मैंने उसके साथ चलने वाले पुरुष को या तो नियोगी महोदय जैसा नहीं पाया होगा या उसका पति नियोगी जैसा होगा-इसकी कल्पना नहीं की होगी।
नियोगी उस महिला के साथ खड़ा होकर गहरी अंधकार भरी अमावस की काली रात ही कहा जा सकता था। वह खूब मोटा ताजा और आबनूसी रंग का था। हालाँकि उसकी लम्बाई कम नहीं थी पर थुलथुलपन की ओर बढ़ता उसका बदन उसकी लम्बाई को अनायस कम कर देता था। उसके चेहरे में कोई आकर्षण नहीं था। चेहरे की बनावट में सौन्दर्य की तो बात ही क्या उल्टे होठों से सामने के दो दाँत बाहर की ओर निकले दिखाई पड़ते थे।

चलते समय नियोगी एक पाँव हल्का सा घसीटकर चलता था। जिससे घुटने पर लचक पैदा हो जाती थी। उसके स्याह रंग पर सफेद लिबास ही फिट बैठता था इसलिए वह मक्खन जींस की पैंट और सफेद शर्ट पहनता था।
निश्चय ही इस दाम्पति को एक साथ चलते-फिरते देखकर कोई भी चमत्कृत हुए बिना नहीं रह सकता था। यह ‘ब्यूटी विद दा बीस्ट’ (जंगली के साथ सुन्दरी) वाला मामला लगता था। प्रेम करने के पीछे न कोई तर्क काम करता है, न कोई नियम इसलिए ऐसे जोड़े इस दुनिया में बनते ही रहते हैं-बस यही कहा जा सकता है।
नियोगी जी ने हमारे सामने खड़ी सुन्दरी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘रूपा ! इनसे मिलो, ये दिनेश जी हैं।’’ और फिर रमेश की ओर इंगित किया, ‘‘इन्हें तो जानती ही हो-ही इज अवर नेक्स्ट डोर नेबर रमेश श्रीवास्तवा।’’
मैंने उनकी ओर दोनों हाथ जोड़े और नमस्कार की।
उन्होंने हम दोनों की ओर मुसकराकर देखा और नमस्कार का उत्तर दिया। नियोगी जी ने अपनी पत्नी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘दरअसल रूपा का असली नाम तो वर्षा ही है। यह तो मैं ही इन्हें रुपा कहने लगा हूँ।’’
इस समय सहन में मोटी-मोटी बूँदें पड़नी शुरु हो गईं। मेरे मुँह से अनायास निकला, ‘‘आज तो रूपा जी का नाम ‘वर्षा’ ही सार्थक है।’’

आसमान पर इसी समय बिजली बड़े जोर से कौंध उठी तो नियोगी जी बोले, ‘‘लीजिए वर्षा और बिजली दोनों एक साथ। अब आया मौसम का कुछ मजा।’’
फिर उन्होंने रुपा की ओर देखकर कहा, ‘‘वर्षा जी आज तो तुम्हारे नाम के एकोर्डिंग (अनुरूप) ही कुछ होना चाहिए। मैं इन दोनों भले आदमियों को यही वायदा करके साथ लाया भी हूँ।’’
बिजली की कौंध के साथ बहुत तेज बारिश होने लगी तो मैं बोला, ‘‘वर्षा जी मौसम के हिसाब से तो आपका नाम ‘आज’ होना चाहिए क्योंकि आप पूरी तरह से और सम्पूर्ण अर्थों में ‘वर्तमान’ हैं।’’
मेरी बात पर वह लजाते हुए बोली, ‘‘जैण्टिल मैन यू आर एक्जरेटिंग माई इनसिगनीफिसेण्ट एक्जीस्टेंश (महोदय आप मेरे गौण अस्तित्व को अतिशयोक्तिपूर्ण बना रहे हैं)।’’
‘‘अतिशयोक्तिपूर्ण तो एकदम नहीं। और वैसी हालत में तो बिल्कुल भी नहीं जब अपने नाम और मौसम के अनुरूप हमें चाय पकौड़ियाँ खिलाने जा रही हो।’’
मेरी बात पर रूपा जी और बाकी सभी हँसने लगे।

वह उत्साहपूर्वक बोली, ‘‘पकौड़ियाँ ? व्हाई नाट ? अभी बनाने के लिए कहती हूँ।’’ और यह कहने के बाद उन्होंने गुसलखाने में कपड़े धोती नौकरानी का नाम पुकारकर कहा, ‘‘शीला ! कपड़े बाद में धोती रहना। पहले लाला की दुकान से बेसन वगैरा लेकर आओ। साहब के दोस्त पकौड़ी खाना चाहते हैं।’’
पलक झपकते आँचल से हाथ पोंछती हुई एक जवान लड़की कमरे के बीचोंबीच आकर खड़ी हो गई। श्रीमती नियोगी ने डाइनिंग टेबिल पर पड़े पर्स को खोला और उसे फिर बंद कर दिया। उन्होंने शीला की ओर देखा वह सोलह-सत्तरह साल की साँवली सलोनी छोकरी थी। रूपा जी बोलीं, ‘‘शीला अमरत लाला के यहाँ तो हम लोगों का हिसाब चलता है जा उससे पकौड़ियाँ बनाने का सामान जल्दी से लेकर आ।’’
शीला हिरनी की तरह कुलाँचें भरते हुए कमरे से बाहर चली गई उसके अंग-अंग से उच्छ्वसित यौवन का उत्साह फूटता दिखलाई पड़ता था।

उस जमाने में महाविद्यालय के प्रोफेसर को भी कोई मोटी तनख्वाह नहीं मिलती थी। बड़े कालिजों के विभागाध्यक्षों का सम्मान तो बहुत था मगर वेतन यही कोई पाँच-छह सौ रुपए मिलता था। चूँकि महंगाई तब तक सिर पर नहीं चढ़ी थी इसलिए मध्यवित्त नौकरीपेशा नौकर अथवा नौकरानी रखने की हिम्मत कर जाते थे। नियोगी जी की पत्नी पढ़ी-लिखी भद्र और सुन्दर महिला थी। फिर उनके यहाँ एक बच्चा भी हो चुका था इसलिए उन्होंने किशोरवय की एक नौकरानी रख छोड़ी थी। हो सकता है वह उनके परिवार में ही रहती हो इसलिए पगार वगैरह भी ज्यादा न देनी पड़ती हो।
शीला बहुत फुर्ती से सारी चीजें लेकर दौड़ती-भागती आई और सहन पार करके रसोई में चली गई।
मैंने रुपा जी को किचन की ओर जाते देखकर कहा, ‘‘भाभी जी ! यह पकौड़ियाँ-वकौड़ियाँ की तवालत छोड़िये। चाय से भी मौसम का जश्न मनाया जा सकता है।’’

‘‘अरे वाह ! आपने भी कमाल कर दिया। इतने खुशगवार मौसम को सैलीब्रेट न करना तो उसकी तौहीन होगी। चाय के साथ गरम पकौड़ियों का मजा ही कुछ अलग होता है।’’ कहकर नियोगी जी ने अपनी पत्नी की ओर देखकर कहा, ‘‘इनको कुछ भी कहने दो रुपा-तुम जाकर पकौड़ियाँ तलवाओ कुछ प्याज की और बाकी आलू वगैरह की।’’
उधर आकाश से झमाझम पानी बरस रहा था इधर गरम पकौड़ियों की बड़ी प्लेट हम लोगों के सामने आई। सरसों के तेल की खुशगवार महक और चाय के प्यालों से उठती भाप देखकर मन पुलकित हो उठा। मैंने और रमेश ने बिना प्लेट छुए ही गद्गद भाव से प्रशंसा करनी शुरू कर दी पर ज्यों ही एक पकौड़ी उठाकर कुतरी मैं मन ही मन विक्षुब्ध हो उठा। पकौड़ियों में पड़ी प्याज और आलू एकदम अधकचरे थे। लगता था श्रीमती नियोगी और उनकी अल्हड़ नौकरानी शीला दोनों में से कोई भी पकौड़ी तलना नहीं जानती थी। आलू और प्याज दोनों को पतले ढंग से कतरा गया होता तो वह भली प्रकार सिंक जाते मगर वह खूब मोटे-मोटे होने की वजह से पूरी तरह आँच नहीं पकड़ पाये थे।

मगर अब किया क्या जा सकता था ? कचाँध को पचाना भी मुश्किल था और पकौड़ियों की तरफ से एकाएक हाथ खींच लेना भी सम्भव नहीं था। दूसरा कोई उपाय न देखकर मैंने नियोगी जी को पकौड़ियाँ खाने के लिए उत्साहित किया। उन्होंने एक पकौड़ी का छोटा सा हिस्सा दाँतों से कुतरते ही कहा, ‘‘कमाल है आप दोनों कैसे भले लोग हैं जो कच्ची पकौड़ियाँ खाकर भी तारीफ से जमीन आसमान के कुलांबे मिलाते चले जा रहे हैं ? पकौड़ियाँ एकदम मत खाइये। दरअसल पकौड़िय़ाँ तलना न रूपा जानती है, न शीला को पकौड़ियाँ बनाने का शऊर है। यह दोनों आपकी तारीफ से इस कदर खुश हो उठी हैं कि बस बनाती ही चली जा रही हैं।
मैंने दबे स्वर में कहा, ‘‘उतनी तो खराब नहीं बनीं, हाँ थोड़ी और सिंक जाती तो बेहतर था।’’
तभी रमेश उठा और पकौड़ियों की प्लेट उठाकर रसोई की तरफ चल पड़ा। मेरी कुछ भी समझ में नहीं आया कि वह क्या करने जा रहा है।
ज़रा देर बाद मैंने रसोई के अन्दर से ही उसकी आवाज सुनी, ‘‘भाभी जी आप ज़रा यहाँ से हटने की मेहरबानी करें-आपको प्रोफेसर साहब याद कर रहे हैं।’’
रूपा जी का उत्तर भी सुनाई पड़ा, ‘‘बस कढ़ाई में पड़ी पकौड़ियाँ तलकर ला रही हूँ एक मिनट लगेगा।’’
रमेश बोला, ‘‘शायद कोई खास बात कहना चाहते होंगे, ज़रा जाकर सुन लीजिए। इतनी देर शीला पकौड़ियाँ तलती रहेगी।’’

मैं समझ गया कि रमेश रूपा जी को किचन से हटाने का इसरार क्यों कर रहा था। ज्यों ही वह बाहर आयेंगी वह प्लेट की सारी पकौड़ियों को कढ़ाई में डालकर फिर से तलने लगेगा। इस तरह सारी पकौड़ियाँ ढंग से पक जायेंगी और रूपा जी को अपने अनाड़ीपन का आभास भी नहीं होगा। रमेश की तरकीब जानकर मैंने मन ही मन उसकी प्रशंसा की। वह पकौड़ी की प्लेट उठाकर न चला जाता तो पता नहीं आज पेट पर क्या कहर न टूट पड़ता।
ज्यों ही रूपा जी आती दीख पड़ीं मैंने प्रोफेसर नियोगी का हाथ दबाकर फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘प्लीज प्रोफेसर साहब ! रूपा जी से आप पकौड़ियों के बारे में कोई भी बात नहीं करेंगे।’’
नियोगी जी सम्भवतः मेरा संकेत समझ गये और वह चुप ही बने रहे। ज्यों ही रूपा जी सामने आकर खड़ी हुईं मैंने उन्हें कुछ भी बोलने का अवसर ही नहीं दिया, स्वयं ही बोलने लगा, ‘‘भाभी जी आपने कमाल की पकौड़ियाँ बनाई हैं। हम चाहते हैं कि अब आप भी हमारे साथ बैठकर गरम पकौड़ियों का लुत्फ उठायें।’’
रूपा जी के चेहरे पर संकोच भरी मुस्कान दिखी और वह बोलीं, ‘‘बट आई नेवर न्यू दा आर्ट आफ फ्राईंग पकोरीज। आई एम फुली अनअवेयर आफ रेसीपी (लेकिन मैं पकौड़ी बनाने की कला से पूरी तरह अनभिज्ञ हूँ। इनको बनाने का तरीका भी मुझे मालूम नहीं है)।’’

‘‘कोई बात नहीं है। पाक कला तो होती ही ऐसी है कि आप कुछ बनाते-बनाते ही सीख सकती हैं। अब आप इत्मीनान से बैठकर वर्षा, पकौड़ियों और गरमागरम चाय का आनन्द लीजिए।’’
वह अब तक यह भूल चुकी थी कि प्रोफेसर नियोगी ने उन्हें क्या कहने के लिए बुलाया था। वह रसोई की ओर जाते हुए बोली, ‘‘मैं पकौड़ियों के लिए सॉस (चटनी) लेकर आती हूँ, उससे इनका स्वाद और भी बढ़ जाएगा।’’
उधर रसोई से पकौड़ियों की प्लेट लेकर रमेश कमरे में आया और इधर से रुपा जी सॉस लेने के लिए चल पड़ीं।
ज्यों ही रमेश ने प्लेट मेज पर टिकाई-मैं और नियोगी जी बेसाख्ता हँसने लगे। रमेश ने भी हँसी में हमारा साथ दिया और होठों पर उँगली रखते हुए फुसफुसाया, ‘‘बराये मेहरबानी पकौड़ियों की कोई बात न करे।’’

रुपा जी के लौटने की टोह सी लेते हुए नियोगी जी धीमे स्वर में बोले, ‘‘मिस्टर श्रीवास्तवा, यू विल सरटेन्ली प्रूव एन आइडियल हसबैंड यू शैल नेवर डेजर्ट योर लाइफ पार्टनर बाई टैलिंग हर शार्ट कमिंग्ज (मिस्टर श्रीवास्तवा आप निश्चय ही एक आदर्श पति सिद्ध होंगे। अपनी पत्नी को कभी भी उसकी कमियाँ बतलाकर दुखी और हताश नहीं करेंगे)।’’
नियोगी जी की टिप्पणी पर रमेश कुछ न बोलकर बस हल्के से मुस्करा दिया।
इसी समय टोमेटो सॉस की बड़ी बोतल हाथ में पकड़े श्रीमती नियोगी आती दीख पड़ीं।
उन्होंने बोतल मेज पर टिकाई और रसोई की ओर लौटने लगीं। मैंने उनसे बैठकर पकौड़ियाँ खाने का आग्रह किया तो वह कुर्सी पर टिक गईं और बहुत कहने पर उन्होंने एक पकौड़ी अपनी नाजुक उँगलियों में पकड़कर उठाई और होठों की तरफ ले गईं। उन्होंने पकौड़ी का छोटा-सा भाग कुतरा और शर्माते हुए बोलीं, ‘‘आल ऑफ यू प्लीज फारगीव मी फोर माई पुअर प्रीपेरेशन एज ए मैटर आफ फैक्ट आयम परफैक्टली अनस्कील्ड इविन इन सिंपलेस्ट वैरायटीज (कृपया सभी उपस्थिति जन मुझे क्षमा करें मैं मामूली चीजों को तैयार करने में भी पूरी तरह अनाड़ी हूँ)।’’



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