रंगों की महिमा - कांता एस.पाल धवन Rango Ki Mahima - Hindi book by - Kanta S Pal Dhavan
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रंगों की महिमा

कांता एस.पाल धवन

प्रकाशक : सी.बी.टी. प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :16
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3857
आईएसबीएन :81-7011-923-5

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रंगों की महिमा का वर्णन...

Rango Ki Mahima - A Hindi Book - by Kanta S Pal Dhavan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

रंगों की रंग-बिरंगी दुनिया रंग कैसे बनते हैं ? प्रकाश और रंगों का संबंध,रंगों के गुण और इंद्रधनुष का बनना, सुबह और शाम के समय सूरज का रंग बदलना, ऐसी ही ढेरों ज्ञानवर्धक और मनोरंजक बातें इस पुस्तक में दी गई है।
निखिल, ईशा, सिद्धार्थ और मनु को अपने नाना-नानी से बहुत प्यार था। तभी तो स्कूल में छुट्टियां होते ही वे अपने-अपने मम्मी-पापा के पीछे पड़ जाते थे कि वे उन्हें नाना के घर लेकर जाएं।
उनके नाना जी का घर एक पहाड़ी गांव में था। वह गांव चारों ओर से हरे-भरे खेतों से घिरा हुआ था। न कहीं शोर-शराबा और न ही शहरों के जीवन की भाग-दौड़ थी। सुबह होते ही रंग-बिरंगी चिड़ियां चहचहाने लगती थीं और मोर अपने चमकीले व चटकीले रंगों वाले सुंदर पंख फैलाकर नाचने लगते थे। ऐसा लगता था, मानो वे सुबह के सूर्य का स्वागत कर रहे हों।

नानी उन्हें सुबह जल्दी ही बिस्तर से उठा देती थीं ताकि वे अपने नाना के साथ प्रातः भ्रमण के लिए जा सकें और प्रकृति के मनमोहक दृश्यों का आनंद ले सकें। बच्चे पूर्व दिशा में उगने वाले सुर्ख लाल रंग के सूर्य और चारों ओर फैले लाल प्रकाश को देखकर बहुत प्रसन्न होते थे। निखिल और सिद्धार्थ ने तो एक दिन नाना जी से पूछ ही लिया, ‘‘नाना जी, नाना जी ! भगवान जी रोज सुबह-शाम पहाड़ों के पीछे छिपकर होली खेलते हैं, क्या ?’’
‘‘क्यों भई ! आपने ऐसा कैसे सोच लिया ?’’ नाना जी ने पूछा।
‘‘रोज सुबह-शाम आसमान का रंग इतना लाल सुर्ख जो हो जाता है और फिर सूर्य का रंग भी लाल हो जाता है, जैसे लाल रंग का गुब्बारा हो !’’

‘‘नहीं बेटे, ऐसी कोई बात नहीं है,’’ नाना जी ने हँसकर कहा, ‘‘यह तो सूर्य-प्रकाश की लालिमा है। इसी सूर्य-प्रकाश से तो सारे संसार का अंधकार दूर होता है।’’
नन्हां मनु जो अभी चार वर्ष का ही था, सब बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था। उसने बड़े ही भोलेपन से पूछा, ‘‘नाना जी, यह सूर्यप्रकाश कौन हैं ? क्या वे आकाश में रहते हैं ?’’
मनु की बात सुनकर ईशा और सिद्धार्थ हँसने लगे और वह झेंप गया, किंतु नाना जी उसे गले लगाकर प्यार से समझाने लगे, ‘‘यह सूर्य-प्रकाश किसी आदमी का नाम नहीं है, यह तो सूर्य की किरणों से फैलने वाली धूप का ही दूसरा नाम है। प्रकाश तो उस ऊर्जा या शक्ति का नाम है, जिसके कारण हम देख सकते हैं।’’

‘‘इसका मतलब यह हुआ कि दीपक, मोमबत्ती और बिजली के बल्ब या ट्यूब को जलाने पर भी हमें प्रकाश मिलता है।’’
‘‘बिल्कुल ठीक समझे।’’
‘‘किंतु नाना जी, सूर्य और उसकी धूप का रंग तो सफेद होता है। फिर सुबह-शाम यह लाल कैसे हो जाता है ?’’
निखिल ने पूछा तो नाना जी बोले, ‘‘देखो बच्चों ! सूरज तो हमेशा ही सफेद होता है। लाल रंग का वह तो केवल दिखाई देता है।’’
‘‘वह कैसे ?’’

‘‘वह ऐसे होता है कि वातावरण में सुबह और शाम के समय नमी, धुंध अथवा धूल के नन्हें-नन्हें कण बिखरे होने से जब सूर्य की किरणें हमारी धरती की ओर आती हैं तो उसका पूरा प्रकाश हम तक नहीं पहुंच पाता।
‘‘उस समय तो हमें केवल लाल रंग ही दिखायी देता है क्योंकि लाल रंग की किरणों की रंग-तरंगों की लंबाई यानी तरंग-दौर्ध्य बाकी सभी किरणों की रंग-तरंगों से अधिक यानी 6470-7600 ऐंगस्ट्रम होती है।’’
‘‘यह ऐंगस्ट्रम क्या होता है ?’’
‘‘और लाल रंग कहां से आता है ?’’
‘‘रंग-तरंग क्या होती है ?’’

बच्चों के इन प्रश्नों को सुनकर नाना जी ने उन्हें समझाया कि ऐंगस्ट्रम एक सेंटीमीटर का दस करोड़वां भाग होता है। यह तरंगों के मापने की इकाई माना जाता है।
उन्होंने यह भी बताया कि प्रकाश की किरणें भी पानी की लहरों की भांति चलती हैं। वैसे तो सूर्य का प्रकाश सफेद होता है किंतु उसमें सात रंग छिपे रहते हैं और प्रत्येक रंग की तरंग-दैर्ध्य अलग-अलग होती है।
‘‘लेकिन ये रंग हमने तो कभी देखे ही नहीं।’’

‘‘सामान्यतः तुम इन्हें नहीं देख सकते। ये सब तो कभी-कभी इन्द्रधनुष के रूप में ही आकाश में दिखायी पड़ते हैं।’’
‘‘नाना जी, हमने तो बरसात के दिनों में भी इन्द्रधनुष देखा था। गोल-गोल, सुंदर सात रंगों वाला परियों का झूला, जो आकाश में एक कोने से दूसरे कोने तक फैला हुआ था।’’
‘‘लेकिन मैंने तो कभी इंद्रधनुष देखा ही नहीं। मैंने तो इंद्रधनुष के रंग भी नहीं देखे’’, मनु ने उदास होकर कहा।
नाना जी बोले, ‘‘इंद्रधनुष तो वर्षा ऋतु में ही दिखायी देगा। लेकिन आज हम आपको इंद्रधनुषी रंगों के कुछ मजेदार खेल दिखाएंगे।’’

उन्होंने तेल की दो-चार बूंदें नाली के पानी पर टपका दीं। उस गंदले रंग के पानी की सतह पर बूंदें सतरंगे आकार में तिरने लगीं। अभी बच्चे इसी खेल पर हैरान हो रहे थे कि उन्होंने दूसरा खेल दिखाने के लिए साबुन के पानी का थोड़ा-सा घोल तैयार किया और एक पाइप (नली) से फूंक मारकर साबुन के पानी के बड़े-बड़े बुलबुले उड़ाने शुरू कर दिए, जो बिल्कुल छोटे-छोटे गुब्बारों जैसे लगते थे।
जब बच्चों ने इन नन्हें-नन्हे गुब्बारों में चमचमाते हुए कई सारे रंग देखे, तो वे हैरान रह गए। वे उन्हें पकड़ने को झपटे किंतु ज्यों ही वे उनको पकड़ने की कोशिश करते, बुलबुले फूट जाते थे और साथ ही खो जाती थी, इंद्रधनुषी रंगों की झिलमिलाती मनमोहक छटा और बच्चों की आंखों से खुशी की चमक। बच्चे तो बच्चे ही होते हैं। जब तक वे किसी वस्तु को छूकर महसूस न कर लें, उन्हें संतुष्टि ही नहीं होती।
‘‘काश ! इस समय कोई परी आती और अपनी जादू की छड़ी घुमाकर हमें अपना इंद्रधनुष बनाना सिखा देती,’’ बच्चे बोले, ‘‘ऐसा इन्द्रधनुष, जिसके रंगों को हम जी भरकर देख सकते।’’

‘‘किंतु ऐसी परी तो कहानियों में ही मिलती है,’’ इतना कहकर ईशा ने अपने नाना जी की ओर देखा, जो मंद-मंद मुस्करा रहे थे।
नाना जी ने बच्चों को उदास होते देखकर कहा, ‘‘अरे भई, परी नहीं है तो क्या हुआ ! तुम्हारी खुशी के लिए हम कोशिश करके देखते हैं।’’
फिर उन्होंने ठोस कांच का एक त्रिकोणीय टुकड़ा उन्हें पकड़ाकर कहा, ‘‘देखो बच्चो, जब तक हम तुम्हारा अपना सचमुच का इंद्रधनुष ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं, तब तक तुम यब प्रिज्म ले जाओ और आंगन में सूर्य के प्रकाश में छिपे हुए सातों रंगों को अपनी आंखों से देखो।’’

‘‘इस कांच में से ?’’ बच्चों के कौतूहल का कोई ठिकाना न था।
‘‘हां भई हां ! इसे प्रिज्म कहते हैं। इसमें एक ओर से सफेद प्रकाश भीतर जाएगा और दूसरी ओर से सात रंगों में बंटकर बाहर आएगा।’’
‘‘सच नाना जी ?’’
‘‘हमारे नाना जी झूठ थोड़े ही बोलेंगे !’’ मनु ने कहा।
‘‘हां, तो अब तुम लोग रंगों को देखकर क्रमवार उनके नाम भी लिखकर लाना।’’ इतना कहकर नाना जी अपने कमरे में चले गए और बच्चे आंगन में।

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