चीवर - रांगेय राघव Chiver - Hindi book by - Rangey Raghav
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चीवर

रांगेय राघव

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :179
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3765
आईएसबीएन :81-7119-911-9

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प्रमुख ऐतिहासिक उपन्यास जिसमें हर्षवर्धन काल के पतनशील भारतीय सामंतवाद को रेखांकित किया गया है।

Chivar

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

उपन्यासकार रांगेय राघव ने ‘सीधा-सादा रास्ता’ और ‘कब तक पुकारूँ’ जैसे समकालीन विषय-वस्तु पर आधारित उपन्यासों के साथ ऐतिहासिक उपन्यासों से भी हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है। अपनी मार्क्सवादी विश्व-दृष्टि के आधार पर वे प्रत्येक विषय को अपने खास नजरिए से चित्रित करते हैं।
‘चीवर’ उनके प्रमुखतम ऐतिहासिक उपन्यासों में से एक है। इसमें उन्होंने हर्षवर्धन काल के पतनशील भारतीय सामंतवाद को रेखांकित किया है। ब्राह्मण और बौद्ध मतों के परस्पर संघर्ष के साथ-साथ मालव गुप्तों, वर्धनों और मौखरियों के बीच राजनीतिक सत्ता के लिए होनेवाला संघर्ष भी हमें यहाँ दिखाई देता है।
भाषा के स्तर पर यह उपन्यास सिद्ध करता है कि शब्दावली अगर घोर तत्समप्रधान हो तब भी उसमें रस की सर्जना की जा सकती है-बशर्ते लेखनी किसी समर्थ रचनाकार के हाथ में हो। यह इस उपन्यास की प्रवहमान भाषा का ही कमाल है कि इसमें विचरनेवाले पात्र, वह चाहे राज्यश्री हो या हर्षवर्धन या कोई और हमारी स्मृति पर अंकित हो जाते हैं।

1

श्वेत पाषाणों की दीर्घ और विस्तृत शोभा से सोपानों पर एक मन्दिम आलोक प्रतिध्वनित होता हुआ वापी के जल में उतर जाता और राज्यश्री के सुडौल सुन्दर शरीर पर उसके गौरवर्ण में केन्द्रित होकर नयनों को तुला पर टाँग देता है। जल को नीले और सुनहले कमल अपनी भीर से आक्रान्त किए हुए थे। नीले मृणाल खाकर कभी-कभी श्वेत भव्य राजहंस मरकत की शिलाओं पर चलकर क्रेंकार करते, कभी अपनी लम्बी, श्वेत और कोमल ग्रीवा झुकाकर उत्फुल्ल पुंडरीक में से मकरन्द खाने लगते। मन्दिम समीरण दूर स्थित वातायनों से भीतर प्रवेश करता और बहुत ही हल्के स्पर्शों से उस मांसल कमलों की सुरभि को मुग्ध-सा सूँघ लेता और फिर हटकर गोलाकार वललभियों के नीचे एक मनोहर गुंजार भरकर सीधे-सीधे बुझे हुए दीपाधारों पर पड़ते प्रकाश के अधमुँदे होंठों को धीरे से चूमकर प्रासाद की भीतों पर बने सुन्दर चित्रों को सुन्दरी युवती के पारदर्शी वस्त्रों की भाँति रगड़कर बाहर लय हो जाता।

विशाल स्तम्भों पर टिकी हुई छत पर सुदूर पारसीक देश की चित्रकला सुशोभित थी। अगरु-धूम की काँपती लहरियाँ उस प्रकोष्ठ के विस्तृत अन्तराल में भीनी जर्जरता भर रही थीं। एक युवती वीणा के तारों पर कुछ धीमे-धीमे बजा रही थी। सोपानों पर बैठी दासियाँ कभी हँसती और कभी अपने अस्त-व्यस्त वस्त्रों को ठीक करने लगतीं।
राज्यश्री ने मन्द स्मित के साथ कहा : ‘मल्लिका ! क्या कहती थी ? कह न, रुक क्यों गई ?’
मल्लिका उस समय स्वर्णकमल से राज्यश्री की स्निग्ध पीठ को रगड़ रही थी। उसने धीमे से कहा : ‘महादेवी ! यह मराल कितना चमत्कृत हो गया है। आपने इस पर ध्यान नहीं दिया ?’

राज्यश्री नहीं समझी। उसने मस्तक पर से जल की बूँदों को पोंछकर कहा : ‘क्यों, सखी ?’
मल्लिका के कुछ कहने के पहले ही एक युवती दासी जो जल में खड़ी थी, बोल उठी : ‘मैं बताऊँ, महादेवी ? वह चिन्ता कर रहा है कि जब वापी में चन्द्रमा उतर आया है तो अभी तक सरसिज क्यों नहीं मुरझाए ?’
दासियाँ खिलखिलाकर हँस दीं। जल तीर पर जैसे असंख्य मोती बिखर गए। राज्यश्री ने विशाल नयनों को बंकिम करके कहा : ‘चल हट ! तू सदा ठिठोली ही किया करती है !’
मदनिका अब तक सुस्थिर हो गई थी। उसने सम्मान से शीश अनवत करके कहा : ‘देवी, अपराध क्षमा हो...।’
अभी वह अपनी बात समाप्त भी न कर पाई थी कि मल्लिका ने कहा : ‘मदनिका ! देवी के लिए पुष्प-चयन कर ला। आराधना की वेला निकट आती जा रही है।’

मदनिका जाना नहीं चाहती थी, किन्तु उसे जाना पड़ा। उसने मल्लिका को एक बार शंकित दृष्टि से देखा। मल्लिका उस समय राज्यश्री के साथ जल में थी और उसके समस्त वस्त्र भीग गए थे। गीले वस्त्र पहनकर वह बाह्य उद्यान में जा भी नहीं सकती थी।
मदनिका के चले जाने पर राज्यश्री ने कहा : ‘मल्लिका ! तू ऐसी चुप क्यों हो गई ?’
मल्लिका के होंठों में एक रहस्यमयी कुटिल स्मित दिखाई पड़ी। उसने नयन नचाकर कहा : ‘देवी ! मैं सोचती हूँ, यदि देवी की यह शोभा महाराज देख पाते....’
राज्यश्री के कपोलों पर आकर्ण एक रक्ताभा काँप उठी और स्वर्ण की-सी देह-यष्टि नीलम-से जल पर ऐसी प्रतीत हुई जैसे रात्रि के नीरव और गन्धित अन्धकार में दीपशिखा ऊपर की ओर लाल होकर चंचलता से काँप उठी हो। राज्यश्री ने विभोर मन से कहा : ‘मल्लिका ! अभी तो मदनिका यही कहती थी, तू उससे भी आगे बढ़ गई।’

उसने दोनों हाथों से जल को सामने ढकेल दिया और तीर की ओर चलने लगी। एकदम ही चारों ओर बैठी हुई दासियाँ उठ खड़ी हुईं। उनके आभूषणों की झंकृति उस स्निग्ध पाषाण भूमि पर फिसलते-अन्धकार पर झूमने लगी। महासुन्दरी राज्यश्री नील घन के बीच स्थिर हो गई सौदामिनी-सी, जिस समय शरीर पोंछती दासियों के बीच खड़ी हुई तब चीनांशुक के स्पर्श से सुस्थिर अंग लिये वह ऐसी प्रतीत हुई जैसे सूर्य के मन्दिम स्पर्श से हिमावृत पुंडरीक कमल के बीच एक अवर्णनीय कम्प से व्याप्त होकर अपनी शोभा से स्वयं विभोर हो जाता है।
उसने धीरे से अपने चिकुर जाल को पीछे हटाकर पूछा : ‘महाराज अहेर से आ गए, फेनिला ?’
फेनिला चपल तरुणी थी। वह गान्धार की दासी थी। उसके नील नेत्र बहुत बड़े न होकर भी लम्बे-लम्बे थे। उसने झुककर निवेदन किया : ‘दंडधर से पूछा था, ‘अभी तक महाराज नहीं लौटे।’ वीणा अब और भी मधु स्वरों में अकुला रही थी। वापी का जल ऐसा हतप्रद दिखाई दे रहा था जैसे मणिविहीन सर्प अपने विष के बुदबुद उगलकर फिर निश्चेष्ट हो गया हो।

इन्द्रधनुषी छाया सम्मुख लगे दर्पण पर अब थिरकने लगी थी। राज्यश्री उनके सम्मुख खड़ी हो गई। दासियों ने उसके जानु तक लहराते काले केशों को खोल दिया और दो दासियाँ प्रचुर कालागरु का धूप जलाकर उन केशों को सुखाने लगीं। उस मादक गन्ध से राज्यश्री का अंग-अंग तरुणाई के अलस से अतृप्त हो उठा।
ताम्बुल करंकवाहिनी आतुर होकर ताम्बूलों पर ताम्बूल अपने सामने सजाने लगी। स्वर्ण का ढक्कन धीरे-धीरे हरे पत्तों के नीचे छिप गया।
रक्त कौशेय पहनाकर अंगसन्धियों के नीचे से लेकर दासी ने जब अन्तिम वस्त्र महादेवी को पहना दिया, तब मल्लिका ने चम्पक के वर्ण से भी कमनीय दुकूल पर स्वर्ण की रत्नजड़ित मेखला पहना दी जिसकी दीप्ति से एकबारगी दासियों के नित्य देखनेवाले नेत्र भी चकाचौंध में आ गए। महादेवी के कान पर अब कर्णिकार झूलने लगा। कुसुम और मुक्ता के हारों से उसका वक्षस्थल ढक गया। जिस समय राज्यश्री ने अपनी कंचन से भी उज्जवल बाहु वलयअंगद पहनने के लिए उठाई, मालती ने झुककर स्वर्ण के नूपुर बाँध दिए और अपने आप रश्ना का मंजुक्वणन हुआ।
दासियाँ पत्रलेखन के लिए रक्त कुंकुम, श्वेत चन्दन, कालीयक, प्रियंगु और कस्तूरिका का लेप तत्पर हाथों से बनाने लगीं। वीणावादिनी का हाथ भी अपने-आप शीघ्रता से चल रहा था।

अन्तराल में एक क्षीण अस्फुट शब्द से लगता था, कहीं कोई मृदंग बजा रहा है। झंकारते वलयों की ध्वनि सुनकर कभी-कभी स्वर्ण के चक्र पर बैठा श्वेत काकातूआ चकित हो उठता, कभी संगमर्मर की फलका से उड़कर सारिका निकट की स्फटिक चौकी पर जा बैठती और अपने बँधे पाँव की ओर देखकर फरफराने लगती।
राज्यश्री हँस उठी। वासन्ती चीनांशुक उसके स्कन्धमूल से पीछे लहराता हुआ पृथ्वी पर गिर रहा था। मल्लिका ने दोनों हाथों को अपने कानों पर रखकर कहा : ‘देवी ! हेरुक कल्याण करें। आज तो मेरा मन काँप रहा है।’
राज्यश्री ने गर्व से कहा : ‘हेरुक तेरा कल्याण करेंगे, मल्लिका ! तथागत का ध्यान कर। तेरा भय दूर हो जाएगा।’
मल्लिका इतनी सरल नहीं थी। जानती थी, यह स्वामिनी का स्वभाव है। वे ऐसा ही उत्तर देती हैं, जब चाहती हैं कि कोई उनका विरोध करे। उस विरोध में उनकी अहम्मन्यता और रूप के गर्व की तृष्णा को तृप्ति मिलती है।
चामरवाहिनी पीछे हट गई थी। मल्लिका ने कहा : ‘देवी ! शरद ज्योत्स्ना में जब कभी इन्द्रधनुष का मादक विलास उतर आए तो उसे क्या कहना चाहिए ?’

राज्यश्री ने झंकारते स्वर में हँसकर कहा : ‘मूर्ख की कल्पना !’
दासियाँ हँस पड़ीं। मल्लिका लज्जित हो गई। इस समय वह दुर्भाग्य से जो वस्त्र बदलकर आई थी, उसने पीले अधोवस्त्र पर रंग-बिरंगी कंचुकी धारण कर रखी थी। हाथों में दो स्वर्ण-वलय और कानों में दो स्वर्ण-कुंडल पहनकर वह सचमुच शरद-रात्रि-सी विरलतारा श्यामा दिखाई दे रही थी। राज्यश्री का व्यंग्य उस पर सफल हो गया।
फेनिला राज्यश्री के चरणों में आलक्तक लगा रही थी। इस समय हँसते समय जो उसने शीश उठाया और फिर पुलकाकुल हो मुख नीचे किया। उसके गाल पर उसका वह लाल हाथ लगा और फिर एक बार गन्ध से भारालस प्रकोष्ठ उनके हास्य से झंकार उठा जैसे भीतों पर लटकते मुक्ताहार अब प्रतिध्वनित होकर झूलते हुए स्वयं बोल उठे हों।
प्रसाधन समाप्त करके दासियाँ सादर पीछे हट गईं। केवल मल्लिका ने राज्यश्री के सीमन्त पर कुरुबक ग्रथित पुष्प लगा दिए और वह भी हट गई। उस समय राज्यश्री ने एक बार अपने रूप और यौवन को दर्पण में देखा। ईर्ष्या और विभ्रम ने उसके चंचल चित्त को एक गर्व की शक्ति दी और एक बार उसने उस अहंकार को देखा जो स्त्री की सबसे बड़ी निर्बलता है, किन्तु जिसे वह अपनी सबसे बड़ी शक्ति समझती है।

2


बुद्ध-प्रतिमा पर दीपाघरों की शिखाओं का चंचल आलोक स्थिर होकर उनकी मुद्रा की गम्भीरता को और भी गम्भीर दिखाने लगा। दोनों शीर्णकाय भिक्षु अपने पीले वस्त्र पहने अत्यन्त गम्भीर थे। धूप-गन्ध से समस्त प्रकोष्ठ सुरभित हो रहा था।
राज्यश्री ने विनत होकर कहा : ‘तथागत, मैं जानती हूँ मनुष्य का सुख सदैव ही नहीं रहता, किन्तु भगवन् ! क्या जो आनन्द आपने मुझे दिया है उसे मैं अस्वीकार कर दूँ ?’
उसके स्वर में एक विह्वल अनुराग था। त्याग और तपस्या की सुनी हुई गरिमा जैसे मन से यह समझौता करना चाहती कि जो गृहस्थ-जीवन आज चल रहा है, वह एक पाप ही नहीं है, वह स्वयं स्वाभाविक है।
वृद्ध भिक्षु ने शान्त स्वर में कहा : ‘देवी ! मन को साधो। आनन्द बुरा नहीं है, क्योंकि तुम अभी गृहस्थ हो। तुम्हारे लिए यही अच्छा है। सुन्दरी नन्दा भगवान के प्रभाव में राजवंश में जन्म लेने पर भी प्रव्रजित हुई थी, किन्तु वह अपने हृदय को बहुत समय तक वंश में नहीं रख सकी। राज्यश्री, शास्ता सब पर दृष्टि रखते समय आने पर वे उचित को ही प्रचलित करते हैं। तू उपासिका है, तेरे लिए यही धर्म श्रेष्ठ है।’

राज्यश्री ने दंडवत करके कहा : ‘तथागत ! मुझे वही शक्ति दो कि मैं कभी भी अपने सत्य से विमुख नहीं होऊँ। पाप मुझे कभी भी डिगाए नहीं। मेरे मन में अशुभ विचार कभी न आएँ और तुम्हारी जीवमात्र पर दया करने की क्षमता मेरे मन में सदैव बनी रहे। मेरे सौभाग्य की सदैव ही रक्षा करो, उन पर पड़नेवाले दुःख मेरे भाग्य में लिख दो, भगवान् !’
और फिर वहाँ बौद्ध भिक्षु उपासना में लग गए। राज्यश्री चली आई। विशाल स्तम्भों पर टिके अलिन्दों में से चलकर जब मौखरि कुल की महारानी अपने विलास-कक्ष में आ गई, मल्लिका ने श्वेतमर्मर और सुवर्ण की बनी फलका पर पारसिक कालीन बिछा दी, जिस पर बैठकर राज्यश्री वीणा बजाने लगी। नृत्य और संगीत में उसकी अत्यन्त रुचि थी। वीणा के तार झनझनाने लगे, स्वरों की उठती झंकार, अपनी गतिलय पर झूमती अन्तराल में विलीन होने लगी। और फिर वे समस्त स्वर जैसे नृत्य करने लगे और विभोर उल्लास में काँपने लगे। मदनिका ने जिस समय प्रवेश किया उसे लगा जैसे महाश्वेता वीणापाणि सरस्वती स्वयं ही सम्मुख उपस्थित थीं। वह क्षण-भर कुछ नहीं सोच सकी। दासी दुविधा में पड़ गई। व्याघात डालने का अर्थ यह भी हो सकता है कि स्वामिनी क्रुद्ध हो जाएँ और उसे अपनी सेवा से च्युत कर दें, जिसका अर्थ होगा अन्य प्रभुओं की सेवा और वह तो कोई सरल काम नहीं था !

निदान मदनिका कुछ भी नहीं कह सकी। स्तम्भों के पीछे से दंडधारिणी का स्वर सुनाई दिया : ‘मौखरि कुल-भूषण...।’
फिर शंखनाद प्रतिध्वनित हुआ। राज्यश्री की उँगलियाँ हठात् रुक गईं। वह उठकर खड़ी हो गई। उसने कहा : ‘अरे ! महाराज आ गए।’
मदनिका लज्जित हो गई। उसने कहा : ‘देवी ! मैं यही शुभ समाचार देने आई थी।’
‘तो फिर कहा क्यों नहीं ?’
‘देवी, मुझे साहस नहीं हुआ।’
क्यों ?’

राज्यश्री का यह सुहासित प्रश्न सुनकर मदनिका फिर चक्कर में पड़ गई। उसकी समझ में नहीं आया कि वह उत्तर क्या दे। राज्यश्री ने देखा, मदनिका के मुख पर विषाद की एक रेखा खिंची और फिर उसके नेत्र झुक गए। उसने सिर झुकाकर कहा : ‘देवी ! स्वामिनी हैं न ? मैं दासी ठहरी।’
नितान्त सत्य होने पर भी राज्यश्री को जाने यह क्यों अच्छा नहीं लगा। जैसे यह वैभव, यह सत्ता एक क्षण के लिए व्यंग्य बन गई। जीवमात्र पर दया !
किन्तु विचार अधिक टिका नहीं। निकट ही कामकन्दला की झंकारती हुई हँसी सुनाई दी। फिर एक पुरुष का स्वर सुनाई दिया : ‘क्यों कामकन्दला ! महारानी को संगीत बहुत प्रिय है न ?’
कामकन्दला का स्वर आया : ‘देवी तो नृत्य-संगीत में स्वयं ही प्रवीण हैं, देव !’
‘जानता हूँ, कामकन्दला,’ पुरुष के निकट आते शब्द सुनाई दिए : ‘इस बार वसन्तोत्सव का प्रबन्ध मैंने पहले से भी बहुत अच्छा कराया है। देख तो देवी के लिए मैं कैसा सुन्दर छौना लाया हूँ ?’
‘देव,’ कामकन्दला का स्वर सुनाई दिया : ‘इसके नयन तो बिल्कुल देवी के-से हैं।’
पुरुष का हास्य और निकट आ गया। राज्यश्री ने झुककर प्रणाम किया। पति को देखकर वह सब कुछ भूल गई। दासियाँ एक-एक करके चली गईं। केवल मदनिका एक स्तम्भ की आड़ में हो गई। दासी का उपस्थित रहना प्रत्येक समय ही प्रायः आवश्यक था।

गृहवर्मा ने छौना उसकी गोदी में धर दिया। अबोध बालक की भाँति छौने ने अपनी निर्दोष बड़ी-बड़ी आँखों से राज्यश्री की ओर देखा।
‘इसे पाना बहुत कठिन हो गया था,’ गृहवर्मा ने कटिबन्ध को खोलते हुए कहा : ‘मृग की चंचलता प्रसिद्ध है, महारानी । अन्त में मुझे हरिणी को मार ही देना पड़ा।’
राज्यश्री के हृदय पर आघात-सा हुआ। हरिणी की मृत्यु के समय वेदना से आर्त्त नेत्र उसकी आँखों के सामने घूम गए। गृहवर्मा आतुर-सा शैया पर बैठ गया। उसे मृगी के नेत्रों की भयविस्फारित प्रतिछाया एक क्षण को राज्यश्री के नेत्रों में दिखाई दी। वह निस्तब्ध बैठा रहा।

राज्यश्री ने ही कहा : ‘छिः छिः, कितने कठोर हैं आप, स्वामी ! इसके नयन कितने निर्मल और पवित्र हैं !’
गृहवर्मा ने शैया पर लेटते हुए कहा : ‘देवी ! यह पवित्र और निर्मल नयन इतने सीधे नहीं होते जितना तुम कहती हो। यह भोले-भाले प्राणी भी दूसरों के खेत को चर जाते हैं।’
और वह हँस पड़ा। क्षण-भर पहले जो निर्बलता उसमें आई थी, मानो उसने उसको इस हास्य द्वारा बहा दिया। राज्यश्री ने धीरे से कहा : ‘किन्तु देव ! यह तो उसका स्वभाव है। क्या हम एक-दूसरे की वस्तु का अपहरण नहीं करते ? क्या राजा एक-दूसरे से राज्य के लिए युद्ध नहीं करते ?’

गृहवर्मा ने सुना और जैसे नहीं सुना। वह कहता गया : ‘मुझे एक बात का आश्चर्य होता है, राज्यश्री ! आज तुम्हारे भगवान बुद्ध को हुए अनेक शताब्दियाँ बीत गईं। उदयन से आज तक अनेक संवत्सर व्यतीत हो गए। आज से लगभग सहस्त्र वर्ष पूर्व सम्राट अशोक देवानाम् प्रियदर्शी ने विश्व में शान्ति फैलाने के लिए अपनी पुत्री संघमित्रा को भिक्षुणी बना दिया था और सहस्रों स्त्री-पुरुष, सहस्रों नहीं लाखों, तब से अपने जीवन के समस्त सुखों का बलिदान करके संसार में शान्ति फैलाने में लग चुके हैं। किन्तु संसार में शान्ति नहीं आई। लोग जैसे तब एक-दूसरे से लड़ते थे, अब भी वैसे ही परस्पर युद्ध करते हैं।’
राज्यश्री क्षण-भर चुप रही। फिर उसने अटक-अटककर कहा : ‘देव ! यदि मनुष्य राज्य, धन और यश का लोभ न करे, यह वासना का मूल मिट जाए तो संसार में कभी युद्ध नहीं होगा।’

गृहवर्मा हँसा। उसने कदम्ब के पत्तों को एक ओर फेंककर कहा : ‘देवी ! महाभारत में सत्ययुग के वर्णन में कहा कि हिमालय के पार उत्तर कुरु में मनुष्यों को कोई दुःख नहीं, वहाँ कोई राजा नहीं, कोई अत्याचार नहीं, युद्ध नहीं। किन्तु यह तो कल्पना है। बिना राज्य के मनुष्य समुदाय में नहीं रह सकता। बिना दंड के भय नहीं रह सकता और जब राज्य रहता है तो समर्थ अपने को बाँधकर नहीं रह सकता। जाने दो, देवी ! मुझे तनिक अपने मुख की रूपसुधा का पान करने दो।’
बात को एकदम दूसरी दिशा में मुड़ जाते देख राज्यश्री लज्जा से लाल हो उठी। उसने मुस्कुराकर कहा : ‘चलिए भी !’
मदनिका उस समय और पीछे हट गई थी। गृहवर्मा ठठाकर हँस पड़ा। मदनिका ने अपने नयन मूँद लिये।



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