पंचतंत्र की कहानियाँ - अशोक कौशिक Panchantra ki kahaniyan - Hindi book by - Ashok Kaushik
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पंचतंत्र की कहानियाँ

अशोक कौशिक

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :166
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3677
आईएसबीएन :81-7182-355-6

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पशु-पक्षियों को माध्यम बनाकर कही गई नीति की कथाएं...

Panchatantra Ki Kahaniyan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


भारतीय साहित्य के लोक एवं नीति कथाएं विश्व में अपना विशिष्ट स्थान बनाये हुए हैं। इन लोकनीति कथाओं के स्त्रोत हैं, संस्कृत साहित्य की अमर कृतियां- हितोपदेश एवं पंचतंत्र।
पंचतंत्र में इसके रचयिता श्री विष्णु शर्मा ने राजकुमारों को राजनीति-विशारद बनाने के लिए अनेक पशु-पक्षियों को माध्यम बनाकर नीति की कथाएं कही हैं। वे कथाएं और उनके बीच में आयी हुई सूक्तियां आज के इस आपा-धापी के युग में निश्चय ही मानव के लिए उपयोगी हैं।
कोमलमति बालकों के लिए ये कहानियां एक ओर मनोरंजक और कौतूहल की सामग्री प्रस्तुत करती हैं और दूसरी ओर उन्हें नीति-निपुण, चुस्त मानव एवं प्रबुद्ध नागरिक बनाने में सहायता करती हैं।
बालकों के लिए ही नहीं वयस्क एवं प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए भी ये कहानियां समान रूप से उपयोगी एवं संग्रहणीय हैं।

कथामुख


जैसा कि सुना जाता है, दक्षिण देश में महिलारोप्य नाम का एक नगर था। उस नगर में अमरशक्ति नामक एक राजा का शासन था। वह राजा बड़ा उदार होने के साथ ही निपुण और कुशल प्रशासक भी था। उसके तीन पुत्र थे। उनका का नाम था बहुशक्ति, उग्रशक्ति तथा अनन्तशक्त। राजा जितना ही उदार था, उसके पुत्र उतने ही उच्छृंखल थे। राजा जितना ही कुशल और निपुण था, उसके पुत्र उतने ही वज्रमूर्ख थे।

अपने पुत्रों की यह दशा देखकर राजा को चिन्ता सताने लगी। उसने इस विषय में अपने मंत्रियों से मन्त्रणा की। उसने कहा कि अजात, मृत और मूर्ख पुत्रों में से पहले दो तो फिर भी अच्छे हैं, क्योंकि आजात और मृत पुत्रों का तो अल्पकालिक दुःख है, किन्तु मूर्ख तो आजीवन दुःख ही देता है। वह गाय किस काम की जो न तो गर्भ धारण करे और न दूध ही दे। उसी प्रकार ऐसे पुत्र के जन्म से क्या लाभ जो न तो विद्वान् हो और न शक्तिमान ही। मूर्ख पुत्र की माता यदि स्वयं को पुत्रवती कहती है तो फिर बन्ध्या कौन कहलाएगी ?

राजा की व्यथा का विचार कर तीनों मन्त्रियों ने अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार अपना परामर्श दिया। किसी ने कहा कि इनको व्याकरण-शास्त्र पढ़ाया जाए, तो किसी ने अन्य शास्त्र का नाम लिया और किसी ने उससे अन्य का। अन्त में सुमति नाम के मन्त्री ने परामर्श दिया कि राजसभा में विष्णुशर्मा नाम के सर्वशास्त्रों के ज्ञाता विद्वान् विराजमान हैं यदि राजकुमारों की शिक्षा का प्रबन्ध उनके अधीन हो जाएं तो वे अल्प अवधि में उन्हें सब विद्याओं में पारंगत कर देंगे।

यह सुनकर राजा को प्रसन्नता हुई और उसने पण्डित विष्णु शर्मा को बुलवाया और उनसे निवेदन किया कि यदि वे किसी प्रकार राजकुमारों को सुशिक्षित कर दें तो उनको एक सौ ग्रामों का अधिकार प्रदान कर पुरस्कृत किया जाएगा।

विष्णु शर्मा ने सगर्व कहा, ‘‘मुझे आपके ग्राम नहीं चाहिए। मैं विद्या का विक्रय नहीं करता। तदपि मैं आपको आश्वासन देता हूँ कि छः मास की अवधि के भीतर ही मैं आपके राजकुमारों को सुशिक्षित कर दूँगा। मैं अर्थ-लोलुप नहीं हूँ। यह कार्य मैं केवल मनोरंजन के लिए स्वीकार करता हूँ। यदि छः मास की अवधि समाप्त होने पर मैं आपके राजकुमारों को सुशिक्षित न कर पाया तो आप जो उचित समझे वह दण्ड मुझे दीजिए।’’

पण्डित विष्णु शर्मा की इतनी कठिन प्रतिज्ञा सुनकर राजा सहित सारी राजसभा आश्चर्यचकित रह गई। राजा ने अपने राजकुमारों को बुलवाया और उन्हें पण्डित जी को सौप दिया। विष्णुशर्मा ने उन राजकुमारों को सुशिक्षित करने के लिए मित्रभेद, मित्र-सम्प्राप्ति, काकोलूकीय, लब्धप्रणाश तथा अपरीक्षित कारक नामक नीतिशास्त्र के पांच प्रकरण बनाकर, उन्हें राजकुमारों को पढ़ाना आरम्भ किया।
अपने वचनानुसार विष्णु शर्मा ने छः मास की अवधि में उन पांच प्रकरणों को राजकुमारों को पढ़ा दिया और उसको पढ़कर वे अप्रतिम विद्वान बन गए। तभी से पंचतन्त्र नाम का यह नीतिशास्त्र बालकों को व्यवहारपटु बनाने के लिए इस संसार में प्रचलित हुआ। इसके विषय में ऐसी मान्यता है कि इस नीतिशास्त्र का जो अनवरत अध्ययन करता है अथवा जो इसको सुनाता है, वह इन्द्र से भी पराभूत नहीं हो सकता।

प्रकाशक

प्रथम तन्त्र

मित्रभेद

1.दुष्ट और लोभी श्रृगाल


दक्षिण देश में महिलारोप्य नाम का एक नगर था। उसमें वर्धमान नाम का एक वैश्य रहता था। उस वैश्य के पास अपार धन-सम्पत्ति थी, फिर भी रात के समय लेटे हुए उसने विचार किया कि अपनी सम्पत्ति को और अधिक बढ़ाने के लिए उसको कोई उपाय करना चाहिए, क्योंकि धन ही एक ऐसी वस्तु है जिससे संसार की किसी भी वस्तु को प्राप्त किया जा सकता है। धनवान से सभी मित्रता करते हैं और धन न रहने पर बन्धु-बान्धव भी साथ छोड़ दिया करते हैं। जिसके पास धन है, वही उत्तम पुरुष माना जाता है, उसे ही विद्वान् भी मान लिया जाता है।

धन की महिमा समझ में आते ही उसने धन कमाने के उपायों पर विचार किया। उसने सोचा, धन कमाने के छः उपाय हैं, भिक्षा, नौकरी, कृषि, विद्या, व्याज पर ऋण देना और व्यापार। इन छः उपायों में से उसको व्यापार ही सर्वोत्तम उपाय लगा। क्योंकि भिक्षावृत्ति कपटी जनों के कारण कुख्यात हो चुकी है, नौकरी में श्रम का उचित मूल्य नहीं मिलता, कृषि बड़ी कष्टसाध्य है, विद्यार्जन बड़ा कठिन कार्य है, ब्याज पर ऋण देने से कभी-कभी मूल धन के डूब जाने का भी भय रहता है। अतः व्यापार ही सर्वश्रेष्ठ है।

वर्धमान वैश्य ने विचार किया कि व्यापार में भी किस वस्तु का व्यापार उचित है और किस वस्तु का अनुचित। इन सब बातों पर गम्भीरतापूर्वक विचार कर उसने निश्चय किया कि व्यापार के लिए मथुरा जाएगा। अतः उस नगर में किन-किन वस्तुओं का व्यापार सम्भव है यह विचार कर उसने वह सारी सामग्री अपनी बैलगाड़ी में लदवाई और अपने गुरुजनों का आशीर्वाद तथा परिजनों का स्नेह प्राप्त कर अपने संजीवक और नन्दक नाम के दोनों बैलों को गाड़ी में जोतकर मथुरा के

लिए प्रस्थान कर दिया। मार्ग पर चलते हुए जब वे यमुना के कछार में पहुँचे तो संजीवक बैल का पैर दलदल में फंस गया। उन्होंने बल पूर्वक आगे बढ़ना चाहा तो उसका पैर ही टूट गया। बैल का पैर ठीक होने की प्रतीक्षा में वैश्य वहीं पड़ा रहा।
जब उसको वहाँ पड़े हुए तीन दिन और तीन रात हो गए तो वैश्य के साथी सेवकों ने उसको समझाया कि इस प्रकार एक बैल के लिए इस बीहड़ वन में, जो कि सिंह और व्याघ्र जैसे भयानक प्राणियों से भरा हुआ है, रहना बुद्धिमानी की बात नहीं है। क्योंकि कहा भी है कि छोटी वस्तु के लिए बडी वस्तु की हानि नहीं करनी चाहिए। संकट आने पर छोटी वस्तु का त्याग और बड़ी वस्तु की रक्षा ही बुद्धिमत्ता कहलाती है।

मन मारकर वर्धमान को यह परामर्श स्वीकार करना पड़ा। संजीवक की देखभाल के लिए दो सेवकों को वहीं छोड़कर अपने शेष साथियों को लेकर वह लोग एक ही बैल के सहारे आगे को चल दिया। वैश्य जब चला गया तो संजीवज की देख-भाल के लिए नियुक्त दोनों सेवक उस बीहड़ वन में भयभीत हुए। अतः संजीवन को वहीं उसी अवस्था में छोड़कर दूसरे दिन वे भी वहाँ से चल दिए और दो दिन बाद सेठ से जा मिले। उन्होंने सेठ से कहा कि दूसरे दिन ही संजीवक मर गया था।

क्योंकि वह सेठजी का प्यारा बैल था, अतः उन दोनों ने वन से काष्ठ एकत्रित कर उस बैल का दाहकर्म कर दिया है।
सेठजी को संजीवन के मरने का सामाचार सुनकर दुःख तो बहुत हुआ किन्तु विधि के विधान के सम्मुख वह कर भी क्या सकता था ! इस प्रकार सेठ की मथुरा की यात्रा जारी रही। उधर संजीवक को वहाँ पड़े-पड़े हरी घास चरने को मिली और कुछ पीड़ा भी कम हुई तो वह उठकर खड़ा हो गया। फिर धीरे-धीरे चलकर वह यमुना के तट पर पहुँच गया।

उस तट पर घास चरने वाले पशुओं का अभाव होने के कारण वहां बहुत बड़ी मात्रा में हरी-हरी घास थी। उस हरी घास का सेवन और यमुना के शीतल जल का पान करता हुआ संजीवक कुछ दिनों में स्वस्थ हो गया। इस प्रकार निर्द्वन्द्व रहता हुआ वह शिवजी के नन्दी की भाँति हृष्ट-पुष्ट हो गया। किसी ने ठीक ही कहा है-यदि भाग्य अनुकूल हो तो अरक्षित वस्तु भी सुरक्षित रहती है और भाग्य विपरीत हो तो सुरक्षित वस्तु भी अरक्षित हो जाती है। भाग्य अनुकूल होने पर वन में छोड़ा हुआ अनाथ भी जीवित रहता है और भाग्य प्रतिकूल होने पर घर में रहता हुआ अनेक उपाय करने पर भी जीवित नहीं रह पाता।

संजीवक जब हृष्ट-पुष्ट हो गया तब एक दिन पिंगलक नाम का एक सिंह अपने साथियों सहित यमुना का जल पीने के लिए उस ओर ही आ निकला। सहसा उसने देखा कि एक विशालकाय पशु यमुना तीर पर विचरण करता हुआ दहाड़ रहा है। उसकी गर्जना सुनकर सिंह डर गया तट की ओर बढ़ने की अपेक्षा वह वहीं समीप के एक वृक्ष के नीचे आकर बैठ गया।

अपने चारों ओर उसने संगी-सीथियों को बैठा लिया। इस प्रकार उसने अपनी सुरक्षा के लिए व्यूह की रचना कर डाली।
किसी युग में पिंगलक का एक श्रृगाल प्रधानमन्त्री होता था। उसके मरने के बाद उसके करटक और दमनक नामक दोनों पुत्रों को राजा ने मन्त्री बनाया था, किन्तु अपनी दुष्टता के कारण उनको पदच्युत होना पड़ा था। तो भी अपने अधिकार की पुनर्प्राप्ति के लिए वे दोनों भाई अपने राजा का अनुगमन किया करते थे।

आज भी जब डर से उन दोनों ने अपने राजा को सहसा रुककर एक वृक्ष की जड़ में व्यूह बनाते देखा तो वे स्वयं भी वहीं रुक गए दमनक बोलास ‘‘करटक भाई ! हमारा राजा प्यासा होने पर भी यमुना-तट पर न जाकर यहां व्यूह बनाकर बैठ गया है, इसका क्या कारण हो सकता है ?’’
करटक बोला, ‘‘दमनक भाई ! इससे हमें क्या ? क्योंकि जो व्यक्ति बिना उद्देश्य के कार्य करने की इच्छा करता है वह कील उखाड़ने वाले वानर की भाँति विनष्ट हो जाता है।’’
यह सुन दमनक ने पूछा, ‘‘भला वह कैसे ?’’
करटक बोला, ‘‘सुनाता हूँ, सुनों।

2. कील उखाड़ने वाला वानर


किसा वैश्य ने अपने नगर के समीप के वन में एक देवमन्दिर बनवाना आरम्भ किया। उस मन्दिर के निर्माण-कार्य में लगे श्रमिक मध्याह्न का भोजन करने के लिए नगर में चले जाया करते थे। इस प्रकार एक दिन जब सब श्रमिक भोजन करने के लिए नगर में गये हुए थे तो उसी समय वानरों का एक झुण्ड उधर से आ निकला। उन दिनों वहां लकड़ी चिराई का कार्य भी हो रहा था। अर्जुन का बहुत बड़ा वृक्ष काटकर उसे चीरा जा रहा था। चीरने वाले ने भोजन के समय अपने काम को रोका तो उसने अधचिरी लकड़ी के बीच में लकड़ी की एक मोटी कील ठोक दी जिससे कि भोजन के उपरान्त आकर वह उससे सरलता से अपनी आरी को डाल सके।

वानर का स्वभाव ही उत्पाती होता है। एक वानर आकर उस अधिचिरी लकड़ी पर बैठ गया। जहां पर कील ठुकी थी वहां पर जब बन्दर बैठा तो उस चिरी लकड़ी के दो पाटों के बीच में उसके अण्डकोष लटक गए। बन्दर बैठा-बैठा उस लकड़ी की कील को उखाड़ने लगा। जोर लगाने पर वह कील तो उखड़ गई किन्तु वानर चीख उठा। उसके अण्डकोष दब गए थे। वानर के बचने का कोई उपाय नहीं था। वह वहीं पर समाप्त हो गया।

करटक कहने लगा, ‘‘इसलिए मैं कहता हूँ जो व्यर्थ का कार्य करता है। उसकी दशा वानर जैसी होती है। राजा के बचे हुए भोजन में से हमको भोजन मिल जाता है तब हमें व्यर्थ के प्रपंच में पड़ने की क्या आवश्यकता ?’’

दमनक बोला, ‘‘लगता है, तुम केवल भोजन के लिए ही जीते हो। बुद्धिमान जन मित्रों के उपकार और शत्रु के अपकार के लिए राजा का आश्रय ग्रहण करते हैं। पेट तो सभी भर लेते हैं। जो दूसरों के लिए जीता है उसी का जीवन सफल है। जिसने कभी कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं किया, उसने तो जन्म लेकर केवल अपनी माता के यौवन को ही विनष्ट किया है। नदी तट पर उगे तृण का भी जन्म सफल है जिसका आश्रय ग्रहण कर नदी में डूबता व्यक्ति तट पर आ जाता है। काष्ठ के भीतर छिपी अग्नि का लोग उल्लंघन कर जाते हैं किन्तु प्रज्वलित अग्नि का उल्लंघन करने का साहस किसी को नहीं होता।’’

दमनक का उपदेश सुनकर करटक फिर बोला, ‘‘जब हम दोनों को ही राजा ने पदच्युत कर दिया है तो हमें राजा के विषय में जानने की चेष्टा करने से क्या लाभ ? इससे तो हम अपमानित होंगे और उपहास के पात्र बनेंगे। मनुष्य को अपनी वाणी का प्रयोग उसी स्थान पर करना चाहिए जहां उसके प्रयोग से कुछ लाभ होता हो। जिस प्राकार श्वेत वस्त्र पर ही रंग उभरता है उसी प्रकार उचित स्थान पर प्रयुक्त वाणी ही सार्थक होती है।’’

यह सुन दमनक बोला, ‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है। राजा की सेवा में तत्पर रहने वाला अप्रधान व्यक्ति भी प्रधान बन जाया करता है। कहते हैं कि जो व्यक्ति सन्निकट होता है राजा उसी से प्रेम करता है, भले ही वह मूर्ख क्यों न हो। स्त्रियों और लताओं की भाँति राजा भी अपने निकटस्थ व्यक्ति से ही प्रेम किया करते हैं। जो राजसेवक राजा के समीप रहता है वह राजा के कुपित तथा प्रसन्न होने के कारण को जान लेता है

और तदनुरूप कार्य करने पर वह पुनः राजा का प्रिय पात्र बनने में सफल हो जाता है। जो उत्साही और अध्यवसायी व्यक्ति है वह क्या नहीं कर सकता। ऐसे लोग विषधर सर्प, हिंसक व्याघ्र और सिंह आदि को भी वशीभूत कर लिया करते हैं। राजा को वश में कर लेने पर हम सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं।’’

करटक ने पूछा, ‘‘तो आप क्या करना चाहते हैं ?’’ ‘‘हमारा स्वामी पिंगलक भयभीत है। उसके साथ रहने वाले भी सन्त्रस्त हैं। मैं उनके समीप जाकर उसके भयग्रस्त होने का कारण जानना चाहता हूं। कारण जान लेने पर ही सन्धि, विग्रह, यान आसन, संश्रय और द्वैधी भावों में से किसी भी एक का अवलम्बन प्राप्त कर अपना कार्य सिद्ध करने का यत्न करूंगा।’’
‘‘आप यह कैसे कह सकते हैं कि हमारा स्वामी भयभीत है ?’’

‘‘अरे ! इसमे जानने को है ही क्या ? कथिक अर्थ को तो पशु भी समझ लेते हैं। इंगित के आश्रय ही हाथी, घोड़े आदि अपने सवार को यथास्थान ले जाते हैं। बुद्धिमान तो वह है जो अकथिक अर्थ को भी समझ जाए। यह स्पष्ट है कि पिंगलक भयभीत है। मैं उसके समीप जाकर उसके भय का कारण जानना चाहूंगा। फिर अपनी बुद्धि से उसको निर्भय करने का यत्न करूंगा, और इस प्रकार मैं अपना खोया मन्त्रित्व पुनः प्राप्त करूंगा।’’

करटक बोला, ‘‘सेवा क्या होती है, यह तो आप जानते ही नहीं, फिर आप किस प्रकार उसको अनुकूल करेंगे ?’’
‘‘अरे यह तुम क्या कहते हो। मैं पिता के साथ रहता हुआ समागत विद्वानों के मुख से सब प्रकार के नीतिशास्त्र सुन और समझ चुका हूं। उस सबका मूल यही है कि अपनी सेवा से राजा को प्रसन्न कर दो। बस फिर सब कुछ आपका है।’’
इस प्रकार दमनक ने सेवा के अनेक प्रकार करटक को बताए। उसने बताया कि राजा की सेवा में रहते हुए दूत को यमदूत और हाला को हलाहल समझना चाहिए। युद्घ के समय राजा के आगे रहना चाहिए और नगर यात्रा में सदा उसके पीछे रहना चाहिए। ऐसा ही व्यक्ति राजा को प्रिय होता है।

करटक ने पूछा, ‘‘आप वहां जाकर पहले क्या करेंगे, जरा बताइए तो ?’’
दमनक बोला, ‘‘इस विषय में पहले से वाक्यों का निर्धारण करना कठिन है, वहां की परिस्थिति देखकर मेरी बुद्धि स्वयं ही अपना मार्ग बना लेगी।’’

करटक कहने लगा, ‘‘जिस प्रकार भीषण पाषाण, हिंसक सिह, व्याघ्र और विषधर सर्षों आदि से घिरे रहने के कारण पर्वत दुरारोह होते हैं उसी प्रकार शठों, धूर्तों और दुष्टों से घिरे रहने के कारण राजा भी सरलता से प्रसन्न नहीं किए जा सकते। राजा भी कुटिल सर्पों की ही भाँति होते हैं जो केवल मन्त्रों द्वारा ही साधे जा सकते हैं। उनके समान ही वे दुमुंहे होते हैं।’’
इस प्रकार जब करटक ने अपनी बुद्धि के अनुसार अनेक उदाहरण देकर समझाया तो दमनक कहने लगा, ‘‘यह तो तुम ठीक ही कहते हो। किन्तु जिस व्यक्ति का जैसा स्वभाव होता है उसको उसी प्रकार के आचरण से वशीभूत भी किया जा सकता है। बस हमें तो स्वामी को उसके मनोनुकूल आचरण से प्रभावित करना होगा। राजा तो राजा, अनुकूल आचरण करने से तो राक्षस भी वश में हो जाया करते हैं।’’

दमनक की बात सुनकर करटक बोला, ‘‘यदि आप ही चाहते हैं तो जाइए ईश्वर आपकी सहायता करेगा। बस वहां जाकर सतत् सावधान रहिएगा क्योंकि आपके भाग्य पर ही हमारा भाग्य भी निर्भर करता है।’’
करटक से स्वीकृति मिलने पर दमनक उससे विदा लेकर पिंगलक की ओर चल दिया।

पिंगलक ने जब दमनक को आते देखा तो विपत्ति में पड़ा होने के कारण उसने द्वारपाल को निर्देश दिया कि वह उसे रोके नहीं, आने दे। इस प्रकार जब दमनक आया तो उसको भीतर पहुंचने में किसी प्रकार की बाधा नहीं हुई। राजा के समीप पहुँचकर उसने यथाविधि प्रमाण किया और राजा के संकेत पर यथास्थान बैठे गया। उसके बैठ जाने पर राजा ने पूछा, ‘‘कुशल तो है, आज बहुत दिनों के बाद दिखाई दिए हो। किधर से आ रहे हो ?’’

दमनक ने नम्रता से कहा, ‘‘मैं किसी विशेष प्रयोजन से सेवा में उपस्थित हुआ हूं। व्यक्ति चाहे कैसा ही उत्तम, मध्यम अथवा निम्न कोटि का हो, राजा का तो सभी से प्रयोजन पड़ता है जैसे दांतो में अटकी हुई वस्तु निकालने के लिए तलवार की नहीं तिनके की आवश्यकता होती है। फिर मैं तो मनुष्य हूँ। यद्यपि दुर्भाग्य से हमारा अधिकार छिन गया है तदपि हैं तो हम वंशक्रम से आपके अनुगत ही। जो स्वामी सेवकों के गुणों को नहीं पहचानता अथवा जान–बूझकर उनकी अवहेलना करता है, अवसर मिलने पर उस स्वामी को सेवक छोड़ दिया करते हैं।’’

‘‘सोने में जड़ने योग्य मणि को यदि रांगे में जड़ दिया जाए तो मणि किसी प्रकार की आपत्ति नहीं करेगी किन्तु उसकी सोभा समाप्त हो जाती है। जिस राजा के यहाँ योग्य और आयोग्य व्यक्ति की पहचान न हो उस राजा के आश्रय में रहना हानिकर हो सकता है। जो राजा कांच को मणि और मणि को कांच समझता हो उसके आश्रय में कभी कोई योग्य सेवक स्थिर नहीं रह सकता। राजा अपने सेवक पर अत्यधिक प्रसन्न होने पर भी केवल धन को प्रदान करता है किन्तु सेवक तो राजा के लिए अपने प्राणों तक की आहुति देने को तत्पर रहता है। गुणी व्यक्ति अपने गुणों के विकास से ही प्रसिद्धि को प्राप्त करता है। राजन् ! मैं अपका भक्त हूं और शक्तिमान भी हूं। अतः आपको मुझे सेवा का अवसर अवश्य ही प्रदान करना चाहिए।’’

पिंगलक कहने लगा, ‘‘यह सब जो कुछ तुमने कहा है वह सब ठीक है। तुम तो वैसे भी मेरे मन्त्री के पुत्र हो। अतः तुम यदि कुछ कहना चाहते हो तो निर्भय होकर कहो।’’
मन-ही-मन प्रसन्न होता हुआ दमनक बोला, ‘‘देव ! मुझे एक आवश्यक निवेदन कराना है।’’
‘‘ठीक है, बोलो।’’
‘‘महाराज ! आचार्य बृहस्पति ने कहा है कि राजा का कोई छोटे-से-छोटा कार्य भी हो तो उसे जनसमुदाय में नहीं कहना चाहिए। अतः मेरी बात को आप एकान्त में सुने तो अधिक उपयुक्त होगा।’’
पिंगलक ने अपने पार्षदों की ओर दृष्टि की तो सब वहां से एक ओर को खिसक गए। उनके चले जाने पर दमनक राजा के समीप गया और धीरे से पूछने लगा, ‘‘आप जल पीने के लिए आए थे, किन्तु बिना पिपासा शान्त किए ही यहां आकर किस प्रकार बैठ गए हैं ?’’
पिंगलक ने अपने भय को छिपाते हुए कहा, ‘‘कोई विशेष बात नहीं है, बस यों ही विश्राम करने के लिए हम लोग बैठ गए हैं।’’ ‘‘ठीक है कोई गोपनीय बात नहीं तो रहने दीजिए। क्योंकि शास्त्र में कहा गया है कि कुछ बाते ऐसी होती है जिन्हें अपनी पत्नी से भी गुप्त रखना पड़ता है।
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