10 प्रतिनिधि कहानियाँ(विष्णु प्रभाकर) - विष्णु प्रभाकर 10 Pratinidhi Kahaniyan (Vishnu Prabhakar) - Hindi book by - Vishnu Prabhakar
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10 प्रतिनिधि कहानियाँ(विष्णु प्रभाकर)

विष्णु प्रभाकर

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :92
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3479
आईएसबीएन :81-7016-216-5

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विष्णु प्रभाकर की दस प्रतिनिधि कहानियाँ...

10 Pratinidhi Kahaniyan - A Hindi book of stories by Vishnu Prabhakar - 10 प्रतिनिधि कहानियाँ - विष्णु प्रभाकर

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दस प्रतिनिधि कहानियाँ सीरीज़ ‘किताबघर’ प्रकाशन की एक महत्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।
इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हो, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कथाकार होने का एहसास बना रहा हो। भूमिका स्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
‘किताबघर’ गौरान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। हिंदी के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : ‘बँटवारा, ‘क्रान्तिकारी, ‘पर्वत से ऊंचा’, ‘ठेका’, ‘पिचका हुआ केला और क्रान्ति’, ‘चितकबरी बिल्ली’, ‘एक मौत समन्दर किनारे’, ‘एक और कुन्ती’, ‘पैड़ियों पर उठते पदचाप’ तथा ‘पाषाणी’।
हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार विष्णु प्रभाकर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।

भूमिका


हिंदी प्रकाशन जगत् में ‘किताबघर’ एक नाम ही नहीं है एक मानदंड भी है। वहाँ से मेरी भी कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। अपनी लंबी यात्रा में बहुत से पड़ाव उन्होंने पार किए हैं। अब वे उस मुकाम पर पहुँच गए हैं जहाँ लेखक से वे कुछ अपेक्षाएँ भी रखने लगे हैं।

इसी प्रक्रिया में उन्होंने मुझसे चाहा है कि मैं अपने संपूर्ण कथा-दौर में रची गई कहानियों में से कुछ कहानियाँ चुनूँ जो मेरे लिए, समीक्षक-आलोचक-संपादकों के लिए मील का पत्थर हों तथा जिनकी वजह से स्वयं लेखक को लगातार यह अहसास बना रहा है कि वह कथाकार बना रहा है कि वह कथाकार है लेकिन उससे भी जरूरी हमारा आग्रह यह है कि इस संकलन की भूमिका स्वरूप लेखक का एक अद्भुत वक्तव्य भी, जिसमें संकलित कथाओं के प्रतिनिधि होने की बात पर अपने संपूर्ण कथा दौर के संदर्भ में प्रकाश डाला जाए तथा बड़बोलेपन को भूमिका का दोष माना जाए।
हम समझते हैं कि रचना प्रक्रिया में श्रद्धा की ज़रूरत होती है तथा इसी कथा श्रद्धा को हम इस श्रृंखला के माध्यम से पाठकों तथा लेखकों की नई पीढ़ी को सौंपना चाहते हैं ताकि यह भूमिका उनके भावी लेखन के लिए प्रतिमान तो बने ही, साथ ही उनकी साहित्यिक निष्ठा को भी मजबूती दे सके।

यह एक चुनौती थी जिसे मैं प्रथम दृष्टि में स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं था। उसके कई कारण हैं। सबसे पहला कारण तो यही है कि मेरे कुछ अग्रज सर्जक और समीक्षक मुझे कहानीकार ही नहीं मानते। उनका कहना है कि जो तत्व कहानी को कहानी बनाते हैं, वे मेरे पास नहीं हैं। मैं दिशाहीन हूँ। कुछ है जो मुझे अश्रुगलद् भावुकता की परंपरा का लेखक, लिजलिजा, गांधीवादी सतह पर तैरने वाला मानते हैं अर्थात् मेरी ‘कहानियों’ में गहराई नहीं है। कुछ मानते हैं कि मेरे पास शक्ति (पावर) नहीं है कुछ कहते हैं कि मेरी कहानियों में मिर्ची (कचोट) नहीं है यानी मेरे साहित्य में द्वंद्व नहीं है। एक व्यक्ति के शब्दों का प्रयोग करूँ तो मैं जैसा सीधा-सादा आदमी हूँ वैसा ही मेरा साहित्य है। उसकी क्या चर्चा करना। यानी उन्होंने मुझे लेखकों की बिरादरी से ही खारिज कर दिया। इसीलिए कुछ समीक्षकों ने मुझे न लिखने की सलाह दी।
और भी बहुत कुछ कहा और लिखा। लिखने-कहने के उनके अधिकार को मैंने कभी चुनौती नहीं दी। पर साथ ही मेरे अन्दर के किसी कोने में यह विश्वास बना रहा कि मैं कहानीकार हूँ। यह सच है कि महान् तो क्या मैं मात्र सर्जक कहलाने का अधिकारी भी नहीं हूँ। निर्माता भी नहीं हूँ, बस अर्ज़ीनवीस हूँ, साहित्य का अर्ज़ीनवीस। मेरी कहानियाँ भी उसी श्रेणी की हैं। समाज में महान् के साथ साधारण सदा रहा है। उसका होना ही तो ‘महान’ की पहचान है।

समाज के प्रत्येक व्यक्ति का मानसिक स्तर एक जैसा नहीं होता। काल जिनको चुनता है उनकी संख्या तो विरल होती है। आसमान में सूर्य एक ही है, चन्द्रमा भी एक ही है पर उसमें दोष होने पर भी रसिक जन उसे कितना प्यार करते हैं। तारे असंख्य हैं, वे सूर्य-चन्द्र जैसा प्रकाश तो देते नहीं दिखाई देते पर जो कुछ देते हैं उसका भी महत्त्व होता है। महत्त्व तो पटबीजनों का भी होता है। कथा आती है कि सूर्य जब अस्ताचल की ओर जा रहे थे तो उन्हें एक ही पीड़ा साल रही थी कि अब जगत् को कौन प्रकाश देगा। तब मिट्टी के छोटे-से दीप ने कहा था, ‘प्रभु, आप चिंता न करें, मैं हूँ यहाँ पर।’
मैंने अनेक विधाओं में लिखा पर अपने को मैं मूलतः कहानीकार ही मानता हूँ। इसे मेरी धृष्टता कहिए या बड़बोलापन, पर मेरे अंतर का विश्वास यही है। और इसी विश्वास के कारण मैंने प्रकाशक की यह चुनैती स्वीकार की है। चुनौती इस अर्थ में कि क्या कोई लेखक विश्वास के साथ कह सकता है कि अमुक-अमुक उसकी प्रतिनिधि कहानियाँ हैं। मैं तो नहीं ही कह सकता। ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’, ‘मेरी लोकप्रिय कहानियाँ’, ‘मेरी चर्चित कहानियाँ, मेरे ऐसे कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और उन्हें तैयार करने में मुझे विशेष कठिनाई नहीं हुई। लेकिन प्रतिनिधि कहानियों का चुनाव करना सहज नहीं हो सका। यह मेरी दुर्बलता भी हो सकती है, हीन भाव भी हो सकता है पर ये सब बातें इस तथ्य को नहीं झुठला सकतीं कि यह काम मुझे असंभव जैसा लगा। फिर भी मैंने इस प्रस्ताव को स्वीकर इसलिए किया ताकि मुझे अपने अंतर में झाँकने का, अपने को कुरेदने का अवसर मिलेगा।

और वह मिला भी। मेरी कथा-यात्रा नवंबर 1931 से आरम्भ होती है जब मैंने ‘दिवाली के दिन’ पहली कहानी लिखी थी और वह लाहौर से प्रकाशित होने वाले दैनिक पत्र ‘हिन्दी मिलाप’ के रविवासरीय संस्करण में प्रकाशित हुई थी। तब मैं अनेक कारणों से सरकारी नौकरी में था इसलिए ‘प्रेमबंधु’ के छद्म नाम से लिखना शुरू किया था। बाद में मैंने यह नाम छोड़ दिया और विष्णु के नाम से लिखना शुरू किया। उस समय मुझ पर आर्यसमाज का गहरा प्रभाव था। तीसरी सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि बचपन से ही मैं कांग्रेस की ओर आकर्षित हो चुका था। सात वर्ष की आयु से ही खद्दर पहनने का चाव पैदा हो गया था। बड़ी इच्छा थी कि बड़े होकर मैं आज़ादी की लड़ाई का एक सिपाही बनूँ और खूब पढ़ूँ।
पढ़ने की बात मेरे मन में माँ के कारण पनपी थी। तब हमारे परिवार में वही एक मात्र पढ़ी-लिखी महिला थीं। और वे चाहती थीं कि उनके बच्चे भी पढ़-लिखकर कुछ बनें, इसलिए उन्होंने हमें सन् 1924 में अपने भाई अर्थात् हमारे मामाजी के पास भेज दिया था लेकिन दुर्भाग्य से अगले ही वर्ष या उसी वर्ष के अंत में हमारे कस्बे पर प्लेग का आक्रमण हुआ और उसने हमारे परिवार को नष्टप्राय कर दिया। हमारे छोटे चाचाजी जो परिवार के आधार-स्तंभ और दीप-स्तंभ दोनों थे, मृत्यु का ग्रास बन गए। फिर तो कुछ ही दिनों में हमारा समृद्ध परिवार, सारी सम्पत्ति, दुकानें व जेवर सब-कुछ गँवाकर निर्धनता के चरम सीमा पर आ गया।

अब मैं न तो आगे पढ़ सकता था और न आज़ादी की लड़ाई में भाग ले सकता था। कहानी बहुत लंबी है। संक्षेप में इतना ही कहूँगा कि तब मेरे मामाजी ने सलाह दी थी कि अब कुछ नहीं हो सकता। अपने परिवार के लिए कुछ करने के लिए यह ज़रूरी है कि तुम कुछ काम शुरू कर दो। तुम चाहो तो मैं तुम्हें अपने दफ्तर में नौकरी दिलवा सकता हूँ।
तब मैंने मैट्रिक की परीक्षा दी थी और गरीबी क्या होती है यह काफी देख चुका था। इसलिए अपने अंतर की व्यथा को दबाकर मैंने मामाजी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। काम था मेज़ साफ करना, दवातों में स्याही डालना, फाइलें पकड़ाना इत्यादि-इत्यादि। करने को मैं सब-कुछ करता था लेकिन भीतर-ही-भीतर रोता भी कम नहीं था। चारों तरफ से पड़ने वाली विपदाओं ने मुझे तोड़ दिया था। आर्यसमाज के प्रभाव के साथ-साथ गांधीजी का प्रभाव भी मुझ पर पड़ चुका था। खद्दर पहनता था; शुद्ध हिंदी में भाषण भी दे सकता था। अछूतों, महिलाओं और मुसलमानों के प्रति मेरे मन में करुणा जाग आई थी। मैं किसी से भी, किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करता था। हाँ, तब तक मैंने डायरी लिखना भी शुरू कर दिया था। तब की वह डायरी सुरक्षित रहती तो उसके हर पृष्ठ पर यह लिखा देखा जा सकता था—Better to die [ऐसे जीवन से मरना अच्छा]।

ये सारी परिस्थितियाँ जहाँ एक ओर मुझे कथा से मथ रही थीं, दूसरी ओर डायरी लिखने की प्रवृत्ति के कारण और आर्यसमाज में सक्रिय भाग लेने की वजह से मुझे अपनी व्यथा को कागज़ पर उतारने की प्रेरणा भी मिली। दर्द सहने की यातना में से गुज़रे बिना कोई लेखक नहीं बन सकता। मैं तब इसी प्रक्रिया में से गुज़र रहा था। वाल्मीकि का क्रौंचवध तब मेरा क्रौंचवध बन गया। मैंने लिखना शुरू किया। पहले कविता लिखी फिर गद्य काव्य। लेकिन उनमें मन इतना रमा नहीं इसलिए कहानी लिखनी शुरू कर दी। इसका एक कारण यह भी था कि मैं पढ़ता बहुत था और तब मैंने रवीन्द्र, शरत, प्रेमचंद, प्रसार इत्यादि महान् रचनाकारों की रचनाएँ पढ़ ली थीं। बचपन में पुराने किस्से-कहानियाँ भी बहुत पढ़े थे और दादी-परदादी से सुने भी थे। इन सबका परिणाम अंततः ‘दिवाली के दिन’ कहानी के रूप में हुआ। यह कहानी अब कहाँ है मुझे नहीं मालूम लेकिन इतना अवश्य कह सकता हूँ कि उस पर जहाँ एक ओर आर्यसमाज के आदर्शवाद का प्रभाव था वहीं दूसरी ओर व्यथा और वेदना से पूर्ण करुणा का भी प्रभाव था। उसे बाद में आलोचकों ने अश्रुगलद् भावुकता का नाम दिया।
तो संक्षेप में यह मेरे कहानीकार बनने की कहानी। लेकिन इसके बाद इतना व्यस्त रहा कि गंभीरता से कुछ लिख नहीं पाया। उन दिनों सरकारी नौकरी आज की नौकरी से भिन्न थी ! 12 घंटे काम करना पड़ता था। कोई ओवर टाइम या लंच अवर नहीं होता था। आर्यसमाज से जुड़े होंने के कारण मैं उसके कार्यक्रमों में भी सक्रिय रहता था। नगर में नाटक मंडलियाँ थीं चूँकि मैं उत्तर प्रदेश से आया था इसलिए मेरी हिंदी और उसका उच्चारण बहुत प्रभावशाली था। इसलिए मैं तत्कालीन नाटकों में अभिनय करने लगा था। उसके बाद तो स्वयं मैंने अपनी एक नाटक मंडली बना ली थी। इसके अतिरिक्त पढ़ने की लालसा भी मेरे अन्दर बड़ी तीव्र थी और मैं पंजाब विश्वविद्यालय की ‘हिंदी भूषण’ और ‘प्रभाकर’, संस्कृत की ‘प्राज्ञ’ और ‘विषारद’ आदि परीक्षाओं में बैठता रहा। और अंततः बी.ए. की डिग्री प्राप्त कर ली। आज यह सब-कुछ आश्चर्यजनक लगता है लेकिन इस सबको छोड़कर मैं अपने साहित्य-सृजन की चर्चा करना चाहूँगा।

सन् 1934 से मैंने गम्भीरता से लिखना शुरू किया। और सारी बाधाओं के बावजूद आज तक वह क्रम निर्बाध रूप से चलता आ रहा है। बीच में पड़ाव ज़रूर आए, बार-बार मोहभंग भी हुआ लेकिन रास्ता रुका नहीं। लगभग 70 वर्ष इस यात्रा में कितना कुछ लिखा इसका लेखा-जोखा अब सबके सामने है। मैंने अब तक लगभग 300 कहानियाँ लिखी होंगी, उनमें से बहुत-सी कहाँ गईं, मुझे पता नहीं। लेकिन जो शेष हैं उनमें से भी दस प्रतिनिधि कहानियाँ चुनना असम्भव-सा है। लेकिन जैसा कि कह चुका हूँ कि मैंने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया।

इस प्रक्रिया में अपनी सहयोगी की सहायता से जो कहानियाँ पहले चुनीं उनमें से अधिकतर बहुत लोकप्रिय हो चुकी हैं और बहुत-से संग्रहों में आ चुकी हैं। अभी-अभी सामयिक प्रकाशन ने ‘मेरी चर्चित कहानियाँ’ के नाम से एक नई पुस्तक-माला का आयोजन किया है। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि प्रतिनिधि कहानियों के लिए जो दस कहानियाँ चुनीं, उनमें से सात ‘चर्चित कहानियाँ’ में आ चुकी हैं। यह मेरे सामने दूसरी चुनौती थी। क्या मैं लोकप्रियता को कसौटी बनाऊँ या नए सिरे से फिर अपनी कहानियों और उनकी रचना-प्रक्रिया का मंथन करके नई कहानियाँ चुनूँ। यह बहुत कठिन काम था क्योंकि ऐसा करने से मेरी कुछ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कहानियाँ छूट रही थीं। पर मैंने निश्चय किया कि जो भी हो, मैं इस संग्रह में वे कहानियाँ संकलित करूँगा जो पुराने संग्रहों में नहीं आई हैं। पुराने संग्रहों से मेरा आशय है जो अब कहीं उपलब्ध नहीं हैं।
बहुत सोचने के बाद मैंने एक मानदंड तैयार किया। मैंने चौथे दशक में लिखना शुरू किया था और अब दसवें दशक तक लिखता रहा हूँ, यानी सात दशक। प्रत्येक दशक में से मैंने अपने विचारों, युग के प्रभावों के अनुरूप, किसी दशक की एक और किसी दशक की दो कहानियाँ चुनीं। शोधकर्ताओं के लिए यह कहानियाँ इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो सकती हैं कि चौथे दशक की कहानी से दसवें दशक की कहानी तक, मैंने कोई प्रगती की है या नहीं। ऐसा नहीं कि ये कहानियाँ चर्चित नहीं हुई हैं, अपने-अपने समय में स्वीकृति मिली है। और वे मेरी रचना-शैली और मान्यतओं का भी प्रमाण हैं।

चौथे दशक की मैंने ‘बँटवारा’ कहानी चुनी जो सन् 1938 में ‘विशाल भारत’ में प्रकाशित हुई थी और उस समय उसके संपादक थे श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’। यह मेरी अनुभूत सत्य कहानी है। यहाँ मैं एक बात और स्पष्ट कर देना चाहूँगा कि मेरी कहानियों का आधार ज्ञान नहीं, अनुभूति रहा है। भले ही कहानी-कला की दृष्टि से मैं अपनी उस अनुभूति को सही भाषा नहीं दे पाया हूँ। ‘बँटवारा’ मेरे अपने बुजुर्गों के परिवार-विभाजन की कहानी है। उसको मैंने बहुत पास से देखा है। इस कहानी पर अश्रुगलद् भावुकता का आरोप लगाया जा सकता है लेकिन अपने प्रारंभिक त्रासद जीवन का प्रभाव मुझ पर पड़ चुका था उससे मैं मुक्त नहीं हो सका। मैं अपनी माँ और अपने चाचा को किसी दूसरे रूप में चित्रित नहीं कर सकता था।

दूसरी कहानी है ‘क्रांतिकारी’, जो पाँचवे दशक की प्रतिनिधि कहानी है और इस बात को प्रमाणित करती है कि मैं राष्ट्रीय आंदोलन से किस सीमा तक प्रभावित हो चुका था। क्या ऐसा नहीं लगता कि मैं स्वयं वह बनना चाहता था जो उस कहानी का नायक बना। मूलतः यह कहानी भी सत्य घटना पर आधारित है। मैं स्वयं भी परोक्ष रूप से इस आंदोलन से जुड़ा रहा और उसका मूल्य भी चुकाया। 15 वर्ष की नौकरी से हाथ धोकर पंजाब छोड़ना पड़ा।

छठे दशक की दो कहानियाँ इस संग्रह में हैं ‘पर्वत से भी ऊँचा’ और ‘ठेका’। ‘पर्वत से भी ऊँचा’ के पात्र से मेरी भेंट अपनी एक हिमालय यात्रा के दौरान हुई। उसकी अंतरतम की गहराई तक छू जाने वाली सहज सादगी और आस्था ने मुझे चकित और मुग्ध कर दिया। बहुत अद्भुत चरित्र मिले मुझे इन यात्राओं में पर वैसा सहज, सरल और दृढ़ आस्था वाला कोई नहीं मिला। वह मेरे तन-मन में समा गया और एक दिन अनायास ही कलम की नोक पर उतर आया। यह कहानी मैंने नहीं लिखी। स्वयं उसी ने कही है। मेरे सैलानी जीवन का सर्वोत्तम प्रसाद है यह।

हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार के चित्र भी मैंने बहुत खींचे हैं। उनमें मेरी कहानी ‘धरती अब भी घूम रही है’ बहुत प्रसिद्ध हुई। देश-विदेश की अनेक भाषाओं में अनूदित भी हुई है लेकिन मेरे अग्रज सर्जकों और समीक्षकों ने उसे ‘अश्रुगलद् भावुकता’ से सराबोर मानकर अस्वीकृत कर दिया परंतु प्रकाशक का आग्रह था कि मैं उसे इस संग्रह में अवश्य लूँ। ले सकता था पर ले नहीं रहा क्योंकि उसी विषय पर लिखी यह ‘ठेका’ कहानी मेरे बहुत से मित्रों को अधिक सशक्त और प्रभावशाली लगी। मैंने भी अनुभव किया कि अपने सभी संभावित गुण-दोषों के बावजूद वह मेरी प्रतिनिधि रचना है। बहुत पास से देखा है मैंने ऐसे व्यक्तियों को।

सातवें दशक की भी दो कहानियाँ आ गई हैं ‘पिचका हुआ केला और क्रान्ति’ मेरी मानसिकता के अनुरूप है। ऐसे सैकड़ों दृश्य मैंने देखे हैं मैंने और सोचा है यह वर्ग-भेद क्यों है ? उसी मानसिकता की प्रतीक है यह कहानी। उस पिचके केले को लेकर लड़ते देखा है मैंने अर्द्धनग्न भूखे पेट बच्चों को।

‘चितकबरी बिल्ली’ को अकहानी कहा जा सकता है या नहीं, मैं नहीं जानता। जब वह दृश्य मैंने और मेरी पत्नी ने देखा था और हम सोते-सोते जाग उठे थे तब मैं इसका अर्थ नहीं समझ पाया था लेकिन पशुजगत् की रति-प्रक्रिया पर एक पुस्तक पढ़ने पर पता लगा कि वह दो बिल्लियों का आक्रोश-भरा युद्ध युद्ध नहीं था, बल्कि रति-प्रक्रिया का अंग था। पशु-पक्षियों को लेकर मैंने दो-चार ही कहानियाँ लिखी हैं, उन्हीं का प्रतिनिधित्व करती है यह कहानी।

आठवें दशक की कहानी ‘एक मौत समंदर किनारे’ एक ऐसी नारी की कहानी है जो जितनी सहज और सरल थी, उतनी ही मुक्त भी। कैसी भी बाधा उसे उसके मनचाहे मार्ग पर चलने पर रोक नहीं सकती थी। दंभ, द्वेष, कटुता, ईर्ष्या से दूर वह बहुत स्नेहिल थी। वह कुशल अभिनेत्री थी पर रंगमंच की। जीवन के रंगमंच पर वह जीवन को मुक्त होकर जीती थी। मृत्यु-पथ पर जाने से भी उसे कोई रोक नहीं सका। नारी की स्वतंत्रता का मैं सदा पक्षधर रहा हूँ, उसी का प्रतीक है यह कहानी। इस नारी को भी बहुत पास से देखा था मैंने।

नवें दशक की दोनों कहानियाँ, ‘एक और कुंती’ और ‘कैसी हो मरियम्मा’ कम चर्चित नहीं हुईं। ‘एक और कुंती’ विभाजन की विभीषिका और हिंदू-मुस्लिम मानसिकता की प्रतीक है। वह इतनी मार्मिक है कि मैं उस पर टिप्पणी करना नहीं चाहूँगा। यह भी सत्य-कथा पर आधारित है। मुझसे अनुरोध किया गया था कि मैं इस नारी की त्रासदी को अपनी कहानी का विषय न बनाऊँ। 14 वर्ष तक मेरे अंतर में संघर्ष मचता रहा। अन्ततः वह तभी शांत हुआ जब मैंने इसे शब्द दे दिए।
‘कैसी हो मरियम्मा’ प्रेम-कहानी है। प्रेम-कहानियाँ मैंने लिखी हैं। उनका प्रतिनिधित्व करते हुए भी यह उनसे थोड़ी भिन्न है। मरियम्मा समाज, परिवार और पति सबसे प्रताड़ित होकर बसेरे की तलाश में है। जीवन जीने के लिए उसे ऊष्मा की तलाश है। ऊष्मा उसे मिलती है पर वह ऊष्मा को रिश्ते के बंधन में न बाँधकर मुक्त ही रहने देती है। नैतिकतावादी इस पर अनैतिकता का आरोप लगा सकते हैं पर मेरी दृष्टि में अनैतिक वह नहीं है, अनैतिक अगर कोई है तो समाज है और उसका पति है।

दसवें दशक की कहानी ‘पाषाणी’ एक मनोवैज्ञानिक कहानी है। मनोवैज्ञानिक कहानियाँ मैंने लिखी हैं पर बहुत कम, किंतु उनकी मांग निरंतर रही। लेकिन मैंने माँग पर प्रायः नहीं लिखीं। जो लिखीं वह न जाने कहाँ विलीन हो गईं।
‘पाषाणी’ की मूल घटना मेरे एक मित्र ने मुझे सुनाई थी। सुनाने का कोई उद्देश्य नहीं था पर मुझे लगा कि यह तो आधुनिका का सुंदर चित्र है। उसकी निरंकुशता को चुनौती मिलने पर कैसा तुमुलनाद उठा उसके अंतर में, उसके बिना जाने, बिना चाहे। और अंततः अनायास ही पिघल गई, यहाँ भी बिना चाहे, बिना जाने।
तो यह परिदृश्य है इन कहानियों का। मैंने यहाँ केवल इनकी कथा-वस्तु के उद्भव और विकास की चर्चा की है। भाषा-शैली और कथा-तत्त्व के संबंध में कुछ कहने का अधिकार मेरा नहीं है, वह सुविधा समीक्षकों और पाठकों को है। मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि ये मेरी मानसकिता का प्रतिनिधित्व निश्चित रूप से करती हैं।

मैं असफल कहानीकार हो सकता हूँ पर जानबूझकर असत्य बोलने का साहस मैंने नहीं किया है। भले ही यह साहित्य का सत्य न हो जीवन का सत्य ज़रूर है। इस बड़बोलेपन के लिए मैं अपने पाठकों और समीक्षकों से क्षमा माँगता हूँ क्योंकि इसके पीछे दंभ नहीं है, बस सहज आत्म-स्वीकृति है।
एक बात और। प्रारंभ में मैंने अपनी कहानी-कला के बारे में समीक्षकों की राय का उल्लेख किया है। उसके पीछे कोई दुर्भावना नहीं है बल्कि वास्तविक स्थिति को स्पष्ट करना है। अपने साहित्यक जीवन के अंतिम छोर पर पहुँचकर मैं स्वयं स्वीकार करता हूँ कि मैं न कालजयी रचना करने वाला सर्जक हूँ न युग निर्माता, बल्कि साहित्य का अर्ज़ीनवीस हूँ। और वृहत्तर समाज में अर्ज़ीनवीस को चाहने वालों का भी एक बड़ा वर्ग होता है। ये कहानियाँ इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हैं कि इनसे इस क्षेत्र में मेरी प्रगति और मेरे विकास का भी अध्ययन किया जा सकता है।

मैं एक बार फिर अपने प्रकाशक, अपने समीक्षकों और अपने पाठकों के प्रति कृतज्ञ हूँ जिन्होंने मुझे अपने मन की बात कहने का अवसर दिया। फिर भी यदि प्रकाशक मुझसे जो अपेक्षा रखते थे वह पूरी नहीं हुई हो तो उसे मेरी सीमा समझकर मुझे क्षमा कर दें।
अन्त में यह शेर उद्धृत करने की अनुमति चाहता हूँ

मेरी क़लम की अदालत में मेरा ज़मीर है,
मेरी क़लम का सफ़र कभी रायगां नहीं जाएगा

इसलिए मेरा वजूद जब तक है मैं नई चुनौतियों को स्वीकार करता हुआ निरंतर आगे और आगे बढ़ता रहुँगा, बिना मंज़िल की चिंता किए। फ़िराक गोरखपुरी के शेर में एक शब्द बदल कर कहना चाहूँगा।

न मंज़िल है न मंज़िल का पता है,
अदब1 बस रास्ता ही रास्ता है।

818 कुंडेवालान
अजमेरी गेट, दिल्ली-110006

विष्णु प्रभाकर

1. मूल में अदब के स्थान पर मोहब्बत है।
बँटवारा


नंदा जब से घर में आई है, उसका मन एक गहरे अवसाद से भरा रहता है। उसे लगता है, जैसे वह एक नई दुनिया में आ पहुँची है, जहाँ सब उसके परिचित होकर भी अपरिचित हैं। वह जानती है कि जिन्हें पीछे छोड़ आई है, वे केवल दो प्राणी हैं, देवर और देवरानी। देवर को उसने गोद में खिलाकर पाला है। आपद-विपद में वह माँ के समान उस पर छाई रही है। देवरानी को एक दिन अपनी बहू की तरह घर में लाई थी, जिसके ऊपर निछावर करने को उसने कुछ नहीं बचा रखा था। इन्हीं दो प्राणियों को पीछे छोड़कर, वह निपट खाली जान पड़ती है। उसके पति, पुत्र, पुत्रियाँ सदा की भाँति आज भी उसके साथ हैं, परंतु उनके कोलाहल में उसे जीवन नहीं मालूम देता। लगता है जैसे सब दीवार के चित्र की तरह मौन नृत्य कर रहे हैं। भाव होते हैं, पर स्पंदन कहाँ होता है इन चित्रों में ?

उसे इस घर में आए अभी एक सप्ताह ही हुआ है, परंतु मालूम होता है, जैसे युग बीत गए हैं, जैसे महाकाल ने सदा के लिए दोनों भाइयों को अलग कर दिया है। सहसा वह घर का काम करते-करते ठिठक जाती है। कोई चिरपरिचित स्वर सुनाई देता है, मानो कोई उसे पुकार रहा है, ‘‘भाभी !’’
लेकिन अर्द्ध-चेतना की दशा भंग होती है, तो देखती है कि उसका छोटा लड़का गौरा खड़ा हुआ कह रहा है ‘‘भाभी ! सुना नहीं तुमने ? स्कूल को देर हो गई। रोटी दो मुझे !’’ वह काँप उठती है। देवेन भी कभी ऐसे ही आकर पुकारता था। वही देवेन आज मुझसे अलग हो गया है। लेकिन यह ठीक ही हुआ। वह बुद्धिमान है, खूब कमाता है। इसीलिए कुछ दिन से यह बात उसके मस्तिष्क में समा रही थी कि कुटुंब का जीवन उसकी कमाई पर अवलंबित है, परंतु शासन करती हैं भाभी ! और शायद यह भी सोचा था कि भाभी का परिवार बड़ा है। मूर्ख कहीं का ! विवाह करते ही उसने अपने को परिवार से अलग कर लिया।

‘‘मैंने अच्छा ही किया। कल को महाभारत मचता। रही-सही मुहब्बत भी मिट जाती। गलती मेरी भी है। वह जवान हो गया था, और मैं उसे निपट अजान बालक ही समझती रही। पर मैं क्या करूँ ? मेरी आँखें तो उसी को देखती हैं, जो कभी स्कूल से पिटकर सिसकता हुआ आकर मेरी गोद में चिपट जाता था और सुबकियाँ लेता हुआ कहता था, ‘‘भाभी, मैं कल से स्कूल नहीं जाऊँगा ! मुझे सबक याद नहीं होता !’’ उसके भाई क्रुद्ध होकर चिल्ला उठते, ‘‘सबक याद नहीं होता, हरामखोर ! क्या कुलीगीरी करेगा ?’’
मैं कहती, ‘‘देखो जी, उसे गाली मत दो ! कुलीगीरी करेगा या कुछ भी करेगा, तुम्हारे आगे हाथ पसारने नहीं आएगा !’’
वह माथा ठोक लेते। कहते, ‘‘तुम इसका सर्वनाश करके रहोगी !’’
‘‘लेकिन, भगवान् की माया कि वही सर्वनाशी बालक आज उनके कान काटता है ! वह उसके इशारों पर नाचते हैं। सारा व्यापार उसी के कंधों पर ठहरा है।’’

नंदा इसी तरह सोचती रहती है। आज भी सोच रही है। रात काफी बीत चुकी है, परंतु रामदास अभी तक मंदिर से नहीं लौटे। गौरी और शीला दोनों सो गए थे। छोटा बच्चा उसी के पलंग पर शांत, निश्चिंत नींद की परियों से खेल रहा था। वह कई क्षण उसे देखती रही। मानो बच्चे की निश्चिंतता ने माँ को बल दिया। वह मुग्ध हो उठी। सहसा तभी किसी ने द्वार खटखटाया। वह उठी, और किवाड़ खोले। देखा—सामने देवेन खड़ा है।
अचकचाकर बोली, ‘‘अरे देवेन !...कैसे आया इस वक्त ?’’
देवेन मुस्कराया। कहा, ‘‘अपने घर आने के लिए भी वक्त देखना होता है, यह आज जाना है भाभी !’’
नंदा अप्रतिभ हुई। बोली कुछ नहीं।
तब देवेन ने पूछा, ‘‘भइया नहीं आए ?’’

नंदा ने कहा, ‘‘दस बजे से पहले वह कभी नहीं लौटते।’’
देवेन यह जानता था, इसलिए चुप रहा।
अब वे आग के पास आ बैठे थे। नंदा ने देखा, कोयले बुझ चले हैं। उन्हीं को इधर-उधर करके वह बोली, ‘‘उनसे कुछ काम था ?’’
‘‘हाँ।’’
‘‘बहुत ज़रूरी ?’’
देवेन ने अस्थिर होकर कहा, ‘‘भाभी, आज पहली तारीख है न !’’
‘‘हाँ !...तो ?’’
‘‘गोपाल को रुपये भेजने हैं।’’
‘‘तो फिर ?’’
‘‘वही रुपये लाया हूँ !’’
नंदा अचरज से भर आई। बोली, ‘‘रुपए लाया है ? क्या उन्होंने माँगे थे ?’’
देवेन चौंका। बोला, ‘‘माँगते क्यों ? ये बीस रुपए मैं बराबर देता आ रहा हूँ।’’
नंदा बोली, ‘‘जानती हूँ, देवेन, तुम सदा बीस रुपए देते आए हो। पर वक्त क्या हमेशा एक-सा रहता है ? कल हम एक थे ? आज अलग हैं। अब तेरे देने की बात नहीं उठती।


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