योगीराज अरविन्द - अशोक कौशिक Yogiraj Arvind - Hindi book by - Ashok Kaushik
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योगीराज अरविन्द

अशोक कौशिक

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :159
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3440
आईएसबीएन :81-89182-13-7

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योगीराज अरविन्द के जीवन पर आधारित पुस्तक...

Yogiraj arvind

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


दूसरे लोग जहाँ देश को एक जड़ वस्तु, कुछ मैदान, जंगल, पठार और नदी समझते हैं, वहाँ मैं अपने देश को अपनी माता मानता हूँ। मैं उसकी पूजा करता हूँ मैं माँ की भाँति उसकी भक्ति करता हूँ। जब कोई राक्षस माँ की छाती पर बैठकर उसका खून पी रहा हो तो उस समय उसका पुत्र क्या करेगा क्या वह चुपचाप अपने परिवार के साथ मौज मनाता रहेगा या इसके बदले में माँ को बचाने के लिए दौड़ पड़ेगा ? मैं जानता हूँ इस पतित जाति को उठा सकने का सामर्थ्य मुझमें है। यह कोई शारीरिक सामर्थ्य नहीं और मैं तलवार या बंदूक लेकर भी लड़ने नहीं जा रहा, यह तो ज्ञान की शक्ति है। क्षत्र तेज ही शक्ति का एकमात्र तेज नहीं है, ब्रह्म तेज भी है, वह तेज ज्ञान के ऊपर प्रतिष्ठित है।
योगीराज अरविन्द

भूमिका


 स्वर्गीय श्री अरविन्द घोष को, ‘योगीराज अरविन्द’ के  नाम  से ख्याति प्राप्त है, घर के अंग्रेजित वातावरण और इंग्लैड में अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण करने के उपरान्त भी अरविन्द स्वदेश और स्वराज्य के प्रति समर्पित रहे। बाल्यावस्था से आरम्भ कर यौवनावस्था तक का उनका क्रान्तिकारी जीवन इस, देश के लिए महान् वरदान सिद्ध हुआ। उनकी रचनाएं आज भी मानवता पर उपकार सिद्ध हो रही हैं। उनके व्यक्तिगत जीवन से अनेक लोगों ने व्यक्तिगत लाभ भी उठाया, यह अन्य बात है।

हमारी दृष्टि में अलीपुर षड्यन्त्र में अरविन्द का लिप्त किया जाना और उस अभियोग में  दोषमुक्त होने पर उनको कारागार में रखना, उनके जीवनक्रम में विपरीत परिवर्तन का कारण बना। किन्तु इसे न तो अरविन्द ने स्वीकार किया और न उनके भक्तों अथवा शिष्यों ने। हाँ इतना सब स्वीकार करते हैं कि कारागार में अरविन्द को आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होने लगे थे।
 
1893 में लंदन से भारत वापस आने के उपरान्त 1910 तक चंद्रनगर तथा उसके बाद पाण्डिचेरी प्रस्थान करने तक का अरविन्द का सफर देश और धर्म के लिए समर्पित रहा 1910 के उपरान्त भी 1926 तक वे अपनी रचनाओं द्वारा देश, जाति को कुछ प्रदान करते रहे हैं, किन्तु उसके बाद के 24 वर्ष का उनका जीवन योग-साधना और सिद्ध का जीवन रहा है। इन अंतिम 24 वर्षों के उनके जीवन का कोई क्रम अथवा गतिविधि  किसी प्रकार कहीं भी उपलब्ध नहीं है। इस अवधि में वे अपने भक्तों को अथवा एकलव्य की भाँति बने अपने शिष्यों को मात्र कभी-कभी दर्शन और आशीर्वाद से उपकृत करते रहे हैं। प्रकट रूप से अरविन्द ने न किसी को शिष्य बनाया और न भक्त। उनके सहयोगी ही अनायास उनके शिष्य बनते गए और यह क्रम स्वयंमेव बढ़ता गया।

अरविन्द के जीवन को पढ़ने वाले अथवा उनके सम्पर्क में रहने वाले व्यक्ति यह भली-भाँति जानते हैं कि अरविन्द सिगारपान एवं भक्षण निरन्तर करते रहे थे। यह क्रम पाण्डिचेरी से भी कम-से-कम 1920-24 तक तो रहा ही है। कम से कम 1914 तक तो वे कभी मद्यपान भी करते रहे थे, इसका उल्लेख अनेक स्थानों पर उनके भक्तों तथा सहयोगियों ने किया है। योग साधना और तामसी भोजन दोनों परस्पर विरोधी माने जाते हैं। इस विषय में न कभी किसी ने अरविन्द से जिज्ञासा व्यक्त की और न उन्होंने स्वयं कभी इसका समाधान प्रस्तुत किया।

1901 में बड़ौदा में कार्यरत रहते हुए उन्होंने स्वयं अपने विवाह के लिए विज्ञापन प्रकाशित करवाया और उसी वर्ष उनके मित्रों के सहयोग से उनका विवाह भी हो गया। विवाह के 4-5 वर्ष के उपरान्त बड़ौदा में रहते हुए ही उन्होंने कलकत्ता में रहनेवाली अपनी पत्नी को अपनी मान्यताओं के विषय में लिखा और कहा कि उन मान्यताओं से समझौता करने पर ही उनका दामपत्य जीवन सुखमय हो सकता है, जबकि अपनी उन मान्यताओं के विषय में उनको विवाह से पूर्व अपनी पत्नी को अवगत कराना चाहिए था। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि एक प्रकार से भारतीय नारी की मनोव्यथा को अरविन्द ने बढ़ाया ही, यद्यपि उन जैसे प्रबुद्ध व्यक्ति को उसे दूर नहीं तो कम से कम, कम तो करना ही चाहिए था।
श्री मां का उनकी योग साधना में कितना और किस प्रकार का सहयोग रहा है, इस विषय में सर्वत्र मौन ही छाया हुआ है। न भक्तगण कुछ जानते हैं और न स्वयं अरविन्द अथवा श्री माँ ने इस विषय में कुछ उजागर किया है। श्री मां ने तो केवल इतना ही कहा हैं कि अपने बाल्यकाल में जिस कृष्ण की उन्होंने कल्पना की थी वह उन्हें पाण्डिचेरी आने के बाद प्रत्यक्ष में दिखाई दे गया। अस्तु।
पाण्डिचेरी जाने के उपरान्त श्री अरविन्द को एक बार राजा राममोहन राय और स्वामी विवेकानंद की प्रतिछायाएं दृष्टिगोचर होती रही हैं और उनके निर्देश पर वे कुछ न कुछ लिखते रहे हैं। तो क्या इससे यह अनुमान लगाना चाहिए कि उस अवधि तक उन दोनों की आत्माएं इस संसार में भटकती रही होंगी ? यह पहेली अनसुलझी रह जाती है।

तटस्थ अथवा निष्पक्ष पाठक अरविन्द साहित्य और उनके प्रशंसकों द्वारा लिखे गए उनके जीवन चरित्रों को पढ़कर चकित होता हैं, किन्तु वह किसी से कुछ कहने अथवा पूछने का साहस नहीं कर पाता। क्योंकि यदि वह पूछता है तो उसके उत्तर में उसको भर्त्सना ही प्राप्त होती है समाधान नहीं। हमने अरविन्द के जीवनकाल में ही उनके अनेक शिष्यों को उनके प्रभा-मण्डल के वशीभूत विभिन्न प्रकार के अनर्गल प्रलाप करते हुए सुना है। हमने देखा है कि यदि कोई भक्त मरणासन्न हो गया है तो वह एक ओर तो पाण्डिचेरी तार भेजकर अरविन्द और श्री माँ के आशीर्वाद की कामना करता था और दूसरी ओर नगर के योग्यतम डॉक्टर को चिकित्सा के लिए आमंत्रित करता था। न केवल इतना अपितु हमने यह भी देखा कि यदि रोगी ठीक हो गया तो उसे योगीराज की कृपाप्रसाद माना गया और यदि कुछ अघटित हो गया तो उसे चिकित्सक की अकुशलता माना गया।

हमारी दृष्टि से 1872 से आरम्भ कर नवम्बर 1926 के अरविन्द और दिसम्बर 1926 से आरम्भ कर 5 दिसम्बर 1950 के योगीराज अरविन्द दो पृथकृ-पृथक व्यक्तित्व थे। अरविन्द साधना, लगन, निष्ठा, समर्पण और त्याग के प्रति हम श्रद्धावत हैं। किन्तु योगीराज अरविन्द हमारे लिए अनबूझी पहेली होकर रह गए हैं
इसी जीवनी के लेखन में हमने यथाशक्ति निष्पक्ष रहने और अरविन्द के भक्तों की अपार श्रद्धा को ध्यान में रखने का भरकस प्रयत्न किया हैं। तदपि जहाँ कहीं हमें शंका हुई, उसका उल्लेख करना कर्तव्य मान उसका समावेश अवश्य किया हैं क्योंकि यह जीवनी सामान्य पाठकों के लिए लिखी गई है, मात्र भक्तों के लिए नहीं।

-अशोक कौशिक

बाल्यावस्था


श्री अरविन्दो वास्तविक शुद्ध नाम अरविन्द का जन्म उस काल में हुआ जब भारत में एक ओर तो अंग्रेजी सरकार अपने पूर्ण वैभवकाल का उपयोग कर रही थी, तो दूसरी ओर अंग्रेजों की दासता की बेड़ियां तोड़ने के लिए भारतवासी छटपटा रहे थे। और एक के बाद एक इस प्रकार अपनी जान की बाजी लगाते जा रहे थे। अरविन्द के जन्म से पंद्रह वर्ष पूर्व भारतीय स्वतंत्रता का प्रथम समर लड़ा जा चुका था। उस समर की उपलब्धियों और दोषों के आधार पर निर्धारित भावी युद्ध लड़ा जा रहा था।

अरविन्द का जन्म उस परिवार में हुआ जो एक ओर तो स्वयं सुधारवादी घोषित करता हुआ ‘ब्रह्मों समाज’ के नियमों एवं रीति-रिवाजों का परिपालन करता था, क्योंकि अरविन्द के मातृ और पितृ, दोनों पक्ष ‘ब्रह्मसमाजी’ थे तो दूसरी ओर उसके पिता अंग्रेजी शासन और प्रशासकों के अनन्य भक्तों में से थे। अरविन्द के पिता डॉक्टर कृष्णन घोष की मान्यता थी कि यदि भारत में अंग्रेजों का राज न होता तो यह देश न जाने अब और कब तक अंधकार में डूबा रहता। अंग्रेजों ने शासन, शिक्षा, समाजसुधार आदि कार्यों से जो प्रकाश इस देश में फैलाया, उसकी कृपा से ही डॉक्टर घोष की दृष्टि में, भारत का पुनरोदय हो रहा था।

डॉक्टर कृष्णधन घोष ने मेडिकल कॉलेज कलकत्ता से चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा ग्रहण की। 1884 में 19 वर्ष की आयु में उनका 12 वर्षीया स्वर्णलता बोस के साथ विवाह हुआ और सन 1869 में आयुर्विज्ञान की ऊंची पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए। अपनी शिक्षा पूर्ण कर जब वे 1871 में भारत लौटे तो तब पूर्णतया अंग्रेजियत के दास और परम नास्तिक बन चुके थे।

भारत लौटने पर उनको चिकित्सा विभाग में नौकरी मिल गई और सिविल सर्जन के रूप में उनकी नियुक्ति हो गई। उनकी नौकरी का अधिकांश भाग भागलपुर, रंगपुर और खुलना में ही व्यतीत हुआ। अपने जीवन के अंतिम दिनों में उनकी नियुक्ति खुलना में हुई थी और उसके जीवन का अंत भी वहीं पर हुआ था।


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