अँजुरी भर धूप - रोहिताश्व अस्थाना Anjuri Bhar Dhoop - Hindi book by - Rohitashva Asthana
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अँजुरी भर धूप

रोहिताश्व अस्थाना

प्रकाशक : ज्ञान गंगा प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :108
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3323
आईएसबीएन :81-88139-81-5

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प्रमुख कवियों द्वारा चुनी हुई कविताएँ

Anjuri Bhar dhup a hindi book by Rohitashva Asthana - अँजुरी भर धूप -

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

साहित्यक विभव की दृष्टि से हरदोई जनपद की अप्रतुल आढ्यता अयूत सिद्ध है। हरदोई जनपद का साहित्यक गौरव विद्वानों, विविदिषुओं और सह्रदय पाठकों की दृष्टि में डॉ. रोहिताश्व अस्थाना द्वारा संपादित इस कृति के माध्यम से यदि किसी सीमा तक भी महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सका और भावी लेखकों की चिंतनपरा बुद्धि को अभिनव चक्षुष्मता प्रदान कर सका, तो जिस श्रम का निमित्त संपादक को बनना पड़ा है, वह असमोर्द्ध्व उद्धर्ष की अनुभूति कराएगा। वैसे मुझे विश्वास है कि पाठकों को हरदोई के अतीत की हैमाभ वर्चस्विता, आगत, वर्तमान की प्रातिभ अवर्हता और अनागत भविष्य की आशा निर्भर भव्यता का सुखद आभास देगी।

संपादक डॉ. रोहिताश्व अस्थाना इस श्रमसाध्य कार्य के लिए निष्चित ही साधुवास के पात्र हैं।
- डॉ. शिवबालक शुक्ल

भूमिका


आज भारत के प्रत्येक प्रदेश के प्रत्येक जनपद के दूरस्थ अंचलों में अवस्थित कवि एवं लेखक गण अपनी साहित्य साधना में रत हैं। कतिपय रचना कर्मी प्रचार-प्रसार की भावना से दूर रहकर स्वांत: सुखाय ही साहित्य की साधना में सन्नद्ध हैं। कदाचित् उनका यह चिंतन समीचीन ही है कि गोस्वामी तुलसीदासजी ने जब रामचरितमानस रचा, तब वे यह नहीं जानते थे कि उनका यह ग्रंथ लोकप्रियता के स्वर्ण शिखरों तक पहुंचकर कलियुग में उद्धारक मंत्र-कोश बन जाएगा।
अत: आज हिन्दी साहित्य की लुप्तप्राय एवं उपलब्ध संपदा का संरक्षण किए जाने की आवश्यकता है, ताकि जब भी वह शोधार्थियों, समालोचकों एवं साहित्येतिहासकारों की दृष्टि में पड़े-उसका मूल्यांकन हो जाए।
इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए ‘हरदोई के कवि’ नामक इस परिचयात्मक काव्य-ग्रंथ का संपादन करना पड़ा। मैं हरदोई की माटी में जन्मा, पला और बढ़ा हूँ, हरदोई के ग्राम्यांचल अटवा का अली मर्दनपुर में बैठकर मैंने साहित्य की साधना की है, अत: मेरे मन में यह भावना थी कि एक ऐसे ग्रंथ का संपादन किया जाए जिसमें हरदोई की साहित्यिक संपदा को एक स्थान पर संकलित करके उसे सुरक्षित रूप से आनेवाली पीढ़ी को हस्तांतरित कर दिया जाए।
उत्तर प्रदेश का हरदोई जनपद क्षेत्रफल एवं साहित्यिक, सांस्कृतिक उपलब्धियों की दृष्टि से विशाल एवं महत्त्वपूर्ण है। इस जनपद की सीमाएँ लखनऊ, उन्नाव, शाहजहाँपुर, फर्रूखाबाद, कन्नौज, सीतापुर एवं खीरी लखीमपुर जनपदों से मिलती हैं।
आचार्य रामचंद्र शुक्लजी ने अपने ‘हिन्दी साहित्य के इतिहास’ नामक ग्रंथ में हरदोई से संबद्ध रसलीन, सम्मन, कादिर बख्श, सैय्यद मुबारक अली बिलग्रामी आदि का उल्लेख किया है।
कादिर बख्श का जन्म हरदोई जनपद के पिहानी कस्बे में सन् 1558 ई. में हुआ। इनका एक कवित्त देखें-
गुन को न पूछै कोऊ, औगुन की बात पूछै
कहा भयो दई, कलिकाल यों खरानो है।
पोथी औ’ पुरान ज्ञान’ ठट्ठन में डारि देत-
चुगुल-चबाइन को मान ठहरानो है।
‘कादिर’ कहत या सों कछु कहिबे की नाहिं
जगत की रीति देख, चुप मन मानो है।
खोलि देखौ सब ओरन सों भाँति-भाँति-
गुन ना हिरानो, गुनगाहक हिरानो है।।


सम्मन का जन्म इसी जनपद के मल्लावाँ कस्बे में सन् 1717 ई. में हुआ। इन्होंने दोहे लिखे। इनका ‘पिंगल काव्य भूषण’ नामक रीति ग्रंथ मिलता है। इनका एक दोहा यों है-
‘‘निकट रहे आदर घटे, दूरि रहे दु:ख होय।
‘सम्मन’ या संसार में प्रीति करौ जनि कोय।।


‘रसलीन’ का पूरा नाम सैय्यद गुलामनबी था। इनका जन्म हरदोई जिले के बिलग्राम कस्बे में हुआ था। ‘अंगदर्पण’ तथा ‘रस प्रबोध’ इनके प्रमुख काव्य हैं। इनका रचनाकाल 1737-41 के आस पास ठहरता है। इनका भी एक दोहा देखें-
‘‘अमिय हलाहल, मदभरे, सेत, स्याम, रतनार।
जियत, मरत, झुकि-झुकि परत, जेहि चितवत इक बार।।’’
सैय्यद मुबारक अली बिलग्रामी भी इसी कस्बे में सन् 1583 ई.में जनमे। ‘अलक-शतक’ तथा ‘तिल शतक’ इनकी चर्चित कृतियाँ हैं। इनका एक चमत्कारिक दोहा यहाँ प्रस्तुत है-
‘‘चिबुक कूप, रसरी अलक, तिल सु चरस, दृग बैल।
बारी बैस सिंगार की, सींचत मनमथ छैल।।’’
आचार्य शुक्लजी द्वारा उद्धत इन कवियों के क्रम में ही इसी जनपद में सांडी कस्बे के पास श्रीमऊ नामक ग्राम में इंद्रजीत श्रीवास्तव हुए। इनका जीवन काल सन् 1887-1956 तक रहा। इनकी कविताएँ आध्यात्मिक बिंदुओं पर केंद्रित रहीं ! कुछ अंश देखें-
नर तन धरे कौन फल पाए।
इक स्वाँसा को नहीं भरोसा, राग-द्वेष उपजाए।
कल्प भरे को आगम बाँधे, तन-मन देत जलाए।
चौरासी के मध्य हरी ने नाना विषय बनाए।।

इसी प्रकार हरदोई जनपद के शाहपुर-गंगा नामक स्थान पर राम नाथ सुमन का जन्म 1915 में हुआ। यह स्वतंत्रता सेनानी व कवि थे। इन्होंने अपने ग्राम में माध्यमिक विद्यालय की स्थापना की। इन्होंने दोहे व गीत लिखे। इनका ‘मातृभूमि’ काव्य मिलता है। इनका निधन सन् 1990 ई. के लगभग 75 वर्ष में हुआ। इनकी एक रचना यहाँ उद्धृत है-

आएँगे फिर क्या सुदिन, भर मानव में प्यार।
तरणि पड़ी मँझधार में, लाना है इस पार।।
लाना है इस पार, सभी संकट सह लेंगे।
धरे हथेली प्राण, पंथ पर हम चल देंगे।।
ले जन-बल को साथ, कदम जब बढ़ जाएँगे।
मंजिल हो तब पार, श्रमिक आगे आएँगे।।
वस्तुत: हरदोई का साहित्यिक वैभव तो अथाह सागर की भाँति विस्तीर्ण है। उसमें अवगाहन करके साहित्यिक मोती तलाश करने का प्रयास इस ग्रंथ में किया गया है !
प्रस्तुत ग्रंथ में हरदोई जनपद में जनमे या बाहर से आकर हरदोई में स्थायी रूप से बसे हुए कवियों की प्रतिनिधि रचनाएँ उनके संक्षिप्त परिचय सहित अकारादि क्रम में संकलित की गई हैं ! ग्रंथ की संक्षिप्तता के कारण संभव है कुछ कवि संकलित न हो सके हों, जिसका मुझे खेद है।
हरदोई जनपद एक साहित्यिक तीर्थ भी है। यह तीर्थ स्थल है-श्रद्धेय डॉ.शिव बालक शुक्लजी के सुभाष नगर स्थित उनका आवास ! दु:ख है कि उनका स्वर्गवास दिनांक 15-11-2005 को हो गया। उनके प्रति मैं समस्त कविजनों की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि समर्पित करता हूँ। उनकी यह सम्मति तो मेरे लिए आर्शीवाद का आगार है। इसी क्रम में मैं अन्य विद्वानों का भी आभारी हूँ, जिन्होंने ग्रंथ के प्रति अपनी सारगर्भित सम्मतियाँ प्रदान की हैं !
परम पिता परमात्मा एवं माँ सरस्वती से प्रार्थना है कि हरदोई जनपद से जुड़े समस्त कविगण स्वस्थ, सुखी, समृद्ध एवं शतायु होकर साहित्य की साधना में सन्नद्ध रहें !
चूँकि हरदोई की मिट्टी से मेरे शरीर को आकार मिला है, अत: इस ग्रंथ का संपादन-प्रकाशन कराकर मैंने माटी के ऋण से उऋण होने का लघु प्रयास मात्र ही किया है !
मुझे आशा ही नहीं, अपितु विश्वास है कि प्रस्तुत ग्रंथ के माध्यम से हरदोई की साहित्यिक उपलब्धियाँ सुरक्षित रह सकेंगी और सहृदय समाचोलकों, शोधार्थियों एवं साहित्य प्रेमियों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगी। प्रस्तुत ग्रंथ के पारायणोपरांत विद्वज्जनों से उनकी निष्पक्ष प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी !
स्वस्थ कामनाओं सहित
-डॉ.रोहिताश्व अस्थाना


संपादक
अतुल कपूर
मारुत नंदन के जीवन से



मारुत-नंदन के जीवन से, हम भी कुछ शिक्षा ले लें
जीवन यह संघर्ष भरा है, आगे बढ़कर हम झेलें।।

वह बल, बुद्धि, तेज, दृढ़-निश्चय, जैसा रखते थे कपिराज।
वैसे गुण अर्जित करने, के लिए विचेष्टित हों हम आज।।

अभी देश के सम्मुख लाखों, मुख फाड़े हैं सुरसाएँ।
सूझ-बूझ से जूझें उनसे, उचित नहीं है घबराएँ।।

स्वतंत्रता-सीता को कितने, रावण आज रहे हैं, ताक।
गर्व चूरकर उनका हम सब, रखें विश्व में अपनी धाक।।

अभी बहुत हैं अत्याचारी, मुँह की उन्हें खिलानी है।
उन्नति की संजीवन-बूटी, हमें खोजकर लानी है।।

भेदभाव के सागर को भी, साहस से करना है पार।
अच्छा हो हर भारतवासी, बने स्वयं अब पवन-कुमार।।



डॉ. अनंतराम मिश्र

अनंत दोहे



अब जीवन ऐसा लगे, जैसे अंधा कूप।
हैं अंजुरी भर चाँदनी, है मुट्ठी भर धूप।।
खरी-खरी कहना अगर, दर्पण सका न छोड़।
तो बंदर इस देश के, देंगे तुझको तोड़।।
उच्च विचारों का कहाँ, अब होता डष्ठौन।
पोशाकें लक-दक रखो, हृदय देखता कौन।।
है उपवन में प्रगति पर, वासंतिक निर्माण।
लाल झंडियो-से लगे, सेमल पुष्प प्रमाण।।
रोम-रोम है जल रहा, रही धधक सी रेणु।
ग्रीष्म पवन नीरो मगर, बजा रहा सुख-वेणु।।
मृत्यु प्रतीक्षा कर तनिक-यों न खट खटा द्वार।
प्रिया बाहुओं में अभी, अभी चल रहा प्यार।।
कुढ़न, घुटन, टूटन, थकन, तड़पन, तपन,तमाम।
यही वसीयत कर गई, नियति हमारे नाम।।
दो चरणों में नापते, धरा और आकाश।
वामन-से दोहे बने, पर विराट इतिहास।।

अरुणेश मिश्र
नवगीत



हादसे फुटपाथ पर, हर रात हैं होते।
पथरा गई आँख में, आँसू नहीं होते।।
चीखें उलझी हैं यहाँ, दीवारों की ठोकरों में,
और खोये गम यहाँ, ताश के इन जोकरों में,
इन कुहासी गठरियों को, आशा समझ ढोते।
हादसे फुटपाथ पर, हर रात हैं होते।।
दीखता है हर तरफ, फैला हुआ संताप,
पर झुकी ये गरदनें कराती है हजारों पाप,
सब लुटाकर भी, सुनहरे स्वप्न, हम बोते।
हादसे फुटपाथ पर हर रात है होते।।
रच दिया है भाग्य कैसा इन लकीरों ने
एक खाली झोंपड़ी लूटी फकीरों ने
स्वप्न में उलझे हुए, अब सत्य हैं सोते।
हादसे फुटपाथ पर, हर रात हैं होते।।
जिंदगी की उलझनों में, बुनी रातें यहाँ फिरतीं
चाँद तो मिलता यहाँ, किरनें नहीं मिलतीं
राह पर यूँ ही अँधेरी, चल दिए हम परछाइयाँ होते।
हादसे फुटपाथ पर, हर रात हैं होते।।

अवधेश मिश्र
छंद त्रयी



जीवन सार्थक है, बिना मुक्ति के कभी नहीं
गुरु ज्ञान प्राप्ति है, बिना भक्ति के कभी नहीं
परमाणु-परीक्षण तो अस्तित्व की कसौटी है-
संतुलन शक्ति का, बिना शक्ति के कभी नहीं।।
विश्व के प्रमुख देश धमकी-प्रलोभन दे-
पाक को परीक्षण-विरत करने लगे।
रंच मात्र उनका प्रभाव हो सका न कुछ-
दुर्दैव दु:ख देने बुद्धि हरने लगे।
पाक में परीक्षण की बात हुई हर ओर
पाप के घड़े भी कुछ और भरने लगे।
अंतत: पाक ने परीक्षण किया परंतु-
युद्ध की विभीषिका से देश डरने लगे।।
जब-जब पीठ थपकाने पर लड़े तुम-
याद करो मलहम लगाया कब किसने ?
चारों खाने चित्त तुम होते रहे बार-बार-
कौन आया साथ में तुम्हारे कहो पिसने ?
लड़ते नहीं है बुद्धिमान तो लड़ाते सदा-
इसीलिए आते तुम्हें बार-बार घिसने।
ज्ञान-चक्षु खोल कुछ अपना विकास करो-
जर्जर देश को किया इस रिस ने।।

अशोक वाजपेयी ‘सजल’
गीत


संयम के सारे नियमों को, मानव कब पालन कर पाया ?
सागर की आकुल लहरों पर, कौन नियंत्रण कर पाया ?

भावुकता अपने यौवन में, कोई तर्क नहीं है सुनती
बुद्धि ठिठुरकर रह जाती, जब प्रेम ज्योति है जलती
यह अग्नि सृष्टि की जननी, कौन मनुज इससे बच पाया ?

चंदन इतना शीतल होता, उर में उसके पावक दहती-
जब प्रबल झकोरे आते तो, वह दावानल बन जलती
मुखर, मूक की अपनी क्षमता, पूर्ण नियंत्रण कब कर पाया ?

अतुलित क्षमता पृथ्वी में, भीषण आग गर्भ में रखती-
अग्नि नियंत्रित जब होती, वह ज्लावामुखी सदृश है फटती
संयम के सारे नियमों को, मानव कब पालन कर पाया ?





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