रोमांचक विज्ञान कथाएँ - जयंत विष्णु नारलीकर Romanchak Vigyan Kathayein - Hindi book by - Jayant Vishnu Narlikar
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रोमांचक विज्ञान कथाएँ

जयंत विष्णु नारलीकर

प्रकाशक : विद्या विहार प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :166
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3321
आईएसबीएन :81-88140-65-1

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सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं विज्ञान लेखक श्री जयंत विष्णु नारलीकर द्वारा लिखित ये विज्ञान कथाएँ रहस्य, रोमांच एवं अदभुत कल्पनाशीलता से भरी हुई है...

Romanchak vigyan kathayein

आधुनिक युग विज्ञान का युग है। मनुष्य के भाँति-भाँति के कौतूहलों और जिज्ञासाओं को शमित करने को विज्ञान सक्षम रहा है। विज्ञान के बल पर ही मनुष्य चंद्रमा पर उतरा और मंगल ग्रह पर उतरने की तैयारी कर रहा है। उसने अणु-परमाणु के विखंडन व संघटन के परिणाम जान लिये हैं और अंतरिक्ष के ग्रहों-उपग्रहों से संबंध स्थापित कर रहा है। विज्ञान की इन्हीं चमत्कार गतिविधयों ने विज्ञान लेखन की कल्पना को नई-नई संचेतनाएँ दीं, जिससे रोचक व रोमांचक विज्ञान कथाओं का सृजन हुआ।

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं विज्ञान लेखक श्री जयंत विष्णु नारलीकर द्वारा लिखित ये विज्ञान कथाएँ रहस्य, रोमांच एवं अद्भुत कल्पनाशीलता से भरी हैं तथा अपने पाठकों को भरपूर आनंद देती हैं।

1
हिम युग की वापसी


‘‘पापा, पापा ! जल्दी उठो। देखो, बाहर कितनी सारी बर्फ है ! कितना अच्छा लग रहा है !’’
राजीव शाह की सुबह-सुबह की गहरी नींद बच्चों के शोरगुल से उचट गई। पहले तो उसे समझ नहीं आया कि शोरगुल किस बात पर हो रहा है। कविता और प्रमोद क्यों इतने उत्तेजित हो रहे थे ?
‘‘पापा, क्या हम नीचे जाकर बर्फ में खेल सकते हैं ?’’ कविता ने पूछा।

बर्फ ! यहाँ मुंबई में ! यह कैसे मुमकिन है ? राजीव की नींद फौरन गायब हो गई। वह लपककर खिड़की के पास पहुँचा और बाहर झाँका। उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। वाकई ! बाहर बर्फबारी हुई थी। दूर-दूर तक घरों के बीच में बर्फ की सफेद चादर बिछी हुई थी और तभी उसे महसूस हुआ कि कितनी ठंड पड़ रही थी। बच्चों ने तो दो-दो स्वेटर तक चढ़ा लिये थे। गरम कपड़ों के नाम पर उनके पास वही स्वेटर थे। वैसे भी मुंबई में गरम कपड़ों की जरूरत किसे पड़ती है। ये स्वेटर भी उन्होंने पिछले साल ऊँटी में खरीदे थे और तब उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन मुंबई में उनकी जरूरत पड़ेगी।

‘‘नहीं ! नीचे मत जाओ।’’ ठंड से सिहरते हुए राजीव बोला और फिर अपने चारों ओर शॉल लपेटते हुए उसने भी हथियार डाल दिए, हम छत पर चलेंगे। लेकिन पहले जूते-मोजे पहन लो।’’
प्रमोद और कविता दौड़कर पहले ही छत पर पहुँच गए। राजीव ने भी एक और मोटा शॉल लिया। उसकी दिली इच्छा हो रही थी कि उनके पास भी कोई हीटर होता। यहाँ तक कि कोयले वाली अँगीठी से भी काम चल जाता है।
पिछले एक हफ्ते से जलवायु में जो बदलाव आ रहे थे उसी की परिणति थी यह बर्फ। आमतौर पर तापमान 15 डिग्री सेल्सियल तक गिरने पर ही मुंबईवाले शोर मचाने लगते हैं कि ठंड पड़ रही है। कल दिन का तापमान मुश्किल से 5 डिग्री पहुँचा था और रात में 0 डिग्री हो गया। लेकिन किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि बर्फ भी पड़ने लगेगी। इस बर्फबारी ने मौसम के अच्छे-अच्छे पंडितों के मुँह बंद कर दिए थे। अब मौसम में कहाँ और क्या परिवर्तन आएगा, कोई नहीं जानता।
‘‘जल्दी आओ, पापा !’’ छत की ऊपरी सीढ़ी से प्रमोद चिल्लाया। अपार्टमेंट के सबसे ऊँचे माले पर बने इस फ्लैट के मालिक होने के नाते छत पर भी उन्हीं का अधिकार था। मुंबई जैसे शहर में यह बड़े शान की बात थी।

‘‘मैं आ रहा हूँ। पर अपना ध्यान रखो। बर्फ फिसलन भरी हो सकती है।’’ सीढ़ियाँ चढ़ते हुए राजीव ने बच्चों को सावधान किया। वह समझ नहीं पा रहा था कि छत पर कितनी ठंड होगी।
लेकिन छत पर पहुँचते ही आस-पास का नजारा देखकर वह अपनी चिंता भूल गया। उसे लगा कि गरम और आर्द्र जलवायु के शहर मुंबई की बजाय वह क्रिसमस कार्ड पर छपे किसी यूरोपीय शहर की तसवीर देख रहा हो। हिंदू कॉलोनी की कुंज सड़कों पर यातायात के कारण काले सफेद का बेमेल संगम हो रहा था। दादर के पार जाती रेल लाइन भी सुनसान पड़ी थी।

‘‘मैं शर्त लगा सकता हूँ कि मध्य रेलवेवालों ने भी अपना तामझाम समेट लिया होगा। उन्हें किसी बड़े बहाने की जरूरत नहीं पड़तीं। राजीव बड़बड़ाया ‘‘मुझे हैरानी है कि पश्चिम रेलवेवाले क्या कह रहे होंगे।’’ जवाब के तौर पर तभी उसे माहिम की ओर जाती पटरी पर लोकल ट्रेन दिखाई दी।
लेकिन राजीव की कल्पनाएँ पाँच साल पीछे की उड़ान भर रही थीं, जब उसने एक शर्त लगाई थी। उस वक्त तो शर्त लगाना बहुत आसान लग रहा था कि क्या मुंबई में बर्फ पड़ेगी ? उसका दावा था, ‘‘कभी नहीं।’ लेकिन वसंत ने बड़े यकीन के साथ कहा था, ‘अगले दस वर्षों के भीतर मुंबई में बर्फ पड़ेगी।’
लेकिन ऐसा केवल पाँच वर्षों के भीतर ही हो गया।


वाशिंगटन में भारतीय राजदूत द्वारा दी गई दावत में पहली बार वह वसंत से मिला था। वसंत यानी प्रो. वसंत चिटनिस, जो उस दौरान अमरीका में जगह-जगह पर व्याख्यान दे रहे थे। राजदूत ने उस दावत में डी.सी. मैरीलेंड और वर्जीनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों को बुलाया था। कुछ पत्रकार भी थे, जिनमें राजीव भी एक था।
विज्ञान और राजनीति पर गपशप का दौर जारी था। लेकिन वसंत चुपचाप बैठा था। ऐसी दावतों और गपशप में वह शायद ही कभी शामिल होता हो।
‘ट्रेलीप्रिंटर पर अभी-अभी एक संदेश आया है। ज्वालामुखी वेसूवियस दोबारा फट पड़ा है।’ एक पत्रकार लगभग चिल्लाता हुआ अंदर दाखिल हुआ।
‘हे भगवान् ! तीन महीनों के भीतर फटनेवाला यह चौथा ज्वालामुखी है। ऐसा लगता है कि धरती माता का पेट खराब हो गया है।’ राजीव ने वसंत से कहा, ‘जो उसकी बगल में ही बैठा था।

‘पर हमें धरती माँ के पेट की बजाय उसकी खाल की परवाह करनी चाहिए।’
‘आपका क्या मतलब है ?’ राजीव ने पूछा।
‘हाँ हाँ, वसंत ! हमें भी बताओ।’ मैरीलैंड विश्वविद्यालय से आए एक प्रोफेसर ने कहा।

‘अच्छा। जब कोई ज्वालामुखी फटता है। तो उसका सबकुछ धरती पर ही नहीं गिरता है। कुछ पदार्थ वायुमंडल में भी घुल-मिल जाता है। यह निर्भर करता है कि कितना ? क्योंकि एक निश्चित स्तर पार करने पर प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाता है। मुझे डर है कि हम उस सीमा को अगर पार नहीं कर गए हैं तो उसके निकट तो पहुँच ही गए हैं।’ वसंत ने गंभीरतापूर्वक बताया।

‘प्रकति का संतुलन बिगड़ जाएगा ! फिर उससे क्या होगा ?’ किसी सनसनीखेज’ कथा की उम्मीद में एक अमरीकी खबरनवीस पेन और पैड निकालकर तैयार हो गया।
उसकी आँखों में सीधे देखते हुए वसंत ने उलटा सवाल कर दिया, ‘कल्पना करें कि मैं अपनी सलाह दूँ कि आप अपनी राजधानी वाशिंगटन से हटाकर होनोलूलू ले जाएँ।’
‘पर उसकी जरूरत ही क्यों पड़ेगी ?’ खबरनवीस ने पूछा।
‘क्योंकि आप खबरनवीसों को पहेलियाँ बुझाना अच्छा नहीं लगता, मैं इसका जवाब भी दूँगा।’ मुसकराते हुए वसंत ने कहा, ‘मालूमी हिम युग के आने से आपको न्यूयॉर्क, शिकागो और यहाँ तक कि वाशिंगटन जैसे उत्तरी शहर खाली करने पड़ेंगे।’

इससे पहले कि प्रो. वसंत और कुछ बता पाते, विदेश मंत्रालय से एक खास मेहमान के आने से उनकी बातचीत में व्यवधान पड़ गया। फिर आम बातचीत होने लगी। लेकिन राजीव वसंत को थोड़ा और कुरेदना चाहता था। अतः जैसे ही बातचीत का मौका मिला, उसने सीधे मतलब की बात की।

‘आप अपने सभी दावों को ठोस सबूतों के साथ पेश करने के लिए विख्यात हैं। लेकिन क्या हिम युग के बारे में आपकी भविष्यवाणी कुछ दूर की कौड़ी नहीं लगती ? अवश्य ही मैं आपके क्षेत्र का नहीं हूँ, मगर मेरा मानना है कि अगले हजारों साल तक कोई हिम युग नहीं आएगा। बशर्ते कि हमारा पारंपरिक ज्ञान ....’
‘गलत साबित न हो !’ पापड़ खाते हुए वसंत ने उसकी बात पूरी करते हुए कहा, ‘‘मैं साबित कर सकता हूँ कि अगर हमारे वर्तमान पारिस्थिति की तंत्र में प्रकृति का संतुलन यों ही बिगड़ता गया तो दस साल के भीतर ही यह मुसीबत आ जाएगी। लेकिन मिस्टर शाह, आपको डरने की जरूरत नहीं। मुंबई में आप सुरक्षित हैं। भूमध्य रेखा के दोनों ओर उत्तर दक्षिण में 20 डिग्री अक्षांश तक की पट्टी को सुरक्षित रहना चाहिए।’
‘अगर मुझे स्कूल में पढ़ी भूगोल की कुछ मोटी-मोटी बातें याद हैं तो मुंबई भी इसी अक्षांश के भीतर करीब 19 डिग्री उत्तर में स्थित है। आपकी पट्टी के सीमांत पर।’
‘तो हम मुंबईवालों को बर्फबारी और अन्य सब चीजों के साथ असली शीत लहर का सामना करना पड़ सकता है। मुझे कहना चाहिए कि हम आसानी से बचे रहेंगे। वसंत ने चहकते हुए कहा।

‘मैं यकीन नहीं कर सकता। केवल दस साल के भीतर मुंबई में बर्फ गिरेगी, यह नामुमकिन है। अगर आप एक दमड़ी लगाएँ तो मैं दस डॉलर की शर्त लगा सकता हूँ कि ऐसा कभी नहीं होगा। निश्चित रूप से यह बहुत दुःसाहसपूर्ण शर्त।’ दस डॉलर का नोट निकालते हुए राजीव ने कहा।

‘मुझे डर है कि हालात मेरे पक्ष में कुछ ज्यादा ही अनुकूल हैं। निश्चित बातों पर मैं शर्त नहीं लगाता हूँ। पत्रकार साहब, आप निश्चित रूप से यह दस डॉलर हार जाएँगे। उसकी बजाय आइए, हम अपने कार्ड बदल लेते हैं। यह रहा मेरा कार्ड। मैं इस पर आज की तारीख लिख देता हूँ। आप भी ऐसा ही करें। अगर दस साल के भीतर मुंबई में बर्फ गिरती है तो आप मेरी कार्ड लौटा देंगे और अपनी हार मान लेंगे। अगर नहीं पड़ी तो मैं अपनी हार मान लूँगा।’
अभी वे कार्डों का लेन-देन कर ही रहे थे कि मेजबान ने आकर घोषणा की, ‘आइए, और हमारे खानसामे द्वारा बनाई गई खास मिठाई का आनंद लीजिए।’

एक बड़ा-सा आइस केक इसी मेज पर लाया गया जिस पर कुछ देर पहले दावत चल रही थी। केक का नाम पढ़कर राजीव और वसंत दोनों के चेहरों पर मुसकराहट दौड़ गई। केक का नाम था-‘आर्कटिक सरप्राइज।’
वास्तविक सरप्राइज तो दस साल के भीतर आने वाला है। वसंत बुदबुदाया, पर वह उतना खुशनुमा नहीं होगा।’
छत पर बच्चों ने धमा-चौकड़ी मचा रखी थी। कविता द्वारा फेंका गया बर्फ का गोला राजीव को आकार लगा और वह अतीत से तुरंत वर्तमान में आ गया। सचमुच में वह शर्त हार चुका था। अब उसे डाक द्वारा प्रो. चिटनिस का कार्ड वापस भेजना था। वह सीढ़ियों से नीचे उतरा।

पर डेस्क से कार्ड निकालते ही उसपर अंकित फोन नंबर से उसे एक बेहतर विचार सूझा। अवश्य ही शर्त के अनुसार उसे कार्ड डाक द्वारा भेजना था। पर फोन द्वारा उनसे सीधे बात क्यों न की जाए। उसने तुरंत ही फोन मिलाया।
‘‘हाँ, चिटनिस ?’’ उसने पूछा।
दूसरे छोर पर स्थित व्यक्ति ने उत्तर दिया, ‘‘जी हाँ, वसंत चिटनिस बोल रहा हूँ। क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ प्लीज ?’’

‘‘मैं राजीव शाह बोल रहा हूँ, आपको याद होगा।’’
‘‘हमारी शर्त ! बिलकुल, मैं आज तुम्हें ही याद कर रहा था। तो तुम हार मानते हो ?’’
राजीव की आँखों के सामने दूसरे छोर पर वसंत का मुसकराता चेहरा घूम गया।
‘‘सचमुच, पर क्या आप मुझे साक्षात्कार के लिए आधे घंटे का समय देंगे ? मैं आपकी भविष्यवाणी का वैज्ञानिक आधार जानना चाहता हूँ। मैं आपके सिद्धांत को प्रकाशित कराना चाहता हूँ।’’
‘‘बिलकुल पत्रकार के अनुसार; पर अब इसका कोई फायदा नहीं होगा। फिर भी तुम्हारा स्वागत है, बशर्ते कि तुम सुबह ग्यारह बजे तक संस्थान में पहुँच जाओ।’’



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