10 प्रतिनिधि कहानियाँ (नरेन्द्र कोहली) - नरेन्द्र कोहली 10 Pratinidhi Kahaniyan (Narendra Kohli) - Hindi book by - Narendra Kohli
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10 प्रतिनिधि कहानियाँ (नरेन्द्र कोहली)

नरेन्द्र कोहली

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :131
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3296
आईएसबीएन :81-7016-778-7

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नरेन्द्र कोहली के द्वारा चुनी हुई दस सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ...

10 Pratinidhi Kahaniyan a Hindi book by Narendra Kohli - 10 प्रतिनिधि कहानियाँ - नरेन्द्र कोहली

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’ सीरीज़ ‘किताबघर’ प्रकाशन की एक महत्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।
इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने सम्पूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कथाकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
किताबघर प्रकाशन गौरान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार नरेन्द्र कोहली ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं; ‘परिणति’, ‘किरचें’, ‘दृष्टि-देश में एकाएक’, ‘शटल’, ‘नमक का कैदी’, ‘निचले फ्लैट में’, ‘नींद आने तक’, ‘संचित भूख’, ‘संकट’ तथा ‘छवि’।
हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार नरेन्द्र कोहली की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगे।

मेरी कहानियाँ

मेरा लेखन कहानियों से आरंभ हुआ या कविताओं से-यह कहना कठिन है, किंतु इसमें कोई भ्रम नहीं है कि मेरे लेखन का विकास कहानियों के माध्यम से ही हुआ। अपनी कॉपियों में तो कविताएँ भी खूब लिखी थीं, पर न तो उनका विकास हुआ और न प्रकाशन। किंतु कहानियों की बात और थी। जिधर दृष्टि जाती थी, कोई न कोई कहानी दिख जाती थी-अपने भीतर भी और अपने बाहर भी। फिर भी मेरी आरंभिक कहानियाँ इस अर्थ में काफी आत्मकेंद्रित रही हैं कि उनकी सामग्री मैंने अपने परिवार और निकट संबंधियों के व्यक्तिगत जीवन से ही ली है। अबोध शैशव को पीछे छोड़ आए, पहली बार आँखें खोलते हुए तरुण मन के लिए शायद यही स्वाभाविक था। प्रतिदिन पारिवारिक सामाजिक जीवन के किसी न किसी नए तथ्य का उद्घाटन हो रहा था। अपने आसपास घटती घटनाओं की अनुभूतियों का ताजापन और उनके प्रति तीखी प्रतिक्रिया मुझे कहानी लिखने को बाध्य कर रही थी। कॉलेज के नए-नए अनुभव, हलके-हलके रोमांस, घर में पहला विवाह, नए बनते संबंध और पुराने संबंधों के प्रति विद्रोह जैसे उपकरण मुझे अकस्मात् ही सुलभ हो गए थे, और मेरे पास था मस्ती से भरा तथा लोगों को कोंचने को आतुर चुलबुला मन, चुहल से कटाक्ष और विद्रूप तक जाती वाणी, स्वयं को बड़ों के बराबर मनवाने का किशोर प्रयास...क्योंकि बड़ों के गरिमायुक्त व्यक्तित्व क्रमश: हलके पड़ते जा रहे थे। आरंभिक कहानियों में घटनाओं के नाटकीय संयोजन से विसंगतियों तथा दोहरे मानदंडों पर प्रहार करना ही शायद मेरा प्रमुख उद्देश्य था। आज सोचता हूँ तो लगता है कि शायद अपने विद्रोह की घोषणा करने के लिए ही मैंने कहानियाँ लिखी थीं। ‘पानी का जग, गिलास और केतली’, ‘दो हाथ’, ‘बदतमीजी’, ‘ज्ञान की पिपासा’, ‘दो-ढाई आठ’, ‘उजड़े दयार में’ इत्यादि कहानियाँ मेरे इसी मूड की अत्यंत आरंभिक कहानियां हैं।

इसी अवधि में कुछ कहानियाँ केवल इसलिए लिखी गईं, क्योंकि कहानियाँ बन गई थीं। कहानीपन का भी अपना एक मजा होता है। उसको छोड़ पाना कठिन होता है, विशेषकर आरंभिक दौर में। ऐसा भी हुआ कि परस्पर चर्चा में किसी ने कोई रोचक घटना सुना दी, अथवा किसी की बातचीत में सो कोई पक्ष उभर आया, तो उसकी भी कहानी बन गई। ‘राजा दशरथ के बेटे’ तथा ‘मम्मी, पापा और उनकी बेबी’ ऐसी ही कहानियाँ हैं।

प्रेम-कथाएँ मैंने बहुत कम लिखी हैं, किंतु आरंभ में कुछ रोमानी कहानियाँ अवश्य लिखी थीं। ‘स्नेह का उदय’, ‘संगिनी’, ‘उसने गलत नहीं कहा था’, तथा ‘मालिनी’ जैसी कुछ कहानियाँ याद आ रही हैं, किन्तु इनमें से कोई भी गंभीर प्रेम-कथा नहीं है। प्रेम-कथा लिखने में न मुझे तब संकोच था, न अब है, किंतु प्रेम को कहानी बनने में शायद एक लंबी अवधि चाहिए। लंबे अरसे के बाद मैंने ‘कथा पुरानी मैत्री की’, ‘त्रासदियां प्रेम की’ तथा ‘प्रीति-कथा’ इत्यादि रचनाएँ अवश्य लिखीं किंतु उनमें प्रेम कम विश्लेषण और व्यंग्य ही अधिक सघन हुआ है, क्योंकि प्रेम की वास्तविकता अब उतनी अबूझ नहीं रह गई थी।

फिर जैसे अपने आप से अवकाश पाकर मेरा लेखक अपने दु:ख-दर्द के साथ-साथ दूसरों के दु:ख-दर्द को भी पहचानने लगा था। इस समय मेरी कहानियाँ, मेरे जीवन को छूते हुए अन्य लोगों के अनुभवों की कहानियाँ है। मेरी लेखकीय सहानुभूति इन्हीं दिनों विकसित होनी आरंभ हुई थी। ‘आहत प्यार’, ‘भूखे बच्चे’, ‘सूखी डाली’, ‘मेरा अपना संसार’ बहुत भावुक और आहत भावनाओं की कहानियाँ हैं। उनके साथ-साथ ‘कहानी का अभाव’, ‘होने वाली पत्नी’ तथा एक ही विकल्प परिस्थितियों की विडंबना की कहानियाँ हैं। कहानी का अभाव यद्यपि मेरी आरंभिक कहानियों में से है, किंतु मुझे अब भी बहुत प्रिय है। इसकी सामग्री मैंने अपने बड़े भाई के जीवन से ली थी, जो अत्यंत नीरस, शुष्क तथा मशीनी हो चुका था। उनकी पीड़ा तो मेरे लिए महत्त्वपूर्ण भी है, किंतु यह कहानी मुझे अन्य कारणों से भी प्रिय है। यह कहानी की संरचना के परंपरागत अकादमीय ढाँचे पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। ‘एक ही विकल्प’ कहानी मैंने तीन बार लिखी थी। पहली बार यह ‘अँधेरे का जीवन’ नाम से कहानी पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। उसे लिखने ही नहीं, प्रकाशित करवा देने के पश्चात् भी मेरे मन में एक बात सदा कौंधती रही कि उस कहानी में और बहुत कुछ कहने और चित्रित करने का अवकाश था, किंतु मैंने उसे बहुत विरल रूप में प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि मैंने उसे पुन: उपन्यास बनाने के अविवेकी प्रयत्न में मैंने उसे अनावश्यक विस्तार दे दिया है और उस रचना की प्रखरता तथा प्रहारकता क्षीण कर दी है। उसे तीसरी बार लिखा और वह एक ही विकल्प के रूप में सामने आई।

जीवन के केंद्र में अब भी कॉलेज ही था, किंतु छात्र से अध्यापक बनने की प्रक्रिया से गुजर चुका था। नई-नई नौकरी विवाह, दांपत्य जीवन की कुछ आरंभिक समस्याएँ..और इनके कारण अपने तथा अपने निकट के लोगों के जीवन में उत्पन्न हुई जटिलताएँ..जीवन के इन नए अनुभवों ने अपनी आकस्मिकता के कारण वाणी की वक्रता को गौण बना दिया था। अनुभूति ही प्रधान हो गई थी। ‘मॉरिस नगर’, ‘कपूर’, ‘दूसरे कगार का निषेध’ तथा ‘सीमा के आर-पार’ इन्हीं दिनों लिखी गई कहानियाँ हैं।
1966-67 के दो वर्ष मेरे जीवन में घटनाओं की दृष्टि से अधिक हलचल भरे थे। पहली संतान का जन्म छोटे बच्चे के पालन-पोषण की समस्याएँ और फिर चार ही महीनों में उनकी मृत्यु ! मैंने अनुभव किया कि विवाह अपने आप में जीवन की बहुत बड़ी घटना हो सकता है, किंतु संतान का जन्म तथा उसका पालन-पोषण-भावना, व्यवहार तथा परिस्थितियों इत्यादि के धरातल पर कहीं अधिक सघन अनुभव है, जो जीवन-क्रम को आपादमस्तक लील लेता है। ‘परिणति’, ‘दूसरी आया’ और ‘किरचें’ इत्यादि कहानियों की पृष्ठभूमि में ये ही घटनाएँ हैं। रोमानियत को छोड़ जीवन कठोर यथार्थ के ढर्रे पर आ रहा था। पारिवारिक संबंधों की अनेक जटिलताएँ अपने केंचुल खोल रही थीं। मृत्यु को इस प्रकार आमने-सामने देखकर व्यक्ति रोमानी रह ही कैसे सकता है !

तब तक मेरे अनुभव कहानियों के रूप में ही ढलते थे, शायद इसलिए कि प्रत्येक घटना को स्वत: संपूर्ण तथा स्वतंत्र मानकर मेरा सर्जक मन उस घटना को उसी की संपूर्णता में बुनता था। उसे कार्य और कारण की लंबी श्रृंखला से स्वतंत्र ही रखता था। कहानी उसी एक बिंदु के चारों ओर बुनी जाती थी, उसे एक विराट् जाल के अंग के रूप में बुनने की चेतना अभी नहीं जागी थी। तब तक व्यंग्य भी पूरी तरह से मुझ पर हावी नहीं हुआ था, धीरे-धीरे अपनी आँखें अवश्य खोल रहा था। सार्थकता में उसके अंकुर फूटते अवश्य दिखाई पड़ रहे थे। उपन्यास लेखन की ओर बढ़ने की छटपटाहट भी चल रही थी। ‘दि कॉलेज’ शायद इन दोनों के मिश्रण का ही परिणाम था। आज वृत्त को पढ़ता हूँ तो वह भी किसी बड़े सामाजिक/राजनीतिक उपन्यास का कथानक सा ही दिखाई पड़ता है। ‘साथ सहा गया दुख’ का प्रथम प्रारूप भी इन्हीं कहानियों का समकालीन है।

1967-68 में लिखी गई कहानियों की पृष्ठभूमि पिछले वर्ष की कहानियों से विशेष भिन्न नहीं है। दूसरी संतान का जन्म हो चुका था। इस बार जुड़वाँ बच्चे थे-एक लड़का और एक लड़की। लड़की चौबीस दिनों की ही आयु लेकर आई थी।
...इस काल में लिखी कहानियों में इन घटनाओं की प्रत्यक्ष चर्चा नहीं है। हां, पिछले दो वर्षों के अनुभवों की कटुता के कारण विनोद की वक्रता अब यथार्थ की कटुता में बदलती अवश्य लग रही थी। इसी प्रक्रिया का आभास ‘हिंदुस्तानी’ में मिलता है।

स्वयं पिता बनकर अपने पिता को मैंने और भी निकट से जाना। शायद इसीलिए वृद्धावस्था के प्रति संवेदना और सहानुभूति जागी। ‘शटल’, ‘दृष्टि देश में एकाएक’, ‘नमक का कैदी’ तथा ‘खर्च, डायरी और अस्पताल’ इत्यादि कहानियाँ तो पिताजी से संबंधित हैं ही, ‘चारहान का जंगल’ भी उन्हीं के जीवन में घटित एक घटना पर आधृत कहानी है।
जहाँ घटनाओं का चित्रण न कर उस पर प्रतिक्रिया और वह भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करने की आवश्यकता पड़ी, वहाँ कहानी नहीं बनी, व्यंग्य ही बना। 1969 ई. में कहानियों से अधिक मैं व्यंग्य लिख रहा था। बीच-बीच में कुछ कहानियाँ भी लिखी जा रही थीं, किंतु क्रमश: कहानियों का स्रोत सूख रहा था। वैसे तो व्यंग्य में भी घटनाओं का उपयोग होता ही है, किंतु व्यंग्य कथानक-विहीन विधा है। तो मेरे भीतर का कथा-तत्त्व कहाँ जा रहा था ? 1970 ई. में जब उपन्यास लेखन आरंभ हुआ तो कहानी-लेखन प्राय: बंद हो गया ! शायद तब छोटी घटनाओं का स्वतंत्र महत्त्व कम लगने लगा था। वे घटनाएँ तो एक बड़ी व्यवस्था की कड़ियाँ थीं। और व्यवस्था का चित्रण उपन्यास लिखे बिना नहीं हो सकता था। संभवत: मेरा आक्रोश व्यंग्य का रूप ग्रहण कर रहा था और कथा-तत्व उपन्यास में ढल रहा था।

1970-75 की अवधि में बहुत कम कहानियाँ लिखी गईं। व्यक्तिगत जीवन के विभिन्न पड़ाव (जो व्यक्ति के जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ होती हैं) मैं प्राय: पार कर आया था। पढ़ाई, नौकरी विवाह संतान का जन्म, उनका रोग-शोक गृहस्थी के तनाव और परेशानियाँ, सामाजिक संबंध, सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक दबाव-यह सब कुछ देख चुका था।...मेरी रचना-प्रक्रिया में एक विचित्र अंतर आता जा रहा था। सृजन-प्रक्रिया के वृक्ष के तने में से दो शाखाएँ उग आई थीं-व्यंग्य और उपन्यास। बीज आ जाने पर फूल झड़ जाते हैं। इन दो टहनियों के विकास से कहानी अनायास ही सूख गई थी।
मेरे सृजन-वृक्ष का तना अब भी कथा ही है, किंतु विधा के रूप में कहानी जैसे विलीन हो गई है। कथा-तत्त्व उपन्यास में समा गया और आक्रोश व्यंग्य में। पिछले पंद्रह वर्षों में मैंने कहानियाँ बहुत कम लिखी हैं, न के बराबर। अब तो स्वतंत्र रचना के रूप में व्यंग्य भी कभी-कभार लिख लेता हूँ, अन्यथा वह भी उपन्यास में ही समाहित हो गया है लोग पूछते हैं-आपने कहानी लिखनी बंद कर दी ? मैं स्वीकार में सिर हिला नहीं पाता, क्योंकि न तो मैंने ऐसा कोई संकल्प ही किया है और न ही मुझे कहानी से किसी भी प्रकार का विरोध है। कहानियाँ लिख नहीं रहा तो इसलिए नहीं कि लिखना नहीं चाहता। हुआ यह है कि उपन्यास अधिक प्रबल हो उठा है।...या यह कहना अधिक उचित होगा कि वह मुझ पर हावी हो गया है।
26 फरवरी, 2006
175, वैशाली पीतमपुरा,
दिल्ली-110034

-नरेन्द्र कोहली

परिणति


अनुराधा बहुत देर से आई और जब आई तो बहुत उदास थी।
अमिताभ ने उसे देखते ही कारण पूछना चाहा-देर का भी और उदासी का भी पर वह अनुराधा को बहुत अच्छी तरह जानता था। पूछने पर वह बड़ी सुविधा से सारा दोष परिवहन-व्यवस्था पर डाल सकती थी। और उदासी का कारण ? वह अनुराधा नहीं बताएगी। जितनी बार पूछेगा, उतनी ही बार वह कहेगी, कुछ नहीं हुआ। तुम तो खामखाह ही पीछे पड़ जाते हो।’
अमिताभ ने कुछ नहीं पूछा।
वे मेरिस नगर से यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी की ओर जा रहे थे। चुपचाप।
फिर अनुराधा ही बोली, ‘‘सुनो अमि ! एक बात कहनी है पर इस एश्योरेंस के साथ कि तुम उसका कारण नहीं पूछोगे, पूछताछ नहीं करोगे।’’

अनुराधा स्वयं ही खुल रही थी। फिर अधिक कुरेदने की आवश्यकता ? वह जानता था, अनुराधा उससे कुछ छिपा नहीं पाएगी। पहले थोड़ी-सी बात बताएगी, फिर आधी और जाते-जाते पूरी बात कह जाएगी।
अनुराधा को आश्वस्त करने के लिए ही उसने कह दिया, ‘‘नहीं पूछूँगा।’’
सोचा था, उसके यह कहते ही अनुराधा शुरू हो जाएगी और बात समाप्त करने से पूर्व चुप नहीं होगी।
पर अनुराधा चुप ही रही।
अनुराधा की चुप्पी से अमिताभ के स्नायुओं पर बोझ बढ़ने लगा था।
लाइब्रेरी की सीढ़ियाँ चढ़कर अमिताभ हटकर एक किनारे खड़ा हो गया। अनुराधा काउंटर पर चली गई। किताबें लौटाने में उसे पाँच मिनट से अधिक नहीं लगे। कार्ड वापस ले, उसने अपने पर्स में डाले और साड़ी का पल्लू ठीक करती हुई लाइब्रेरी के स्टैक-हॉल की ओर मुड़ गई।

अमिताभ को साथ चलना पड़ा। उसको अनुराधा का स्टैक-हॉल में जाना अच्छा नहीं लग रहा था। वह बात, जो अनुराधा उसे बताने वाली थी क्या है ? अधिक प्रतीक्षा वह कर नहीं सकता था। वह जल्दी से जल्दी लाइब्रेरी से बाहर निकलना चाहता था, ताकि अनुराधा से वह बात पूछ सके। पर अनुराधा स्टैक-हॉल में जा रही थी, जहाँ से चार-पाँच पुस्तकें छाँटेगी, फिर उन्हें इशु करवाएगी और तब बाहर निकलेगी। इस सबमें आधा-पौना घंटा तो लग ही जाएगा।
अनुराधा शेल्फें खँगाल रही थी। जिस शेल्फ के सामने जा खड़ी होती, उसकी कोई भी पुस्तक अनछुई न रहने देती ! और तब तक अमिताभ की दृष्टि आसपास खड़े, पुस्तकें देखने में संलग्न लोगों को उलटती-पलटती रही।
अनुराधा ने तीन पुस्तकें चुनीं। अपने पर्स में से इशु कराने वाले तीन कार्ड निकाले और उसे इंगित किया, आओ, चलें।’’
अमिताभ आगे-आगे चलता हुआ पहले ही दरवाजे से बाहर निकल सीढ़ियों पर आकर खड़ा हो गया। अनुराधा पुस्तकें इशु करवा पीछे-पीछे ही आ गई।

‘‘क्या बात है ?’’ सीढ़ियाँ उतरते ही अमिताभ ने पूछा।
‘‘बता दूँगी !’’ अनुराधा बोली। उसका स्वर टालने वाला नहीं था।
अमिताभ को लगा, अभी एक-आध बार और पूछना पड़ेगा।
वे चलते-चलते विधि-संकाय के पास से गुजरते हुए रामजस कॉलेज के सामने आ खड़े हुए थे। रास्ते में अमिताभ और दो-तीन बार पूछ चुका था। अनुराधा बता देना चाह रही थी, पर अपनी आदत के अनुसार, असली बात न बताकर इधर-उधर की बातें करती जा रही थी। रामजस कॉलेज और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के बीच की सड़क पर आते ही वह ठिठक गई, ‘‘लो ! मैं आज फिर भूल गई।’’
‘‘क्या भूल गई ?’’ अमिताभ इस अप्रत्याशित बात से कुछ खीज सा उठा।
‘‘भई ! अब देखो, हम यहाँ तक आए हैं, अनुराधा बोली, ‘‘इस समय मिसेज शर्मा से भी मिलते चलते।’’
‘‘तो मिल लो न !’’ अमिताभ बोला, ‘‘मैंने कब मना किया है।’’
‘‘आज नहीं। मैं आज उनकी चीजें नहीं लाई।’’

‘‘न सही। अच्छा, अब यह बताओ, वह बात क्या है ?’’
‘‘वह बात !’’ अनुराधा एक क्षण रुकी, ‘‘बुरा मत मानना और कुछ पूछना भी मत !’’
‘‘नहीं पूछूँगा !’’
‘‘देखो,’’ अनुराधा बहुत हौले से बोली, ‘‘अब तुम हमारे घर मत आना। बाहर जहाँ कहोगे, जब कहोगे-मैं आ जाऊँगी। पर हम अब घर पर नहीं मिलेंगे।’’
‘‘क्यों ?’’ अमिताभ के मुख से अनायास ही निकल गया।
‘‘तुमने कहा था, तुम कुछ नहीं पूछोगे !’’ अनुराधा ने याद दिलाया।
‘‘हाँ-हाँ ! अच्छा, नहीं पूछता।’’
दोनों कुछ देर तक चुपचाप चलते रहे।
‘बुरा मान गए क्या ?’’

‘‘नहीं। इसमें बुरा मानने की क्या बात है!’’ अमिताभ बोला।
अनुराधा ने उसके मुख की ओर देखा-चेहरे से वह चिंतित नहीं दिख रहा था।
अमिताभ के मस्तिष्क से एक बहुत बड़ा बोझ हट गया। इतने से समय में वह बहुत कुछ सोच गया था। अनुराधा ने जैसे ही बहुत उदास होकर कहा था कि उसे कुछ कहना है, तभी से उसके मस्तिष्क में अनुराधा की मौसी की बात बार-बार उभरकर सामने आ रही थी।
अमिताभ ने अनुराधा की मौसी को एक ही बार देखा था, पर अनुराधा से सुना बहुत कुछ था। मौसी बहुत अमीर थी। उसकी कोयले की कुछ खानें थीं। उसके दोनों लड़के अमेरिका में थे और बेटी किसी मंत्री के बेटे से ब्याही गई थी। पिछले दिनों मौसी ने अनुराधा के लिए बहुत सारे रिश्ते बताए थे। एक से एक बढ़कर लड़के-पढ़े-लिखे, अमीर-माँ-बाप के सुंदर लड़के और अच्छी से अच्छी नौकरी पर लगे हुए।
अमिताभ मन ही मन इस मौसी से चिढ़ गया था और डरने भी लगा था। उन्हीं दिनों उसने बहुत सारे स्वप्न भी देखे थे कि एक चुड़ैल अनुराधा को उससे छीनकर लिए जा रही है। वह चीख रहा है, हाथ-पैर पटक रहा है, पर अपने स्थान से हिल नहीं पाता। और उसे चुड़ैल की शक्ल हर बार मौसी से मिलती-सी लगी थी।

अनुराधा ने अमिताभ की आशंकाओं का हमेशा मजाक उड़ाया था। उसका कहना था, मौसी अपने स्तर के रिश्ते बताती है। यह नहीं देखती कि अनुराधा के माँ-बाप के हैसियत क्या है। और फिर, वह स्वयं वयस्क है। कोई बच्ची नहीं है कि मौसी जिससे चाहे उससे ब्याह दे।
चुपचाप चलते-चलते काफी समय हो चुका था। अमिताभ ने नजर उठाई, अनुराधा का मुख निर्विकार था। ऐसा नहीं लगता था कि निकट भविष्य में वह कुछ कहेगी। सुबह से जिन बात का घनत्व उसके मुख पर छाया था, कहकर उसका विरेचन हो गया था।
‘‘वैसे, अब हम जा कहाँ रहे हैं ?’’ मन के हलकेपन को जताने के लिए वह हँसकर बोला।
अनुराधा ने रुककर उसे देखा, ‘‘कनॉट प्लेस चलें तो कैसा रहे ? कुछ शॉपिंग कर लेंगे और कहीं बैठकर कॉफी भी पी लेंगे !’’
अमिताभ चुपचाप चलता रहा। मल्कागंज के स्टैंड से उन्होंने स्कूटर-रिक्शा ले लिया।
कनॉट प्लेस के बरामदों में घूमते हुए अमिताभ सोच रहा था-अब वह अनुराधा के घर नहीं जाएगा। फिर वे कहाँ मिलेंगे ? बाहर बहुत ज्यादा मिलना जुलना उसे पसंद नहीं था। पर यदि वे बाहर नहीं मिलेंगे तो कहाँ मिलेंगे ? बिना मिले रहने की बात सोच नहीं सकता। उसे लगा, कोई उसकी शक्ति को तौलना चाहता है।

वे हैंडलूम हाउस के सामने से निकले तो अमिताभ रुक गया।
अनुराधा ने फिरकर प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे देखा।
‘‘अनु !’’ अमिताभ को अपना स्वर काँपता लगा।
अनुराधा एकदम पास आ गई।
‘‘आज प्रेम में पहली बाधा आई है।’’ अमिताभ बोला, ‘‘यह हमारे प्रेम की तीव्रता को तौलना चाहती है। मैं तुम्हें बता देना चाहता हूँ।’’
वह अनुराधा की बाँह पकड़कर उसे हैंडलूम के भीतर ले गया। उसे स्वयं लगा, वह बहुत रोमांटिक हो रहा है, पर उसने स्वयं को रोका नहीं।
अनुराधा ने सादी-सी चौड़ी लाल बॉर्डर वाली सफेद सूती साड़ी पसंद की।
हैंडलूम हाउस से निकलकर वे काफी देर तक शामियाना कॉफी-हाउस में बैठे रहे।

अमिताभ लौटा तो उस पर काफी गहरा अवसाद घिर आया था। आज घर पर मिलने पर बंधन लगा है, कल किसी और बात से भी रोका जा सकता है। अब अनुराधा से मिले बिना रहना संभव नहीं था। पर उसने ऐसा क्यों होने दिया ? वह इतना कमजोर ही क्यों बना ? वह अपने आपको टटोल रहा था।
जब विवाह की बात शुरू हुई थी, वह अनुराधा को जानता भी नहीं था। इस बातचीत में बीच में बहुत सारे रिश्तेदार थे।
पर अब उसे याद भी नहीं है कब औपचारिक बातचीत रोमांस में बदल गई। यह नहीं लगता था कि अमिताभ कभी इस घर में अनुराधा को बड़े औपचारिक ढंग से देखने आया होगा या उसे उस रूप में बुलाया गया होगा। अमिताभ और अनुराधा एक-दूसरे की अपनी ही पसंद लगते थे।

वे दोनों साथ घूमने जाते रहे। कई पिक्चर उन्होंने इकट्ठे देखीं। अमिताभ टिकटें खरीदकर पिक्चर-हॉल से टेलीफोन कर देता था। यदि घर का कोई बड़ा भी फोन उठाता तो वह कह देता कि वह पिक्चर-हॉल से बोल रहा है। टिकटें उसने खरीद ली हैं। वे अनुराधा को भेज दें। अनुराधा हर बार आती रही। कभी किसी ने आपत्ति की मुद्रा नहीं दिखाई। उन्होंने कई बार बाहर साथ-साथ डिनर खाया और फिर स्थिति यह हो गई कि अमिताभ शाम को दफ्तर से छूटते ही अनुराधा के घर चला जाता। शाम की चाय वहीं पीता। उसे बुलाने की आवश्यकता नहीं थी। न वह कहकर जाता। सबको पता था, वह शाम को आएगा। जिस दिन न जाता, उस दिन अवश्य पूछ हो जाती कि वह क्यों नहीं आया ? अब, जब वह अनुराधा के साथ इतना बँध चुका है, यह वर्जन उसे समझ नहीं आया।

अलग होते हुए अमिताभ के ध्यान में यह बात थी कि अगली बार मिलने का समय और स्थान अभी तक तय नहीं हुआ है। पर वह मौन रहा। अनुराधा ने मना किया है तो वही क्यों नहीं बताती, वह उसे कब और कहाँ मिलेगी ? मिलने को उसी का मन नहीं चाहता, अनुराधा भी व्याकुलता से उसकी प्रतीक्षा करती है। फिर वही क्यों पहल नहीं करती ?
पर अनुराधा ने इस विषय में कोई बात नहीं की। हैंडलूम हाउस से निकलकर वह साड़ी को निहारने में लगी हुई थी। कई बार अनजाने ही उसने साड़ी के पैकेट को अपने गालों से लगाया था, वक्ष के साथ जोरों से भींच लिया था।
उसी मग्नता में अनुराधा चली गई थी और अगली भेंट का कुछ निश्चित नहीं हो पाया था।
अमिताभ के मस्तिष्क की नसें तड़कने लगी थीं और उसे अपना दिल डूबता-सा लगा।
सवेरे उठा तो उदासी उसकी आत्मा के साथ चिपक गई थी। लगा, उसके शरीर में इंजेक्शन की सिरींज डालकर उसकी सारी ऊर्जा निचोड़ ली गई है। बिस्तर से हिलने तक को मन नहीं चाहा। पर दफ्तर तो जाना ही था। दफ्तर जाएगा, काम में उलझा रहेगा, तो अनुराधा को भूला रहेगा और तबीयत सँभली रहेगी। कमरे में पड़े-पड़े तो तबीयत और घबराएगी।

नाश्ता करके तैयार होते-होते उसका विचार बदल गया था। वह पहले यूनिवर्सिटी जाएगा-उसने तय कर लिया था-फिर दफ्तर जाएगा। दफ्तर के लिए देर हो जाएगी, पर वह यूनिवर्सिटी अवश्य जाएगा। वह अनुराधा से शाम को मिलने का समय और स्थान नियत कर लेगा। वह जानता था, अनुराधा रोज सवेरे घंटे-डेढ़ घंटे के लिए लाइब्रेरी जरूर जाती थी। वह दस बजे वहां पहुँचती थी और अमिताभ को साढ़े नौ बजे दफ्तर में अपनी सीट पर होना चाहिए था। काफी देर हो जाएगी, पर वह उससे मिलने जाएगा।
ठीक दस बजे अनुराधा उसे यूनिवर्सिटी-लाइब्रेरी में मिल गई।
‘‘तुम आ गए !’’ अनुराधा बोली, ‘‘मैं सोच रही थी, तु्म्हें कहाँ कंटैक्ट करूँ ? अभी न मिलते तो शाम को तुम्हारे कमरे पर मैं जरूर आती। तुम दफ्तर नहीं गए ?’’


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