पंत प्रसाद और मैथिलीशरण - रामधारी सिंह दिनकर Pant Prasad Aur Maithilisaran - Hindi book by - Ramdhari Singh Dinkar
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पंत प्रसाद और मैथिलीशरण

रामधारी सिंह दिनकर

प्रकाशक : उदयांचल प्रकाशित वर्ष : 1989
पृष्ठ :151
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3255
आईएसबीएन :000000

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पंत, प्रसाद और मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएँ और जीवन परिचय

Pant, Prasad Aur Maithalisharan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दो शब्द

प्रस्तुत पुस्तक में हिन्दी के तीन सुप्रसिद्ध आधुनिक कवियों पर, स्वतंत्र रूप से अलग-अलग लिखित मेरे तीन निबन्ध संगृहीत हैं।
मैथिलीशरण जी की कविताओं का अध्ययन इस दृष्टि से किया गया है कि उन्नीसवीं सदी में आरम्भ होनेवाले हिन्दू-जागरण अथवा भारतीय पुनरुत्थान की अभिव्यक्ति उनमें कैसे और किस गहराई तक हुई है।

पंत-साहित्य में पल्लव, वीणा, गुंजन और ग्रंथि को जो प्रसिद्धि मिली, वह पंत जी की बाद की पुस्तकों को नसीब न हुई। अतएव मैंने पल्लव, वीणा, गुंजन और ग्रंथि को छोड़ दिया है। इस निबन्ध में मेरा मुख्य ध्येय इस बात का अनुसंधान रहा है कि गुंजन के बाद से लेकर अबतक पंत जी क्या कार्य करते रहे हैं। पंत जी का गुंजनोत्तर साहित्य भी काफी सुन्दर सुगंभीर और विशाल है। केवल एक निबन्ध में उनकी सभी प्रवृत्तियों को समेटने का काम, स्वभाव से ही, कठिन था। तब भी, मेरा ख्याल है, इस निबन्ध ने गुंजनोत्तर पंत-साहित्य की एक छोटी-सी पीठिका तैयार कर दी है।

प्रसाद जी पर जो निबन्ध है उसमें केवल कामायनी का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। कामायनी काव्य मुझे पसन्द भी है और नापसन्द भी और अपने दोनों ही प्रकार के मतों का मैंने सप्रमाण उल्लेख किया है। निबन्ध की पाण्डुलिपि देख कर मेरे एक मित्र ने कहा कि कामायनी में भाषा अथवा शैली के जो दोष तुम्हें दिखायी देते हैं, वे तो अनेक कवियो में मिलेंगे और खुद तुम्हारी रचनाएँ भी उनसे मुक्त नहीं है। बात ठीक है। लेकिन दोष तो दोष ही रहेंगे चाहे वे मेरी कविताओं में हों अथवा मेरे गुरुओं की रचनाओं में। कामायनी देश के अनेक विश्वविद्यालयों में विधिवत् पढ़ायी जाती है और इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस सुगम्भीर ग्रन्थ के अध्ययन के क्रम में छात्रों और विद्वानों को विचारों के ऊंचे धरातल पर विचरण करने का अवसर प्राप्त होता है। मेरा प्रयास भी इस काव्य में अध्ययन-क्षितिज को विस्तृत बनाना रहा है।
पहले ये निबन्ध ‘‘काव्य की भूमिका’’ नामक मेरे नये ग्रंथ में जानेवाले थे, किंतु कई कारणों से दोनों पुस्तकों को दो कर देना पड़ा। आशा है, आधुनिक हिन्दी-कविता के ऊँचे छात्र और विद्वान इन दोनों पुस्तकों को उलट-पुलट कर देख जायेंगे।

कलकत्ता
5 जुलाई, 1958 ई.
-रामधारी सिंह दिनकर




पुरुस्थान के कवि श्री मैथिलीशरण गुप्त



1.पुनरुत्थान का स्वरूप



पुनरुत्थान से मेरा तात्पर्य उस वैचारिक आन्दोलन से हैं जो भारत में, भारत और यूरोप के संपर्क के साथ, आरम्भ हुआ और जो कदाचित् आज भी चल रहा है। यह आन्दोलन भारत में नयी मानवता के जन्म का आन्दोलन है एवं उसके प्रवाह के साथ केवल यूरोपीय विचार ही भारत में नहीं आ रहे हैं, बल्कि इस देश के बहुत-से प्राचीन विचार भी नवीनता प्राप्त कर रहे हैं। पौराणिक कथाओं पर इस आन्दोलन ने नयी आभा बिखेरी है एवं इसके आलोक में हमारे इतिहास की अनेक घटनाएँ और अनेक नायक नयी ज्योति से जगमगाने लगे हैं।

इस आन्दोलन के आदि-पुरुष राजा राममोहन राय माने जाते हैं। वे संस्कृत अरबी, फारसी और हिब्रू के बहुत अच्छे विद्वान थे तथा अपने देश के लिए उनके हृदय में असीम प्यार था। किन्तु जब शिक्षा का प्रश्न आया, वे अंग्रेजी सरकार से लड़ पड़े कि भारतवासियों को अंग्रेजी अनिवार्य रूप से पढ़ायी जानी चाहिए जिससे कि वे विज्ञान की विविध शाखाओं एवं यूरोप में विकसित समाजशास्त्र का सम्यक् ज्ञान प्राप्त कर सकें। राममोहन राय वेद और उपनिषदों के परम भक्त थे और भारतवासियों को भी वे धर्म पर आरूढ़ रखना चाहते थे। अतएव, उनकी शिक्षा का निचोड़ यह था कि नवीन भारत के एक हाथ में उपनिषदों का गूढ़ सत्य और दूसरे में विज्ञान की मशाल होनी चाहिए। राममोहन के बाद देश में पुनरुत्थान के जो भी बड़े नेता उत्पन्न हुए, उनमें से प्राय:, सबका यही दृष्टिकोण रहा। केशवचन्द्र सेन, स्वामी दयानन्द परमहंस, रामकृष्ण, स्वामी विवेकानन्द, महादेव गोविन्द, रानाडे श्रीमती बेसेंट, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, योगी अरविन्द, महर्षि रमण, पं. मदनमोहन मालवीय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गांधी और डॉ. राधाकृष्णन् इनमें से प्रत्येक ने यह माना कि वेद और उपनिषदों से अलग भागना भारत के लिए अशक्य है। वेद और उपनिषदों के सत्यों को छोड़ने से भारत उस वस्तु से वंचित हो जाएगा जो उसके समग्र इतिहास का निचोड़ है, जो उसके संपूर्ण व्यक्तित्व का सार है। किन्तु, प्रत्येक ने यह भी कहा कि भारत का प्राचीन ज्ञान चाहे जितना भी महार्घ हो, किन्तु यह यथेष्ट नहीं है। इस प्राचीन ज्ञान का सामंजस्य हमें उस नवीन ज्ञान से बिठाना चाहिए जो यूरोप में जनमा और वहीं विकसित हुआ है। अर्थात्, पुनरुत्थान के इस महाव्यापक आन्दोलन की शिक्षा का सार यह है कि प्राचीन भारत और नवीन यूरोप के समास से जो व्यक्तित्व उत्पन्न होगा, वही आगामी भारत का असली व्यक्तित्व होगा।

पिछले सौ वर्षों में भारत ने जिस स्वप्न को जन्म दिया, वह यही स्वप्न है और पिछलें सौ वर्षों में हम जो कुछ कहते आये हैं, उसमें सबसे अधिक आख्यान इसी स्वप्न का हुआ है। पिछले सौ वर्षों में हम जो कुछ करते आये हैं उसमें सबसे अधिक प्रयास इसी स्वप्न को आकार देने के निमित्त है और पिछले सौ वर्षों में हम जो कुछ सोचते आये हैं, उसमें अधिक-से-अधिक विचार इसी स्वप्न के विचार रहे हैं। यह कोई आकस्मिक बात नहीं है कि भारत अहिंसा के मार्ग से स्वाधीन हुआ और अहिंसा के द्वारा ही वह अपनी ऐसी सारी समस्याओं का समाधान खोज रहा है जिनके हल के लिए संसार भर में युद्ध और हत्या का आश्रय लिया जाता है। और यह भी आकस्मिक बात नहीं है कि स्वाधीन होते ही बाहर शान्ति की सेवा का बीड़ा इसी देश ने उठाया और घर में वह जिस समाजवाद को रूप देने में लगा हुआ है, उसका उदाहरण समाजवाद की पोथियों में नहीं मिलता, न किसी अन्य देश ने उसका प्रयोग ही किया है। संसार भर की समस्याएँ चारों ओर से, बहकर भारत-महासागर में आ गयी हैं और यहाँ से एक अप्रतिम रासायनिक प्रक्रिया में खौल रही है। भारत में आज धर्म और विज्ञान, राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता, प्राचीनता और नवीनता तथा देह और मन के बीच एक प्रच्छन्न संघर्ष छिड़ा हुआ है और हमारी सारी क्रियाएँ इस संघर्ष से प्रभावित हो रही हैं।

 व्यक्तित्व केवल मनुष्य का ही नहीं होता, युग और इतिहास भी व्यक्तित्व से युक्त होते हैं। भारत के पिछले सौ वर्षों के इतिहास ने प्राचीन भारत और नवीन यूरोप के ज्ञान और साधनों को एकत्र करके हमारे भविष्य की पीठिका तैयार कर दी है। इस पीठिका से हम भाग नहीं सकते। हम अपने सुदूर तथा आसन्न इतिहास की पकड़ में हैं। वह हमें अपनी पकड़ से बाहर जाने नहीं देगा। और कहीं हम अपने पिछले सौ वर्षों की चिन्ता-धारा को ठीक से पहचान लें तथा स्वेच्छया उसके अनुशासन में रहना आरम्भ कर दें तो आश्चर्य नहीं कि भारत फिर कोई ऐसा प्रयोग सिद्ध कर दिखाये जिससे सारी मानवता का कल्याण हो सकता है, जिससे धर्म हास्यास्पद न रहकर फिर से आदरास्पद बन सकता है, जिससे राजनीति का शुद्ध रूप निखर सकता है तथा जिससे विज्ञान से आग्नेयता का लोप हो सकता है। अस्तु।

किन्तु, ये सब कुछ दूर की बातें हैं। देखना हमें यह है कि पिछले सौ वर्षों के भीतर, पुनरुत्थान के क्रम में, देश के हृदय और मस्तिष्क में जो आन्दोलन मचे हैं, उनसे हमारे संस्कारों के भीतर कौन से परिवर्तन घटित हुए हैं।
 हमारा यह पुनरुत्थानकारी आन्दोलन बहुत कुछ उसी आन्दोलन के समान है जो यूरोप में ‘रेनासाँ’ नाम से आया था और इसके प्रभाव भी बहुत सारे वैसे ही हैं जैसे तत्कालीन यूरोप में दिखायी पड़े थे। इस आन्दोलन का सबसे बड़ा प्रभाव बुद्धि की स्वतंत्रता और प्रवृत्ति का उत्थान है। पौराणिक और मध्यकालीन संस्कारों में जकड़ी हुई बुद्धि परवश और परतंत्र थी। उसमें यह साहस नहीं था कि वह चाहे जिस किसी विषय पर, अथवा जिस किसी दिशा में निर्भीक होकर सोच सके। बुद्धि को कई प्रकार के भय थे। वह अंधविश्वासों से दबी हुई थी। इस कारण वह न तो शास्त्रों की आज्ञा के विरुद्ध सोच सकती थी, न किसी ऐसे ढंग से जिससे ईश्वर, देवता, ब्राह्मण अथवा धर्म-ग्रंथों का किंचित भी अनादर होता हो। किन्तु, पुनरुत्थान के क्रम में उसकी शक्ति और निर्भीकता इतनी निखर आयी कि अब वह सब के विरुद्ध सोच सकती है। इसी का यह परिणाम है कि पुराणों के कितने ही प्रसंग नवीन हो उठे हैं और इतिहास के नायक एवं देवी-देवता नयी व्याख्याओं के कारण नवीन होकर पहले की अपेक्षा अधिक समीप पहुंच गये हैं। हिन्दू-धर्म का यह एक विचित्र लक्षण है कि वह जितना ही बदलता है, उतना ही अपने मूल-रूप के अधिक समीप पहुंच जाता है। पुनरुत्थान के क्रम में उसकी जो नयी व्याख्याएँ प्रस्तुत हुईं, उनसे हिन्दुत्व का मूल-रूप कुछ और उद्भासित हो उठा है।

प्रवृत्ति के प्रसंग में जानने की बात यह है कि जब यूरोप भारत पहुंचा, उस समय यहां के लोग जीवन की सत्यता में प्रबलता से विश्वास करना छोड़ चुके थे। जीवन असत्य है जीवन क्षणभंगुर है एवं मनुष्य का सबसे बड़ा काम अपने परलोक की चिन्ता करना है, इस निवृत्तिवादी दर्शन का बीज पहले-पहल उपनिषदों में दिखायी पड़ा था। किन्तु जैन और बौद्ध मतों के दर्शन में यह बीज बढ़कर विशाल वृक्ष हो गया और, कालक्रम में, इस देश की जनता लोक को परलोक के सामने हीन मानने लगी। निवृत्तिवादी दर्शन के इस अंधकार पर प्रकाश के बाण पहले-पहल स्वामी दयानंद और स्वामी विवेदानन्द ने बरसाये और विवेकानन्द ने ही पहले-पहल लोगों को यह बतलाया कि वेदान्त जीवन से भाग खड़ा होने की शिक्षा नहीं देता, प्रत्युत वह तो जीवन की कठिनाइयों के साथ अनवरत संग्राम सिखाता है। हिन्दू-धर्म की ऐसी ही व्याख्या केशवचन्द्र सेन, रामकृष्ण एनी बेसेंट अरविन्द, रानाडे और गांधी जी ने भी की। किन्तु इस दिशा में हिन्दुत्व को माँजकर चमका देने का सबसे बड़ा कार्य लोकमान्य तिलक ने किया जिनका ग्रंथ ‘गीता रहस्य’ अथवा ‘कर्मयोग-शास्त्र’ अभिनव हिन्दुत्व का सबसे प्रामाणिक ग्रन्थ है। तिलक के समकालीन अथवा उनके बाद के भारतीय चिंतकों और कवियों में से बिरला ही कोई होगा जिस पर गीता-रहस्य का प्रभाव न पड़ा हो। छोटी-सी पोथी ‘गीता’ हिन्दुत्व के हाथ में सबसे बड़ी मशाल थी। किन्तु, निवृति मार्गी व्याख्याओं के कारण उसका तेज मन्द पड़ गया था। तिलक जी ने उसे फिर से स्वच्छ बनाकर देश के हाथों में रख दिया। इसीलिए, कहा जाता है कि गीता एक बार तो भगवान श्रीकृष्ण के मुख से कही गयी थी, किन्तु दूसरी बार वह तिलक के ही द्वारा उद्गीत हुई है।

प्रवृत्ति को उत्तेजना मिलने से लोक सत्य हो उठा एवं कर्मठता का सिद्धान्त आदर पाने लगा तथा लोक को छोड़कर परलोक की कल्पना में ग्रस्त रहनेवाले व्यक्तियों की समाज में हँसी उड़ायी जाने लगी। समाज में यह भावना पनप उठी कि गृहस्थ का स्थान सर्वोपरि है एवं जो लोग संन्यास लेकर संसार से अलग हो गये हैं उन्हें भी लोक-सेवा का कोई न कोई काम करना ही चाहिए। यह ध्यान देने की बात है कि आधुनिक युग के संन्यासी भी (उदाहरणार्थ रामकृष्ण मिशन के साधु) समाज की सेवा को अपना प्रमुख व्रत मानते हैं एवं अरविन्द आश्रम के साधक वेश-भूषा से गृहस्थ ही दिखायी देते हैं। प्रवृत्ति के उत्थान के कारण जीवन से भागने की भावना और वैराग्य दोनों ही मन्द पड़ने लगे। शास्त्र-प्रमाण और परंपरा के बन्धन ढीले होने लगे एवं स्वर्ग और नरक की कल्पनाएँ निस्सार मानी जाने लगीं। धीरे-धीरे जीवन बहिर्मुखी होने लगा जिसके कुछ दुष्परिणाम भी निकले हैं किन्तु भारत के मानस में मध्यकालीनता का जो कुहरा व्याप्त था, वह बहुत दूर तक छंट गया है। जंजीरों से छूटी हुई बुद्धि अनेक ऐसे क्षेत्रों में विचरण करने लगी जहाँ पहले उसका प्रवेश भी निषिद्ध था। जीव-विज्ञान और मनोविज्ञान के प्रचार से यौनाचार के पाप तथा कितने ही अन्य पाप भी, बहुत दूर तक, क्षम्य माने जाने लगे। शिक्षितों के समाज में धर्म के बदले प्रतिभा और बुद्धि की पूजा होने लगी एवं साहित्य और कला में लेखक और कलाकार का व्यक्तित्व अपने आप को प्रतिष्ठित करने लगा।

स्वर्ग और नरक की कल्पना के निस्सार होने से अमरता की इच्छा इसी भूमि पर अनन्त काल तक टिकनेवाली कीर्ति की कामना बन गयी। साहित्य में साहित्यकार के व्यक्तित्व की खोज की प्रवृत्ति इसी कीर्ति-कामना का परिणाम है। मध्यकालीन नैतिकता के पीछे अतिप्राकृतिक (सुपरनेचुरल) विश्वासों का बल था। उस बल के क्षीण होते ही नैतिकता के रूप में परिवर्तन आने लगा। फिर भी, समाज का जो भाग ईश्वर, स्वर्ग और नरक में विश्वास करता था, मुख्यत: उस जनता के भय से भारत में अनैतिकता की वह बाढ़ नहीं आयी जो ‘रेनेसाँ’ आन्दोलन के बाद इटली में आयी थी। किन्तु कुछ थोड़े लोगों के बीच वह नैतिकता या अनैतिकता अब भारत में भी सिर उठा रही है जो बुद्धि के बिलकुल आत्मतंत्र हो जाने से इटली में दिखायी पड़ी थी।

इटली में ‘रेनेसाँ’ के बाद अचानक धन में भी वृद्धि आयी और धन की वृद्धि से अनैतिकता को प्रोत्साहन मिलने लगा। समाज का जो वर्ग सबसे अधिक सुखी था, वहां बुद्धिवाद का विकास भी उसी के बीच हुआ था। जब भीतर आनन्द भोगने की उद्दाम इच्छा और बाहर सुख के सभी साधन उपलब्ध हों, तब बिरला ही व्यक्ति होगा जो संयम के उपदेश से रुष्ट न हो। ‘रेनेसाँ’ के समय इटली के सम्पन्न लोगों ने भी यही किया। वे उस धर्मशास्त्र के विरोधी हो गये जिसका जन्म भय और निर्धनता के बीच हुआ था, क्योंकि अब वे अभावों से मुक्त थे एवं उनकी बुद्धि भय के सभी प्राचीरों को तोड़कर बाहर आ गयी थी। परिणाम यह हुआ कि वे भोगवादी दर्शन की ओर उत्साह से दौड़ पड़े जिसकी शिक्षा यह थी कि जीवन आन्नद भोगने को प्राप्त हुआ है तथा विश्व के सभी आनन्द निर्दोष हैं जब तक यह प्रमाणित न हो जाए कि उनमें दोष या पाप भी होता है। निर्बन्ध बुद्धि से उच्छल समाज पर नारियों की मोहकता का ऐसा जादू चढ़ा कि उसके आगे धर्मशास्त्रों के निषेधों के पाँव उखड़ गये।

प्रवृत्ति और निवृत्ति में से कौन श्रेष्ठ और कौन हीन है, यह सरलता से नहीं जाना जा सकता। ये दोनों धार्मिक विश्वासों के दो छोर हैं और अति तक पहुंचने पर दोनों के दोनों दूषित हो जाते हैं। किन्तु, एक हद तक जीवन में दोनों की आवश्यकता होती है। निवृत्ति एक हद तक आवश्यक है, क्योंकि वह यह बताती है कि सभी ऐश्वर्य नाशवान् हैं, अतएव, उनका संचय अधर्म पर चलकर नहीं करना चाहिए। साथ ही निवृत्ति की भावना से ग्रसित समाज निर्धन और दास हो जाता है इसके उदाहरण भी इतिहास में अनेक बार मिले हैं। किन्तु प्रवृत्ति भी सीमातीत होने पर भोगवाद का पर्याय बन जाती है। जीवन का धर्म, कदाचित भोग ही है, किन्तु उसे अधिक-से-अधिक निष्काम होना चाहिए। तेन त्क्तेन भुंजीथा:’’। भोग तो करना है, किन्तु उसके साथ त्याग का पुट भी आवश्यक है। त्रिवर्ग में गिनती केवल अर्थ, धर्म और काम की है। यदि अर्थ और काम का भोग हम धर्म की भावना से करें तो मोक्ष उसका स्वाभाविक परिणाम होगा।

प्रवृत्ति के उत्थान का एक परिणाम यह भी निकला कि मनुष्य भला बनने के बदले शक्तिशाली होने को अधिक बेचैन रहने लगा। उसकी बौद्धिकता में उन्नति हुई, उसके नैतिक साहस में वृद्धि हुई, उसकी चिंतन शक्ति पहले से अधिक तीव्र एवं उसकी वृत्तियाँ बहुमुखी हो उठीं। इसी का यह परिणाम है कि अब वह प्रत्येक विचार और प्रत्येक बिम्ब को ग्रहण करने की उत्सुकता से चंचल तथा सौन्दर्य से प्रभावित होने की क्षमता से प्रमत्त है। उसकी कीर्ति-कामना इतनी उद्दाम है कि चिंतन और कला दोनों के द्वारा वह जितना कल्याण विश्व का करता है, उससे अधिक वह अपने आप को अमरता प्रदान करने की चेष्टा करता है। पहले के युगों में कई कलाकार मिलकर कोई एक वस्तु तैयार करते थे, किन्तु, नाम उसमें किसी का नहीं जाता था। किन्तु अब प्रत्येक कृति के साथ, हर कारीगर अपना नाम लिखकर या खोदकर सही करने लगा है।

और नैतिकता का स्थान धीरे-धीरे सौन्दर्य-बोध लेने लगा। मध्यकालीन नैतिकता के भीतर कहीं-न-कहीं यह संशय काम करता था कि जहां आनन्द है वहाँ रोग बसता है और जहाँ सुन्दरता है वहां पाप भी होगा। किन्तु आज की नैतिकता सौन्दर्य और आनन्द को निर्दोष, पावन तथा सुसेव्य मानती है। बुद्धि के सर्वथा स्वतंत्र हो जाने से वह संशय और भय समाप्त हो गया जिसके कारण मनुष्य सौंदर्य एवं आनन्द की ओर निश्शंक होकर नहीं बढ़ पाता था तथा प्रवृत्ति के उत्थान से प्रभावित होकर वह जीवन से आनन्द निचोड़ने को सर्वश्रेष्ठ कर्म मानने लगा। परिणाम यह हुआ कि संन्यास की तुलना में गार्हस्थ्य उज्जवल हो उठा एवं गार्हस्थ्य को आध्यात्मिक स्वीकृति मिलने से नारियों की मर्यादा में अपरिमित वृद्धि हो गई। सच पूछिये तो प्रवृत्ति का उत्थान, बुद्धि की स्वतंत्रता और नारियों की मर्यादा वृद्धि ये तीनों पुनरुत्थानकारी आनन्दोलन के सबसे बड़े परिणाम हैं। शूद्रों और नारियों के प्रति समाज में जो सम्मान से भाव बढ़े हैं, उनके कुछ मूल-कारण पश्चिमी जगत् के प्रजातांत्रिक विचारों एवं उदार भावनाओं के आयात भी हैं। किन्तु विशेषत: नारियों के प्रति देश में जो औदार्य जाग्रत हुआ, उसकी प्रेरणा बुद्धि की स्वतंत्रता एवं प्रवृत्ति के उत्थान से ही आयी है।

 प्राचीन नैतिकता ने जब अपना आसन सौन्दर्य-बोध के लिए रिक्त कर दिया, तब नारियों का सम्मान किसी के भी रोके नहीं रुक सकता था। इस कथन का सबसे अधिक समर्थन, भारतीय पुनरुत्थान के मुख्य कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताओं में मिलेगा, जहाँ कवि ने नारियों की पूजा उनके सौंदर्य के कारण की है। और हिन्दी के छायावादी काव्य में नारियों को जो सौरभ तथा आलोक की प्रतिमा के रूप में चित्रित किया गया, उसकी प्रेरणा भी इसी सिद्धान्त में थी कि संसार की सभी सुन्दरताओं के बीच नारी सब से अधिक सुन्दर वस्तु थी। पुनरुत्थान की धारा में पड़कर हम कई क्षेत्रों में परिवर्तित हो चुके हैं किन्तु सबसे बड़ा परिवर्तन, कदाचित्, वही है जो नारियों को देखनेवाली हमारी दृष्टि में आया है।


2 पुनरुत्थान और हिन्दी साहित्य



ऊपर पुनरुत्थान का जो अत्यंत संक्षिप्त विविरण दिया गया है, उसका प्रभाव भारतेन्दु से लेकर आज तक के प्रत्येक लेखक और कवि की कृतियों में खोजा जा सकता है और, इसी प्रक्रिया, से वह भिन्नता भी समझी जा सकती है जो प्राचीन और नवीन कवियों की दृष्टियों में प्रत्यक्ष है। उदाहरणार्थ, जिस स्थिति की चोट खाकर प्राचीन कवियों ने ये पंक्तियाँ लिखीं कि,

कोउ नृप होय हमहिं का हानी, चेरी छाँरि न होउब रानी।


अथवा


अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम,
दास मलूका कहि गये सब के दाता राम।


उसी स्थिति की चोट खाकर आज के कवि यह लिखते हैं कि,

ब्रह्मा से कुछ लिखा भाग्य में मनुज नहीं लाया है,
अपना सुख उसने अपने भुजबल से ही पाया है।
प्रकृति नहीं डर कर झुकती है कभी भाग्य के बल से
सदा हारती वह मनुष्य के उद्यम से, श्रमजल से।

(कुरुक्षेत्र)


अथवा जिस नारी को देखकर कबीर ने यह लिखा था कि,

नारी तो हम हूँ करी, तब ना किया विचार,
जब जानी तब परिहरी, नारी महा विकार।

उसी नारी को देखकर आज के कवि यह लिखते हैं कि,

यदि स्वर्ग कहीं हैं पृथ्वी पर तो वह नारी-उर के भीतर।


तथा


तुम्हारे रोम-रोम से नारि1। मुझे है प्रेम अपार।
तुम्हारा उर-गृह की सुकुमारि ! मुझे है स्वर्गाहार।

-पंत


यह भेद प्राचीन और नवीन भारत का भेद है; यह भिन्नता प्राचीन और नवीन मनुष्य की भिन्नता है। प्राचीन तथा मध्यकालीन मनुष्य की मानसिकता पुराणों से बनी थी, शास्त्रों की विधि-निषेधवाली आज्ञाओं से बनी थीं, धर्माचार्यों के उपदेशों और सन्तों की अनुभूतियों एवं उनकी देहदंडनपूर्ण कृच्छ तपश्चर्याओं से बनी थीं। उस मानसिकता का कुछ अमिट अंश तो अब भी हमारे साथ है, किन्तु हम नये भारतवासियों की नयी मानसिकता अनेक अन्य प्रभावों से भी युक्त है। ये प्रभाव जीवविज्ञान के हैं जो हमें यह बताता है कि मनुष्य के स्खलनों को देखने की एक दृष्टि यह भी है कि किसी विशिष्ट अवस्था में पड़ जाने से मनुष्यों के आचार स्खलित हुए बिना नहीं रह सकते। ये प्रभाव विज्ञान मात्र के हैं जो हमें यह सिखाता है कि प्राचीन मानव बहुत सी ऐसी चीज़ों को भी ईश्वरीय चमत्कार समझकर अवाक् रह जाता था जो अब आसानी से सबकी समझ में आ रही हैं। ये प्रभाव बुद्धिवाद के हैं जो हमें ऐसी घटनाओं अथवा वस्तुओं में अपनी आस्था जमाने से रोकता है जो तर्क-बुद्धि से परखी नहीं जा सकती। और इस नयी मानसिकता का प्रभाव केवल हमारे विचारों पर ही नहीं, प्रत्युत, हमारी भावनाओं पर भी पड़ा है, हमारी कल्पनाओं पर भी पड़ा है। यही कारण है कि हमारा नवीन साहित्य हमारे प्राचीन साहित्य से उतना भिन्न हो गया है।

पुनरुत्थान की पृष्ठभूमि पर भारत के प्रत्येक नये कवि और लेखक का अध्ययन किया जा सकता है। किन्तु, यहाँ मेरा अभीष्ट राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण जी गुप्त की रचनाओं पर दृक्पात करना है, क्योंकि वे ऐसे कवि हैं जिनमें भारत की प्राचीन परंपरा अभी तक सर्वाधिक जीवित और चैतन्य है तथा दूर से देखने पर वे नवीनता नहीं, प्राचीनता के प्रतिनिधि मालूम होते हैं। अतएव नवीनता के जो प्रभाव गुप्त जी की कृतियों में मिलेंगे, वे अन्यत्र पाये जानेवाले प्रभावों से अधिक विलक्षण और रोचक होंगे।

भारत में पुनरुत्थान या ‘रेनेसाँ’ का आन्दोलन सबसे पहले बंगाल में उठा, क्योंकि अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार सबसे पहले बंगाल में ही हुआ था। पीछे-ज्यों-ज्यों अंग्रेजी का प्रसार अन्य क्षेत्रों में होता गया, वहां भी पुनरुत्थान के लक्षण प्रकट होने लगे। हिन्दी प्रान्तों में अंग्रेजी का व्यापक प्रचार बाद को हुआ। अतएव इन प्रान्तों में पुनरुत्थान का आन्दोलन भी बाद को आया। यह भी ध्यान देने की बात है कि बंगाल में पुनरुत्थान के नेता राममोहन राय, केशवचन्द्र सेन, रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द थे। अतएव बंगाल में उस आन्दोलन के कवि श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर हुए। किन्तु हिन्दी, प्रान्तों में पुनरुत्थान के कवि श्री मैथिलीशरण जी गुप्त हुए। यह बात सुनने में कुछ विचित्र सी लगती है, क्योंकि गुप्त जी आर्यसमाजी नहीं सनातनी कवि हैं। यही नहीं, उनकी कविताओं में ऐसे भाव भी प्रकट हुए हैं जो स्वामी दयानन्द के मतों के ठीक विपरीत हैं,


कृष्ण अवैदिक ? और राम भी ? ठहरो, धीरज धारो,
वेदवादरत ! ठंढे जी से सोचो और विचारो।
राम-कृष्ण का रूप कहाँ से देखे दृष्टि तुम्हारी ?
इन्द्र-वरुण तक ही परिमित है यह श्रुति-सृष्टि तुम्हारी।

(द्वापर)


किन्तु स्वामी जी का महत्त्व केवल इतना ही नहीं है कि उन्होंने निराकार मत का प्रचार किया। ये यूरोपीय बुद्धिवाद के भी प्रेमी थी और बुद्धिवाद के ही आलोक में वे हिन्दुत्व के समग्र-रूप का परिमार्जन करना चाहते थे। पुराणों की कथाओं पर शंका करके हिन्दी प्रान्तों में उन्होंने ही यह प्रवृत्ति जगायी कि पुराणों को देखने की प्राचीन दृष्टि यथेष्ठ नहीं है, पौराणिक कथाओं, देवताओं और पौराणिक मानवों को नये ढंग से समझने के लिए बुद्धिवाद की नयी दृष्टि चाहिए। अंध-विश्वासों के बहिष्कार की शिक्षा भी हिन्दीवालों को पहले-पहल उन्हीं के उपदेशों से प्राप्त हुई। और उन्हीं को देखकर हिन्दी-प्रान्तों में पहले पहल यह भाव जाग्रत हुआ कि यूरोप से आनेवाले ज्ञान के प्रकाश में हमें अपने संपूर्ण जीवन, संपूर्ण इतिहास और सभी आदतों में संशोधन लाना चाहिए।

यह ठीक है कि हिन्दी प्रान्तों में जब पुनरुत्थान की इस प्रक्रिया का आरंभ हुआ तब देश-विदेश के सभी अभिनव चिंतकों का प्रभाव यहाँ भी पड़ा। किन्तु, पुनरुत्थान की ध्वजा हिन्दी प्रान्तों में सबसे पहले स्वामी दयानन्द अथवा उनके शिष्यों ने उठायी, इस निष्कर्ष से भागना कठिन है। और उतना ही कठिन इस बात से भी भागना है कि हिन्दी में इस पुनरुत्थान के प्रतिनिधि-कवि श्री मैथिलीशरण जी गुप्त हुए। केवल निराकार-साकार की दृष्टि से देखें तो हमारी दृष्टि पं. नाथूराम जी शर्मा शंकर पर पड़ती है, क्योंकि जिस आन्दोलन के नेता स्वामी दयानन्द हुए, उसके कवि शंकर जी माने जाएँ, यह संभव दीखता है।


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