तर्पण - शिवमूर्ति Tarpan - Hindi book by - Shivmurti
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तर्पण

शिवमूर्ति

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :116
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3123
आईएसबीएन :9788126708475

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शोषित, दलित और उत्पीड़ित समुदाय के प्रतिरोध एवं परिवर्तन की कथा...

Tarpan

तर्पण भारतीय समाज में सहस्राब्दियों से शोषित, दलित और उत्पीड़ित समुदाय के प्रतिरोध एवं परिवर्तन की कथा है। इसमें एक तरफ कई-कई हजार वर्षों के दुःख, अभाव और अत्याचार का सनातन यथार्थ है तो दूसरी तरफ दलितों के स्वप्न, संघर्ष और मुक्ति चेतना की नई वास्तविकता। तर्पण में न तो दलित जीवन के चित्रण में भोगे गये यथार्थ की अतिशय भावुकता और अहंकार है, न ही अनुभव का अभाव। उत्कृष्ट रचनाशीलता के समस्त जरूरी उपकरणों से सम्पन्न तर्पण दलित यथार्थ को अचूक दृष्टिसम्पन्नता के साथ अभिव्यक्त करता है।

गाँव में ब्राह्मण युवक चन्दर युवती रजपत्ती से बलात्कार की कोशिश करता है। रजपत्ती के साथ की अन्य स्त्रियों के विरोध के कारण वह सफल नहीं हो पाता। उसे भागना पड़ता है। लेकिन दलित, बलात्कार किये जाने की रिपोर्ट लिखते हैं। ‘झूठी रिपोर्ट’ के इस अर्द्धसत्य के जरिए शिवमूर्ति हिन्दू समाज की वर्णाश्रम व्यवस्था के घोर विखंडन का महासत्य प्रकट करते हैं। इस पृष्ठभूमि पर इतनी बेधकता, दक्षता और ईमान के साथ अन्य कोई रचना दुर्लभ है।

समकालीन कथा साहित्य में शिवमूर्ति ग्रामीण वास्तविकता के सर्वाधिक समर्थ और विश्वनीय लेखकों में है। तर्पण इनकी क्षमताओं का शिखर है। रजपत्ती, भाईजी, मालकिन, धरमू पंडित जैसे अनेक चरित्रों के साथ अवध का एक गाँव अपनी पूरी सामाजिक, भौगोलिक संरचना के साथ यहाँ उपस्थित है। गाँव के लोग-बाग, प्रकृति, रीति-रिवाज, बोली-बानी-सब कुछ-शिवमूर्ति के जादू से जीवित-जाग्रत हो उठे हैं। इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि उत्तर भारत का गँवई अवध यहाँ धड़क रहा है।

संक्षेप में कहें तो तर्पण ऐसी औपन्यासिक कृति है जिसमें मनु की सामाजिक व्यवस्था का अमोघ संधान किया गया है। एक भारी उथल-पुथल से भरा यह उपन्यास भारतीय समय और राजनीति में दलितों की नई करवट का सचेत, समर्थ और सफल आख्यान है।

तर्पण


दो बड़े बड़े गन्ने कन्धे पर रखे और कोंछ में पाँच किलो धान की मजदूरी सँभाले चलती हुई रजपत्ती का पैर इलाके के नम्बरी मेंड़कटा’ नत्थूसिंह की मेंड़ पर दो बार फिसला। कोंछ के उभार और वजन के चलते गर्भवती स्त्री की नकल करते हुए वह दो बार मुस्कराई।
आज की मजदूरी के अलावा चौधराइन ने उसे दो बड़े गन्ने घेलवा में पकड़ा दिए। जब से इलाके में मजदूरी बढ़ाने का आन्दोलन हुआ, खेतिहर मजदूरों को किसान खुश रखना चाहते हैं। पता नहीं किस बात पर नाराज होकर कब काम का ‘बाईकाट’ कर दें।

इस गाँव के ठाकुरों-बाभनों को अब मनमाफिक मजदूर कम मिलते हैं। पन्द्रह-सोलह घरों की चमरौटी में दो तीन घर ही इनकी मजदूरी करते हैं। बाकी औरतें ज्यादातर आसपास के गाँवों में मध्यवर्ती जाति के किसानों के खेत में काम करना पसन्द करती हैं और पुरुष शहर जाकर दिहाड़ी करना। चौधराइन औरतों को खुश रखना जानती हैं। कभी गन्ना, आलू या शकरकंद का ‘घेलवा’ देकर, कभी अपने टी. वी. में ‘महाभारत’ या ‘जै हनुमान’ दिखाकर।

लेकिन धरमू पंडित के गन्ने की बात ही और है। लाल छालवाला। मोटाई में भी दुगना। बड़े-बड़े रस भरे पोरोंवाला। नाखून से भी खुरच दो तो रस की बूँदें चू पड़ें। फैजाबाद के सरकारी फारम से बीज मँगाकर बोया है धरमू ने। परभुआ कहता, ‘‘बुलबुल गन्ना। गल्ला बनाने के लिए छिलके का सिरा दाँत से खींचो तो पेड़ी तक छिलता चला जाता है।’’

रजपतिया ने मेंड़ के बगल में लहराते सरसराते धरमू पंडित के गन्ने पर हसरत की नजर डाली। उसके मन में कई दिन से पाप बसा है-धरमू पंडित के गन्ने की चोरी करने का। गन्ना तो असली यही होता है। हरी छालवाली तो ‘ऊख’ है। आज ही उसका यह पाप फलित हो सकता था, अगर थोड़ा-सा अँधेरा हो गया होता।
सूरज भगवान लाली फेंककर डूबने जा रहे हैं।
एक तरफ बुलबुल गन्ने की सरसराती झूमती फसल। दूसरी तरफ पीली-पीली फूली लाही (अगैती सरसों) का विस्तार। बीच के खेत में बित्ते-बित्ते भर के सिर हिलाते मटर के पोल्ले। इन कोमल पोल्लों के स्वाद की बराबरी भला कोई और साग कर सकता है ? चाहे चने का ही क्यों न हो। ऐसी ही अचानक लगनेवाली ‘गौं’ के लिए वह नमक और हरी मिर्च आँचल के खूँट में बाँध कर चलती है।

नरम पोल्ले सिर हिलाकर खोंटने का न्यौता दे रहे हैं।
लाही के खेत में घुटने मोड़े सिर छिपाए देर से इन्तजार करता धरमू पंडित का बेटा चन्दर रह रहकर ऊँट की तरह गर्दन उठाकर देखता है। दूर खेतों की मेंड़ पर चली आ रही है रजपतिया। अब पहुँची उसके खेतों की मेंड़ पर अभी अगर वह उसके खेत से ‘कड़कड़ा’ कर दो गन्ने तोड़ ले तो रँगे हाथ पकड़ने का कितना बढ़िया ‘चानस’ हाथ लग जाए। फिर ना-नुकुर करने की हिम्मत नहीं पड़ सकती। पर आज तो यह पहले से ही दो गन्ने कन्धे पर लादे हुए है।

अगर थोड़ा-सा अँधेरा उतर आया होता...।
इस साल धान की लगवाही से ही पीछा करता आ रहा है रजपतिया का। पिछले साल का पीछा करना बेकार गया था। अगले साल तक अपनी ससुराल चली जाएगी। कितनी जल्दी रहती है इन लोगों को अपनी बेटियाँ ससुराल भेजने की। साल दो साल भी गाँव में ‘खेलने-खाने’ के लिए नहीं छोड़ते।
रजपतिया ने आस-पास देखा। कहीं कोई नहीं। सूरज भगवान डूब गए हैं।
वह मटर के खेत में उतरकर झुकी और ‘हबर-हबर’ नोचने लगी। बस पाँच मिनट का मौका चाहिए।

पहला कौर भी मुँह में नहीं गया था कि अधीर चन्दर अचानक जमदूत की तरह ‘परगट’ हुआ। देखकर खून सूख गया। गाँव के बबुआनों के लड़कों की मंशा तो वह बारह-तेरह साल की उमर से ही भाँपती आई है। और यह चन्दरवा। इसका चरित्तर तो अब तक दो तीन बच्चों की माँ बन चुकी गाँव की लड़कियाँ तक से बखानती आ रही हैं जब वह इन बातों का मतलब भी ठीक से समझने लायक नहीं हुई थी। कसकर दुरदुराना पड़ेगा।
चन्दर की आँखों में शैतान उतर आया है। वह शैतानी हँसी हँसता है-‘‘आज आई है पकड़ में। तभी मैं कहूँ कि कौन रोज मेरी मटर का सत्यानाश कर रहा है। घंटे भर से अगोर रहा हूँ।’’
‘‘अभी तो मैंने ठीक से खेत में पैर भी नहीं रखा। एक कौर भी मुँह से गया हो तो कहो। उसने मुँह फैला दिया-‘‘आँ ! देखो ।’’ उसकी धुकधुकी तेज होती जा रही थी।
‘‘और यह जो गठरी बाँध रखी है कोंछ में, सो।’’
‘‘यह तो मजूरी है।’’

‘‘मजूरी कि पोल्ले ? जरा देखूँ तो।’’ वह आगे बढ़ा।
‘‘खबरदार।’’ वह पिछड़ते हुए गुर्रायी, ‘‘दूर ही रहना। मैं खुद दिखाती हूँ।’’
खबरदार ? खबरदार बोलना कब सीख गईं इन ‘नान्हों’ की छोकरियाँ ? इतनी हिम्मत।
और रजपतिया का कोंछ खुलने से पहले चन्दर का हाथ बदमाशी के लिए चल गया। इस चले हुए हाथ को बीच में ही झटक कर वह गरजी-‘‘हरामजादे।’’ और पीछे हटने लगी।
झटके हुए हाथ की अँगूठी की नोक आँचल से अरझी तो आँचल फट गया। धान खेत में गिरने लगा। वह आँचल सँभालती इसके पहले ही चन्दर ने लपककर उसे कन्धों से पकड़ा और पैर में लंगी मार दिया। वह सँभल न पाई। गिर गई और ऊपर झुक आए चन्दर के बाल पकड़कर खींचती हुई चिल्लाई-‘‘अरे माई रे। गोहार लागा। धरमुआ कै पुतवा उधिरान बा रे।’’
‘‘का भवा रे ? कौन है रे ?’’ लाही के खेत के उस पार की मेंड़ पर घास छीलती परेमा की माई चिल्लाते हुए दौड़ी-‘‘आई गए। जाई न पावै। पहुँचि गए।’’

सुनकर रजपतिया को बल मिल गया। छुड़ाने की कोशिश कर रहे चन्दर के बालों को उसने और कसकर पकड़ लिया।
‘‘कौन हे रे, का भवा ?’’ परेमा की माँ पास आ गई। उसने चन्दर के बाल छोड़ दिए। वह उठकर खड़ा हुआ तो रजपतिया भी उठी। कपड़े ठीक करते हुए वह बताने लगी-‘‘इहैं मेहरंडा धरमुआ कै पुतवा। कैलासिया (चन्दर की बहन) कै भतरा। अन्नासै मारै लाग।’’
‘‘क्या कहा ? धरमुआ ? बहिन की गाली भी। नुकसान भी करेगी, चोरी भी करेगी और ऐसी बेपर्दगी वाली गाली भी। जबान में लगाम नहीं। साली चमाइन।’’
उसने नीचे पड़े गन्ने की अगोढ़ी तोड़कर गद्द-गद्द दो तीन अगोढ़ी रजपतिया की पीठ पर जमा दिया।

रजपतिया चिल्लाई। परेमा की माई ने लपककर रजपतिया को अपनी आड़ में लिया और सरापने लगी-‘‘अरे तुम लोगों की आँख का पानी एकदमै मर गया है ? आँख में ‘फूली’ पड़ गई है ? बिटिया-बहिन की पहचान नहीं रह गई है तो कैलसिया को काहे नहीं पकड़ लेता घरवै में। भतार के घर से गदही होकर लौटी है। पाँच साल से किसी के फुलाए नहीं फूल रही है।’’
‘खबरदार ! जो आगे फिर ‘जद्दबद्द’ निकाला। पहले अपनी करतूत नहीं देखती। बिगहा भर मटर हफ्ते भर से बूँची कर डाला। फारमी गन्ना एकदम ‘खंखड़’ हो गया। उस पर झूठ-मूठ हल्ला मचाती हो।’’

सिवार में चारों तरफ से का भवा ? का भवा ? की आवाजें पास आती जा रही हैं। मिस्त्री बहू हाथ में खुरपा लिये दौड़ती हुई सबसे आगे पहुँची और चन्दर को देखकर बिना बताये सारा माजरा समझ गई। ललकारने लगी-‘‘पकड़-पकड़ ! भगाने न पावै। ‘पोतवा’ पकड़ि के ऐंठ दे। हमेशा-हमेशा का ‘गरह’ कट जाय।’’
तीनों लपकीं तो लड़का डर गया। पकड़ में आ गया तो बच नहीं पाएगा। खुरपा...! वह पीछे हटा। फिर मुड़कर भाग खड़ा हुआ।
रजपतिया ने बताया, ‘‘जाने कहाँ से निकला और बोलब न चालब, सोझै मारै लाग। कहा हमार गन्ना तोरी हो। हमार मटर नोची हो। तलासी लेब। जब कि ई गन्ना चौधरी के घर से मिला है। देखने से ही पता चल जाता है कि इसके खेत का नहीं है।’’

‘‘ई हैजा काटा बौराई गवा है। जवान जहान बहिन-बिटिया को आड़-ओड़ में पाकर तलासी लेगा ? हाथ पकड़ेगा ? इसकी तरवार बहक गई है। इसको किसी की लाज-लिहाज नहीं है। डर, भय नहीं है। सारा गाँव इसकी करनी से गंधा रहा है और कोई इसे रोकने-छेंकनेवाला नहीं है।’’ मिस्त्री बहू गरज-गरियाकर बात को पूरे गाँव में फैला देना चाहती है। पाँच साल पहले उसकी ननद के साथ घटी घटना इसी रजपतिया की माई के चलते गाँव भर में फैली थी। अब उसे मौका मिला है तो वह क्यों दबने दे बात को ?
खेत में गिरा आधा-तीहा धान बटोरकर सब के साथ चली रजपतिया। इतना ‘कौवारोर’ सुनकर वह आतंकित हो गई है। मिस्त्री बहू बताती जा रही है-‘‘इहै चन्दरवा। अकेली लड़की देखकर गिरा दिया। वह तो कहो हम पहुँच गए। खुरपा लपलपा के धमकाया-छोड़ दे, नहीं काट लेंगे, तब भागा।’’

दुआर पर जुट आई भीड़ को हटाकर रजपतिया की माँ बेटी को अन्दर करके दरवाजा बन्द कर लेती है। अभी रजपतिया का बाप नहीं लौटा शहर से दिहाड़ी कमाकर। इस बीच वह जान लेना चाहती है कि असली मामला क्या है ?
‘‘सच-सच बताना। झूठ एक रत्ती नहीं।’’ पियार को गाँव में घुसते ही खबर मिलती है। सुनकर सन्न रह जाता है। जैसे पूरे शरीर का खून सूख गया हो। उसे तुरन्त अपनी बड़ी बेटी सूरसती की याद आती है। दस साल हो गए उसे कुएँ में कूदकर जान दिये हुए। आज तक पता नहीं चल पाया कि किसने उसका सत्यानाश किया था। और आज फिर...।’
बाहर अँधेरा है। साइकिल खड़ी करके वह अन्दर जाता है। रजपतिया धान कूट रही है। वह हवा में कुछ सूँघने की कोशिश करता है। फिर सीधे रजपतिया के सामने जाकर खड़ा हो जाता है। उसे आया जानकर रजपतिया की माँ भी आ जाती है।
‘‘क्या हुआ रे ? सही सही बोल।’’

‘‘उहै चन्दरवा। अन्नासै ढकेल दिहिस। मारे लाग।’’
‘‘ढकेल दिया ? मारने लगा ?’’ बबुआनों, सवर्णों के लड़कों द्वारा नान्हों, दलितों की जवान बहू-बेटियों का रास्ता साँझ के झुटपुटे में, निर्जन खेत-बाग में रोक लेने, ढकेल देने का क्या मतलब होता है, यह उसे खूब मालूम है। इससे अधिक न कोई बाप पूछ सकता है, न कोई बेटी बता सकती है। लगा उसके तन-बदन में धीरे धीरे अंगार भर रहा है। अधेड़ देह उत्तेजना से काँपने लगी है। अभी मिल जाए साला तो बोटी-बोटी कर डाले। फिर चाहे फाँसी लगे, चाहे दामुल।

वह बाहर की ओर लपकता है। रजपतिया की माँ पीछे से आवाज देती है-‘‘जरा सुनिए। पहले कान नहीं टोइएगा। कऊआ ही खदेड़िएगा। मैं कहती हूँ पूरी बात सुनकर जाइए।’’
‘‘क्या है पूरी बात ? क्या बाकी है सुनने को ?’’
‘‘अकेली नहीं थी बिटिया। परेमा की माँ थी। मिस्त्री बहू थी। उसने धक्का दिया लेकिन इसने भी तो उसका मुँह नोच लिया। बाल उखाड़ लिया। तीनों ने मिलकर खदेड़ा तो भागते भागा। जो तुम सोच रहे हो वैसी कोई बात नहीं हुई। फिर गलती तो इसी की है। जब हम लोग उनकी मजूरी का ‘बाईकाट’ किए हैं तो इसे उसके खेत में साग नोचने की क्या जरूरत थी ?’’
‘‘तो क्यों घुसी यह उसके खेत में ? किसने भेजा ? हरामजादी तेरी ही जीभ कब्जे में नहीं रहती। बहुत चटोरी हो गई है। क्यों भेजा लड़की को ?’’

पियारे उसका बाल पकड़ कर धमाधम चार-पाँच घूँसे पीठ पर लगाता है। पत्नी चिल्लाने लगती है-एकदम्मै सनक गया है ई आदमी तो। कहाँ का गुस्सा कहाँ उतार रहा है। अगर लड़की ने एक कौर साग नोच ही लिया तो क्या वह कसाई जान ले लेगा ? जवान जहान लड़की पर हाथ उठा देगा ?
ठीक बात। अभी चलकर वह धरमू पंडित से पूछता है लाठी लेकर दनदनाता हुआ वह धरमू के घर की ओर लपकता है। दालान से चारा मशीन चलने की आवाज आ रही है। पियारे झाँककर देखता है। ढिबरी भभक रही है। उनका नेपाली नौकर मशीन चला रहा है। नैपालिन चरी लगा रही है।
कम मजदूरी देने के चलते गाँव के चमारों द्वारा-पाँच साल पहले हलवाही बन्द करने के बाद धरमू कहीं से यह नेपाली जो़ड़ा खोज कर लाए हैं। बस इसे हल जोतना नहीं आता।
तभी धरमू हाथ में लालटेन लिये घर से बाहर निकलते हैं। पियारे दनदनाता हुआ उनके सामने पहुँचता है, ‘‘महाराज, आप ही के पास आए हैं। बता दीजिए कि इस गाँव में रहें कि निकल जाएँ ? आप लोगों की नजर में गरीब-गुरबा की कोई इज्जत नहीं है ?’’

धरमू को पियारे का पैलगी प्रणाम न करना बहुत अखरा लेकिन जाहिर नहीं होने दिया। अब तो यह आम रिवाज होता जा रहा है। वे शांत स्वर में बोलते हैं, ‘‘कुछ बताओगे भी, बात क्या है ? तुम तो लगता है फौजदारी करने आए हो।’’
‘‘बात ही ऐसी है महाराज ! जानकर अनजान मत बनिए। आपके चन्दर महाराज ने मेरी बेटी को अकेली पाकर सिवार में पकड़ लिया। बेइज्जत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सारे गाँव में हल्ला है।’’
‘‘देखो, हल्ला की मत कहो। इस गाँव में उड़ने को पइया तो लोग सूप उड़ा देते हैं। लेकिन सुना मैंने भी है कि किसी को उन्होंने साग नोचते या गन्ना तोड़ते पकड़ा है। अभी घर नहीं लौटे। लौटते हैं तो पूछता हूँ। लौण्डे-लपाड़े हैं। गलती किए हैं तो मैं समझा दूँगा।’’

‘‘लौण्डे-लपाड़े ? तीस के ऊपर पहुँच गए हैं। बियाह हुआ होता तो पाँच बच्चों के बाप होते।’’
‘‘ठीक है, लेकिन तुम भी तो सयानी बेटी के बाप हो पियारे। तुम्हें भी आँख, कान खोलकर रखना चाहिए। लौंडिया जवान हो गई तो बिदाई करके कंटक साफ करो। घर में बैठाने का क्या मतलब ?’’
पंडिताइन पता नहीं कब आकर पंडित के पीछे खड़ी हो गई थीं। सामने आते हुए बोलीं, ‘‘जवान बेटी को बिदा कर देगा तो उसकी कमाई कैसे खाएगा ? उतान होकर गली-गली अठिलाती घूमती है। गाँव भर के लड़कों को बरबाद कर रही है। वह तुमको नजर नहीं आता ? जहाँ गुड़ रहेगा वहाँ चिउँटा जाबै करेंगे। एक बार चमाइन का राज क्या आया, सारे चमार, पासी खोपड़ी पर मूतने लगे। इतनी हिम्मत कि लाठी लेकर घर पर ओरहन देने चढ़ आए।’’

‘‘तै चल अन्दर। हम कहते हैं चल।’’ धरमू पत्नी पर बिफरे।
पियारे भी गरम हो गया, ‘‘किसी गुमान में मत भूलिए। पंडिताइन। अब हम ऊ चमार नहीं हैं कि कान, पूँछ दबाकर सब सह, सुन लेंगे। चिउँटे को गुड़ का मजा लेना महँगा कर देंगे।’’
धरमू पियारे को बुलाकर आगे ले गए और तसल्ली देने लगे, ‘‘छोटा हो चाहे बड़ा। इज्जत सबकी बराबर है। इस कुल-कलंकी को आने दो आज। बिना दस लात लगाये घर में घुसने नहीं दूँगा। फिर आवाज दबाकर बोले-‘‘अब इस बात को बढ़ाने में कोई रस नहीं निकलेगा पियारे। समझदारी से काम लो।’’

थोड़ी देर तक दुविधा में खड़ा रहने के बाद पियारे लौट पड़ा। धरमू ने पंडिताइन को अन्दर ठेलते हुए हड़काया-‘‘पैदा किया है ऐसा कुल कलंकी और आग में पानी के बजाय खर डालना सीख कर आई हो बाप के घर से। अभी सारी चमरौटी आकर घेरेगी तो दाँत चियार दोगी।’’
‘‘कुल कलंकी हुआ है तुम्हारे लच्छन लेकर। जैसे बाप अभी तक दुआर-दुआर छुछुआते घूमता है वही तो बेटा भी सीखेगा।’’
‘‘चल अन्दर।’’ धरमू दहाड़े, ‘‘ज्यादा गचर-गचर किया तो अभी मारे जूतन के...कूकूरि...।’’
आधी रात तक आने के बाद पियारे को लगता है कि पंडित ने मीठी बातों से उसे उल्लू बना दिया। बिना कुछ किये घर लौटा आ रहा है। लगता है वह कुछ हारकर, कुछ गँवाकर लौट रहा है।
लेकिन क्या करे ? क्या कर सकता है ?
शहरों की वह नहीं जानता लेकिन गाँव में जवान बेटी का बाप होना, वह भी छोटी मेहनतकश जाति वालों के लिए महा मुश्किल। कितना धीरज, कितनी समवायी चाहिए, यह वह आदमी बिल्कुल नहीं समझ सकता जो किसी बेटी का बाप नहीं है।

वह चाहता था कि इस समय उसे किसी से मिलना न पड़े। किसी को कुछ बताना न पड़े। बिना खाए-पिए मुँह ढँककर मड़हे में सो जाना चाहता था। लेकिन दरवाजे पर तो पूरी चमरौटी इकट्ठी है। ढिबरी की मद्धिम रोशनी में उनकी परछाइयाँ हिलडुल रही हैं।

उसकी अनुपस्थिति में ही सब एकमत हो गए हैं कि थाने में रिपोर्ट लिखानी जरूरी है। मिस्त्री की बहन के साथ हुई घटना के चार-पाँच साल बाद फिर ऐसी वारदात हुई है। आसपास के चार-छह गाँव की बिरादरी में इस गाँव की बड़ी इज्जत है। भले ही मजदूरी बढ़ाने का झगड़ा दूसरे गाँव में शुरू हुआ लेकिन उसे सबसे पहले लागू करने को मजबूर किया था हमी लोगों ने। तब से कहीं कोई टेढ़ा मामला फँसता है तो बिरादरी के लोग यहीं सलाह-मशविरा लेने के लिए आते हैं।..एक दो रोज में बात चारों तरफ फैलेगी। एक आदमी की नहीं, पूरी जाति की बदनामी और बेइज्जती का मामला है।

पियारे बारी-बारी सबका मुँह देखता है। थाना, पुलिस में बात ले जाने का मतलब है दस गारी और सौ दो सौ का खर्चा। दस दिन का अकाज ऊपर से। नतीजा कुछ नहीं।
वह लोगों को समझाने की कोशिश करता है-लेकिन थाने पर लिखाएँगे क्या ? उसने धक्का दिया। और बदले में तीनों औरतों ने गरियाते हुए खदेड़ दिया। वह जान लेकर भागते भागा। इसमें लिखाने के लिए क्या है ?
लेकिन नौजवान तबका कुछ सुनने को तैयार नहीं।
-हम कहते हैं अगर दोनों औरतें न पहुँचतीं तब क्या होता ? क्या बचा था होने के लिए ?
-क्या हमें चेतने के लिए सब कुछ हो जाना जरूरी है ?
पियारे मानता है कि लड़के गलत नहीं कह रहे हैं। आज से नहीं होश सँभालवने के बाद से ही वह देख रहा है कि बड़ी जातियों के लोग उनकी इज्जत पर हाथ डालने में रत्ती भर भी संकोच नहीं करते। बल्कि इसे उनके मान-सम्मान पर चोट करने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। ज्यादातर मामलों में उनके घर के मुखिया को भी इसमें कुछ नाजायज नहीं दिखाई पड़ता। आज ही किस तरह मालकिन उल्टे उसकी बेटी पर तोहमत लगाने लगीं।

वह खुद भी जाति-बिरादरी के मामलों में हमेशा आगे-आगे चलता रहा है क्या बोले ?
‘‘जैसी सबकी मर्जी। वैसे मैं तो खुद ही धरमू को दस बात सुना आया। लड़का मिल गया होता तो बिना मुँड़ फोड़े न लौटता। पंडित चिरौरी करने लगा कि लड़का है। गलती कर बैठा। अगला जब अपनी गलती मान रहा है...’’
‘‘गलती मान रहा है तो भरी पंचायत में माफी माँगे।’’
‘‘कहाँ रहते हो ? वह बाभन होकर तुम्हारी पंचायत में माफी माँगने आवेगा।’’ मिस्त्री का बी.ए. में पढ़नेवाला लड़का विक्रम कहता है, ‘‘दो दिन की मोहलत पा गया तो आपस में ही लड़ा देगा। फिर करते रहिए पंचायत। कसम तो खाई थी सबने पंचायत में कि इस गाँव के किसी ठाकुर, बाभन की हलवाही नहीं करेंगे। फिर कैसे धरमू ने फोड़ लिया बग्गड़ को। दो जने ठाकुरों की हलवाही करने लगे। बिना थाना पुलिस किए, ये ठीक नहीं हो सकते।’’



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