बसवेश्वर - काशीनाथ अंबलगे Basveshver - Hindi book by - Kashinath Amblagey
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बसवेश्वर

काशीनाथ अंबलगे

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :120
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3120
आईएसबीएन :81-8031-081-7

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इस पुस्तक में काव्यशक्ति और सामाजिक शक्ति पर आधारित कहानियाँ हैं...

Basaveshwar Kavyashakti Aur Samajik Shakti a hindi book by Kashinath Amblagey - बसवेश्वर - काशीनाथ अंबलगे

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कन्नड़ साहित्य इतिहास की धारा में बारहवीं सदी का वचन साहित्य-युग सच्चे अर्थों में ‘स्वर्ण-युग’ कहलाता है। इस काल विशेष में कन्नड़ के कवि-कवियित्रियों ने जो शिवशरण और शिवशरणियाँ कहलाते हैं, कविता की रचना सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक आंदोलन के लिए की है। काव्यकर्म इनके लिए साधन मात्र था, न कि साध्य।

लगभग सैकड़ों शरण कवि-कवयित्रियों ने समकालीन काल संदर्भ में, व्यष्टि और समष्टि हित को समान रूप से महत्व देते हुए, वचन साहित्य की रचना की थी। आज भी लगभग सैकड़ों शिवशरण और पैंतीस से बढ़कर शिवशरणियों का वचन साहित्य उपलब्ध होना आश्चर्य का कारण बन सकता है।

स्त्री मुक्ति, जातिवाद का नाश, धर्म के क्षेत्र में लोकतंत्र की स्थापना, श्रम संस्कृति की श्रेष्ठता एवं सब प्रकार की समानता, कथनी करनी का सुन्दर समन्वय, मनुष्य केन्द्रित जीवन चिंतन इनके काव्य की प्रमुख आवाज थी। समानता ही इनके लिए योग था।

इसलिए विश्वास भरी एवं ऊँची आवाज में यह कहा जा सकता है कि विश्व साहित्य पंक्ति में कन्नड़ के वचन साहित्य को खुले दिल से रखा जा सकता है।


प्रस्तावना



भारतीय साहित्य संसार में कन्नड़ साहित्य अपना ही एक विशेष स्थान रखता है। आज कन्नड़ भाषा साहित्य में सात रचनाकारों से ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने की वजह से भारतीय साहित्य और साहित्यकारों में कन्नड़ साहित्य विशेष प्रकार से आदर का स्थान रखता है।
कन्नड़ साहित्य इतिहास की धारा में बारहवीं सदी के वचन साहित्ययुग सच्चे अर्थों में ‘स्वर्ण-युग’ कहलाता है। इस काल विशेष में कन्नड़ के कवि-कवयित्रियों ने जो शिवशरण और शिवशरणियाँ कहलाते हैं; कविता की रचना सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक आंदोलन के लिए की है। काव्यकर्म इनके लिए साधन मात्र था, न कि साध्य।
लगभग सैकड़ों शरण कवि-कवयित्रियों ने समकालीन काल संदर्भ में, व्यष्टि और समष्टि हित को समान रूप से महत्व देते हुए, वचन साहित्य की रचना की थी। आज भी लगभग सैकड़ों शिवशण और पैंतीस से बढ़कर शिवशरणियों का वचन साहित्य उपलब्ध होना आश्चर्य का कारण बन सकता है।
‘वचन’ गद्य-पद्य का सम्मिश्र सरस काव्य प्रकार माना जा सकता है। इनके साहित्य को वचन साहित्य के नाम से पहचाना गया है।

इनके जीवन और लेखन एवं कथनी और करनी में सुन्दर समन्वय देखा जा सकता है। इसीलिए इनके काव्य में जीवन को देखने की प्रामाणिकता थी और काव्यदृष्टि स्वस्थ थी। इन्होंने जो भी अनुभव किया, उसे वाणी में अभिव्यक्त किया, जो भी अभिव्यक्त किया वही जीवन दर्शन बन गया, उनका जीवन दर्शन ही काव्य दर्शन था और वही उनकी जीवन शैली भी थी।
इस काल के लगभग सभी शरण निम्न जाति और निम्न वर्ग के थे। सब वृत्तियों के लोगों ने इस काव्य कर्म में भाग लिया था, जैसे मोची ढोर, धोबी, हज़्ज़ाम, हरिजन लकड़ी बेचने वाला, रस्सी बनाने वाला किसान, नट, गायक, चावल कूटने वाला आदि। यहाँ तक कि वेश्या सूले संकव्वे जैसी महिला भी मनपरिवर्तन से शिवशरणी बनी थी और उसने भी वचन की रचना की थी। इतनी बड़ी संख्या में और विशाल आयामों से आये हुए लोग एक स्थान में, एक समय में, एक ही सामाजिक हित के लिए मिलकर आत्मशुद्धि एवं समाजशुद्धि के लिए साहित्य की रचना की है, जो दुनिया के सांस्कृतिक और साहित्यिक लोक में दुर्लभ है।

प्रायः भारत के पाँच हजार या जितना भी बड़ा इतिहास हो वर्षों के सांस्कृतिक और साहित्यिक इतिहास में सबसे पहली बार उपेक्षित वर्ग को बोलने का मुक्त अधिकार मिला और उनकी वाणी सार्थक काव्यवाणी बन गई।
एक समय में एक शेक्सपीयर या वर्ड्सवर्थ का होना, एक कालीदास या रवीन्द्रनाथ टैगोर का होना मेरे लिए या कोई भी स्वस्थ साहित्य प्रेमी के लिए-आश्चर्य की बात नहीं लगनी चाहिए। यहाँ तो हर कोई महान कवि था, महाकवि था।
संस्कृत से हट कर लोगों की कन्नड़ भाषा में लिखना पहली बार इन लोगों ने आरम्भ किया और विकास की दृष्टि से कन्नड़ भाषा चरमसीमा को छू गई।

कविता के उद्देश्य की दृष्टि से ये कवि अत्यंत ही स्पष्ट थे। उनकी दृष्टि में कविता लोगों तक जाने के लिए थी और उनके जीवन को ऊपर उठाने के लिए थी।

जैसा कि माऊत्सेतुंग ने कहा है कि जिसे समूह का शिष्य बनना नहीं आता, वह कभी उस समूह का गुरु नहीं बन सकता है। इन शरण-शरणियों ने आम आदमी के जीवन से बहुत कुछ सीखा था। इसीलिए इनके काव्य में आम आदमी का हृदय बोलता है और मार्गदर्शन पाता है।
स्त्री मुक्ति, जातिवाद का नाश, धर्म के क्षेत्र में लोकतन्त्र तत्त्व की स्थापना, श्रम संस्कृति की श्रेष्ठता एवं सब प्रकार की समानता, कथनी करनी का सुन्दर समन्वय मनुष्य केन्द्रित जीवन चिंतन इनके काव्य की प्रमुख आवाज़ थी। समानता ही इनके लिए योग था।
इसलिए विश्वास भरी एवं ऊँची आवाज़ में यह कहा जा सकता है कि विश्व साहित्य पंक्ति में कन्नड़ के वचन साहित्य को खुले दिल से रखा जा सकता है।

वचन साहित्य के प्रमुख कवि हैं-बसवण्ण, अल्लमप्रभु, सिद्धराम, चन्नसवण्ण अंबिगर चौडय्य, नुलिय चंदय्य, हडपद अप्पण्ण, आय्दक्की मारय्या, किन्नरी बोम्मय्य, मडिवाल माचय्य, मोलिगे मारय्य, तुरगाही रामण्ण, उरिलिंग देव, उरिलिंग पेद्दी, डोहर कक्कय्य, एकांतद रामय्य, नगेय मारितंदे, बहुरूपी चौडय्य, मरूळ शंकरदेव, घट्टिवाळ्य्य अजगण्ण, वचन भांडारी शांतरस, कोलशांतय्य, सोडुल बाचरस और अन्य फुटकल शिवशरण।
वचन साहित्य की प्रमुख शरणी कवयित्रियाँ हैं-नीलांबिके, नागलांबिके, मोलिगेय महादेवी, कालव्वे आय्दक्की लक्कम्मा, हडपद लिंगम्म, अमुगि रायम्म, सत्यक्क, केतलदेवी, वीरम्म, दुग्गळे, गुड्डव्वे, बोंतादेवी, सूळे (वेश्या) संकव्वे, गंगम्म, रेकम्म, मसणम्म, मुक्तायक्क और कई फुटकल शिवशरणियाँ।

वचन साहित्य के केन्द्रबिन्दु के रूप में इनके मार्गदर्शक, प्रेरक शक्ति, भक्ति भांडारी, समाज सुधारक विश्वज्योति की उपाधि से सुशोभित शरण थे बसवण्ण। बसव, बसवण्ण, बसवप्रभु, बसवेश्वर, बसवराज आदि नामों से जानाजाने वाले समकालीन सभी वचनकारों से प्रशंसित बसवेश्वर के काव्य व्यक्तित्व और सामाजिक व्यक्तित्व का परिचय चिंतन और मुख्य रूप से आज के साहित्यिक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में उनकी विचारधारा की प्रासंगिकता का एक अध्ययन इस ग्रंथ का उद्दे्श्य है।
किसी एक भारतीय भाषा का साहित्य ही भारतीय साहित्य नहीं है, अपितु भारतीय किसी भी भाषा का साहित्य ‘भारतीय साहित्य’ ही है। वचन साहित्य, बसव साहित्य की जनवादी जीवन दृष्टि का अध्ययन भारतीय स्तर पर हो और चर्चा परिचर्चा का कारण बनें-यही प्रेरणा इस ग्रंथ की रचना के पीछे काम कर रही हैं।


अखिल भारत शरण साहित्य परिषत्



अंतरंग-बहिरंग व्यक्तित्व विकास के लिए बसवादी शरण साहित्य का चिंतन आज के समाज के लिए आवश्यक है। अखिल भारत शरण साहित्य परिषत् इन्हीं उद्देश्यों के लिए प्रतिबद्ध शरण साहित्य और सांस्कृतिक संस्था है। राज्य और राष्ट्र स्तर पर समय-समय पर वचन साहित्य की संगोष्ठियों का आयोजन करना, ग्रन्थों का प्रकाशन और इस दिशा में काम करने वालों का सम्मान करना, इस संस्था का अर्थपूर्ण काम है। इस संस्था के अध्यक्ष श्री गो. रू चन्नबसप्पा जी ने अपना सारा जीवन बसवादी शरण साहित्य के प्रचार के लिए रखा है। वे एक श्रेष्ठ शरणजीवी हैं। इनके संपादकत्व में एक साहित्य पत्रिका का प्रकाशन किया जाता है।

अखिल भारत शरण साहित्य परिषत् का नेतृत्व और कृपाशीर्वाद डॉ. श्री श्री शिवरात्री देशीकेन्द्र महास्वामीजी श्री सुत्तूर वीरसिंहासन संस्थान मठ सुत्तुर (मैसूर) इनका है। इसकी स्थापना स्व. डॉ. श्री श्री शिवरात्री राजेन्द्र महास्वामी जी सुत्तूर मठ मैसूर ने की थी। डॉ. श्री श्री शिवमूर्ति शिवाचार्य महास्वामी जी तरलबालु ब्रहन्मठ सिरिगेरे इनका सदैव सहयोग रहा है। अ.भा.श.सा. परिषत् का एक बहुत ही विचारणीय आयोजन है, अखिल भारत शरण साहित्य सम्मेलन। प्रतिवर्ष तीन दिनों तक यह चलता है। समाज दर्शन और शरण साहित्य को लेकर संगोष्ठियों में इस क्षेत्र के विद्वान अपने लेख पढ़ते हैं। इन सभी लेखों को संकलन कर एक ग्रंथ का विमोचन अगले वर्ष के सम्मेलन में किया जाता है। कर्नाटक भर में ही नहीं, अपितु सारे देश में इस साहित्य परिषद् के सदस्य हैं। राज्य के कोने-कोने में इसके कार्यक्रम क्रियाशील हैं। वार्षिक सम्मेलन में लेखक, पाठक साहित्य प्रेमी बड़े ही उत्साह से भाग लेते हैं। कन्नड़ के श्रेष्ठ लेखक, विशेषतः शरण साहित्य के ज्ञाताओं को इस सम्मेलन का अध्यक्ष बनाया जाता है। श्री गो. रू. चन्नबसप्पा जी कन्नड़ा साहित्य परिषद् बेंगलोर के कई वर्ष तक अध्यक्ष थे। इस संस्था से भी अखिल भारत साहित्य सम्मेलनों का आयोजन किया जाता हैं, जिसमें लाखों की संख्या में लोग भाग लेते हैं। इन सम्मेलनों के आयोजन का अनुभव चन्नवसप्पा जी को है, इसलिए अत्यंत ही अनुशासासन से अखिल भारत शरण साहित्य परिषद् इनके निर्देशन में काम कर रहा है।

मेरा यह ग्रंथ अ.भा.श.सा. परिषद् की प्रेरणा और सहयोग से आपके सामने है। इसलिए मैं श्री गो.रू. चन्नबसप्पा जी और शरण साहित्य परिषद् के प्रति भावभीनी अभिवादन समर्पित करना चाहता हूँ।

-डॉ. काशीनाथ अंबलगे


मेरी बात....


संतों और शिवशरणों के काव्य में सामाजिक चेतना विषय को लेकर लगभग 1986 में पीएचडी के लिए मैंने शोध प्रबन्ध, लिखा, पीएचडी नामक डॉ. वैद्य बना, ग्रंथ प्रकाशित हुआ आदि आदि। पर कन्नड़ साहित्य के संदर्भ में 12वीं सदी के वचन साहित्य ने मुझे कई दृष्टियों से प्रभावित किया है, कई अन्य समकालीन जनवादी संवेदनशील लेखकों की तरह। 800 वर्षों के बाद आज लगभग 35 महिलाओं का काव्य उपलब्ध है, जिन्होंने बारहवीं सदी में लिंग समानता वर्ग-वर्ण रहित समाज, अंतरंग-बहिरंग शुद्धि के लिए काव्य लिखा था। सब निम्न वर्ग जाति के शरणों ने भी चिंतन किया और काव्य लिखा, लोगों की भाषा कन्नड़ में। इनके काव्य-काव्य का समग्र चिंतन जनवादी था। इन सभी बातों की चर्चा मैंने प्रस्तावना और इस ग्रंथ में मेरे विवेक के अनुसार की है।
मेरे मन में यह विचार बार-बार आया है कि बसवादि शरणों के वचन साहित्य का पाठ हिंदी संदर्भ में हो और इस बहाने भारतीय भाषाओं में भी। श्रम संस्कृति की श्रेष्ठता, सब प्रकार की समानताओं की बात जो साहित्य करता हो और आठ सौ वर्ष पूर्व यह घटता है, तो क्या आज के पाठक न पढ़ें ? पढ़े यह हर कोई जनवादी लेखक और साहित्य चिंतक चाहता है।

ग्रंथ लेखन, प्रकाशन, पाठकों तक पहुँचना और स्वस्थ साहित्य विमर्श को लेकर मेरा ऐसा सोचना है : किसी भाषा में साहित्यिक महत्त्व के, समकालीन महत्त्व के ग्रंथों के प्रकाशन करने वाले होते हैं, पर कम होते हैं। ऐसी प्रकाशन संस्था से कोई किताब निकलती है तो पढ़ने वाले लगभग 300-400 पाठक होते हैं-आलोचक, कुछ प्राध्यापक साहित्य के प्राध्यापक, पत्रिकाओं को लिखने वाले, साहित्यक पत्रिकाओं के पाठक और मन की शांति के लिए पढ़ने वाले इंटरेस्टिंग पाठक। इसमें कहीं छात्र पाठक भी हैं। ये पाठक उस किताब के ओपिनियन मेकर्स होते हैं।

वचन साहित्य पर हिन्दी में एकाध किताबों आई हैं, पर कर्नाटक में किस पाठक के लिए किताब ? उत्तर अस्पष्ट है। तीन दशक पूर्व कर्नाटक विश्वविद्यालय धारवाड से भक्तिभांडारी बसवेश्वर के वचन ग्रंथ हिंदी में अनुदित क.वि.वि. से प्रकाशित हुआ पर आज भी किताबें वैसी ही हैं। जब मैं कर्नाटक साहित्य अकादमी का सदस्य था, हमने ‘वचन’ ग्रंथ की योजना बनाई जिसमें सब शरणों के चुने हुए वचनों का हिन्दी अनुवाद है। मैंने स्पष्टरूप से कहा था कि हिंदी के अच्छे प्रकाशनों से प्रकाशित हों। किसी नियम की अपूर्णता की वजह से संभव नहीं हुआ, कर्नाटक साहित्य अकादमी ने ही प्रकाशन किया और किताबें जहाँ होनी चाहिए, वहाँ नहीं है। सादर प्रति भेजते हैं तो एक पत्र आता है-प्रशंसा होती है, बस्।

वचन साहित्य को लेकर हिंदी में चार ग्रंथों की मेरी योजना है। कर्तव्य समझ कर मैंने यह स्वीकार किया है, क्योंकि 40 वर्षों से हिंदी के नाम से पेट भर रहा हूँ और पेटभर खा रहा हूँ। ‘बसवेश्वर: काव्य शक्ति और सामाजिक शक्ति,’ ‘बारवीं सदी की कवयित्री अक्कमहादेवी और स्त्री विमर्श,’ ‘बारहवीं सदी की कवयित्रियाँ और स्त्रीविमर्श,’ और शरण संत काव्य में सामाजिक चिंतन की धारा में आपके हाथों में यह किताब है।
बसवेश्वर और वचन साहित्य के साहित्यों-सांस्कृतिक आंदोलन को लेकर कई लेख और ग्रंथ कन्नड़ हिन्दी में मैंने लिखे हैं, पर यह मेरा प्रिय सृजन है। इसकी प्रस्तावना में इस साहित्य संदर्भ का परिचय और चिंतन है। समकालीन शरण-शरणियों ने एक दूसरों के साहित्यिक व्यक्तित्व के बारे में बाते की है, जो विशेष है। इसलिए समकालीनों की दृष्टि में बसवेश्वर को देखने की कोशिश है ! बसवेश्वर को लेकर कई लेखक चिंतक और विभिन्न क्षेत्र के विद्वानों के एकाध विचार दिये गये हैं-इसे देने में; अहिंदी कवि दार्शनिक के अनेक आयामों को छूने का प्रयास है यहाँ। अंत में उनके चुने हुए सौ वचन दिये गये हैं।
हिंदी में मेरी एक कविता संग्रह ‘अधूरे शब्द’ प्रकाशित हुआ और इसने केन्द्रीय हिंदी निदेशालय के रु. 50000/- या पचास हजार नगद पुरस्कार के साथ और दो विश्वविद्यालयों से पुरस्कार प्राप्त किये हैं। और इसलिए यह ग्रंथ आपके हाथ में रखने में मुझे बड़ी खुशी हो रही है।

आदरणीय दिनेश चंद्र जी ने मुझे प्रोत्साहित किया है। मेरे श्रद्धा सुमन के हक़दार है दिनेश जी।
मेरे लेखनकार्य में घरवालों का सदैव सहयोग रहा करता है। पत्नी प्रो. लीला अंबलगे, बेटी स्नेहा, तेजस्वनी एवं शशिधर, चिन्नू, तम्मा को स्मरण करना अच्छा लगता है। साहित्य साथी राहु, खानापुरे, मीनाक्षी नीला और शांतरसजी एवं डॉ. सादिक, सोहर्वर्दि जी को नमस्कार, रमजान दर्गा, ज्ञानोबा को प्रमाण।

-डॉ. काशीनाथ अंबलगे


पृष्ठभूमि



शरण साहित्य पूर्व कालीन विभिन्न परिस्थितियों का एक चित्र यहां आवश्यक लगता है।

राजनीतिक


लगभग ग्यारहवीं सदी में उत्तर भारत की राजनीतिक परिस्थितियों में तीव्र परिवर्तन दिखाई देते हैं। इसी प्रकार दक्षिण भारत में भी, विशेषतः कर्नाटक में भी राजनीतिक अस्थिरता दिखाई देती है।
कन्नड़ के बसव और शिवशरणों के वचन साहित्यकालीन राजनीतिक परिस्थितियों का महत्त्व इनके साहित्यिक और धार्मिक सामाजिक क्रांति के कारण से ही बढ़ जाता है।
सन् 1150 से 1350 तक के दो सौ वर्ष के कर्नाटक के इतिहास में प्रारम्भिक सौ वर्षों के प्रथम काल की महत्त्वपूर्ण घटना है, कल्याण के चालुक्य वंशीय राजाओं का पतन और कलचूर्य राजा बिज्जळ की उन पर विजय।
इनका शासनकाल अत्यन्त ही छोटा था। कलचूरी राजा बिज्जल के शासनकाल में कोई शान्ति, तृप्ति या स्थिरता नहीं थी। इनके शासन का महत्त्व बसव और शरणों के साहित्यिक धार्मिक, और सामाजिक क्रांति के कारण से ही बढ़ गया था। मात्र शरणों के धार्मिक और साहित्यिक कार्यों से इतिहास में बिज्जल का अध्ययन हुआ करता है।
बसवेश्वर बिज्जल के पास मन्त्री थे और साथ ही वचन साहित्य की सृष्टि, धार्मिक परिवर्तन, सामाजिक परिवर्तन के लिए कार्य करते थे।


धार्मिक



कर्नाटक में बसवेश्वर और अन्य शिवशरणों के आगमन से पूर्वकालीन धार्मिक परिस्थिति अत्यन्त ही हीनावस्था की थी। धर्म में कई प्रकार की ऊंचनीच भावना थी। धर्म मानवीय भावनाओं को त्यागकर संकीर्ण बना था। कई प्रकार के धर्म उपधर्म की गलियों में मनुष्य भटका हुआ था। धर्म के नाम पर सामान्य लोगों का शोषण हुआ करता था और कई प्रकार के अत्याचार, अन्याय और पशुबलि आदि धर्म की आड़ में चलती थी। जाति-उपजातियों में संघर्ष सामान्य बात हो गयी थी। समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जैसे वर्गों में विभाजित हुआ था। उच्च जाति के ब्राह्मण अपने आपको धर्म का ठेकेदार समझते थे और दूसरों का शोषण करते थे। युगीन सब प्रकार की सुविधायें ब्राह्मणों के यहाँ कैद थीं। इसीलिए अनिष्ठ जाति पद्धति का कारण वर्ण पद्धति को बसवण्ण ने चुनौती दी और कहा कि उद्योगों के अनुसार आदमी को पहचाना जाना चाहिए-
‘वर्णानां कि प्रयोजनं ? इसीलिए लोगा गरमाया लोहार कहलाया, कपड़ा धोया धोबी कहलाया, सूत ताना जुलाहा कहलाया, वेदपाठ किया विप्र कहलाया, जग में कान से कोई पैदा हुआ है ?’

-बसवण्ण

शूद्रों का जीवन तो पशुपक्षियों से भी गिरा हुआ था। अस्पृश्य गाँव से हटकर दूर झोपड़ियों में रहते थे। इनको घंटी बजाते हुये गाँव में प्रवेश करना पड़ता था, ताकि उच्चवर्ग के लोग इनकी छाया से भी बच सकें। उच्च जाति के लोगों की वाणी ही दूसरों के लिए धर्म था, और कोई प्रश्न ही नहीं कर सकता था। लोगों के धर्मचरणों में धर्म की बातें कम और अंधश्रद्धा अधिक थी। धर्म के नाम पर वामाचार अत्यन्त ही असह्य था।
लोग यह मानते थे कि गांवों की चारों दिशाओं में अनिष्ट शक्तियाँ वास करती हैं और उनकी असन्तुष्टि के कारण से बीमारियाँ फैलती हैं। इन्हें प्रसन्न करने के लिए दुर्गम्मा, कलम्मा मारम्मा चौडम्मा आदि ग्राम देवताओं की उपासना करते थे। इनको प्रसन्न करने के लिए पशुबलि चढ़ाना अग्नि पर चलना और इनका जात्रा महोत्सव करना आदि अन्ध श्रद्धाओं से मनुष्य घिरा हुआ था। इन शक्ति देवियों के उत्सवों में पशुबलि, स्त्रियों की नग्नसेवा और कहीं-कहीं तो उत्सवों में नरबलि भी दी जाती थी।
मूर्तिपूजा की प्रधानता थी, इसलिए कई मन्दिर और मठों के निर्माण हुए। धार्मिक जीवन में पुजारियों की प्रधानता थी। मन्दिरों में धर्म की साधना नहीं, बल्कि ऐश की आराधना होती थी। ये शोषण और धनार्जन के केन्द्र बन गये थे। अपने स्वार्थ साधने के लिए उच्च जाति के लोगों ने मन्दिरों का पूरा-पूरा उपयोग किया। देवदासी पद्धति प्रचलित थी। देवदासियों को देवताओं को नृत्य चढ़ाने के स्थान पर पुजारी और उच्च जाति के लोगों को अपना शरीर देना पड़ता था। इसीलिए बसवेश्वर ने मन्दिर निर्माण का विरोध किया होगा-


‘धनवान शिवमन्दिर बनवाते हैं,
मैं गरीब मैं क्या कर सकता हूं।
मेरे पैर ही मिनार, शरीर ही मन्दिर,
सिर ही सोने का मुकुट है,
कूडल संगमदेव ! जड़ नाशमय है चेतन अविनाश है।’


-बसवण्ण


लेकिन कुछेक मठ-मन्दिरों ने सांस्कृतिक केन्द्र बनाकर शिक्षण प्रसार का काम भी किया। पर अधिकांश मठ, मन्दिर और तीर्थ-क्षेत्र अन्धश्रद्धा, अज्ञान और शोषण के केन्द्र थे। वेदशास्त्र का अध्ययन भी स्वार्थ साधने के लिए हुआ करता था। अनेक यथार्थ ज्ञान से सामान्य लोगों को दूर रखा गया था। पशुबलि और जड़ कर्मकाण्ड के उपदेशक वेदशास्त्रों का खण्डन इन शिवशरणों ने इसीलिए किया है।
सैकड़ों देवों की आराधना में फँसे हुये मनुष्य की बुद्धि पर अज्ञान का परदा फैला हुआ था। मनुष्य को इन अन्धविश्वास और अज्ञान की दलदल से मुक्त करने के शिवशरणों का प्रयास एक महान काम था।
उच्च जाति और वर्ग के लोगों ने समाज का शोषण करने के लिए धर्म को माध्यम बनाया था। वेदाध्ययन का अधिकार स्त्री और शूद्रों को नहीं था। नारी की स्थिति अत्यंत ही दयनीय थी। वह किसी प्रकार के संस्कार के लिए योग्य नहीं मानी जाती थी। वह भोग की वस्तुमात्र थी। होमहवनादि अर्थहीन आचरणों की भरमार थी।
लोगों की मानसिकता यह मानती थी कि जो आता है उसे स्वीकार करना चाहिए, जो पूर्वजन्म का फल है। लोग शकुन भविष्य आदि पर विश्वास करते थे।
जब मनुष्य के जीवन में इस प्रकार का अज्ञान फैल जाता है तो उसे विचार क्रान्ति की ओर ले जाना अत्यन्त आवश्यक होता है। शिवशरणों ने समाज को ज्ञान प्रकाश की ओर ले चलने का काम किया था।


सामाजिक



शिवशरणों के पूर्वकालीन समाज अत्यन्त ही हीनावस्था में था। अशांति, अतृप्ति संघर्ष और सामाजिक मूल्य का नाश, धर्म का अधःपतन ये उस कालीन समाज के प्रमुख अंश थे। कई प्रकार की असमानताओं के जहर से समाज विषैला बन चुका था। उच्च नीच जातियाँ उद्योग में श्रेष्ठ कनिष्ठ, आर्थिक दृष्टि से अमीर गरीब, स्त्री-पुरुष भेद इस प्रकार की असमानताओं से समाज रोगग्रस्त बन गया था। कथनी करनी, अन्तरंग बहिरंग एक नहीं, बाह्यडम्बर में जीवन व्यतीत करता हुआ मनुष्य अनीतियों का शिकार हुआ था। धर्मान्ध के पंजे में सामान्य मनुष्य जकड़ा हुआ था। इस प्रकार असंतुष्ट था।
खेती उस युग का प्रमुख उद्योग था। लोहार, कुम्हार, जुलाहा, मोची और धोबी आदि अपने अपने उद्योग करते थे। ये उद्योग वंश परम्परा से चले आते थे। वैश्य व्यापार करते थे। दूसरे लोग आवश्यक वस्तु इनसे खरीदते थे।
जाति पद्धति प्रचलित थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जैसे वर्ण में समाज बँट गया था। यों तो वर्ण पद्धति के कठोर नियम ढीले पड़ गये थे। कई प्रकार की जाति उपजातियों का निर्माण हुआ था। ब्राह्मण इनमें उच्च स्थान पर थे। सब प्रकार की सुविधायें उन्हें प्राप्त थीं। क्षत्रिय शासन के अधिकारों का अनुभव करते थे और समाज में वैश्यों और शूद्रों की उपेक्षा थी। क्षत्रियों को ब्राह्मणों से शिक्षा मिलती थी। शिक्षा, धर्म, उपनिषद्, और वेदाध्ययन ब्राह्मणों की सम्पत्ति बन गई थी।




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