पान - क्नुत हाम्सुन Paan - Hindi book by - Knut Hamsun
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स्त्री-पुरुष संबंध >> पान

पान

क्नुत हाम्सुन

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :143
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3040
आईएसबीएन :00-0000-00-0

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एक अर्थ में पान एक प्रतीकात्मक कृति है। एदवार्दा और ग्लान के बीच का द्वन्द्व स्त्री और पुरुष का अन्तर्द्वन्द्व है।

Pan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पान में सर्वोत्तम कविता में पायी जाने वाली सहस्वरता है, दरअसल यह कविता ही है जो गद्य में लिखी गई है, और दोनों के श्रेष्ठ गुणों से सराबोर है...यूरोप में पान को कई साल तक एक बेमिसाल कृति के रूप में देखा जाता रहा है, खास तौर पर युवा लोगों द्वारा। एक अर्थ में पान एक प्रतीकात्मक कृति है। एदवार्दा और ग्लान के बीच का द्वन्द्व स्त्री और पुरुष का अन्तर्द्वन्द्व है। उनका गुरूर ऐसा इनसानी गुरूर है जो खुशी की तमन्ना करता है और उससे भाग जाना चाहता है।


‘क्या हम हाम्सन को पढ़ना छोड़ दें’

 


1888 में जब क्नूत हाम्सन लगभग तीस के थे, वे भूख से मर रहे थे, ‘‘एक अटारी में जो चन्द्रमा से सिर्फ तीन फुट की दूरी पर थी,’’ और उनका अब तक का हासिल कुछ भी नहीं था। अब तक नार्वे के साहित्यिक परिदृश्य से घनघोर नैराश्य ही उन्हें मिला था, और अमरीका तक में तरह-तरह की कड़ी मजदूरी कर चुकने के बाद भी नार्वे लौटने पर भी उन्हें कड़े श्रम और भुखमरी का सामना करना पड़ा।

एक उपन्य़ास की अधूरी पाण्डुलिपि उनके पास थी जिसका पहला वाक्य था ‘‘यह उस समय की बात है जब मैं क्रिस्तियानिया में भूख से मर रहा था, उस शहर में जिसकी छाप लिए बिना कोई उसे छोड़ नहीं सकता...उस शहर में उपजे अवसाद को मन में लिए ही वे भूख की अधूरी पाण्डुलिपि लिए एक प्रकाशक से मिलने गये थे। उसी साल पतझड़ के मौसम में भूख की वह अधूरी पाण्डुलिपि छप गयी, और लगभग रातों-रात हाम्सन सकान्दिनेविया के दिग्गज लेखकों में शरीक माने जाने लगे।

अगले कुछ सालों में रहस्य और पान प्रकाशित हुए। इन तीन किताबों की आत्मलक्षी शैली उस समय के लिए चौंका देने की हद तक नयी थी और कई मायनों में अब तक भी बेजोड़ ही साबित हुई है। इन उपन्यासों की बदौलत लेखक आक्सेल सान्देमूसे के अनुसार अन्य नार्वीजी लेखक तो नार्वे में ही विश्व-प्रसिद्ध हैं लेकिन हाम्सन विश्व में विश्व-प्रसिद्ध हैं। यूरोपीय साहित्य में हाम्सन आधुनिक औपन्यासिक विधा के अग्रज की हैसियत से प्रतिष्ठित हैं और नार्वे में कोई लेखक स्वयं को हाम्सन की श्रेणी में रख पाने की हिमाक़त नहीं करता।
फिर इस भूमिका के शीर्षक से हाम्सन के बारे में अभी तक लेख क्यों

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1. हाम्सन के समर्थन में लिखा स्वीडी आलोचक गुन्नार डी हान्सन का एक महत्वपूर्ण लेख।

लिखे जा रहे हैं ? हाम्सन का नाम हर नार्वीजी के मन के एक रिसते हुए घाव की तरह क्यों अंकित है ? नार्वे में हाम्सन की किताबें हजा़रों लोग चोरी-चोरी खरीद कर क्यों पढ़ते हैं ? जी-जान से प्यारे इस लेखक को लेकर हम-वतन इस हद तक मन ही मन आहत क्यों हैं ? नार्वे का कोई मार्ग हाम्सन-मार्ग नहीं कहलाता न अगले कई वर्षों तक कहलायेगा। इस सबके बावजूद हर वर्ष हाम्सन की हर किताब की 30,000 प्रतियाँ यींलदॉल प्रकाशन से बिकती हैं। अमरीकी उपन्यासकार हैनरी मिलर के अनुसार अगर ये 30,000 प्रतियाँ केवल नात्जी ही खरीद रहे होते तो नार्वे का भविष्य काफी मनहूस दिखायी देता।

दुनिया के नक़्शे में उत्तर यूरोप के नन्हीं-सी इल्ली नुमा इस देश में जहाँ मीलों-मील लोग ढूँढ़े नहीं मिलते, हाम्सन को पढ़ने और चाहने वाले लोग बड़ी संख्या में पाये जाते हैं-यह साहित्य में शिद्दत से जीने-मरने वाले लोग हैं। हो सकता है वे हाम्सन नाम की पहेली से क्षुब्ध आहत और अचम्भित हों, लेकिन वे हाम्सन को इस कौतूहल से तो निश्चित ही नहीं पढ़ते कि देखें तो सही कि हिटलर के समर्थन इस विक्षिप्त लेखक की किताबों में उस ख़ौपनाक विचारधारा के कोई संकेत मौजूद भी है या नहीं। हम उन नात्जी सैनिकों के बारे में भी आख़िर क्या जानते हैं जो हाम्सन के महाकाव्यात्मक उपन्यास माटी की फ़सल को अपनी वर्दी की सीने वाली जेब में लिये लिये इतिहास के क्रूरतम अध्यायों में गोटियों की तरह चले जा रहे थे ? साहित्यिक कृतियों को जुनून की हद तक चाहने वाले लोगों का लघुतम समापवर्त्य आख़िर क्या हो सकता है और इन कृतियों के लेखकों का ?

कोरे तथ्य इस प्रकार है-नार्वे 1940 से 1945 तक नात्जी़ जर्मनी के कब्ज़े में था। नार्वे में तो हाम्सन अगाध प्रेम और श्रद्धा के पात्र थे ही, लेकिन अब तक तो वे दुनिया भर के इने-गिने दिग्गजों में माने जाने लगे थे। नार्वे में जर्मनी की उपस्थिति के रहते हाम्सन जर्मनी का समर्थन करने लगे थे। हाम्सन जो अब तक अपने हमवतनों के अजी़ज़दार थे, अब ग़द्दार की हैसियत से उनकी हिका़रत के पात्र बने जब तक कि यह साबित न कर दिया जाता के वे पागल हो चुके थे। पुलिस की हिरासत में हाम्सन पर मुक़द्दमा चलाया गया और इस प्रसंग का इतिहास अब नार्वे तक ही महदूद नहीं रह गया है। जिस क्रूरता से मनोचिकित्सीय जांच के बहाने वृद्ध हाम्सन को यातना दी गयी, वह डेनमार्क के लेखक थॉरकिल्ड हाम्सन की पुस्तक प्रोसेसन में पैने और मार्मिक विवरणों के साथ दर्ज हैं, भले ही पुस्तक के लेखक ने हाम्सन को इस क़दर शिद्दत और अकी़दत से उबारने में खुद को तबाह कर लिया।

 इस पुस्तक से और इसके लेखक के प्रति हुई प्रतिक्रिया से इस बात का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि केवल नात्ज़ी ही नात्जी़ नहीं थे। हाम्सन को बुरी तरह तोड़ देने की कोशिश की गयी बिना उस जीवन को बारीकी़ से देखे जिसमें वह लेखन मौजूद था जो ऑस्मंड ब्रिनिलसन के अनुसार ‘उस मूढ़ फ़लसफे़ का अनवरत विखण्डन था।’ हिटलर से एक प्रेमी मुलाका़त समेत जिसके बाद हाम्सन हिटलर की बॉल्कनी पर जाकर जा़र-जा़र रोने लगे थे। हाम्सन के पूरे जीवन में ऐसा क्या हो सकता था जिससे उनके नात्जी़ होने का आभास मिलता हो ? नार्वे में हिलटर के कॉमिसार तर्बोफ़न से कई बार वे नार्वीजी नौजवानों की जान बचाने अपील करने जाया करते थे। वे इस हद तक खुद को जोखिम में डाल तर्बोफ़न और बाद में हिटलर तक से उलझ बैठे थे कि अन्तत: उनके लिए पूरी तरह बेकार सिद्ध हुए। आट्ले शिट्टाँग हाम्सन पर अपनी पुस्तक बयार हवा कुछ नहीं में लिखते हैं कि प्रतिक्रियावादी हाम्सन ने नात्जी़ और ग़द्दार हाम्सन तक कोई सीधी लकीर नहीं है। आप बेकार में यहूदियों के प्रति घृणा और जातिवाद के संकेत हाम्सन में ढूंढ़ने लगते हैं...हाम्सन के प्रसंग में विचारधारा एक तरह की अचेतन वाणी है-निरपेक्ष की एक ऐसी ज़रूरत जिसमें वे खुद को प्रतिबिम्बित कर सकते।

 नार्वीजी लेखक ऑक्सेल साँदेमूसे हाम्सन को हाम्सन के बावजूद वापिस चाहते हैं, अपनी वृद्धावस्था में जो कुछ वे कर गुज़रे उसके बावजूद। ‘हम कोई बहाने नहीं बनाना चाहते, न हाम्सन को बरी करना चाहते हैं-ऐसा करने से हाम्सन का उतना ही अपमान होगा, जितना कि उन पर फै़सला सुनाना...यह हक लेखकों के सिवा किसी का नहीं है। जब आलोचक हाम्सन में सत्तावाद के चिह्न ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं, वह प्रकृति की दुर्बोध सम्मोहकता को लक्ष्य करते हैं-किसी चरित्र द्वारा सरल जीवन की ऐसी परिकल्पना में जो समकालीन जीवन की धन-लोलुपता और आपाधापी से बहुत परे हो। समस्या सिर्फ इतनी है कि हाम्सन में लिखा हुआ जीवन क़तई सरल नहीं है स्वप्न और भाषा की सम्मोहकता में लगभग हमेशा नैराश्य और मोहभंग के कूट दिखायी देते हैं। पान का ग्रीष्म-सूर्य, नूर्रलाँड के लोगों पर दिन-रात चमकता है, फिर भी वे अबूझ हैं, रहस्यों से सराबोर, और अपनी ही छायाओं से लड़कर खुद को खा़क किये दे रहे हैं, जबकि जंगल में प्रकृति देव पान की सरसराहट के सहारे ही आप इस उपन्यास को पढ़ रहे होते हैं।

यह उपन्यास उत्तरी नार्वे की ग्रीष्म ऋतु के अमिट सूर्य में लिखा गया है, उसी मनस्थिति में जिसमें शायद किशोर हाम्सन पशु चराते समय पीठ के बल लेट कर अपनी तर्जनी से आसमान पर अपना नाम लिखा करते थे। हमें यह तो नहीं मालूम कि जिस समय हाम्सन यह अचरज कर रहे थे कि क्या उन्होंने मरुस्थल में बहुत ज़ोर से पुकार लगायी है, उनकी पॉलिटिक्स क्या थी। लेकिन यह उसी समय की बात है, और प्रसंग भी वही है जब उन्होंने यह ख़्वाहिश जा़हिर की थी कि वे कोई ‘और ही रास्ता अपनाना चाहेंगे, कुछ ऐसे धीर-धरे शब्दों से जो खिड़कियों के सामने से छाया की तरह गुज़र जायें।’


आभार

 


1920 के नोबेल पुरस्कार विजेता क्नूत हाम्सन के उपन्यास का यह हिन्दी अनुवाद उनकी पचासवीं बरसी पर उन्हें अकी़दत से याद करते हुए प्रकाशित किया जा रहा है।
अनुवाद के लिए आँशिक वित्तीय सहयोग ऑस्लो में स्थित नॉर्ला नामक साहित्यिक संस्था से प्राप्त हुआ है। हम यींलदॉल प्रकाशन के भी आभारी हैं जिन्होंने हिन्दी अनुवाद छापने की अनुमति सहर्ष हमें दी।

स्वीडी उपन्यासकार लार्श ऐण्डर्सन हाम्सन के जीवन और कृतित्व के बारे में पिछले कई साल से अपने भारतीय मित्रों से गुप्त़गू करते आये हैं। मूल नॉर्वीजी से पूरे उपन्यास का हिन्दी से मिलान करवाने के लिए हम उनके शुक्रगुज़ार हैं।
युवा कलाकार सीरज पान के आवरण को बड़े धीरज से बार-बार बना-मिटा कर देख रहे थे। और आख़िरकार जब उत्सुक को उपन्यास का पान-देव सूझ गया तो बात बन गयी।
स्वीडी कवि टोमास ट्रांस्ट्रोमर के भरोसे हम राबर्ट ब्लाय द्वारा भूख के अंग्रेजी अनुवाद के उत्तराभिलेख में से हाम्सन की संक्षिप्त जीवनी का एक अंश मैत्रीभाव से ले रहे हैं।


Acknowledgements

 

 


We’re grateful to NORLA (Norwegian Literature Abroad), based in Oslo, for the assistance they graciously offered to us for publishing the Hindi translation of Knut Hamsun’s novel PAN on the occasion of his fiftieth death anniversary in 2002.

We thank the Norwegian publishing house Glydendal Norsk Forlag, based in Oslo, for happily granting us the permission to produce this work in Hindi.

We’re indebted to Swedish novelist Lars Andersson who has, for many years, been sharing his passion for Knut Hamsun with his Indian friends. He helped us tally the translation with the original in Norwegian, word for word.

Siiraj Saxena fussed painstakingly over the cover and when Utsuk suddenly produced the colorful god in bright crayons after discussing the mood of the novel with the translator, Siiraj could not help saying yes to it right away.

Assuming in grateful anticipation that our esteemed friend, the Swedish  poet Tomas Transtromer, would take the responsibility for letting us use a fragment of Robert Bly’s afterword that appears in the English translation of HUNGER, we turn it into an after word to the Hindi PAN.

 

Teji Grover (translator)
Arun Maheshwari (publisher)    

 


1
पान

 


इधर कुछ दिनों से मैं नूर्रलाँड़ की गर्मियों के अन्तहीन दिन के बारे में बराबर सोचता रहा हूँ। यहाँ बैठा मैं उसके बारे में सोचता रहता हूँ, और उस कुटिया के बारे में, और कुटिया के पीछे के जंगल के बारे में, और सिर्फ़ अपना जी बहलाने और समय बिताने के लिए, मैं यह सब लिखने लगा हूँ। समय बिताये नहीं बीतता, जितनी तेजी़ से मैं चाहता हूँ, हालाँकि मुझे कोई चिन्ता नहीं है और मेरी  ज़िन्दगी काफी़ जिन्दादिल क़िस्म की है। मैं हर चीज़ से काफी सन्तुष्ट हूँ और फिर तीस बरस की उम्र कोई खास उम्र भी नहीं है। अभी कुछ ही दिन पहले मुझे कहीं दूर से किसी पक्षी के दो पंख भेजे गये थे, किसी ऐसे शख़्स द्वारा जिसे ऐसा करने की कतई ज़रूरत नहीं थी, सिर्फ दो हरे पंख कागज़ के एक मुहरबन्द पन्ने में लिपटे हुए, जिस पर एक किरीट का चित्र था। मुझे इतने शैतान हरे रंग के पंखों को देखकर बहुत मज़ा आया था। और कोई कष्ट भी नहीं था मुझे, बस कभी-कभार बायें पैर में हल्के से गठिये के अलावा, जो गोली की एक पुरानी चोट की वजह से था, जो कब की ठीक हो चुकी थी।

मुझे याद है कि दो साल पहले समय अधिक तेज़ी से गुज़रता था, अब से कहीं ज़्यादा तेज़ी से। गर्मियों के ख़त्म होने का मुझे पता भी नहीं चलता था। दो साल पहले 1855 में मैं सिर्फ़ जी बहलाने के लिए इसके बारे में लिखना चाहता हूँ-मेरे साथ कुछ हुआ या फिर शायद मैंने सिर्फ सपना देखा होगा। उन दिनों के दौरान हुई काफी़ चीज़ें मैं अब भूल चुका हूँ, क्योंकि तब से मैंने उनके बारे में कुछ ख़ास सोचा नहीं है। लेकिन मुझे याद है रातें काफ़ी सफ़ेद हुआ करती थीं। कई चीज़ें मुझे काफ़ी अजीब लगा करती थीं, साल में बारह ही महीने होते थे, लेकिन रात दिन में बदल जाया करती थी और आसमान में एक भी तारा दिखायी नहीं देता था। जिन लोगों से में मिलता था, वे भी बहुत अजीब थे, और उन लोगों से बिलकुल भिन्न जिनसे मैं अब तक वाकिफ़ था।

कभी-कभी बचपन से सीधे अपने पूरे जोबन पर खिल उठने के लिए इन लोगों के लिए एक ही रात काफ़ी होती थी। इसमें कोई तिलिस्म नहीं था, लेकिन मैं ऐसी किसी चीज़ से इससे पहले कभी वाकिफ़ नहीं था।
समुद्र के किनारे एक बड़े और सफ़ेद कलई पुते घर में मैं किसी से मिला था जो कुछ समय के लिए मेरे ख़्यालों में बस गयी थी। वह हमेशा मेरी स्मृति में नहीं रहती, अब नहीं-नहीं मैं उसे क़रीब क़रीब भूल चुका हूं। लेकिन बाक़ी सब मुझे याद है। समुद्री पक्षियों, की आवाज़ें जंगल में शिकार, मेरी रातें और गर्मियों की वे सभी तपती हुई घड़ियाँ। यूँ भी मैं महज़ इत्तेफ़ाक से उसे मिला था। और अगर वह इत्तेफ़ाक न होता तो वह एक दिन भी मेरे ख़्यालों में न रही होती।

अपनी झोपड़ी से मैं द्वीपों, चट्टानों और समुद्री चट्टानों की घालमेल देख सकता था, ज़रा-सा समुद्र और नीली रंगत लिए कुछ शिखर, और झोपड़ी के पीछे जंगल फैला था, एक विशाल जंगल। मैं खुशी और कृतज्ञता से भर उठता था जड़ों और पत्तों की गन्ध से, और देवदार के पेड़ों की गरिष्ठ चर्बीली खुशबू से जो मज्जा की गन्ध जैसी हुआ करती थी। बस जंगल ही में मेरे भीतर सब शान्त हो पाता था, मेरी आत्मा को चैन और तक़्वियत नसीब होती थी। हर रोज ईसप को साथ लिए मैं पहाड़ियों में चढ़ जाता था, और कोई इच्छा नहीं थी मेरी सिवा इसके कि एक से दूसरे रोज़ मुझे वहां जाने दिया जाए, बावजूद इसके कि ज़मीन अभी तक हिम और कोमल बर्फ से ढकी थी। ईसप ही मेरा एक मात्र साथी था, मेरा कुत्ता जिसे बाद में मैंने गोली से उड़ा दिया था।

दिन भर शिकार करने के बाद शाम झोपड़ी में लौट आने पर अक़्सर घर लौटने का सुखद अहसास मेरे पूरे जिस्म में दौड़ जाया करता था। मैं भीतरी सुख से काँप काँप जाता था और जाकर ईसप से गपियाता था कि क्या मज़े की ज़िन्दगी है हमारी। जो अब हम आग जलायेंगे और एक चिड़िया भूनेंगे, मैं कहा करता था। तुम क्या कहते हो ? और जब यह काम निपट जाता, और हम दोनों खा चुकते, ईसप अलाव के पीछे अपने ठिकाने की ओर सरक जाता था, और मैं पाइप जलाकर अपने तख़त पर लेटकर जंगल की नि:शब्द सरसराहट सुना करता था। हल्की सी हवा थी हवा सीधी झोंप़डी पर बजती थी, और पिछली पहाड़ियों से दूर कहीं से तीतर की आवाज़ आती रहती थी। अलावा इसके, सब शान्त था।
और कई बार मैं वही पड़े-पड़े सो जाया करता था, पूरे कपड़े पहने, और तब तक नहीं उठता था, जब तक समुद्री पक्षी चिल्लाना शुरू नहीं कर देते थे। फिर जब मैं खिड़की से बाहर देखता था, तो ट्रेडिंग स्टेशन की सफ़ेद इमारतें दिखायी देती थीं, जहाँ सिरिलुँड का सामान उतरता था, उस दुकान का जहाँ से मैं अपनी डबलरोटी खरीदता था, और मैं कुछ देर वहीं पड़ा रहता था, इस बात पर विस्मित कि मैं नूर्रलाँड की एक झोपड़ी में पड़ा हुआ हूँ, एक जंगल के किनारे।

फिर अलाव के क़रीब से ईसप अपनी लम्बी, दुबली देह को हिलाया करता था, अपना कॉलर खनखनाते हुए वह उबासी लेता था और दुम हिलाता था, और मैं तीन-चार घण्टे की नींद के बाद उठ बैठता था, तरोताज़ा और हर चीज़ से प्रसन्न, हर शाम से।
कई रातें यूँ ही बीत गयीं।


2

 


बारिश हो या आँधी चले-इन चीज़ों से कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता बारिश के किसी दिन अक़्सर एक छोटा-सा सुख आपको घेर लेता है, जिसके रहते आप अपनी ही किसी ख़ुशी में सिमट जाते हैं। आप खड़े-खड़े अपने ठीक सामने देखने लगते हैं बीच-बीच में हल्का सा मुस्कराते और चारों ओर देखते हुए। आप क्या सोच रहे होते हैं ? खिड़की का साफ़ काँच, काँच पर धूप की एक किरण, उसके पार एक छोटी सी नदी का दृश्य और शायद आसमान में नीले की एक छवि। ज़रूरी नहीं कि इससे ज़्यादा कुछ हो।
किन्हीं अन्य घड़ियों में असाधारण घटनाएँ भी व्यक्ति को नीरस और उदास मन: स्थिति से उबार नहीं पाती हैं नृत्य-कक्ष के बीचोंबीच कोई पूर्णतया: निस्पन्द उदासीन और निरावेग बैठा रह सकता है। क्योंकि ग़म और ख़ुशी के स्रोत हमारे भीतर ही रहा करते हैं।

एक दिन की बात मुझे ख़ास याद है जब मैं समुद्र तट पर चला आया था। मैं बारिश में फंस गया था और एक खुले हुए नाव-घर के भीतर जाकर बैठ गया था। मैं सिर्फ़ अपने लिए गुनगुनाने लगा था, लेकिन बिना किसी ख़ुशी के, बस समय बिताने के लिए। ईसप मेरे साथ था और बैठा-बैठा सुन रहा था, मैंने भी गुनगुनाना बन्द करके सुनना शुरू कर दिया। बाहर आवाज़ें सुनायी दे रही हैं और आहट सुनायी पड़ती है, महज एक संयोग और बिल्कुल स्वाभाविक। दो आदमियों और एक लड़की का समूह मेरी ओर लड़खड़ाता चला आता है। वे एक-दूसरे से चिल्लाकर हँसते हुए कहते हैं जल्दी आओ ! हम यहाँ कुछ देर पनाह ले सकते हैं।’
मैं उठकर खड़ा हो गया।

एक आदमी सफ़ेद कमीज़ पहने था जिसके अगले हिस्से पर कलफ़ नहीं थी और जो अब बारिश में पिचपिचा कर झूलने लगा था। गीली कमीज़ के इस हिस्से पर हीरे की एक पिन थी। पाँव में लम्बे, नुकीले जूते थे जो कुछ भड़कीले से लगते थे। मैंने उन सबका अभिवादन किया। वे श्रीमान् माक थे, व्यापारी। मुझे उनकी याद उस दुकान से थी जहाँ से मैं डबलरोटी ख़रीदा करता था। उन्होंने मुझे अपने घर आने का न्यौता भी दिया था किसी समय, लेकिन मैं अभी तक गया नहीं था।
‘अहा, तो फिर मुलाकात हो रही है हमारी’, मुझे देखते ही उन्होंने कहा। हम लोग चक्की की ओर जा रहे थे लेकिन आधे रास्ते ही लौटना पड़ा। क्या मौसम है, नहीं ? तो कहिए लेफ्टिनेट साहब आप कब तशरीफ़ ला रहे हैं सिरिलुँड़ ? उन्होंने अपने साथ आये काली दाढ़ी वाले उस नाटे आदमी से मेरा परिचय करवाया, जो गिरजे के उपभवन के क़रीब रहता था।
लड़की के चेहरे से पर्दा ज़रा-सा हटाया और धीमी आवाज़ में ईसप से बातें करने लगी। मेरा ध्यान उसकी जैकेट की ओर गया और अस्तर और काजों से मैंने अन्दाज़ा लगाया कि वह रँगी गयी है। श्रीमान् माक ने उसका परिचय भी मुझसे करवाया। वह उनकी बेटी एद्वार्दा थी।

एद्वार्दा ने अपने पर्दे के भीतर से मुझे देखा और फिर कुत्ते से वैसे ही खुसरपुसर करती रही। कुत्ते के कॉलर पर नाम पढ़ कर वह बोली, तो तुम्हें ईसप कहते हैं, नहीं ?...डॉक्टर, यह ईसप कौन था ? मुझे सिर्फ़ इतना याद है कि वह नीतिकथाएँ लिखता था। क्या वह फ़्रिजिया से नहीं था ?-नहीं, मुझे पता नहीं है।’
बच्ची है, स्कूल में पढ़ने वाली लड़की। मैंने उसे देखा, वह लम्बी थी लेकिन उसका शरीर भरा नहीं था। पन्द्रह सोलह की रही होगी, लम्बे भूरे हाथ थे उसके, दस्ताने नहीं थे। हो सकता है ईसप वह उसी दोपहर किसी इन्साइक्लोपीडिया में देखकर आयी हो।

श्रीमान माक ने मुझे शिकार के बारे में पूछा। मैं अधिकतर किस चीज़ का शिकार करता था ? मैं उनकी कश्ती का किसी भी दिन उपयोग कर सकता था मुझे बताना भर होगा उन्हें। जब वे लोग जाने लगे तो मैंने देखा कि डॉक्टर हल्का सा लँगड़ाता था और छड़ी का इस्तेमाल करता था।
मैं उसी ख़ालीपन से घर की ओर चलने लगा जिसमें मैं था, बिना किसी उत्साह के गुनगुनाता हुआ। नाव-घर में उस मुलाक़ात का मुझ पर कोई ख़ास असर नहीं था। मुझे इस पूरे प्रसंग में जो चीज़ बखू़बी याद रही वह श्रीमान् माक की भीगी कमीज़ थी जिस पर हीरे की पिन थी, जो साथ भीग गयी थी और कोई ख़ास शानदार भी नहीं थी।





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