निर्मला - प्रेमचंद Nirmala - Hindi book by - Premchand
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निर्मला

प्रेमचंद

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3029
आईएसबीएन :9788122204957

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हिन्दू समाज में स्त्री के स्थान का सशक्त चित्रण....

Nirmala

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रेमचन्द्र की गणना हिन्दी के निर्माताओं में की जाती है। कहानी और उपन्यास के क्षेत्रों में उन्होंने पहली सफल रचनाएँ दीं जो गुण तथा आकार दोनों दृष्टियों से अन्यतम हैं।

महिला-केन्द्रित साहित्य के इतिहास में इस उपन्यास का विशेष स्थान है। इस उपन्यास की मुख्य पात्र १५ वर्षीय सुन्दर और सुशील लड़की है। निर्मला नाम की लड़की का विवाह एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति से कर दिया जाता है। जिसके पूर्व पत्नी से तीन बेटे हैं--

‘निर्मला का प्रेमचन्द के उपन्यासों की कड़ी में महत्तवपूर्ण स्थान है। इसकी कथा के केन्द्र में निर्मला है, जिसके चारों ओर कथा-भवन का निर्माण करते हुए असम्बद्ध प्रसंगों का पूर्णतः बहिष्कार किया गया है। इससे यह उपन्यास सेवासदन से भी अधिक सुग्रंथित एवं सुसंगठित बन गया है। इसे प्रेमचन्द का प्रथम ‘यथार्थवादी’ तथा हिन्दी का प्रथम ‘मनोवैज्ञानिक उपन्यास’ कहा जा सकता है। निर्मला का एक वैशिष्ट्य यह भी है कि इसमें ‘प्रचारक प्रेमचन्द’ के लोप ने इसे ने केवल कलात्मक बना दिया है, बल्कि प्रेमचन्द के शिल्प का एक विकास-चिन्ह भी बन गया है।’ -डा० कमल किशोर गोयका


निर्मला

यों तो बाबू उदयभानुलाल के परिवार में बीसों ही प्राणी थे, कोई ममेरा भाई था, कोई फुफेरा, कोई भांजा था, कोई भतीजी, लेकिन यहाँ हमें उनसे कोई प्रयोजन नहीं। वह अच्छे वकील थे, लक्ष्मी प्रसन्न थीं और कुटुम्ब के दरिद्र प्राणियों को आश्रय देना उनका कर्तव्य ही था। हमारा सम्बन्ध तो केवल उनकी दो कन्याओं से है, जिनमें से बड़ी का नाम निर्मला और छोटी का नाम कृष्णा था। अभी कल दोनों साथ-साथ गुड़िया खेलती थीं। निर्मला का पन्द्रहवाँ साल था, कृष्णा का दसवाँ, फिर उनके स्वाभाव में कोई विशेष अन्तर न था। दोनों चंचल, खिलाड़िन और सैर-तमाशे पर जान देती थीं। दोनों गुड़िया का धूमधाम से ब्याह करती थी, सदा काम से जी चुराती थीं। माँ पुकारती रहती थी पर दोनों कोठे पर छिपी बैठी रहती थीं कि न जाने किस काम के लिये बुलाती हैं। दोनों अपने भाइयों से लड़ती थीं, नौकरों को डाँटती थीं और बाजे की आवाज सुनते ही द्वार पर आकर खड़ी हो जाती थी। पर आज एकाएक एक ऐसी बात हो गई है, जिसने बड़ी को बड़ी और छोटी को छोटी बना दिया है। कृष्णा वही है, पर निर्मला बड़ी गंभीर, एकान्त- प्रिय और लज्जाशील हो गई है।

इधर महीनों से बाबू उदयभानुलाल निर्मला के विवाह की बातचीत कर रहे थे। आज उनकी मेहनत ठिकाने लगी है। बाबू भालचन्द्र सिनहा के ज्येष्ठ पुत्र भुवन मोहन सिनहा से बात पक्की हो गई है। वर के पिता ने कह दिया है कि आपकी खुशी हो दहेज दें या न दें मुझे इसकी परवाह नहीं है; हाँ बारात में जो लोग जायँ उनका आदर सत्कार अच्छी तरह होना चाहिए, जिसमें मेरी और आपकी जगहँसाई न हो। बाबू उदयभानुलाल थे तो वकील पर संचय करना न जानते थे। दहेज उनके सामने कठिन समस्या थी। इसलिए जब वर के पिता ने स्वयं कह दिया कि मुझे दहेज की परवाह नहीं तो मानो उन्हें आँखें मिल गईं। डरते थे, न जाने किस- किस के सामने हाथ फैलाना पड़े, दो-तीन महाजनों को ठीक कर रखा था।

उसका अनुमान था कि हाथ रोकने पर भी बीस हजार से कम खर्च न होंगे। यह आश्वसन पाकर वे खुशी के मारे फूले न समाये।
इसकी सूचना ने अज्ञान बालिका को मुँह ढाँप कर एक कोने में बिठा रखा है। उसके ह्रदय में एक विचित्र शंका समा गई है, रोम-रोम में एक अज्ञात भय का संचार हो गया है -न जाने क्या होगा ? उसके मन मे उमंगें नहीं है, जो युवतियों की आँखों में तिरछी चितवन बन कर, ओठों पर मधुर हास्य बन कर और अंगों में आलस्य बनकर प्रकट होती है। नहीं, वहाँ अभिलाषाएँ नहीं है; वहां केवल शंकाएँ, चिंताएँ और भीरु कल्पनाएँ हैं। यौवन का अभी तक पूर्ण प्रकाश नहीं हुआ है।
कृष्णा कुछ-कुछ जानती है, कुछ-कुछ नहीं जानती। जानती है, बहिन को अच्छे-अच्छे गहने मिलेंगे, द्वार पर बाजे बजेंगे, मेहमान आयेंगे, नाच होगा-यह जानकर प्रसन्न है; और यह भी जानती है कि बहिन सब के गले मिलकर रोयेगी, यहाँ से रो धोकर विदा हो जायगी; मैं अकेली रह जाऊँगी-यह जानकर दुःखी है। पर यह नहीं जानती कि यह सब किस लिए हो रहा है। माताजी और पिता जी क्यों बहिन को घर से निकालने को इतने उत्सुक हो रहे हैं। बहिन ने तो किसी को कुछ नहीं कहा, किसी से लड़ाई नहीं की क्या इसी तरह एक दिन मुझे भी ये लोग निकाल देंगे ? मैं भी इसी तरह कोने में बैठकर रोऊँगी और किसी को मुझ पर दया न आयेगी ? इसलिए वह भयभीत भी है।

सन्ध्या का समय था, निर्मला छत पर जाकर अकेली बैठी आकाश की ओर तृषित नेत्रों से ताक रही थी। ऐसा मन होता है कि पंख होते तो वह उड़ जाती और इन सारे झंझटों से छूट जाती। इस समय बहुधा दोनों बहिनें कहीं सैर करने जाया करती थीं। बग्घी खाली न होती, तो बगीचे ही में टहला करती। इसलिए कृष्णा उसे खोजती फिरती थी। जब कहीं न पाया, तो छत पर आई और उसे देखते ही हँसकर बोली-तुम यहाँ आकर छिपी बैठी हो और मैं तुम्हें ढूँढती फिरती हूँ। चलो बग्घी तैयार कर आयी हूँ।

निर्मला ने उदासीन भाव से कहा, तू जा, मैं न जाऊंगी।
कृष्णा- नहीं मेरी अच्छी दीदी, आज जरूर चलो। देखो, कैसी ठण्डी-ठण्डी हवा चल रही है।
निर्मला-मेरा मन नहीं चाहता, तू चली जा।
कृष्णा की आँखें डबडबा आईं। काँपती हुई आवाज से बोली-आज तुम क्यों नहीं चलतीं ? मुझसे क्यों नहीं बोलतीं ? क्यों इधर-उधर छिपी-छिपी फिरती हो ? मेरा जी अकेले बैठे-बैठे घबड़ाता है। तुम न चलोगी, तो मैं भी न जाऊंगी। यहीं तुम्हारे साथ बैठी रहूँगी।

निर्मला-और जब मैं चली जाऊंगी, तब क्या करोगी ? तब किसके साथ खेलोगी, किसके साथ घूमने जायेगी, बता ?
कृष्णा-मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगी। अकेले मुझसे यहाँ न रहा जायगा।
निर्मला मुस्कुराकर बोली-तुझे अम्मा न जाने देंगीं।
कृष्णा- तो मैं भी तुम्हें न जाने दूंगी। तुम अम्मा से कह क्यों नहीं देतीं कि मैं न जाऊंगी ?
निर्मला-कह तो रही हूं, कोई सुनता है ?
कृष्णा-तो क्या यह तुम्हारा घर नहीं है ?
निर्मला-नहीं, मेरा घर होता तो कोई क्यों जबर्दस्ती निकाल देता ?
कृष्णा-इसी तरह किसी दिन मैं भी निकाल दी जाऊंगी ?
निर्मला-और नहीं क्या तू बैठी रहेगी ! हम लड़कियां हैं, हमारा घर कहीं नहीं होता।
कृष्णा-चन्दर भी निकाल दिया जायगा ?
निर्मला-चन्दर तो लड़का है, उसे कौन निकालेगा ?
कृष्णा-तो लड़कियां बहुत खराब होती होंगी ?
निर्मला-खराब न होतीं तो घर से भगाई क्यों जातीं ?

कृष्णा-चन्दर इतना बदमाश है, उसे कोई नहीं भगाता। हम-तुम तो कोई बदमाशी नहीं करती।
एकाएक चन्दर धम-धम करता हुआ छत पर आ पहुँचा और निर्मला को देखकर बोला-अच्छा ! आप यहां बैठी हैं। ओहो ! अब तो बाजे बजेंगे, दीदी दूल्हन बनेंगी, पालकी पर चढ़ेंगी ओहो ! ओहो !
चन्दर का पूरा नाम चन्द्रभानु सिनहा था। निर्मला से तीन साल छोटा और कृष्णा से दो साल बड़ा।
निर्मला-चन्दर, मुझे चिढ़ाओगे तो अभी जाकर अम्मा से कह दूँगी।
चन्द्र-तो चिढ़ती क्यों हो ? तुम भी बाजे सुनना। ओ हो-हो। अब आप दूल्हन बनेंगी ! क्यों किशनी, तू बाजे सुनेगी न ? वैसे बाजे तूने कभी न सुने होंगे।
कृष्णा-क्या बैण्ड से भी अच्छे होंगे ?

चन्द्र-हाँ हाँ, बैण्ड से भी अच्छे, हजार गुने अच्छे, लाख गुने अच्छे,। तुम जानो क्या ? एक बैण्ड सुन लिया तो समझने लगीं कि उससे अच्छे बाजे नहीं होते। बाजे बजाने वाले लाल-लाल वर्दियाँ और काली काली टोपियाँ पहने होंगे। ऐसे खूबसूरत मालूम होंगे कि तुमसे क्या कहूँ ! आतिशबाजियाँ भी होंगी, हवाइयाँ आसमान में उड़ जायेंगी और वहां तारों में लगेंगी तो लाल, पीले, हरे, नीले, तारे टूट-टूटकर गिरेंगे। बड़ा मजा आयेगा।
कृष्णा-और क्या-क्या होगा चन्दर, बता दे मेरे भैया।
चन्द्र-मेरे साथ घूमने चल तो रास्ते में सारी बातें बता दूं। ऐसे-ऐसे तमाशे होंगे कि देखकर तेरी आँखें खुल जायेंगी। हवा में उड़ती हुई परियाँ होंगी, सचमुच की परियाँ।
कृष्णा-अच्छा चलो, लेकिन न बताओगे तो मारूँगी।

चन्द्रभानु और कृष्णा चले गये, निर्मला अकेली बैठी रह गई। कृष्णा के चले जाने से इस समय उसे बड़ा क्षोभ हुआ। कृष्णा, जिसे वह प्राणों से भी अधिक प्यार करती थी, आज इतनी निठुर हो गई। अकेली छोड़कर चली गई ! बात कोई न थी, लेकिन दुःखी ह्रदय दुखती हुई आंख है, जिसमें हवा से भी पीड़ा होती है। निर्मला बड़ी देर तक बैठी रोती रही। भाई -बहन माता-पिता, सभी इसी भाँति मुझे भूल जायेंगे, सब की आँखें फिर जायँगी, फिर शायद इन्हें देखने को भी तरस जाऊँ।
बाग में फूल खिले हुए थे। मीठी-मीठी सुगन्ध आ रही थी। चैत की शीतल मन्द समीर चल रही थी। आकाश में तारे छिटके हुए थे। निर्मला इन्हीं शोक मय विचारों में पड़ी-पड़ी सो गई और आँख लगते ही उसका मन स्वप्न-देश में विचरने लगा। क्या देखती है कि सामने एक नदी लहरें मार रही है और वह नदी के किनारे नाव की बाट देख रही है। सन्ध्या का समय है। अँधेरा किसी भयंकर जन्तु की भाँति बढ़ता चला आता है।

वह घोर चिंता में पड़ी हुई है कि कैसे यह नदी पार होगी, कैसे घर पहुँचूँगी। रो रही है कि कहीं रात हो जाये, नहीं तो मैं अकेली यहाँ कैसे रहूँगी। एकाएक उसे एक सुन्दर नौका घाट की ओर आते दिखाई देती है। वह खुशी से उछल पड़ती है और ज्योंही नाव घाट पर आती है, वह उस पर चढ़ने के लिए बढ़ती है लेकिन ज्योंही नाव के पटरे पर पैर रखना चाहती है, उसका मल्लाह बोल उठता है-तेरे लिए यहाँ जगह नहीं है ! वह मल्लाह की खुशामद करती है, उसके पैरों पड़ती है, रोती है लेकिन वह यह कहे जाता है, तेरे लिए यहाँ जगह नहीं है। एक क्षण में नाव खुल जाती है। वह चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगती है। नदी के निर्जन तट पर रात भर कैसे रहेगी, यह सोच वह नदी में कूद कर उस नाव को पकड़ना चाहती है कि इतने में कहीं से आवाज आती है-ठहरो, ठहरो, नदी गहरी है, डूब जाओगी। वह नाव तुम्हारे लिए नहीं है। मैं आता हूँ, मेरी नाव पर बैठ जाओ। मैं उस पार पहुँचा दूँगा। वह भयभीत होकर इधर-उधर देखती है कि यह आवाज कहां से आई। थोड़ी देर के बाद एक छोटी-सी डोंगी आती दिखाई देती है। उसमें न पाल है, न पतवार, और न मस्तूल। पेंदा फटा हुआ है, तख्ते टूटे हुए, नाव में पानी भरा हुआ है, और एक आदमी उसमें पानी उलीच रहा है।

वह उससे कहती है, यह तो टूटी हुई है, यह कैसे पार लगेगी ? मल्लाह कहता है-तुम्हारे लिए यही भेजी गई है, आकर बैठ जाओ ! वह एक क्षण सोचती है- इसमें बैठूँ या न बैठूँ ? अन्त में वह निश्चय करती है बैठ जाऊं। यहाँ अकेली पड़ी रहने से नाव में बैठ जाना फिर भी अच्छा है। किसी भयंकर जन्तु के पेट में जाने से तो अच्छा ही है। कि नदी में डूब जाऊँ। कौन जाने, नाव पार पहुँच ही जाये। यह सोचकर वह प्राणों को मुट्ठी में लिए हुए नाव पर बैठ जाती है। कुछ देर तक नाव डगमगाती हुई चलती है, लेकिन प्रतिक्षण उसमें पानी भरता जाता है। वह भी मल्लाह के साथ दोनों हाथों से पानी उलीचने लगती है। यहाँ तक की उनके हाथ रह जाते हैं, पर पानी बढ़ता ही चला जाता है, आखिर नाव चक्कर खाने लगती है, मालूम होता है- अब डूबी, अब डूबी। तब वह किसी अदृश्य सहारे के लिए हाथ फैलाती है, नाव नीचे से खिसक जाती है और उसके पैर उखड़ जाते हैं। वह जोर से चिल्लाई और चिल्लाते ही उसकी आँख खुल गई। देखा तो माता सामने खड़ी उसका कन्धा पकड़ हिला रही थीं।


(2)



बाबू उदयभानुलाल का मकान बाजार बना हुआ है। बरामदे में सुनार के हथौड़े और कमरे में दर्जी की सूईयाँ चल रही हैं। सामने नीम के नीचे बढ़ई चारपाइयाँ बना रहा है। खपरैल में हलवाई के लिए भट्टा खोदा गया है। मेहमानों के लिए अलग मकान ठीक किया गया है। यह प्रबन्ध किया जा रहा है कि हरेक मेहमान के लिए एक-एक चारपाई, एक-एक कुर्सी और एक-एक मेज हो। हर तीन मेहमानों के लिए एक-एक कहार रखने की तजवीज हो रही है। अभी बारात आने में एक महीने की देर हैं। लेकिन तैयारियाँ अभी से हो रही हैं। बारातियों का ऐसा सत्कार किया जाय कि किसी को जबान हिलाने का मौका न मिले। वे लोग भी याद करें कि किसी के यहाँ बारात में गये थे। एक पूरा मकान बर्तनों से भरा हुआ है। चाय के सेट हैं, नाश्ते की तश्तरियाँ, थाल, लोटे, गिलास। जो लोग नित्य खाट पर पड़े हुक्का पीते रहते थे, बड़ी तत्परता से काम में लगे हुए हैं। अपनी उपयोगिता सिद्ध करने का ऐसा अच्छा अवसर उन्हें फिर बहुत दिनों के बाद मिलेगा। जहाँ एक आदमी को जाना होता है, पाँच दौड़ते हैं। काम कम होता है, हुल्लड़ अधिक। जरा-जरा सी बात पर घण्टों तर्क-वितर्क होता है और अन्त में वकील साहब को आकर निर्णय करना पड़ता है। एक कहता है, यह घी खराब है, दूसरी कहता है, इससे अच्छा बाजार में मिल जाए तो टाँग की राह से निकल आऊं। तीसरा कहता है, इसमें तो हीक आती है। चौथा कहता है, तुम्हारी नाक ही सड़ गई है, तुम क्या जानों घी किसे कहते हैं। जब से यहाँ से आये हो, घी मिलने लगा है, नहीं तो घी के दर्शन भी न होते थे ! इस पर तकरार बढ़ जाती है और वकील साहब को झगड़ा चुकाना पड़ता है।

रात के नौ बजे थे। उदयभानुलाल अन्दर बैठे हुए खर्च का तखमीना लगा रहे थे। वह प्रायः रोज ही तखमीना लगाते थे; पर रोज ही उसमें कुछ-न-कुछ परिवर्तन और परिवर्धन करना पड़ता था। सामने कल्याणी भौंहें सिकोड़े हुए खड़ी थी। बाबू साहब ने बड़ी देर के बाद उठाया और बोले-दस हजार से कम नहीं होता, बल्कि शायद और बढ़ जाय।
कल्याणी-दस दिन में पाँच हजार से दस हजार हुए। एक महीने में तो शायद एक लाख की नौबत आ जाय।

उदयभानु-क्या करूँ, जग हँसाई भी तो अच्छी नहीं लगती। कोई शिकायत हुई तो लोग कहेंगे, नाम बड़े दर्शन थोड़े। फिर जब वह मुझसे दहेज एक पाई नहीं लेते तो मेरा भी यह कर्तव्य है कि मेहमानों के आदर-सत्कार में कोई बात उठा न रखूँ।
कल्याणी-जब से ब्रह्या ने सृष्टि रची, तब से आज तक कभी बरातियों को कोई प्रसन्न नहीं रख सका। उन्हें दोष निकालने और निन्दा करने का कोई-न-कोई अवसर मिल ही जाता है। जिसे अपने घर सूखी रोटियाँ भी मयस्सर नहीं, वह भी बारात में जाकर तानाशाह बन बैठता है। तेल खुशबुदार नहीं, साबुन टके सेर का जाने कहाँ से बटोर लाये, कहार बात नहीं सुनते, लालटेनें धुआँ देती है, कुर्सियाँ में खटमल हैं, चारपाइयाँ ढीली हैं, जनवासे की जगह हवादार नहीं। ऐसी-ऐसी हजारों शिकायतें होती रहती हैं। उन्हें आप कहाँ तक रोकियेगा ? अगर यह मौका न मिला, तो और कोई ऐब निकाल लिये जायँगे। भई, यह तेल तो रंडियों के लगाने लायक है, हमें तो सादा तेल चाहिए। जनाब ने यह साबुन नहीं भेजा है, अपनी अमीरी की शान दिखाई है, मानो हमने साबुन देखा ही नहीं। ये कहार नहीं यमदूत हैं, जब देखिये, सिर पर सवार ! लालटेनें ऐसी भेजी हैं कि आँखें चमकने लगती हैं, अगर दस-पाँच दिन इस रोशनी में बैठना पड़े तो आँखें फूट जायँ। जनवासा क्या है, अभागे का भाग्य है, जिस पर चारों तरफ से झोंके आते रहते हैं। मैं तो फिर यही कहूँगी कि बारातियों के नखरों का विचार ही छोड़ दो।

उदयभानु-तो आखिर तुम मुझे क्या करने को कहती हो ?
कल्याणी-कह तो रही हूँ, पक्का इरादा कर लो कि मैं पाँच हजार से अधिक न खर्च करूँगा। घर में तो टका है नहीं, कर्ज ही का भरोसा ठहरा, तो इतना कर्ज क्यों ले कि जिन्दगी में अदा न हो। आखिर मेरे और बच्चे भी तो हैं, उनके लिए भी तो कुछ चाहिए।
उदयभानु-तो आज मैं मरा जाता हूँ ?
कल्याणी-जीने मरने का हाल कोई नहीं जानता।
उदयभानु-तो तुम बैठी यही मनाया करती हो।

कल्याणी-इसमें बिगड़ने की तो कोई बात नहीं। मरना एक दिन सभी को है। कोई यहाँ अमर होकर थोड़े ही आया है। आँखें बन्द कर लेने से तो होने वाली बात न टलेगी। रोज आँखों देखती हूँ, बाप का देहान्त हो जाता है, उसके बच्चे गली-गली ठोकरें खाते फिरते हैं। आदमी ऐसा काम ही क्यों करे ?
उदयभानु ने जलकर कहा-तो अब समझ लूँ कि मेरे मरने का दिन निकट आ गये, यही तुम्हारी भविष्यवाणी है ! सुहाग से स्त्रियों का जी तो ऊबते नहीं सुना था, आज यह नई बात मालूम हुई। रँडापे में भी कोई सुख होगा ही !
कल्याणी-तुमसे दुनिया की कोई भी बात कही जाती है, तो जहर उगलने लगते हो ! इसलिए न कि जानते हो, इसे कहीं ठिकाना नहीं है, मेरी ही रोटियों पर पड़ी हुई है; या और कुछ ! जहाँ कोई बात कहीं, बस सिर हो गये, मानो मैं घर की लौंडी हूँ, मेरा केवल रोटी और कपड़ें का नाता है। जितना ही मैं दबती हूँ, तुम और भी दबाते हो, मुफ्तखोर माल उड़ायें, कोई मुँह न खोले, शराब कबाब में रुपये लुटें, कोई जबान न हिलाये। वे सारे काँटे मेरे बच्चों ही के सिर तो बोये जा रहे हैं।
उदयभानु-तो मैं क्या तुम्हारा गुलाम हूँ ?

कल्याणी-तो क्या मैं तुम्हारी लौंडी हूँ ?
उदयभानु-ऐसे मर्द और होंगे जो औरतों के इशारों पर नाचते हैं।
कल्याणी-तो ऐसी स्त्रियाँ भी और होंगी जो मर्दों की जूतियाँ सहा करती हैं,
उदयभानु-मैं कमा कर लाता हूँ, जैसे चाहूँ खर्च कर सकता हूँ। किसी को बोलने का अधिकार नहीं।
कल्याणी-तो आप अपना घर सँभालिये ! ऐसे घर को मेरा दूर ही से सलाम है, जहाँ मेरी कोई पूछ नहीं। घर में तुम्हारा जितना अधिकार है, उतना ही मेरा भी। इससे जौ भर भी कम नहीं। अगर तुम अपने मन के राजा हो तो मैं भी अपने मन की रानी हूँ। तुम्हारा घर तुम्हें मुबारक रहे, मेरे लिए पेट की रोटियों की कमी नहीं है, तुम्हारे बच्चे हैं, मारो या जिलाओ। न आँखों से देखूँगी, न पीड़ा होगी। आँखें फूटीं, पीर गई !
उदयभानु-क्या तुम समझती हो कि तुम न सँभालोगी तो मेरा घर ही न सँभलेगा मैं अकेले ऐसे-ऐसे दस घर संभाल सकता हूँ।

कल्याणी-कौन ? अगर आज के महीनवें दिन मिट्टी में न मिल जाय, तो कहना कोई कहती थी।
यह कहते-कहते कल्याणी का चेहरा तमतमा उठा, वह झमककर उठी और कमरे के द्वार की ओर चली। वकील सहाब मुकदमों में तो खूब मीन-मेख निकालते थे, लेकिन स्त्रियों के स्वभाव का उन्हें कुछ यों ही-सा ज्ञान था। यही एक ऐसी विद्या है जिनमें आदमी बूढ़ा होने पर भी कोरा रह जाता है। अगर वे अब भी नरम पड़ जाते और कल्याणी का हाथ पकड़कर बिठा लेते, तो शायद वह रुक जाती। लेकिन आपसे यह तो हो न सका। उल्टे चलते-चलते एक और चरका दिया।
बोले-मैके का घमण्ड होगा ?
कल्याणी ने द्वार पर रुक कर पति की ओर लाल-लाल नेत्रों से देखा और बिफरकर बोली-मैके वाले मेरे तकदीर के साथी नहीं है और न मैं इतनी नीच हूँ कि उनकी रोटियों पर जा पड़ूँ।
उदयभानु-तब कहाँ जा रही हो ?
कल्याणी-तुम यह पूछने वाले कौन हो ? ईश्वर की सृष्टि में असंख्य प्राणियों के लिए जगह है, क्या मेरे ही लिए जगह नहीं है।

यह कह कर कल्याणी कमरे के बाहर निकल गई। आँगन में आकर उसने एक बार आकाश की ओर देखा, तारागण को साक्षी दे रही है कि मैं इस घर से कितनी निर्ययता से निकाली जा रही हूँ। रात के ग्यारह बज गये थे। घर में सन्नाटा छा गया था दोनों बेटों की चारपाई उसी कमरे में रहती थी। वह अपने कमरे में आई, देखा चन्द्रभानु सोया है, सबसे छोटा सूर्यभानु चारपाई पर उठ बैठा है। माता को देखते ही वह बोला-तुम तहाँ दई तीं अम्मा ?
कल्याणी दूर ही से खड़े-खड़े बोली-कहीं तो नहीं बेटा, तुम्हारे बाबूजी के पास गई थी।
सूर्य-तुम तली दई, मुधे अतेले दर लदता ता। तुम त्यों तली दई तीं, बताओं ?
यह कहकर बच्चे ने गोद में चढ़ने के लिए दोनों हाथ फैला दिये। कल्याणी अब अपने को न रोक सकी। मातृ-स्नेह के सुधा प्रवाह से उसका संतप्त ह्रदय परिप्लावित हो गया। ह्रदय के कोमल पौधे, जो क्रोध के ताप से मुरझा गये थे, फिर हरे हो गये। आँखें सजल हो गयीं। उसने बच्चे को गोद उठा लिया और छाती से लगाकर बोली-तुमने पुकार क्यों न लिया, बेटा ?
सूर्य-पुतालता तो ता, तुम थुनती न तीं, बताओं अब तो कबी न दाओगी।
कल्याणी-नहीं भैया, अब नहीं जाऊँगी।

यह कहकर कल्याणी सूर्यभानु को लेकर चारपाई पर लेटी। माँ के ह्रदय से लिपटते ही बालक निःशंक होकर सो गया, कल्याणी के मन में संकल्प-विकल्प होने लगे, पति की बातें याद आतीं तो मन होता-घर को तिलांजलि देकर चली जाऊं। लेकिन बच्चों का मुँह देखती, तो वात्सल्य से चित्त गद्गद हो जाता है। बच्चों को किस पर छोड़कर जाऊँ ? मेरे इन लालों को कौन पालेगा, ये किसके होकर रहेंगे ? कौन प्रातः काल इन्हें दूध और हलवा खिलायेगा, कौन इनकी नींद सोयेगा, इनकी नींद जागेगा ? बेचारे कौड़ी के तीन हो जायेंगे। नहीं प्यारो, मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगी। तुम्हारे लिए सब कुछ सह लूँगी। निरादर-अपमान, जली-कटी, खरी-खोटी, घुड़की-झिड़की सब तुम्हारे लिए सहूँगी।

कल्याणी तो बच्चे को लेकर लेटी; पर बाबू साहब को नींद न आई। उन्हें चोट करने वाली बातें बड़ी मुश्किल से भूलती थीं। उफ, यह मिजाज मानो मैं ही इनकी स्त्री हूँ। बात मुँह से निकालनी मुश्किल है। अब मैं इनका गुलाम होकर रहूँ। घर में अकेली यह रहें और बाकी जितने अपने बेगाने हैं, सब निकाल दिये जायँ। जला करती हैं। मनाती हैं कि यह किसी तरह मरें तो मैं अकेली आराम करूँ। दिल की बात मुँह से निकल ही आती है, चाहे कोई कितनी ही छिपाये। कई दिन से देख रहा हूँ ऐसी जली-कटी सुनाया करती हैं। मैके का घमण्ड होगा, लेकिन वहाँ कोई भी न पूछेगा, अभी सब आवभगत करते हैं, जब आकर सिर पड़ जायँगी तो आटे-दाल का भाव मालूम हो जायगा। रोती हुई आयेंगी। वाह रे घमण्ड, सोचती हैं-मैं ही यह गृहस्थी चलाती हूँ। अभी चार दिन को कहीं चली जाऊं तो मालूम हो जायेगा, सारी शेखी किरकिरी हो जायेगी।

एक बार इनका घमण्ड तोड़ ही दूँ। जरा वैधव्य का मजा भी चखा दूँ। न जाने इनकी हिम्मत कैसे पड़ती है, कि मुझे यों कोसने लगती हैं। मालूम होता है, प्रेम इन्हें छू नहीं गया या समझती हैं यह घर से इतना चिमटा हुआ है कि इसे चाहें जितना कोसूँ टलने का नाम न लेगा। यही बात है, पर यहाँ संसार से चिमटनेवाले जीव नहीं है। जहन्नुम में जाय यह घर, जहाँ ऐसे प्राणियों से पाला पड़े। घर है या नरक ? आदमी बाहर से थका-माँदा आता है तो उसे घर में आराम मिलता है। यहाँ आराम के बदले कोसने सुनने पड़ते हैं। मेरी मृत्यु के लिए व्रत रख जाते हैं। यह है पच्चीस वर्ष के दाम्पत्य जीवन का अन्त ! बस चल ही दूँ। जब देख लूँगा इनका सारा घमण्ड धूल में मिल गया और मिजाज ठण्डा हो गया, तो लौट आऊँगा। चार-पाँच दिन काफी होंगे। लो तुम भी याद करोगी कि किसी से पाला पड़ा था।

यही सोचते हुए बाबू साहब उठे, रेशमी चादर गले में डाली, कुछ रुपये लिये अपना कार्ड निकालकर दूसरे कुर्ते की जेब में रखा, छड़ी उठाई और चुपके से बाहर निकले। सब नौकर नींद में मस्त थे। कुत्ता आहट पाकर चौंक पड़ा और उनके साथ हो लिया।
पर यह कौन जानता था कि यह सारी लीला विधि के हाथों रची जा रही है। जीवन-रंगशाला का वह निर्दय सूत्रधार किसी अगम गुप्त स्थान पर बैठा हुआ अपनी जटिल क्रूर क्रीड़ा दिखा रहा है। यह कौन जानता था कि नकल असल होने जा रही है, अभिनय सत्य का रूप ग्रहण करने वाला है।
निशा ने इन्दु को परास्त करके अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। उसकी पैशाचिक सेना ने प्रकृति पर आतंक जमा रखा था। सद्वृत्तियाँ मुँह छिपाये पड़ी थीं और कुवृत्तियाँ विजय-गर्व से इठलाती फिरती थीं। वन में वन्य-जन्तु शिकार की खोज में विचर रहे थे और नगरों में नर-पिशाच गलियों में मँडराते फिरते थे।

बाबू उदयभानुलाल लपके हुए गंगा की ओर चले जा रहा थे। उन्होंने अपना कुर्ता घाट के किनारे रखकर पाँच दिन के लिए मिर्जापुर चले जाने का निश्चय किया था। उनके कपड़े देखकर लोगों को डूब जाने का विश्वास हो जायगा, कार्ड कुर्ते की जेब में था। पता लगाने में कोई दिक्कत न हो सकती थी। दम-के-दम में सारे शहर में खबर मशहूर हो जायगी। आठ बजते-बजते तो मेरे द्वार पर सारा शहर जमा हो जायगा, तब देखूँ देवीजी क्या करती हैं।

यही सोचते हुए बाबू साहब गलियों में चले जा रहे थे, सहसा उन्हें अपने पीछे किसी दूसरे आदमी के आने की आहट मिली, समझे कोई होगा। आगे बढ़े, लेकिन जिस गली में वह मुड़ते उसी तरफ यह आदमी भी मुड़ता था। तब बाबू साहब को आशंका हुई कि यह आदमी मेरा पीछा कर रहा है। ऐसा आभास हुआ कि इसकी नियत साफ नहीं है। उन्होंने तुरन्त जेबी लालटेन निकाली और उसके प्रकाश में एक आदमी को देखा। एक बलिष्ठ मनुष्य कन्धे पर लाठी रखे चला आता था। बाबू साहब उसे देखते ही चौंक पड़े। यह शहर का छटा हुआ बदमाश था। तीन साल पहले उस पर डाके का अभियोग चला था। उदयभानु ने उस मुकदमे में सरकार की ओर से पैरवी की थी और इस बदमाश को तीन साल की सजा दिलाई थी। तभी से वह इनके खून का प्यासा हो रहा था। कल ही वह छूटकर आया था। आज दैवात् बाबू साहब अकेले रात को दिखाई दिये, तो उसने सोचा यह इनसे दाँव चुकाने का अच्छा मौका है। ऐसा मौका शायद ही फिर कभी मिले। तुरन्त पीछे हो लिया और वार करने की घात ही में था कि बाबू साहब ने जेबी लालटेन जलाई। बदमाश जरा ठिठककर बोला-क्यों बाबूजी, पहचानते हो ? मैं हूँ मतई।

बाबू साहब ने डपटकर कहा- तुम मेरे पीछे-पीछे क्यों आ रहे हो।
मतई-क्यों, किसी को रास्ता चलने की मनाही है ? यह गली तुम्हारे बाप की है ?
बाबू साहब जवानी में कुश्ती लड़ रहे थे, अब भी हष्ट- पुष्ट आदमी थे। दिल के भी कच्चे न थे। छड़ी सँभालकर बोले-अभी शायद मन नहीं भरा। अबकी सात साल को जाओगे।
मतई-मैं सात साल को जाऊंगा या चौदह साल को, पर तुम्हें जीता न छोड़ूगा। हाँ, अगर तुम मेरे पैरों पर गिरकर कसम खाओ कि अब किसी को सजा न कराऊँगा, तो छोड़ दूँ। बोलो, मंजूर है ?



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