505 गीता - अनन्त पई 505 Gita - Hindi book by - Anant Pai
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505 गीता

अनन्त पई

प्रकाशक : इंडिया बुक हाउस प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :32
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2983
आईएसबीएन :81-7508-452-9

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प्रस्तुत है गीता का सार संक्षिप्त रूप....

Gita A Hindi Book by Anant Pai

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

गीता

आज चित्रकथा साहित्य एक प्रभावशाली माध्यम है, जिसके द्वारा बच्चों का ग्रहणशील मन ऊँचे आदर्शों और सुंदर कल्पनाओं को सरलता से ग्रहण कर लेता है।

इस चित्रकथा में जीवन के उन संतुलित मूल्यों का चित्रण है जिनका उपदेश भगवत्-गीता देती है। अर्जुन मानो अपने युग का एक भटका हुआ बच्चा है। उसका व्यक्तित्व खो गया है। वह अपने को पहचान नहीं पा रहा है। गीता उसकी पहचान स्वयं उससे कराती है।

उसके खोये हुए शौर्यपूर्ण व्यक्तित्व तक उसे पुनः पहुँचाती है। भगवान् कृष्ण ने जीवन जीने की एक स्वस्थ राह दिखायी है जिस पर चल कर मनुष्य को न केवल लौकिक सुख—समृद्धि मिलती है, बल्कि वह अलौकिक ब्रह्म में भी अपनी पूर्णता प्राप्त करता है।

चित्रकथा के प्रकाशक बच्चों के भविष्य को सुधारने के लिए जो अथक सेवा कर रहे हैं उसके लिए मैं उन्हे बधाई देता हूँ। मैंने इंडिया बुक हाउस एज्युकेशन ट्रस्ट’ की इन मूल्यवान् चित्रकथाओं को सारी दुनिया में फैले अपने बाल विहार के सदस्यों को पढ़ने के लिए सिफारिश की है।

रोचक बात यह है कि अमरीका, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, जमैका और कनाडा के बच्चे भी इन चित्र कथाओं को बड़ी रुचि से पढ़ते हैं और उनसे प्रेरणा प्राप्त करते हैं। यह देख कर प्रसन्नता होती है कि कैसे वे बच्चे सुंदर नीतिवान व्यक्तित्व विकसित कर रहे हैं।

मैं चाहता हूँ कि इन चित्र कथाओं का सारी यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद हो। यह भारत की बहुत बड़ी देन होगी—संसार के भविष्य को सुधारने के लिए लोगों में सच्चे जीवन के प्रति प्रेम और सम्मान जगाने के लिए।

 

स्वामी चिन्मयानन्द

 

ऐसा कौन भारतवासी है जिसने गीता के विषय में नहीं सुना। उसका पूरा नाम है ‘श्रीमद्भगवद्-गीता’। वास्तव में यह महाभारत का ही एक अंश है। हस्तिनापुर के अंधे राजा धृतराष्ट्र को संजय युद्ध का सारा हाल सुनाते हैं। युद्ध के पहले दिन अर्जुन का मोह दूर करने और उसको युद्ध के लिए प्रेरित करने के लिए भगवान् कृष्ण जो उपदेश देते हैं, वह गीता है।
कई विद्वानों का मत है कि गीता वाला अंश बाद में महाभारत में जोड़ा गया, क्योंकि उसमें छह दर्शनों का उल्लेख है। ये छह दर्शन पांच सौ ई.पू. से दो सौ ई. शताब्दी के बीच में विकसित हुए।

गीता में उपनिषदों का बहुत कुछ प्रभाव है, औऱ बहुधा उसे उपनिषदों का सार कहा जाता है। गीता जीवन को नकारती नहीं, स्वीकारती है। इसीलिए उसमें बड़ी प्रेरक शक्ति है लेकिन असीम ब्रह्म को परिभाषित करने के प्रयास में उसमें कई सीमाएं भी आ गई हैं। यही कारण है कि अनेक आचार्यों ने उसके कुछ अंशों की अलग-अलग व्याख्याएँ भी की हैं।
यह चित्रकथा गीता की व्याख्या होने का दावा नहीं कर सकती। हम तो इसके द्वारा गीता से केवल आपका परिचय करा रहे हैं

 

सम्पादक



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