ऐसा भी सोचा जाता है - हरिशंकर परसाई Aisa Bhi Socha Jata Hai - Hindi book by - Harishankar Parsai
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ऐसा भी सोचा जाता है

हरिशंकर परसाई

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1998
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2907
आईएसबीएन :00-0000-00-0

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‘ऐसा भी सोचा जाता है’, परसाईजी के गम्भीर वैचारिक एवं व्यंग्यात्मक लेखों का संकलन...

Aaisa Bhi Socha Jata Hai a hindi book by Harishankar Parsai - ऐसा भी सोचा जाता है - हरिशंकर परसाई

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हरिशंकर परसाई उन व्यंग्य लेखकों में से हैं जिनके बिना हिन्दी के आधुनिक व्यंग्य लेखन की प्रतिष्ठा सम्भव नहीं होती। उनके व्यंग्य लेखन में हमारे समय की तकलीफें तो उजागर होती हैं ही, मानवीय सहानुभूति, संवेदना और करुणा को भी रेखांकित करने की सचेत कोशिश है, जो अब प्रायः दुर्लभ है।

हरिशंकर परसाई विचारक और चिन्तक भी हैं। एक प्रखर सामाजिक चेतना और सघन आन्तरिकता उनके वैचारिक लेखन की विशिष्ट पहचान है। उनका गम्भीर लेखन अपने आस-पास के जाने अनजाने सत्य को बहुत बारीक और सार्थक अभिव्यक्ति देता है-और उसका जीवन्त प्रमाण है उनकी यह नवीनतम पुस्तक ‘ऐसा भी सोचा जाता है’ जिसमें अपनी एक अन्तर्निहित मूल्य-दृष्टि और अनुभव संपदा भी है।

‘ऐसा भी सोचा जाता है’ में संकलित परसाईजी के गम्भीर वैचारिक लेखों में राजनीतिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और सामाजिक विषय संदर्भ पर महत्वपूर्ण विचार-चिन्तन है, जिनमें आज के आम आदमी की पीड़ा और संघर्षशीलता के कई आयामों से सुधी पाठक को साक्षात्कार होता है। कहने की जरूरत नहीं कि ‘परसाई’ और व्यंग्य’ तो एक-दूसरे के पर्याय हैं ही। यहाँ-उनकी इस नवीनतम पुस्तक में भी व्यंग्य के रंग हैं।

इस तरह गुजरा जन्मदिन

तीस साल पहले बाईस अगस्त को एक सज्जन सुबह मेरे घर आये। उनके हाथ में गुलदस्ता था। उन्होंने स्नेह और आदर से मुझे गुलदस्ता दिया। मैं अकचका गया। मैंने पूछा-यह क्यों ? उन्होंने कहा-आज आपका जन्मदिन है न। मुझे याद आया मैं बाईस अगस्त को पैदा हुआ था। यह जन्मदिन का पहला गुलदस्ता था।  वे बैठ गये। हम दोनों अटपटे थे। दोनों बेचैन थे। कुछ बातें होती रहीं। उनके लिए चाय आई। वे मिठाई की आशा करते होंगे। मेरी टेबल पर फूल भी नहीं थे। वे समझ गये होंगे कि सबेरे से इसके पास कोई नहीं आया। इसे कोई नहीं पूछता। लगा होगा जैसे शादी की बधाई देने आये हैं, और इधर घर में रात को दहेज की चोरी हो गई हो। उन्होंने मुझे जन्मदिन के लायक नहीं समझा। तब से अभी तक उन्होंने मेरे जन्मदिन पर आने की गलती नहीं की। धिक्कारते होंगे कि कैसा निकम्मा लेखक है कि अधेड़ हो रहा है, मगर जन्मदिन मनवाने का इन्तजाम नहीं कर सका। इसका साहित्य अधिक दिन टिकेगा नहीं। हाँ, अपने जन्मदिन के समारोह का इन्तजाम खुद कर लेने वाले मैंने देखे हैं। जन्मदिन ही क्यों, स्वर्ण-जयन्ती और हीरक जयन्ती भी खुद आयोजित करके ऐसा अभिनय करते हैं, जैसे दूसरे लोग उन्हें कष्ट दे रहे हैं। सड़क पर मिल गये तो कहा-परसों शाम के आयोजन में आना भूलिये मत। फिर बोले-मुझे क्या मतलब ? आप लोग आयोजन कर रहे हैं, आप जानें।
चार-पाँच साल पहले मेरी रचनावली का प्रकाशन हुआ था। उस साल मेरे दो-तीन मित्रों ने अखबारों में मेरे बारे में लेख छपवा दिये, जिनके ऊपर छपा था-22 अगस्त जन्मदिन के सुअवसर पर। मेरी जन्म-तारीख 22 अगस्त 1924 छपती है। यह भूल है। तारीख ठीक है। सन् गलत है। सही सन् 1922 है। मुझे पता नहीं मैट्रिक के सर्टिफिकेट में क्या है। मेरे पिता ने स्कूल में मेरी उम्र दो साल कम लिखाई थी, इस कारण कि सरकारी नौकरी के लिए मैं जल्दी ‘ओव्हरएज’ नहीं हो जाऊँ। इसका मतलब है कि झूठ की परम्परा मेरे कुल में है। पिता चाहते थे कि मैं ‘ओव्हरएज’ नहीं हो जाऊँ। मैंने उनकी इच्छा पूरी की। मैं इस उम्र में भी दुनियादारी के मामले में ‘अण्डरएज’ हूँ।
लेख छपे तो मुझे बधाई देने मित्र और परिचित आये। मैंने सुबह मिठाई मँगा ली थी। मैंने भूल की। मिलने वालों में चार-पाँच, मिठाई का डिब्बा लाये। इतने में सब निबट गये। अगले साल मैंने सिर्फ तीन-चार के लिए मिठाई रखी। पाँचवें सज्जन मिठाई का बड़ा डिब्बा लेकर आये। फिर हर तीन-चार के बाद कोई मिठाई लिए आता। मिठाई बहुत बच गई। चाहता तो बेच देता और मुआवजा वसूल कर लेता। ऐसा नहीं किया। परिवार और पड़ोस के बच्चे दो-तीन दिन खाते रहे।
इस साल कुछ विशेष हो गया। जन्मदिन का प्रचार हफ्ता भर पहले से हो गया। सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण के घण्टों पहले उसके ‘वेद’ लग जाते हैं, ऐसा पण्डित बताते हैं। ‘वेद’ के समय लोग कुछ नहीं खाते। वेद यानी वेदना। राहु, केतु के दाँत गड़ते होंगे न। मेरा खाना-पीना तो नहीं छूटा वेद की अवधि में, पर आशंका रही कि इस साल क्या करने वाले हैं यार लोग। प्रगतिशील लेखक संघ के संयोजक जयप्रकाश पाण्डे आये और बोले-इक्कीस तारीख की शाम को एक आयोजन रखा है। उसमें एक चित्र प्रदर्शनी है और आपके साहित्य पर भाषण हैं। गया से डॉ. सुरेन्द्र चौधरी आ रहे हैं। अन्त में आपकी कहानी ‘सदाचार का तावीज’ का नाटक है। मैंने कहा-नहीं, नहीं कोई आयोजन मत करो। मैं नहीं चाहता। जयप्रकाश पाण्डे ने कहा-मैं आपकी मंजूरी नहीं ले रहा हूं, आपको सूचित कर रहा हूँ। आपको रोकने का अधिकार नहीं है। आपने लिखा और उसे प्रकाशित करवा दिया। अब उस पर कोई भी बात कर सकता है। इसी तरह आपके जन्मदिन को कोई भी मना सकता है। उसे आप कैसे और क्यों रोकेंगे ?
वहीं बैठे दूसरे मित्र ने कहा-हो सकता है, बम्बई में हाजी मस्तान आपके जन्मदिन का उत्सव कर रहे हों। आप क्या उन्हें रोक सकते हैं ? तर्क सही था। मेरे लिखे पर मेरा सिर्फ रायल्टी का अधिकार है। मेरा जन्मदिन भी मेरा नहीं है और मेरा मृत्यु-दिवस भी मेरा नहीं होगा। यों उत्सव स्वागत, सम्मान का अभ्यस्त हूँ। फूलमालाएँ भी बहुत पहनी हैं। गले पड़ी माला की ताकत भी जानता हूँ। अगर शेर के गले में किसी तरह फूलमाला डाल दी जाय, तो वह हाथ जोड़कर कहेगा-मेरे योग्य सेवा ? आशा है अगले चुनाव में आप मुझे ही मत देंगे।
आकस्मिक सम्मान भी मेरा हुआ। शहर में राज्य तुलसी अकादमी का तीन दिनों का कार्यक्रम था। विद्वानों के भाषण होने थे। जलोटा को तुलसीदास के पद गाने के लिए बुलाया गया था। पहले दिन सरकारी अधिकारी मेरे पास आये। कार्यक्रम की बात की। फिर बोले-कल सुबह पण्डित विष्णुकान्त शास्त्री और पण्डित राममूर्ति त्रिपाठी पधार रहे हैं। विष्णुकान्त शास्त्री कलकत्ता वाले से मेरी कई बार की भेंट है। त्रिपाठी जी के भी अच्छे सम्बन्ध हैं। अधिकारी ने कहा-वे आपसे भेंट करेंगे ही। उन्हें कब ले आऊँ ? मैंने कहा-कभी भी। तीनेक बजे ले आइये। दूसरे दिन सबसे पहले जलोटा आये। फिर तीन प्रेस फोटोग्राफर आये। मैं समझा ये हम लोगों का चित्र लेंगे। फिर पण्डित शास्त्री और पण्डित त्रिपाठी कमरे में घुसे। मेरे मुँह से निकला-
सेवन सदन स्वामि आगमनू
मंगल करन अमंगल हरनू

 

शास्त्री ने कहा-नहीं बन्धु, बात यों है-
एक घड़ी आधी घड़ी आधी में पुनि आध।
तुलसी संगत साधु की हरै कोटि अपराध।।

 


हम बात करने लगे। इतने में वही सरकारी अधिकारी न जाने कहाँ से एक थाली लेकर मेरे पीछे से प्रवेश कर गये। थाली में नारियल, हल्दी, कुंकुम, अक्षत और रामचरितमानस की पोथी थी। पुष्पमाला भी थी। मैं समझा कि विष्णुकान्त शास्त्री का सम्मान होना है। मैंने कहा बहुत उचित है। शास्त्री कब-कब कलकत्ता से आते हैं। उनका सम्मान करना चाहिए। शास्त्री जी बोले-नहीं महाराज, आपका सम्मान करना है। वे लोग चकित रह गये जब मैंने उसी क्षण अपना सिर टीका करने के लिए आगे बढ़ा दिया। वे आशा कर रहे थे कि मैं संकोच जताऊँगा, मना करूँगा,। मैंने टीका करा लिया, माला पहन ली, नारियल और पोथी ले ली।
दूसरे दिन एक अखबार में छपा-तुलसी अकादमी वाले दोपहर को परसाई जी के घर में घुस गये और उनका सम्मान कर डाला।
ऐसी बलात्कार की खबरें छपती हैं। इक्कीस तारीख की शाम को एक समारोह मेरी अनुपस्थिति में हो गया। भाषण, चित्र-प्रदर्शनी, नाटक।
दूसरे दिन जन्मदिन की सुबह थी। मैं सोकर उठा ही था कि पड़ोस में रहने वाले एक मित्र दम्पत्ति आ गये। मुझे गुलदस्ता भेंट किया और एक लिफाफा दिया। बोले-हैप्पी बर्थडे। मैनी हैप्पी रिटर्न्स। मैंने सुना है, मातमपुर्सी करने गये एक सज्जन के मुँह से निकल पड़ा था-मैनी हैप्पी रिटर्न्स। कम अंगरेजी जानने से यही होता है। एक नीम इंगलिश भारतीय की पत्नी अस्पताल में भरती थी। उनकी एंग्लो-इंडियन पड़ोसिन ने पूछा-मिस्टर वर्मा, हाऊ इज योर वाइफ ? वर्मा ने कहा-आन्टी, समथिंग इज़ वैटर दैन नथिंग !
गुलदस्ता मैंने टेबल पर रख दिया। उसके बगल में लिफाफा रख दिया। खोला नहीं। समझा, शुभकामना का कार्ड होगा। पर मैंने लक्ष्य किया कि दम्पति का मन बातचीत में नहीं लग रहा है। वे चाहते हैं कि मैं लिफाफा खोलूँ। मैंने खोला। उसमें से एक हजार एक रुपये के नोट निकले। मैंने इसकी क्या जरूरत है’ जैसे फालतू वाक्य बोले बिना रुपये रख लिये।
सोचा-इसी को ‘गुड मार्निग’ कहते हैं। आगे सोचा कि अगले जन्मदिन पर अखबार में निवेदन प्रकाशित करवा दूँगा कि भेंट में सिर्फ रुपये लायें। पुर्नविचार किया। ऐसा नहीं छपाऊँगा। हो सकता है कोई नहीं आए। उपहारों का ऐसा होता है कि आपने जो टेबिल लैम्प किसी को शादी में दिया है वही घूमता हुआ किसी शादी में आपके पास लौट आता है।
रात तक मित्र, शुभचिन्तक, अशुभचिन्तक आते रहे। कुछ लोग घर में बैठे कह रहे होंगे-साला, अभी जिन्दा है !
क्या किया ? एक साल और जी लिए तो कौन सा पराक्रम किया ? नहीं, वक्त ऐसा है कि एक दिन भी जी लेना पराक्रम है। मेरे एक मित्र ने रिटायर होने के दस साल पहले अपनी तीन लड़कियों की शादी कर डाली। मैंने कहा-तुम दुनिया के प्रसिद्ध पराक्रमियों में हो। भीम वीर थे। महापराक्रमी थे। पर उन्हें तीन लड़कियों की शादी करनी पड़ती, तो चूहे हो जाते। जिजीविषा विकट शक्ति होती है। खुशी से भी जीते हैं और रोते हुए भी जीते हैं। प्रसिद्ध इंजीनियर डॉ. विश्वेसरैया सौ साल से ऊपर जिये। उनके सौवें जन्मदिन पर पत्रकार ने उनसे बातचीत के बाद कहा-अगले जन्मदिन पर आपसे मिलने की आशा करता हूँ। विश्वेसरैया ने जवाब दिया-क्यों नहीं मेरे युवा मित्र ! तुम बिल्कुल स्वस्थ हो। यह उत्साह से जीना हुआ। और वे बुढ़ऊ भी जीते हैं, जिनकी बहुएँ सुनाकर कहती हैं-भगवान अब इनकी सुन क्यों नहीं लेते ? जिन्दगी के रोग का और मोह का कोई इलाज नहीं।
मृत्टु-भय से आदमी को बचाने के लिए तरह-तरह की बातें कही जाती हैं। कहते हैं-शरीर मरता है, आत्मा तो अमर है। व्यास ने कृष्ण से कहलाया है-
जैसे आदमी पुराने वस्त्र त्याग कर नये ग्रहण करता है, वैसे ही आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरा शरीर धारण कर लेती है। मगर ऐसी सूक्ष्म आत्मा को क्या चाटें ? ऐसी आत्मा न खा-पी सकती है, न भोग कर सकती है, न फिल्म देख सकती है। नहीं, मस्तिष्क का काम बन्द होते ही चेतना खत्म हो जाती है।
मगर-
हम को मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,
दिल को खुश रखने को ग़ालिब ये ख़्याल अच्छा है।

 

ग़ालिब के मन पर मौत छाई रहती थी। कई शेरों में मौत है। पता नहीं ऐसा क्यों है। शायद दुःखों के कारण हो।
        ग़मे हस्ती का असद क्या हो जुजमर्ग, इलाज
        शमअ हर रंग में जलती है, सहर होने तक
        क़ैदेहयात बन्दे गम असल में दोनों एक हैं
        मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाये क्यों।

 


रवीनद्रनाथ ने लिख दिया था-
मीत मेरे दो विदा मैं जा रहा हूँ
सभी के चरणों नमन में जा रहा हूँ
यार की ये कुंजियाँ लो तुम सँभालो
अब नहीं घर-बार मेरा तुम सँभालो लो
आ रही है टेर अब मैं जा रहा हूँ

 


कबीरदास ने शान्ति से कहा-
यह चादर सुर नर मुनि ओढ़ी
मूरख मैली कीन्हीं
दास कबीर जतन से ओढ़ी
जस की तस धर दीन्ही
चदरिया झीनी रे बीनी>h4>

इस सबके बावजूद जीवन की जय बोली जाती रहेगी।

किस भारत भाग्य विधाता को पुकारें

 

मेरे एक मुलाकाती हैं। वे कान्यकुब्ज हैं। एक दिन वे चिन्ता से बोले-अब हम कान्यकुब्जों का क्या होगा ? मैंने कहा-आप लोगों को क्या डर है ? आप लोग जगह-जगह पर नौकरी कर रहे हैं। राजनीति में ऊँचे पदों पर हैं। द्वारका प्रसाद मिश्र, श्यामाचरण शुक्ल, विद्याचरण शुक्ल, जगन्नाथ मिश्र, राजेन्द्र कुमारी बाजपेयी, नारायणदत्त तिवारी ये सब नेता कान्यकुब्ज हैं। लोग कहते हैं, इस देश में दो विचारधारा प्रबल हैं-कान्यकुब्जवाद और कायस्थवाद। मुझे तब पता चला कि जयप्रकाश नारायण कायस्थ हैं, जब उत्तर प्रदेश कायस्थ सभा ने उनका सम्मान करने की घोषणा की। वे कायस्थ कुल भूषण घोषित होने वाले थे। ऐसे ही कोई कान्यकुब्ज शिरोमणि हो जायगा। आप ही हो जाइये।
उन्होंने कहा-आप नहीं समझे। हमारी हालत फिलिस्तीनियों जैसी है। हमारी भूमि उत्तरप्रदेश में कान्यकुब्ज छूट गई है। हम लोग दूसरों के राज्यों में रह रहे हैं। सिख पंजाब चाहते हैं, कश्मीरी कश्मीर चाहते हैं, नेपाली गोरखालैण्ड चाहते हैं। हमारा कोई राज्य कोई देश नहीं है। हमारे राज्य पर ठाकुर, यादव कब्जा किये हैं। अगर राज्यों में ‘‘कान्यकुब्ज, वापस जाओ’’ आन्दोलन हुआ तो हम कहाँ जायेंगे ? यह राज्य हमारा नहीं, देश हमारा नहीं। आगे चलकर पंजाब या असम जाने के लिए पासपोर्ट लेना होगा। हो सकता है, हमारे ही घर उत्तर प्रदेश जाने के लिए पासपोर्ट लेना पड़े। मध्य प्रदेश समुद्र के किनारे भी नहीं है कि कहीं भाग जायें।
मैंने कहा-पर मध्य प्रदेश से आपको भगा कौन रहा है ? वे बोले-कोई भी भगा सकता है। हम नर्मदा के किनारे हैं, तो नार्मदीय लोग भगा देंगे। यहाँ से छत्तीसगढ़ तबादला हो जाय, तो वहाँ छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा अलग राज्य का आन्दोलन कर ही रहा है। वहाँ से भगा दिये जायेंगे।
मैंने कहा-उन्नाव के आसपास का छोटा-सा इलाका कान्यकुब्ज है। यहीं के राजा जयचन्द थे। उन्होंने पृथ्वीराज को खत्म करने के लिए मुहम्मद गोरी को बुलाया था। जब गोरी पृथ्वीराज को ले गया, तब जयचन्द ने उत्सव मनाने को कहा। तब मन्त्री ने कहा-महाराज, यह दिन उत्सव मनाने का नहीं, दुःख का है। पृथ्वीराज के बाद आपकी बारी है। ऐसे बदनाम क्षेत्र में क्यों लौट कर जाते हैं ?
उनका तर्क था-बदनाम कौन क्षेत्र नहीं है ? बंगाल में भी तो मीर जाफर ऐसा ही हो गया है। पर ज्योति बसु को शर्म नहीं आती। वे तो आमार सोनार बांगला-गाते हैं।
मैंने कहा-यह जो आपका संप्रभुता-सम्पन्न कान्यकुब्ज राज्य बनेगा, उसके अस्तित्व के साधन क्या होंगे ? मेरा मतलब है, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर कैसे होगा ?
उन्होंने कहा-हर टूटने वाले को जो मदद करते हैं, वही हमें करेंगे। बाल्टिक देशों को सोवियत संघ से टूटने के बाद कौन मदद करते हैं ? क्रोशिया दो जिलों के बराबर है। वह किनके दम पर पृथक होना चाहता है ? आप देखेंगे, हमारे राज्य को ये सहायता देंगे-अमेरिका, विश्ववैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोश, एड कान्यकुब्ज क्लब, एड कान्यकुब्ज कन्सोर्टियम ! समझे आप ? हम अनाथ नहीं हैं। हम तीव्र आन्दोलन शुरू करने वाले हैं-मगर गांधी जी के तरीके से। आप अपनी कहिये। आपका कौन राज्य होगा ? कहाँ के हैं और कौन जाति के हैं ?
मैंने कहा-हमारे लोग कड़ा-मानिकपुरी के जिझौतिया ब्राह्मण कहलाते हैं। वे तपाक से बोले-बस तो अपने लिए कड़ा-मानिकपुर इलाके की माँग कीजिए, बुंदेलेवीर दान आ जायें।
मैंने कहा-पर एक बात है। मेरा एक भानजा बंगाली कायस्थ लड़की से ब्याहा है और भानजी क्षत्रिय से।
वे बोले-यानी वर्णसंकर ? मैंने कहा-आगे तो सुनिये, हम अन्तर्राष्ट्रीय ब्राह्मण हैं। हमारी जाति में अन्तर्जातीय ही नहीं अन्तर्महाद्वीपीय शादी हो चुकी है। उन्नीसवीं सदी के अन्त में हमारी जाति की गंगाबाई ने एक अँगरेज अफसर से शादी की थी। एक तरह से हम एंग्लो-इण्डियन ब्राह्मण हैं।
उन्होंने कहा-तब तो आपका केस होपलेस है। अधिक-से-अधिक आपको आरक्षण की सुविधा मिल सकती है। विश्वनाथ प्रतापसिंह से बात कीजिये। वे आपको ओ.वी.सी. की सूची में शामिल करा देंगे। मैंने कहा-नहीं, हम अन्तर्महाद्वीपीय जाति के हैं। हमारा दावा भारत में कड़ा-मानिकपुर में और इंग्लैण्ड में एक हिस्से पर बनता है। हम कड़ा-मानिकपुर पर भारत में और केन्टरवरी पर इंग्लैण्ड में दावा करेंगे। अगर आप तैयार हों तो हम लोग अपनी माँग संयुक्त राष्ट्र संघ में उठायें। इस समय जार्ज बुश अलग होने वालों पर विशेष कृपालु हैं। वे हमें हमारा ‘होमलैंड’ दिलायेंगे।
उन्होंने कहा-यह तो करना ही चाहिए। साथ ही हमें आतंकवादी कार्यवाही भी करनी चाहिए। ब्राह्मणों को इस समय परशुराम की जरूरत है। परशुराम ने कहा था-
भुजबल भूमि भूप बिन कीन्हीं
सहस बार महि देवन्ह दीन्हीं

 

विप्रदेवता मुझे क्षमा करें। ऊपर की बातचीत बिलकुल काल्पनिक है। देश में पनप रही अलगाव की प्रवृत्ति की परिणति क्या हो सकती है, यह अन्दाज कराने के लिए मैंने दो विप्रों की काल्पनिक बातचीत दी है।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखा है-भारत मानव महासागर है। यहाँ आर्य द्रविड़, शक, डूण, मुसलमान, ईसाई सब समा गये हैं। हम लहरों की तरह एक दूसरे से टकराते भी हैं और फिर मिलकर एकाकार हो जाते हैं। कवि क्षमा करें। हो यह गया है कि महासागर नहीं है, संकीर्ण नदियाँ और नाले हैं। अगर महासागर है भी तो एक लहर दूसरी से टकराकर दोनों अपने को महासागर समझने लगती हैं। हर लहर महासागर से अलग होकर अलग बहना चाहती है, चाहे वह नाली ही क्यों हो जाय। नाला हो, डबरा हो, गन्दा हो, गर्मी में सूख जाता हो-पर उसकी अलग पहचान है, वह दूसरों से स्वतन्त्र और विशिष्ट है, मटमैला पानी है, पर अपना तो है, अपने केंकड़े महासागर के मगर से अच्छे हैं। जंगली घास किनारों पर हो, पर है तो अपनी फसल, अपनी डोंगी जहाज से अच्छी है। अलगाव और लघुता में गर्व देश-भर में दिख रहा है। दूसरे महायुद्ध के बाद साहित्य में ‘लघु मानव’ आया था। यह हीन भावना से पैदा हुआ था। हाथी अपने को केंचुआ मानने में गर्व करने लगा था कम-से-कम साहित्य में तो महामानव भी अपने को लघु मानव बनाने की कोशिश में लगे थे। अब विराटता में असुरक्षा लगने लगी है, और संकीर्ण हो जाने में सुरक्षा गर्व और सम्पन्नता का अनुभव होने लगा है। नस्ल, भाषा, धर्म, संस्कृति की भिन्नता समझ में आती है। एक ही नस्ल, भाषा धर्म और संस्कृति के लोगों की निकटता का अनुभव भी स्वाभाविक है। इतनी सदियों में विशिष्टता रखते हुए एक हो जाना था। स्वाधीनता संग्राम के कई वर्षों में विशिष्टों की यह एकता थी। सिर्फ’ मुस्लिम लीग ने अलगाव की माँग की थी। पर स्वाधीन देश में अलगाव बढ़ता गया।
अब यह हाल है कि पंजाब, कश्मीर, असम में पृथकता के आन्दोलन। झारखंड और छत्तीसगढ़ की पृथक राज्य की माँग। उत्तराखंड अलग चाहिए तमिलनाडु में लिट्टे का बढ़ता प्रभाव। इनकी सेनाएँ-पंजाब में, कश्मीर में, असम में बाकायदा प्रशिक्षित आतंकवादी सेनाएँ। इन सेनाओं का दायरा अखिल भारतीय हो रहा है।
उधर धनी किसानों, पूर्व जमींदारों की बिहार में सेनाएँ-सनलाइट सेना, सवर्णरक्षक सेना।
एक बात गौरतलब है कि कुछ पिछड़े इलाके के लोग, जो मुख्यतः एक ही नस्ल के हैं, यह शिकायत है कि हमारी उपेक्षा हुई है, हमारा विकास नहीं किया गया। हम अलग राज्य बनाकर अपना विकास करेंगे। हमारी प्राकृतिक सम्पदा का दोहन करके बाहरवाले ले जाते हैं, और हमारा शोषण होता है। यह सोच इसलिए आई कि विकास का ठीक बँटवारा नहीं हुआ। पर जिस क्षेत्र में कोई प्राकृतिक सम्पदा नहीं है, वह क्षेत्र यदि इसी आधार पर पृथक होना चाहे कि हम एक ही नस्ल और जीवन-पद्धति के हैं और सभ्यता के एक ही स्तर पर हैं, तो इसका यही भावात्मक अर्थ है-जियेंगे साथ, मरेंगे साथ !
पृथकतावाद तब और खतरनाक होता है, जब शिवसेना-प्रधान बाल ठाकरे नारा देते हैं-मुंबई मराठी भाषियों की। सुन्दर मुंबई, मराठी मुबंई। लोकप्रिय भावना है।-‘भूमिपुत्र’ (सन आफ दी सायल) व्यवहार में इसका अर्थ है-इस भूमि के वासी ही इसके मालिक हैं, और वही इसके साधनों का उपयोग करेंगे। असम के भूमिपुत्र असमी। तो असम का तेल असमियों का, नौकरियाँ असमियों को, व्यापार असमियों का। अब अगर बनारस में ऊँचे पद पर के असमी से कहा-जाय-असम के भूमिपुत्र तुम असम जाओ। तब क्या होगा ? महाराष्ट्र के बाहर सारे देश में इतने मराठी-भाषी ऊँचे और नीचे पदों पर हैं, व्यापारी हैं, वैज्ञानिक हैं। इन्हें बाल ठाकुर क्या मुंबई में बुलाकर बसा लेंगे ? क्या काम लेंगे ? समुद्र से पानी उलीचने और फिर उसी में डालने का काम ?
संघ राज्य की एकता यह है कि असमी बम्बई में हो, मराठा असम में हो। तमिल उत्तरप्रदेश में हो, उत्तरप्रदेशी तमिल में हो, सबके हित परस्पर मिले हों, एक-दूसरे पर निर्भर हों। यह कैसी बात है, ‘शेरे पंजाब होटल’ जो लोग सारे भारत में ही नहीं, ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका में भी खोलते हों, वे इतने संकीर्ण हो जायें कि देश के एक भूखण्ड को सिर्फ अपना मानें ? मेरा मतलब यह नहीं है कि सब ऐसा चाहते हैं।
विघटन अलगाववाद बढ़ रहा है। अपने-अपने रक्षित क्षेत्र (सेंक्चुअरी) में रहने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। रवीन्द्रनाथ ने ‘जनगणमन’ की एकता की बात की है। जनगण की भावना ही घट रही है। संघ भावना (फेडरल स्पिरिट) कम होती जा रही है। जनगण एक दूसरे से भिड़ रहे हैं। सब टूट रहा है। किस भारत भाग्य विधाता को पुकारें ?

विदेशी धन के साथ और क्या आयेगा


इन दो शालों में जो विदेशी कर्ज लिया है, उसके बारे में जितनी तीव्र प्रतिक्रियाएँ हुई हैं, वैसे पिछले चालीस सालों में नहीं हुईं। अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में कर्ज का लेन-देन होता ही है। भारत उन दो संगठनों का सदस्य है, जिनसे वह कर्ज ले रहा है-विश्वबैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोश। भारत कर्ज लेने वाला भी है और देने वाला भी। पर इन संगठनों पर अमेरिका और पूँजीवादी (पहले साम्राज्यवादी भी) यूरोप का कब्जा है। अधिक वास्तव यह है कि अमेरिका का कब्जा है। हम कमजोर देश ही माने जाते हैं। हमारी अर्थ-व्यवस्था की जाँच के लिए अमेरिका के विशेषज्ञ इंस्पेक्टर आते हैं। बताते हैं-यह गड़बड़ है, यह नीति गलत है, पैसा गलत जगह लगा रहे हो। पिछले तीन महीनों में अमेरिका के तीन आर्थिक इंस्पेक्टर आ चुके। भारत का कोई विशेषज्ञ न अमेरिका जाता, न बुलाया जाता, वहाँ के हालात की जाँच करने। कारण ? हम सदस्य होकर भी भिखारी हैं। और जाँच भिखारी की की जाती है। गरीब की की जाती है-इसकी हैसियत है भी या नहीं ? यह भी देख जाता है कि इसे कर्ज दिलाकर अपनों का कितना लाभ कराया जा सकता है ? क्या शर्ते यह मान लेगा ?
जवाहरलाल नेहरू कहते थे कि वी विल एक्सेप्ट एड विदाउट स्ट्रिक्ज (हम बिना शर्तों की मदद स्वीकार करेंगे)। एक नेता ने अभी संसद में यह कहा है। किसी दूसरे नेता ने कहा है-मदद इंदिरा गांधी भी लेती थीं, मगर झुककर नहीं।

   

 


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