आशा इतिहास से संवाद है - सत्येन्द्र कुमार Asha Itihas Se Samvad Hai - Hindi book by - Satyendra Kumar
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आशा इतिहास से संवाद है

सत्येन्द्र कुमार

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :124
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2794
आईएसबीएन :81-8361-053-6

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सत्येन्द्र समुदाय और समय के बीच प्राकृतिक ऊष्मा का आख्यान रचते हैं।

Asha Itihas Se Samvad Hai

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सत्येन्द्र समुदाय और समय के बीच प्राकृतिक ऊष्मा का आख्यान रचते हैं। यह आख्यान इतिहास से जुड़ता है, यह वहीं तक सीमित कर नहीं रह जाता है बल्कि सार्थक संवाद स्थापित करता है। इस संवाद का लक्ष्य मनुष्य के लिए आशा की एक सामान्य की छतरी पाना है जो व्यवस्था के तमाम विकृतियों के बावजूद संस्कृति, समुदाय और मनुष्य के प्राकृतिक संस्करों के बीच ध्वनि लय को बचा ले। सत्येन्द्र जमीन की दीवारों को नजरअन्दाज नहीं करते, पर किशान की तरह उसकी भाषा को भी समझते हैं। समय की सच्चाईयों से वे अपने कथ्य को अलग नहीं करते, लेकिन यथार्थ से आगे का रास्ता भी तय करते हैं जहाँ समुदाय का स्वप्न यात्रारत है। वह सौन्दर्य के तथ कथित मानकों को नहीं स्वीकारते। गाँठ पड़े और नसों से भरे किसी गंवाई माँ के हाथ उन्हें मोनालिसा के चित्र से अधिक खूबसूरत लगते हैं। अयोध्या राम और मक्का के दिव्य भवनों की अपेक्षा सगीर चाचा की रजाई के दो पल्लों के बीच बसे विश्वल से बचा लेना उन्हें ज्यादा जरूरी लगता है क्योंकि यहाँ एक बच्चे की जरूरत है।
सत्येन्द्र जीवन के काव्य ममता में गहराई तक उतरते हैं। वे जानते हैं कि ‘‘चित्रों तक ठहर नहीं जाती सारी दुनियाँ’’। शायद इसी लिए वे कागज तस्वीरों से बाबस्ता हो कतर नहीं रह जाते बल्कि उस वास्तविक दुनियाँ से भी गुजरते हैं जहाँ सोमालिया, कालाहांडी और पालमू की सड़कों पर पिजंर होती काया वाली औरतें यात्रा करती हैं। उस दुनियाँ से हर छोटे क्षण, हर छोटी नदीं हर छोटे संघर्ष सत्येन्द्र के लिए महाती अर्थवत्ता रखता है क्योंकि उनसे ढेरों बड़ी संभावनाएँ जन्म लेती है। सत्येन्द्र उन भावनाओं की कविताएँ रचते हैं जिनके लिए हर बार बरसाती नदीं का खो जाना मात्र एक निराशाजनक संदर्भ नहीं बल्कि वापसी का इन्तजार भी है।

जंगल से गुजरती बरसाती नदी

खो गई बरसाती नदी
गुम हो गई उसकी छाया।
रेत पर अब कहीं
बाकी नहीं है उसके निशान।
एक उत्सव था उसका आना
भले ही उसके किनारे नहीं बसा कोई नगर
नहीं हुआ दूर देश से व्यापार
नहीं चली उस पर बड़े पालोंवाली नौकाएं
नहीं उठीं उसमें बड़ी-बड़ी तरंगें
दूर तक नहीं गई उसके जन्म की ख़बर
लेकिन फिर भी उसका गुज़रना उस जंगल से
लोगों के लिए आना था खुशियों का
लौटना था सपनों का
जबकि वे जानते थे
उनकी खुशियों की तरह
सपनों की तरह
कभी भी खो जाएगी यह नदी।

तमाम आशंकाओं के बीच
लोकगीतों की तरह
नृत्य की तरह
औरतों के भीतर उतरती रही है वह नदी।
जंगल की औरतें
जैसे करती हैं अपने मरद के लौटने के इन्तजार
अपने बेटे के लौटने का इन्तज़ार
वैसे ही करती हैं वे इन्तज़ार
उस बरसाती नदी के लौटने का।
खोने से पहले उसने दी उन क्षणों को सार्थकता।
वह बरसाती नदी
खोने के बाद भी
बहती रही है बस्तीवालों के भीतर।
थोड़े समय के लिए ही सही
उसने भरे थे मन में उत्सव के भाव।
आज भी है उस नदी से जुड़ी ढेरों कहानियाँ।

समय के तेज प्रवाह में
आज भी ज़िन्दा है समय का वह छोटा टुकड़ा
जो जुड़ी है नदी के साथ।
दूर से पानी लाने की चिन्ता में
गुज़र गईं कितनी ही पीढ़ियाँ
पीढ़ियों तक अनकही रह गईं सखियों की कितनी ही बातें
(हालाँकि उन्होंने उस छोटी-सी नदी के किनारे बैठ
की थीं कितनी ही बातें।)
प्रेमियों ने उस छोटी-सी नदी तक जाने के
ढूँढ़े कितने ही बहाने।

बस्ती के लोगों के बीच
जीवित हैं स्मृतियाँ
जिन्हें हाथ बढ़ाकर स्पर्श किया जा सकता है।
बस्तीवालों का कितना कुछ बदला था
उस नदी के जन्म के साथ।
उस नदी को धन्यवाद
जिसके खोने भर से खो नहीं जाते हैं वे क्षण
जो बीते थे उसके साथ।

हर छोटे क्षण
हर छोटी नदी
हर छोटे संघर्ष का भी अपना अतीत होता है
अपनी दास्तान होती है
जिससे जन्मती है ढेरों बड़ी सम्भावनाएँ
हर बार बरसाती नदी का खोना
उसके लौटने का इन्तज़ार है।

मोनालिसा

पृथ्वी के असीम विस्तार में
एक प्रश्नचिह्न-सी खड़ी
अपने दाएँ हाथ
और मुस्कुराहट से
दुनिया को चिढ़ाती,
हमेशा से उस दीवार पर टँगी
यात्रियों/कलाप्रेमियों के इन्तज़ार में
क्या कोई गणिका
या प्रचंड तेज धूल में

पिघलती हिमशिला-सी
मोनालिसा ?
हाँ, लोग तकते हैं
उसके दाएँ हाथ
उसकी मुस्कुराहट को
शायद मोनालिसा ?
एक चित्रकार की कूची की गुदगुदी
सारे शरीर में महसूस करती
कैनवास के अन्दर
चित्र में तब्दील होती मोनालिसा
सोमालिया, कालाहांडी, पलामू की सड़कों से गुजर
पिंजर होती काया से डरकर भागती
एक मुकम्मिल औरत नहीं
चित्र में पूरी तरह ढलकर जीती मोनालिसा।
आलोचकों का सारा ज्ञान ठहर जाता
उसके सुन्दर दाएँ हाथ
उसकी मुस्कुराहट पर
थके-हारे कला-आलोचकों का फतवा है-
‘‘विश्व के सारे चित्रों में बना सर्वश्रेष्ठ हाथ’’।
मोनालिसा,
लोगों के लिए एक प्रश्नचिह्न
वह हमेशा मुस्कुराती क्यों है ?
मोनालिसा क्या सचमुच हमेशा मुस्कुराती है

या किसी चित्रकार की ज़िद ?
वह भूल चुकी है अपने आपको
वह तो मुस्कुराती ही रहती है
सामने से गुज़रनेवाला हर कोई
उसे एक चित्रकार दिखता है।
वह काँपती है
छिपकलियों/रेंगते कीड़ों से।
उसके मुस्कुराने से पहले
साफ करना होता है-
घर की छिपकलियों/रेंगते कीड़ों को।

मुस्कुराने के क्षण
न जाने कब कोई
छिपकली गुज़र जाए
दीवार के सामने से
और मोनालिसा का डरा विद्रूप चेहरा
प्रवेश कर जाए चित्र के अन्दर ?
वर्ष पर वर्ष बीत गए हैं
वह यूँ ही मुस्कुराती है।
अभी तक चेहरे पर झुर्री नहीं
उतनी ही ताज़गी
शायद पराशर की अंकशायिनी
अक्षतयौवना
मोनालिसा ?
हाथ में उतनी ही कोमलता
अब तक मोटी-मोटी
नसों की धारियाँ नहीं
केतकी के फूल की तरह
मुस्कुराती है मोनालिसा।

एक दिन शहर की कला-दीर्घा में घूमता
अपने गाँव का
भोलुआ गड़ेरी ने पूछा था-
यही है मोनालिसा ?
क्या यह कभी धान नहीं काटती थी ?
पति-बच्चों के लिए रोटी नहीं बेलती थी ?
छीः
ऐसे चिकने
मुर्दे के जैसे हाथ !

इससे सुन्दर तो
गाँठ पड़े, नसों से भरे
हमारी माई के हाथ हैं।
इससे अच्छा तो
अपने आँचल को दाँतों से दबाए
हमारी मेहरिया मुस्काती है।
चित्रों तक ठहर नहीं जाती है सारी दुनिया
ऐसे ही निर्जीव हाथ
चित्रों की शोभा बढ़ाते हैं।
तब पहली बार काँप उठी थी मोनालिसा
और स्तब्ध रह गए थे कला-आलोचक।

तुम जीवित हो

आज तुम नहीं हो
सगीर भाई !
लेकिन आज भी सुरक्षित है वह रजाई
मेरे बच्चे
जब जी चाहता है
दुबक जाते हैं उसमें,
खेलते हैं लुका-छिपी का खेल
तुम्हारी धुनिया का संगीत
अब भी गूँजता है उसमें
जब दो पल्लों में रुइयों को भरकर

तुमने की थी सिलाई
तब कितनी चमक थी
तुम्हारी उन आँखों में ?
कैसी नैसर्गिक शान्ति थी
तुम्हारे उस चेहरे पर ?
मानो
सारे विश्व के लोगों को
तुमने डाल रखा है
उन्हीं दो पल्लों के बीच
आज भी ढूँढ़ते हैं तुम्हें
उस रजाई में
जब भी हम
उनसे छीनना चाहते हैं रजाई,
वे उससे और चिपक जाते हैं।
तब मुस्कुरा उठता है
दो पल्लों के बीच बसाया तुम्हारा विश्व।

सारी रजाई मानो बदल जाती है
जीवित रक्त-नलिकाओं में
और उसमें बहने लगता है
कीटाणु-रहित मिश्रित रक्त।

तब हमें लगता है
सुरक्षित हैं हमारे बच्चे,
हमारा भविष्य
तुम्हारी उस रजाई में।
शायद उस रजाई के छीने जाने पर
वे हमें....
अपने माँ-बाप को,
अपने पूर्वजों को कभी माफ नहीं करेंगे।

बच्चों को देख
हमें ऐसा लगने लगा है
हमारे बच्चों के साथ
रजाई भी सुरक्षित रहेगी, सगीर भाई !
जब भी हम लोग
उस रजाई के पल्लों के बीच से
ढूँढ़ने की कोशिश करेंगे
अयोध्या
रोम
मक्का
तब उन बच्चों की जलती आँखें कहेंगी-

हमें नहीं चाहिए कोई दिव्य भवन,
हमारे लिए तो
सगीर चाचा की रजाई ही होगी
अयोध्या,
रोम,
मक्का।
और तब हमें नहीं लगेगा।
कि तुम
जीवित नहीं हो सगीर भाई !

यात्रा

मैं जानता हूँ
यह समुद्री तूफानों का समय है,
फिर भी मुझे चलना है
समय कम है,
मंजिल बहुत दूर।
तुम इसे मेरा पागलपन भी कह सकते हो,
लेकिन मैं अकेला नहीं
मेरे जैसे कई पागल पथिक
तुम्हें रास्तों में मिल जाएँगे।

यह यात्रा है
उनको आवाज़ देने के लिए,
जिनके घरों के दरवाज़े
चारों ओर से बन्द हैं।
यह यात्रा है उनके लिए
जिन्हें मैं प्यार करता हूँ
इसमें मेरी पत्नी है,
बच्चे हैं,
मेरे वे साथी हैं
जिनके साथ बैठ
वटवृक्ष के नीचे हमने सपने देखे थे।

यह समय घर में बैठ
प्यार करने का नहीं
न बेमतलब की बातें करने का है-
यह समय सारी ज़ंजीरें तोड़कर
बाहर निकलने का है,
क्योंकि आसमान को खुली आँखों से
देखने के लिए ज़रूरी है
अपने ही हाथों अपनी छतें नोंच डालना।

यात्रा के लिए ज़रूरी है
अपने ही ज़ख़्मों को
अपना साथी बना लेना
इस यात्रा में
इस खुले आसमान के नीचे
आज मैं अपनी प्रिया को
ऐसे प्यार करना चाहता हूँ
कि जब भी उसे चुमूँ,
आसमान का चेहरा लाल हो जाए।
जब भी उसे छूऊँ,
सारा जंगल सिहर जाए।

जब भी उसके अलकों से खेलूँ
जंगल के सारे मोर नाच उठें।
मैं अपने बच्चों को
ऐसे प्यार करना चाहता हूँ
कि उन्हें प्यार करूँ
और विश्व के सारे बच्चे
खिलखिलाकर हँस पड़ें।
इस लम्बी यात्रा में बहुत कुछ मेरे साथ है-

प्रिया के होठों की तपिश,
उसकी साँसों की गरमाहट,
माँ की सिली हुई कथरी,
घास पर पड़ी
ओस की बूँदों की रात की सिहरन...
वटवृक्ष की जड़ें भी हैं,
जिन्हें मैंने अन्दर जमा ली हैं
जो काम आएँगी
चट्टानों के बीच धँसने में।

यह यात्रा है...
यह यात्रा है उनके लिए जो किसी द्वीप पर

आज भी इन्तज़ार कर रहे हैं
किसी जहाज के आने का।
यह यात्रा है उनके लिए,
जो हजारों सालों से
आग के पास बैठे हैं
लेकिन ठंडे हैं।

यह यात्रा है उनके लिए
जो घास के मैदानों में दौड़ते हैं
लेकिन उनकी आँखों की
हरियाली सूख गई है।
यह यात्रा है उनके लिए
जो सुनकर भी बहरे हैं
देखकर भी अन्धे हैं
क्या तुम भी शामिल होना चाहोगे इस यात्रा में ?

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