जपुजी तथा सुखमनी साहिब - नन्द कुमार अवस्थी Japuji Tatha Sukhmani Sahib - Hindi book by - Nand Kumar Awasthi
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जपुजी तथा सुखमनी साहिब

नन्द कुमार अवस्थी

प्रकाशक : भुवन वाणी ट्रस्ट प्रकाशित वर्ष : 1992
पृष्ठ :163
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2778
आईएसबीएन :00-0000-00-0

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इसमें प्रत्येक सन्त की वाणी को सम्पूर्ण विश्व के घर-घर में पहुँचाने का वर्णन है...

Japuji Tatha Sukhamani Sahib

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

एक मुस्लिम मोमिन, एक सचमुच एक धर्मपरायण विद्वान की लेखनी से श्री जपुजी और सुखमनी के सम्बन्ध में उपर्युक्त इस महिमा-गान के बाद अब पाठकों को कुछ लिखने बताने के लिए शेष नहीं रहता। आशा है, मनुष्य रचित इन साम्प्रदायिक दीवारों को लाँघकर राष्ट्र के सभी भाषा-भाषी जन गुरु नानकदेव जैसे महान् पथप्रदर्शक के पुण्य कथनों को पढ़कर जीवन-पथ सफल करेंगे।

निवेदन


प्रत्येक क्षेत्र प्रत्येक सन्त की बानी।
सम्पूर्ण विश्व में घर-घर है पहुँचानी।।

हिन्दी, उर्दू (अ़रबी-फ़ारसी सहित), संस्कृत, बँगला, असमी, ओड़िया, कश्मीरी, मराठी, गुरुमुखी, गुजराती, तमिळ, तेलुगु, कन्नड़ मलयाळम, सिन्धी, नेपाली, राजस्थानी आदि भाषाओं तथा अनेक बोलियों के सत्साहित्य को, देवनागरी लिपि में धारावाहिक सानुवाद लिप्यन्तरण द्वारा, भारत के जन-जन तक पहुँचाना, अधिकाधिक भाषाओं का शिक्षण, प्रसारण और ज्ञान प्राप्त कराते हुए इनको एक सूत्र में पिरोहना-यही ‘भुवन वाणी ट्रस्ट’ संस्था का पावन उद्देश्य है। इससे न केवल हिन्दी अहिन्दी, प्रत्युत प्रत्येक भाषा का प्रचार-प्रसार राष्ट्र के कोने-कोने में व्याप्त होगा।

इसी कार्यक्रम के अधीन, गुरुमुखी में नित्य पठनीय, श्री गुरु नानकदेव महाराज की अमरवाणी ‘‘श्री जपुजी’’ तथा श्री गुरु अर्जुनदेव महाराज की भक्ति और ज्ञान से ओत-प्रोत अद्वितीय रचना ‘सुखमनी साहिब’’ का देवनागरी लिपि में लिप्यन्तरण मर्मज्ञ पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत है। गुरुमुखी मूल पाठ को हिन्दी अक्षरों में देते हुए श्रीमद्भागवतगीता के सफल उर्दू पद्यानुवादक खानबहादुर ख्वाजः दिलमुहम्मद साहब, एम.ए. सब रजिस्ट्रार लाहौर, फ़ेलो पंजाब यूनीवर्सिटी, ट्रस्टी लाहौर इ. ट्रस्ट तथा रिटायर्ड प्रिंसिपल, इस्लामिया कालेज, लाहौर द्वारा रचित प्रमाणिक और सुमधुर उर्दू काव्य को भी हिन्दी में लिप्यन्तरित किया गया है। अंग्रेजों के शासनकाल में पंजाब सरकार ने इन उर्दू अनुवादों को सम्मानित और पुरस्कृत किया था। पंजाब में जनता मुग्ध होकर ख्वाजः साहब के इस अनुवाद का नित्य झूम-झूमकर पाठ करती है। आज वह अमर वाणी देवनागरी लिपि के माध्यम से सारे राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत हो रही है। इस अमूल्य जप-स्तोत्रों के सम्बन्ध में ख्वाजः साहब की लेखनी से ही प्रवाहित पावन विचारधारा का आनन्द लीजिए:-

जपुजी


‘‘जपुजी वह मुक़द्दस’1 इर्फ़ानी2 और रुहानी3 पाक कलाम है, जिसे लाखों इंसान सुबह के सुहाने वक़्त में अपने ख़ालिक़4 के हुजूर में तवज्जुह5 और शौक़ से पढ़ते हैं और उसके सामने अपने अब्द6 का इज़हार करके अब्द7 और माबूद8 का रिश्तः उस्तुवार9 करते हैं। यह मुनाजात10 पंजाब के मुस्लेह आजम11 खुदारसीदा12 बुज़ुरिग बाबा गुरु नानक साहब की मुबारक जबान से निकली है। उनके अक़ीदतमन्द13 इस मुक़द्दम नज़्म के एक-एक लफ़्ज को हिर्ज़ेजा14 समझते हैं और उस दुआए सहरी15 दुरूद16 को हर दो जहान में अपने लिए मूजिब नजात17 मानते हैं।’’

‘‘मैंने इस पाक कलाम को आसान ज़बान और मुतरन्निम-बहर18 में नज़्म करके असल और तर्जुमा साथ-साथ दर्ज कर दिये हैं, ताकि पढ़ते वक़्त सुहूलियत हो और मतलब फ़ौरन ज़ेह्न-नशीन19 हो जाये। ग़रज़ यह है कि इस मुक़द्दस नज़्म और प्यारे क़लाम को सिख साहबान के अलावः दीगर उर्दू-दाँ हज़रात हिन्दू मुस्लिम ईसाई वग़ैर : भी पढ़ें, और इससे मुस्तफ़ीद20 हों। इंसान का सबसे पहला फ़र्ज़ खुदाए तआ़ला को सच्चा यानी अज़ली21 अबदी22 हस्ती23 मानना, उसको माबूद और ख़ुद को उसका बन्दा समझना है। बाबा गुरु नानकजी के इर्शादात24 का तर्जुमः मुलाहजः हो।

सुखमनी साहिब


‘‘सुखमनी साहिब वह मुक़द्दस1 नज़्म है, जिसे सिख मत के पाँचवें रहनुमा25 श्री गुरु अर्जुनदेव साहब ने तस्नीफ़ किया। यह नज़्म श्री गुरुग्रन्थ साहिब में शामिल है। गुरु अर्जुनदेव सन् 1563 ई. में पैदा हुए और सन् 1606 ई. में वासिल-बहक़26 हुए। यह नज़्म एक ख़ामोश जंगल
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1.    पवित्र 2. ब्रह्मज्ञान-सम्बन्धी 3. आत्मिक 4. सिरजनहार 5. ध्यान, लगन 6 नम्रता 7. भक्त 8.भजनीय (परमात्मा) 9. दृढ़, स्थायी 10. स्तोत्र 11. सुधारकों में शिरोमणि 12. ईश्वरप्राप्त 13. अनुयायी 14. जीवनकवच 15. भजनप्रभाती 16. ईश्वर-प्रार्थना 17. मुक्तिद्वार 18. संगीतलहरी 19. याद, स्मरण 20. लाभान्वित 21. अनादि 22. नित्य 23. वास्तविक, सत्यस्वरूप 24. आदेशों 25. पथप्रदर्शक 26. ब्रह्मलीन।
में ‘रामसर’ तालाब के पास लिखी। यह तालाब अमृतसर के जुनूब1 में वाकिअ़ है। हज़ारों सिख और गैरसिख साहबान इस मुक़द्दस नज़्म को सुबह के वक़्त तिलावत (पाठ) करके अपनी लगन खुदा से लगाकर दिल का सुख और रूह को आनन्द हासिल करते हैं।’’

‘‘सुखमनी साहिब के अल्फ़ाज एक ऐसे आरिफ़-हक़ीक़ी2 के जज़बात3 का मरक़्क़्अ़4 हैं, जिसे हर तरफ़ ख़ुदा की जात और उसी का जमाल5 और जलाल6 नज़र आता है। यह ऐसे दिल की आवाज़ है, जो भक्ति और ज्ञान से भरपूर प्रेम और मुहब्बत में सरशार7 अपने मालिक अपने महबूब8 की याद में सरमस्त9 है, और जिसे ख़ुदा के सिवा कोई और लगन नहीं।’’ 
‘‘सुखमनी साहिब वह मन (मणि) यानी हीरा है, जिसकी बरक़त से सुख हासिल होता है। यह वह नज़्म है, जो मन को सुख देती है। इसको पढ़ने से इंसान खुदा से लौ लगाता और दुनिया के मक्र व फ़रेब और फ़िक्र व तरद्दुद से नजात हासिल करता है।’’
‘‘तर्जुमा आसान उर्दू यानी हिन्दुस्तानी ज़बान में नज़्म किया गया है। ताकि तमाम खुदापरस्त हिन्दुस्तान के बाशिन्दे ख्वाह वह किसी मजहब के पैरो हों, इसका मफ़हूम10 समझकर इसकी तिलावत (पाठ) कर सकें।’’
एक मुस्लिम मोमिन, एक सचमुच धर्मपरायण विद्वान् की लेखनी से ‘‘श्री जपुजी’’ और ‘‘सुखमनी साहिब’’ के सम्बन्ध में उपर्युक्त इस महिमा गान के बाद अब पाठकों को कुछ लिखने-बताने के लिए शेष नहीं रहता। भाषाभाषी जन गुरु नानकदेव जैसे महान् पथप्रदर्शक के पुण्य-कथनों को पढ़कर जीवन-पथ सफल करेंगे।

-लिप्यन्तरणकार

1. दक्षिण 2. ब्रह्मवेत्ता 3 भावनाओं 4 संग्रह 5 छवि, सौन्दर्य 6 तेज 7 परिपूर्ण 8.प्रियतम (परमात्मा) 9 मगन, विभोर 10 आशय।

जपुजी (सटीक)
(ख़्वाजा दिल मुहम्मद द्वारा मधुर अनुवाद सहित)
मंगलाचरण
मंत्र


1 ओं सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु
अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि।।
1 एक ओंकार1 खुदा है वाहिद, सच्चा जिसका नाम।
कर्ता-धर्ता दुनिया का, बेडर बे-लाग मुदाम2।।
मौत से बाला, पाक जनम से, क़ायम अपने आप।।
अपने गुरु की रहमत से, तू नाम इसी का जाप।।

जपु


आदि सचु जुगादि सचु।
है भी सचु नानक होसी भी सचु।।1।।
सच्चा रोज़ अज़ल3 से पहले, सच्चा रोज़ अजल भी वह।
सच्चा है वह आज भी ‘नानक’, सच्चा होगा कल भी वह।।

पौड़ी 1


सोचै सोचि न होबई जे सोची लखवार
चुपै चुप न होवई जे लाई रहा लिवतार।
भुखिया भुख न उतरी जे बंना पुरीआ भार।

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1 (सत्यस्वरूप एक ओंकार अनादि, अनन्त और भूत-भविष्य-वर्तमान, हमेशा स्थित है) 2 हमेशा 3 रचनाकाल।

गुरमुखी (नागरी लिपि)
सहस सिआणपा लख होहि त इक न चलै नालि।
किव सचिआरा होईए किव कूड़ै तुटै पालि।
हुकमि रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि।।1।।

सोच किए कब सोच में आए    सोच जो लाखों बार करें
चुप रहने को मन कब चुप हो    चुपके ध्यान ह़जार करें
   भूखे रहकर भूख न जाए        बाँध के गो, कुल दुनिया लाएँ
   लाख-हज़ार करें चतुराई          एक भी साथ न लेकर जाएँ
   झूठ का पर्दा चाक हो क्योंकर     सच वाले बन जाएँ हम
   हुक्मरज़ा1 पर चलना ‘नानक’    साथ यह लिक्खा लाए हम।।1।।

पौड़ी 2


हुकमी होवनि आकार हुकमु न कहिआ जाई।
हुकमी होवनि जीअ हुकमि मिलै वडिआई।
हुकमी उतमु नीचु हुकमि लिखि दुख सुख पाईअहि
इकना हुकमी बखसीस इकि हुकमी सदा भवाईअहि।
हुकमै अंदरि सभु को बाहरि हुकम न कोई।
नानक हुकमै जे बुझै त हउमै कहै न कोई।।2।।

हुक्म से बन-बन जाएँ शकलें  हुक्म के भेद न खोले जाएँ

हुक्म से तन में रूहें आएँ   हुक्म से शान बड़ाई पाएँ

हुक्म से इज़्ज़त हुक्म से दौलत  हुक्म का लिक्खा सुख-दुख पाएँ

हुक्म से इस पर बख़्शिश हो इक  हुक्म से चक्कर खाते जाएँ

हुक्म खुदा में दुनिया सारी    हुक्म से बाहर कोई न जाए

हुक्म ख़ुदा जो समझे ‘नानक’   अपनी ‘हूँ, मैं’’2 आप मिटाए।।2।।

पौड़ी 3


गावै को ताणु होवै किसै ताणु। गावै को दाति जाणै नीसाणु।।
गावै को गुण वडिआईआ चार। गावै को विदिआ विखमु वीचारु।।
गावै को साजि करे तनु खेह। गावै को जीए लै फिरि देह।।
गावै को जापै दिसै दूरि। गावै को वेखै हादरा हदूरि।।

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1 परमेश्वर की प्रसन्नता 2 अहंकार भाव।

कथना कथी न आवै तोटि। कथि कथि कथी कोटि कोटि कोटि।।
देदा दे लैदे थकि पाहि। जुगा जुगंतरि खाही खाहि।।
हुकमी हुकमी चलाए राहु। नानक विगसै बेपरवाहु।।3।।

गाए कौन ख़ुदा की क़ुदरत   ताब ये किस इंसान में है

गाए कौन ख़ुदा की रहमत  माहिर कौन निशान1 में है

गाए कौन ख़ुदा की अज़मत2  आलीशान वक़ार3 उसका

गाए कौन ख़ुदा की हिकमत  मुश्किल सोच-विचार उसका

गाए कौन उसे जो तन को  जीनत4 देकर ख़ाक बनाए

गाए कौन उसे जो पैदा  करके मारे और जिलाए

गाए कौन उसे जो हमसे   पास भी है और दूर भी है

गाए कौन उसे जो हाज़िर5  नाजिर6 पाक हुजूर भी है

खत्म न होंगी उसकी बातें  सारा हाल बयान न हो

वस्फ़7 करोड़ों गायें करोड़ों  पूरी लेकिन शान न हो

लेने वाले थक जाते हैं     दाता देता जाता है

जुग जुग में हर खानेवाला   उसकी निअ़मत खाता है

हुक्म से अपने हाकिम ने  दुनिया को राह दिखाई है

खुद आनन्द रहे वह ‘नानक’  कैसी बेपरवाई है।।3।।

पौड़ी 4


साचा साहिबु साचु नाइ भाखिआ भाउ अपारु।
आखहि मंगहि देहि देहि दाति करे दातारु।
फेरि के अगै रखीऐ जितु दिसै दरबारु।
मुहौ कि बोलणु बोलीऐ जितु सुणि धरे पिआरु।
अम्रित वेला सचु नाउ वडिआई वीचारु।
करमी आवै कपड़ा नदरी मोख दुआरू।
नानक एवै जाणीऐ सभु आपे सचिआरु।।4।।

सच्चा है वह मालिक सच्चा  सच्चा प्यारा नाम उसका

बेहद उल्फ़त बोली उसकी बेहद प्रेम कलाम उसका

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1 चिन्ह 2 महिमा, बुजुर्गी 3 प्रतिष्ठा 4 शोभा, रौनक़ 5 सब जगह मौजूद 6 सर्वद्रष्टा 7 गुण, सिफ़्त।

दुनिया माँगे दाता बख्शे   जो माँगे हर बार मिले

पेश करें दरबार में क्या, तोहाफ़ा  जिससे दीदार1 मिले

मुँह से बात कहे क्या बन्दा   जिससे मालिक प्यार करे

नूर के तड़के सच्चे नाम और   शान पे सोच विचार करे

ख़िलअ़त पायें कर्मों से2       रहमत से मुक्ती द्वार आएँ3

सब कुछ आप वह सच्चा रब है   ‘नानक’ मन में ऐसा पाएँ।।4।।

पौड़ी 5


थापिआ न जाइ कीता न होइ।
आपे आपि निरंजनु सोइ।
जिनि सेविआ तिनि पाइआ मानु।
नानक गावीऐ गुणी निधानु।
गावीऐ सुणीऐ मनि रखीऐ भाउ।
दुखु परहरि सुखु घरि लै जाइ।
गुरमुखि नादं गुरमुखि वेदं गुरमुखि रहिआ समाई।
गुरु ईसरु गुरु गोरखु बरमा गुरु पारबती माई।
जे हउ जाणा आखा नाही कहणा कथनु न जाई।
गुरा इक देहि बुझाई
सभना जीआ का इकु दाता सो मै विसरि न जाई।।5।।

कौन करे बुत क़ायम4 उसका  कौन बनाने वाला है

आप से आप निरंजन5 है वह  इस माया से बाला है

जो पूरे हो मान* उसी का   पूजा मान का ज़ीना है

हम्द6 कर उसकी ‘नानक’ जो   सब वस्फ़ों का गंजीना7 है

हम्द भी कर तू हम्द भी सुन  जब मन में प्रेम बसाएगा

सब तेरे दुख दूर हटाकर   सुख के घर ले जाएगा

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1. दर्शन 2. कर्मों से मनुष्य-शरीर मिलता है 3. ईश्वर-कृपा से मुक्ति प्राप्त होती है 4. स्थापना करे 5. निर्विकार, निर्मल 6. स्तुति 7. गुणों का ख़ज़ाना।

*जिसने सेवा की उसी को उस ब्रह्म का ‘मान’, उसकी पहचान होती है। ‘मान’ के अर्थ इज्जत’ भी हैं।

गुरु की बातें नाव समझ ले  गुरु की बातें बेद समझ

गुरुमुख में वह आप समाया   गुरुमुख का यह भेद समझ

ईश्वर-विष्णु-ब्रह्मा तीनों*         मज़हर1 गुरु की क़ुदरत के

सरस्वती-लक्ष्मी-पार्वती सब   नाम हैं गुरु की क़ूवत2 के

जानूँ भी गर उसकी बातें     क्योंकर खोल सुनाऊँ मैं

क्योंकर बात सुनाऊँ उसकी    लफ़्ज कहाँ से लाऊँ मैं

ऐ गुरु मुझको ज्ञान अता कर   एक अहद3 को पाऊँ मैं

सब दुनिया का एक ही दाता    उसको भूल न जाऊँ मैं।।5।।

पौड़ी 6


तीरथि नावा जे तिसु भावा विणु भाणे के नाई करी।
तेजी सिरठि उपाई वेखा विणु करना कि मिलै लई।
मति विचि रतन जवाहर माणिक जे इक गुर की सुख सुणी।
गुरा इक देहि बुझाई।
सभना जीआ का इकु दाता सो मैं विसरि न जाई।।6।।
तीरथ का स्नान यही है  अपने रब को भाऊँ मैं

रब को आप न भाऊँ मैं  तो तीरथ ख़ाक नहाऊँ मैं

जो जो मख़लूक़ात4 हुई  सब मैंने देखी भाली है

अच्छे करम न हों जब पल्ले  हाथ जज़ा5 से ख़ाली है

हीरे लाल जवाहर सब   दानिश6 में अपनी पाये तू

गुरु की एक हिदायत सुनकर  काम में जब ले आये तू*

ऐ गुरु मुझको ज्ञान अता कर  एक अहद को पाऊँ मैं


सब दुनिया का एक ही दाता   उसको भूल न जाऊँ मैं।।6।।

पौड़ी 7


जे जुग चारे आरजा होर दसूणी होइ।
नवा खंडा विचि जाणीऐ नालि चलै सभु कोई।
चंगा नाउ रखाउ कै जसु कीरति जगि लेइ।

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1 द्योतक 2 शक्तियों के 3 एकमेव ईश्वर, 4 सृष्टि 5 पुण्यफल 6 बुद्धि *यहाँ ईश्वर से मतलब ‘शंकर’ है। गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवमहेश्वरः।
*बुद्धि से संसारी पदार्थ मिलते हैं, किन्तु गुरु के पथ-प्रदर्शन से ज्ञान जागता है; और तभी सब पदार्थों का मिलना सार्थक होता है।

जे तिसु नदरि न आवई त वात न पुछै के।
कीटा अंदरि कीटु करि दोसी दोसु धरे।
नानक निरगुणि गुणु करे गुणवंतिआ गुणु दे।
तेहा कोइ न सुझई जि तिसु गुणु कोइ करे।।7।।







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