खलीफों की बस्ती - शिवकुमार श्रीवास्तव Khalifon ki Basti - Hindi book by - Shivkumar Srivastava
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खलीफों की बस्ती

शिवकुमार श्रीवास्तव

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :252
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2752
आईएसबीएन :81-7119-623-3

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दलितों के प्रति सवर्णों के रवैए का रोचक और मार्मिक साक्ष्य....

Khalifon Ki Basti

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश


ख़लीफों की बस्ती शिवकुमार श्रीवास्तव का दूसरा उपन्यास है-एक नितान्त भिन्न कथा-भूमि पर रचा गया। बिल्लेसुर बकरिहा और कुल्लीभाट की परम्परा में यह उपन्यास लेखक के नये अनुभव-क्षेत्र का बखान है। बुंदेलखण्ड में ख़लीफ़ाओं का माफ़िया राज चलता है। ज़ोर-ज़बर्दस्ती से अपनी बात मनवाना, काइयाँपन से कानून की दीवारों में सेंध लगाना तथा शालीनता, मर्यादा और विधिसम्मत जीवन के पक्षधरों को अपना शिकार बनाना इन ख़लीफ़ाओं की पहचान में शामिल है। इस उपन्यास की बस्ती के ख़लीफ़ाओं में छोटे-मोटे नेता हैं, पीत-पत्रकार हैं, नकली डॉ. हैं, छात्र नेता हैं, ठर्रा उतारने वाले हैं, बेकार तरूण है, साधारण व्यापारी हैं जो अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी करने से गुरेज नहीं करते। सत्ता और प्रतिष्ठान द्वारा संरक्षित ये शक्तियाँ आज भी वैसी ही हैं जैसे महाभारत काल में थीं-महाभारत का एकलव्य आज सखाराम है और द्रोण-उसके तो कई रूप हैं-विधायक, पुलिस इंस्पेक्टर, डॉक्टर।

यह उपन्यास दलिल विमर्श नहीं है, लेकिन दलितों के प्रति सवर्णों के रवैये का रोचक और मार्मिक साक्ष्य अवश्य उपलब्ध कराता है जाति विभक्ति समाज में जातियों के भीतरी अंतर्घातों और पारस्परिक दाँव-पेंचों की यह कथा हमें विचलित तो करती ही है, दुनिया को बेहतर बनाने की प्रेरणा भी देती है।

व्यंजक भाषा, बिम्बबहुल चित्रण और चुटीले संवादों के कारण ख़लीफ़ों की बस्ती औपन्यासिक प्रवृति का नया उदाहरण है, जो समाज के हाशिये पर पड़ी हुई जातियों और वर्गों को समाज के मुख्य प्रवाह में लाने की रचनात्मक कोशिश करता है।   


 ‘‘बलदेव ! भूषण ! तुम लोग क्या कर रहे थे-वे डाकू नहीं है ?’’ इंस्पेक्टर ने पूछा।
‘‘सर ! वे डाकू नहीं थे।’’ बलदेव ने कहा। ‘‘तुम मुझसे ज्यादा जानते हो ?’’
‘‘नहीं सर ! आप कहते हैं तो वे जरूर डाकू होंगे। मगर थे वो कप्तान और बंजारा ही।’’ इंस्पेक्टर ने झटके से पुलिस वॅन के केबिन से एक दुनाली बन्दूक उठा ली और पलक झपकते ही दो फायर किए। हेड कांस्टेबल बलदेव और भूषण कटे वृक्ष की तरह गिर पड़े...। इंसपेक्टर ने अपना सर्विस रिवाल्वर निकाल लिया, फिर उसने उन्हें सम्बोधित किया, ‘‘तुम सब पुलिस के वफादार आदमी हो। गद्दारों का अंजाम देखा ?’’ हेड कांस्टेबल बलदेव और कांस्टेबल भूषण की लाशों की तरफ इशारा किया। ‘‘कप्तानसिंह और बंजारासिंह दूजा बब्बा के गैंग में शामिल हो चुके थे। उन्होंने पुलिस पर गोली चलाई जिसमें दोनों बहादुर हेड कांस्टेबल मारे गए। एन्काउण्टर में डाकू भी मारे गए। उन्हें लिक्विडेट करने का हुकुम ऊपर से आया था। हमने वह हुकुम बजाया है-समझे ?’’
दूसरे दिन सबेरे सभी समाचार पत्रों में एन्काउटर के मारे गए डाकूओं और पुलिस के जवानों के चित्रों के साथ एन्काउण्टर का विस्तृत वर्णन छपा। शहीद हुए कांस्टेबलों को श्रद्धांजलि दिए जाने के बाद पूरे सम्मान से उनकी अंत्येष्टि की गई।

ख़लीफ़ों की बस्ती


‘‘साली छिनाल है दम्मो। चकला कायम कर दिया है। झुरपुटे से ही साले हरामी आने लगते हैं।’’ पंडित मुरलीधर ने कहा।
गप्पन खलीफा बसूला पुल पर बैठे थे। उखड़ गए, ‘‘क्या बकता है बे पंडत ?’’ ‘‘क्या बकता हूँ ? ठीक कह रहा हूँ। बस्ती के सारे छोकरों को बरबाद कर रही है। कच्ची दारू उतारती है, पिलाती है, छिनाला करती है। साला रग्गे नाकारा...’’ पंडित मुरलीधर का स्वर ऊँचा हो गया था।

गप्पन खलीफा का पारा चढ़ गया। उसने गरजकर कहा, ‘‘आगे एक भी शब्द दम्मो भौजी के खिलाफ बोला तो मैं तेरा मुँह तोड़ दूँगा।’’ आवाज में क्रोध था और धमकी भी।
भीड़ इकट्ठी होने लगी। मौजी जोशी आ गया। इकबाल दुकान जा रहा था, रुक गया। वार्ड मेम्बर जाटव चौबेजी की चाय की दुकान पर बैठे थे, लपककर पुल पर पहुँच गए। सरदार कप्तानसिंह परगट हो गया। दूर से रग्गे पहलवान आता दिखा।
भीड़ देखकर पंडित तैश में आ गया। इतने लोगों के सामने गप्पन ने उसको धमकी दे दी थी। वह गरजा, ‘‘किस-किसका मुँह बंद करोगे, खलीफा ? सारे मुहल्ले को मालूम है, दम्मो दारू उतारती है और चाँदी के टुकड़ों पर मुस्टंडों के सामने बिछ...’’

गप्पन ने लपककर पंडित मुरलीधर के बाल पकड़ लिए। मुरलीधर असावधान थे-गप्पन हमला कर बैठेगा, इसकी आशंका नहीं थी। कप्तानसिंह ने आगे बढ़कर मुरलीधर को पीछे से झापड़ जमा दिया।
डॉक्टर मस्ताना धर्मशाला से निकल आया। कहा, ‘‘मार साले को !’’

मुरलीधर बसूला पुल पर औंधा गिर पड़ा। मौजी जोशी ने एक लात मारी। अब तक रग्गे पहलवान घटनास्थल पर पहुँच गया था। उसने देखा, गप्पन खलीफा और मुरलीधर में लड़ाई हो रही है। क्यों हो रही है, उसे पता नहीं था। मगर वह अपने हाथ वाली लाठी घुमाने लगा। भीड़ दस-दस, बीस-बीस कदम पीछे हट गई। पुल पर मिलने वाली चारों सड़कों पर तांगें, साइकिलें, ठेले, आदमी और जानवर रुक गए।

बसूला ब्रिगेड के सातों सदस्य-गप्पन खलीफा, रग्गे पहलवान, मौजी जोशी, डॉक्टर मस्ताना, सरदार, कप्तानसिंह, इकबाल मियाँ और मेम्बर जाटव उत्तेजित थे। इस बीच मास्टर वसंतीलाल वर्मा भीड़ चीरते हुए आया और गप्पन खलीफा का हाथ पकड़ लिया।
‘‘खलीफा, शांत हो जाओ। बस करो।’’
बसूला ब्रिगेड के लोग थम गए। जैसे फिल्म का फ्रीज शाट हो।

वे सात ही थे, केवल सात। मगर उन्हें लोग ब्रिगेड कहते थे। अक्सर बसूला पुल पर बैठे रहते इसलिए पूरी बस्ती में उन्हें बसूला ब्रिगेड के नाम से पहचाना जाता।
इस कस्बे में छावनी क्षेत्र को नगर निगम क्षेत्र से जो पुल जोड़ता है, उसका नाम बसूला पुल है। बसूला पुल पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाले एक बड़े नाले पर-नाला जो बरसात में उफनता है-बना है। इस नाले में सदर और भगवानगंज से आकर छह नालियाँ मिलती हैं। ये नालियाँ बस्ती के बरसाती पानी का निकास करती हैं। बस्ती का गंदा पानी भी नाले में विसर्जित करती हैं। यह पुल कब बना, यह बताना कठिन है। साठ वर्षों से हम उसे ऐसा ही देख रहे हैं। झाँसी-छतरपुर, जबलपुर, नरसिंहपुर को भोपाल से जोड़ने वाला यही पुल है।

बंबई, कलकत्ता और मद्रास, दिल्ली के मार्ग इसी पुल पर संधि करते हैं। अब इसे एक पल भी चैन नहीं है। उत्तर से झाँसी रोड, पूर्व स्टेशन रोड इस पुल पर आकर गले मिलती हैं। एक दूसरे से बतियाती हैं और विपरीत दिशा में अपने गंतव्य को चली जाती हैं। झाँसी से आने वाली सड़क की दाहिनी ओर दुर्गा मंदिर है, बाईं तरफ गुड़गंगा धर्मशाला। गंगाबाई चौकसे ने यह धर्मशाला लगभग पचास वर्ष पूर्व बनवाई थी-अपनी माँ गुड़ाबाई की याद में। एकमंजिली इमारत स्लेटी रंग के पत्थर से बनी है। गुड़ागंगा धर्मशाला के प्रवेश-द्वार के सामने कलकत्ता-बंबई रोड के दक्षिण में नाले के किनारे टीन की छत का सनीचर मंदिर है, जिसके पीछे ऊँचे पनघट वाला कुआँ है। एक पीपल का पुराना पेड़ भी है जिस पर अस्थि-कलश टाँगे जाते। इसके बाद ही पूर्व से बहता हुआ नाला आता है और पश्चिम को जाता है।

नाले के दोनों किनारों पर पाँच-पाँच सीढ़ियों वाले घाट हैं जिन पर मुहल्ले के लोग स्नान करते हैं, कपड़े धोते हैं तथा पिंडदान करते हैं। सनीचर के मंदिर के सामने भोपाल रोड के उत्तर में और नाले के दक्षिण में जानकीरमण का मंदिर है। जानकीरमण के मंदिर में प्रवेश-द्वार के सामने, नाले के पार उत्तर में वही दुर्गा मंदिर है जो झाँसी रोड की दाहिनी ओर है। तीनों मंदिर-दुर्गा मंदिर, सनीचर मंदिर और जानकीरमण का मंदिर कब बने, कोई नहीं जानता। शायद बसूला पुल का जन्म और इन मंदिरों की स्थापना करीब एक ही काल में हुई होगी। दुर्गा मंदिर और सनीचर के मंदिर की महिमा हमारे देखते ही देखते बढ़ी है। जानकीरमण मंदिर का प्रताप घटा है। परंतु जानकीरमण मंदिर बड़ा पुराना न्यास है। उसमें कई गाँव लगे हैं। पुराने रईसों ने, जागीरदारों और जमींदारों ने अपने पापों के प्रक्षालन के लिए समय-समय पर मंदिर को जो दान दिए-उनसे उसके नाम बड़ी जायदाद है।

सन् 1938 तक मंदिर और संपत्ति का प्रबंध मोहतमिमकार की हैसियत से महंत दामोदर दास करते थे। वे बैरागी थे। उनके काल में मंदिर अपने प्रताप के मध्याह्न में था। मंदिर के दरवाजे पर दो हाथी झूमा करते थे। महावत उन्हें रोज नहलाने के लिए सागर के तालाब ले जाया करते थे। दामोदर दास के पश्चात् उनके चेले लक्ष्मण दास ने मंदिर व मठ को सँभाला। उनके काल में मंदिर की श्री घूमिल पड़ी। अब उनके मरने के बाद, उनके दो चेलों-अवध दास और परमानंद दास-में संपत्ति के अधिपत्तय को लेकर लंबी मुकदमेबाजी चल रही थी। हाई कोर्ट में मुकदमा लंबित रहने के दौरान मंदिर तथा संपत्ति ‘व्यवस्थापक’ के अधीन थे।

जानकीरमण के मंदिर में राम-जानकी-लक्ष्मण की मूर्तियाँ हैं-उस प्रधान मंदिर के सामने ही हनुमान की मूर्ति भी स्थापित है जिसकी बगल में तीस फुट चौड़ा तीस फुट लंबा अखाड़ा है जिसे राम अखाड़ा कहते हैं। अखाड़े में सबेरे ब्रह्म मुहूर्त में आज भी कुछ नौजवान मुगदर घुमाते, डंड-बैठक लगाते, मलखम पर लिपटते, अखाड़े में जोर करते देखे जा सकते हैं। मंदिर के ख़लीफ़ा तो महंत ही होते हैं, परंतु उस्ताद थे-रग्गे पहलवान-अब किसी भी तरह से पहलवान नहीं लगते। दुबले-पतले मरियल। पर उनके बारे में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। लोग कहते हैं कि जवानी के दिनों में एक दंगल में फत्ते पहलवान से उनकी कुश्ती हुई। फत्ते पहलवान अपने जमाने का खास नामी पहलवान था-सारे हिंदुस्तान में उसका दबदबा था।

कभी किसी कुश्ती में उसके कंधे को, पीठ को मिट्टी नहीं लगी थी। जब कुर्ता-तहमद उतारकर अखाड़े में उतरता तो लोग उसके देह-सौंदर्य को देखते ही रह जाते। गोरी-लंबी-गठी हुई कद-काठी, बाँहों पर, कब्जों पर, रानों में, पिंडलियों पर उछलती-तड़पती मांसल मछलियों की विद्युत झलक का अलग सौंदर्य था जो एक सम्मोहन पैदा करता था। कुश्ती के लिए विरोध में अखाड़े में उतरे पहलवान को भी सम्मोहित करता था। कहते हैं कि हर जोड़ में फत्ते पहलवान की फतह होती थी। इसीलिए उसे फत्ते नाम मिल गया था। उसका असली नाम क्या था, अब यह अप्रासंगिक हो गया था। फत्ते कहाँ का रहने वाला था, यह भी किसी को नहीं मालूम। कोई उसे बलिया का बताता था-कोई पेशावर का। फत्ते कई मामलों में रहस्यमय था।

जब फत्ते ने इस बस्ती में एक दंगल में अपना लंगोट घुमाया तो कोई पहलवान मुकाबला करने अखाड़े में नहीं उतरा। फत्ते पहलवान दोनों हाथ उठाकर सामरिक नृत्य-मुद्रा में अखाड़े में चक्कर लगाते हुए बोला, ‘‘इस बस्ती में कोई पहलवान ही नहीं है।’’
महंत दामोदर दास को यह अपमान बरदाश्त नहीं हुआ। वे धोती खोलकर खड़े हो गए। अपने चेले बैरागी लक्ष्मण दास से बोले, ‘‘जाँघिया ले आओ।’’

महंतजी ऐंठ तो गए मगर अखाड़े में उतरने के पहले ही कनपटियों पर पसीनें की बूँदे झलक आईं। जानने वाले जानते थे कि महंतजी में अब वह दमखम नहीं रहा। लंगोट तो बाँधते हैं मगर लंगोट लंगोट ही है। कभी महंतजी ने-जब वे महंत नहीं, बैरागी दामोदर दास के चेला महंत हनुमान दास थे-पहलवानी और कुश्ती में नाम कमाया था। फत्ते की चुनौती स्वीकार करके महंतजी फँस चुके थे। उनको उबारा रग्गे पहलवान ने। उन दिनों वे रग्गे पहलवान नहीं थे-गंगाराम घोसी थे। गंगा ने आगे बढ़कर कहा, ‘‘महाराज महंतजी, हमारे रहते आप अखाड़े में उतरेंगे ? राम-राम ! ऐसा नहीं हो सकता। मैं हाथ मिलाऊँगा फत्ते पहलवान से।’’

सारे समुदाय में सनसनी फैल गई। गंगा अभी लड़का ही था। महंतजी की जमींदारी के एक गाँव का, किसान का बेटा। बोनी के दिनों में हल की मूठ पर उसकी पकड़ इतनी मजबूत होती कि सूर्योदय से दोपहर तक और कलेवा करने के बाद दोपहर से संध्या तक हल की मूठ न छूटती। शेष दिनों में वह मंदिर में रहता-महंतजी की सेवा में। शौकिया पहलवानी करने लगा था। महंत दामोदर दास ने ही गंडा बाँधकर अपना चेला बनाया था। गंगाराम अखाड़े में जोर करता, मलखम पर फिसलता, कैंची लगाता, मुगदर घुमाता और पाँच मील दौड़ लगाकर आता तो मंदिर के सामने स्थित कुएँ की जगत पर बैठकर घंटे-भर नहाता। मंदिर के भंडार से प्राप्त करके तर माल छकता। जब महंतजी गाँव जाते तो सात फुट का लट्ठ लेकर गंगा महंतजी के बिलकुल पीछे रहता। महंतजी घोड़े पर और गंगा पैदल। दमखमवाला नौजवान था, मगर फत्ते पहलवान के सामने बच्चा ही था। गंगा ने लंगोट बाँधा, जाँघिया कसा, महंतजी के चरण छुए, शहर के और अखाड़ों के उस्तादों और खलीफाओं के पाँवों को हाथ लगाया और सश्रद्धा अखाड़े की मिट्टी सिर पर डाली। इसके बाद सीधे फत्ते पहलवान की आँखों में देखा। गंगा की आँखों में अजीब चमक थी। एक उन्माद वाली चमक।

फत्ते पहलवान ने पैंतरा बदला, गंगा उस पैंतरे को देखकर हरकत में आया। फत्ते पहलवान ने दाहिने हाथ को आगे बढ़ाकर गंगा का ध्यान उस ओर खींचते हुए बायाँ हाथ बढ़ाकर गंगा की गर्दन पर दाँव लगाना चाहा। गंगा बहुत चौकन्ना था। फत्ते पहलवान का बाया हाथ गंगा की पकड़ में आ गया। उसने फत्ते पहलवान का हाथ ऐसे जकड़ लिया जैसे हल की मूठ पकड़ ली हो। फत्ते ने दो झटके दिए, मगर गंगा की पकड़ ढीली नहीं हुई। फत्ते पहलवान के चेहरे पर एक क्षण को चिंता की इबारत आई। गंगा ने फत्ते का हाथ छोड़ दिया और हलके से हँसा। लोगों ने देखा, गंगा में आत्मविश्वास था-मूर्खता की सीमा तक।

फत्ते पहलवान ने फिर पैंतरा बदला, अजगर की तरह लहराती दोनों भुजाओं को दोलित किया और गंगा पर लपका। गंगा ने फिर फत्ते पहलवान की बाईं कलाई थाम ली। दोनों पहलवान अखाड़े की मिट्टी में खंबे की तरह पाँव रोपकर एक-दूसरे को तौलने लगे। फत्ते गंभीर था। गंगा मुसकरा रहा था, जैसे कोई बच्चा सपने में मुसकराए। ऐसा लगा, काफी समय गुजर गया। बिजली की तरह फत्ते पहलवान तड़पा, उसने ‘धोबी पछाव’ दाँव लगाया। गंगा फत्ते की बाएँ हाथ की कलाई पकड़े था-पकड़ नहीं छूटी।

मगर फत्ते के दाँव पर उसके पाँव जमीन से उखड़ गए और वह हवा में था। उसने फत्ते की कलाई पर ही वजन डालकर हवा में ही पलटी लगाई और फत्ते की गर्दन पर गिरा। यह झटका फत्ते से सँभाला नहीं गया। वह अखाड़े की मिट्टी पर झुका और गंगा ने फत्ते की गर्दन पर कलाई के दो रग्गे दिए। फत्ते अखाड़े की मिट्टी पर पसर गया। देखने वालों की गर्दनें दो इंच लंबी हो गईं। गंगा ने फुर्ती से फत्ते के कंधे के नीचे हाथ डाला और फत्ते को चित कर दिया। सारे जनसमुदाय में आश्चर्य और उल्लास की लहर दौड़ गई। राम अखाड़े के पट्ठों-पहलवानों ने गंगा को कंधे पर उठा लिया। किसी को ध्यान नहीं था कि अखाड़े में फत्ते पहलवान चित पड़ा उठने का नाम नहीं ले रहा है।

महंतजी ने कहा, ‘‘अरे भाई ! पहलवान फत्ते को उठाओ।’’
बैरागी लक्ष्मण दास लपके। फत्ते की गर्दन के पीछे हाथ डाल कहा, ‘‘पहलवान उठो’’ और चौंक गए, ‘‘अरे, यह तो मर गया !’’
एक क्षण में सारे मैदान में सन्नाटा छा गया। फिर कोलाहल !
‘फत्ते पहलवान अखाड़े में मर गए।’
‘फत्ते पहलवान को गंगा ने मारा डाला।’
‘गंगा के रग्गे से फत्ते पहलवान की गर्दन टूट गई।’
‘गंगा पहलवान के रग्गें से फत्ते पहलवान का दम निकल गया।’

वातावरण अजीब सनसनी से उत्तेजना से भर गया। फत्ते पहलवान की लाश को पुलिस ने कब्जे में ले लिया। रग्गे को हिरासत में। महंतजी दौड़े अंग्रेज कमिश्नर के पास परंतु कोई सुनवाई नहीं हुई। जब पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आई और उससे पता चला कि फत्ते पहलवान हृदयगति रुक जाने से मर गया तो गंगा को हिरासत से छोड़ा गया। परंतु तब तक गंगा पहलवान और पहलवान के रग्गे पूरे इलाके में चर्चा के विषय बन चुके थे और गंगा का नाम ‘रग्गे पहलवान’ चल चुका था। यह जाने कितने वर्ष पुरानी बात है। अब लोग यह भूल चुके हैं कि रग्गे पहलवान का असली नाम गंगाराम घोसी था। अब गंगाराम केवल रग्गे पहलवान के नाम से जाना जाता है।

रग्गे पहलवान ही राम अखाड़े के वास्तविक गुरु थे। राम अखाड़े के कितने पहलवान थे, यह पता तो दशहरे के उत्सवों में ही चलता था। जब शहर में सभी अखाड़ों के पट्ठे-पहलवान रामदल निकालते थे, तब राम अखाड़े के लड़के यानी पट्ठे-पहलवान रग्गे पहलवान के नेतृत्व में निकलते थे। उन दिनों रग्गे पहलवान सीटी बजाते हुए दल का नेतृत्व करते थे। उनके बादामी कोट पर रुपहले, सुनहरे मैडिल चमक रहे होते थे। वे एक ऐतिहासिक सेनापति की तरह चलते थे। रग्गे पहलवान अतीत में जीते थे। कहते थे-‘फत्ते की गर्दन तो पहले ही रग्गे में टूट गई थी। मैंने सोचा, कसर न रह जाए तो एक और लगा दिया।’

उनके शिष्य कहते-‘गुरु, हमें भी रग्गा लगाना सिखा दो।’
‘न भैया, न ! वो तो महंतजी ने उस जमाने में पानी की तरह रुपया बहाया और मुझे छुड़ा लिया; वरना मैं अभी भी जेल में सड़ रहा होता। मैं तुम्हारा गुरु हूँ, उस्ताद हूँ, दुश्मन नहीं कि तुम्हें जेल भेजने का इंतजाम कर दूँ। तुम्हें पहलवान बनाना है, हत्यारा नहीं।’
‘फिर आपने हत्या क्यों की ?’

‘मैंने हत्या नहीं की। दाँव की सच्चाई की परीक्षा कर रहा था। जब किसी के पास कोई हथियार होता है तो उस हथियार की ताकत की परीक्षा करने की बात जरूर मन में आती है। इसीलिए वह दाँव तुम्हें नहीं सिखा रहा हूँ।’
रग्गे उस्ताद जानते थे-ऐसा कोई दाँव न तो है और न वे जानते हैं; परंतु चेलों पर रुतबा कसने को-ऐसे ही डायलॉग बोला करते थे।

बसूला ब्रिगेड के सबसे ज्यादा उम्ररसीदा सदस्य रग्गे पहलवान ही थे, परंतु व्यवहार में वे सबसे कनिष्ठ सदस्य समझे जाते।
बसूला पुल के पश्चिम में भोपाल की ओर जाने वाली सड़क पर जानकीरमण का मंदिर है। जानकीरमण ट्रस्ट की भूमि की सीमा से लगी हुई गुरुसिंघ सभा की भूमि थी, जिस पर अब गुरुद्वारा बन गया है। उन दिनों गुरुद्वारे का भवन बनना शुरू हुआ था।

गुरुद्वारे के निर्माण के लिए सरदार सूरतसिंह सोढी, सरदार सोहनसिंह चावला, सरदार बरयामसिंह बेदी, सरदार जसवंतसिंह, सरदार माहनसिंह पन्नू, बाबू हरिशचन्द्र, बाबू रुपलाल टुटेजा, मथुरादास होरा आदि के साथ सारा पंजाबी समाज यानी सिक्ख और हिंदू तथा मुहल्ले के हरिजन तक उत्साह में थे। गुरुद्वारे का पक्का भवन काफी कुछ बन चुका था। एक ठिंगना, पर सुदृढ़ मांसपेशियों वाला साँवले रंग का नौजवान सिक्ख-निर्माण-कार्य का निरीक्षक बन गया था। उसे कप्तान कहते थे-कप्तानसिंह। उसे किसी ने चुना नहीं था, किसी ने नियुक्त नहीं किया था, उसने खुद कारोबार की बागडोर सँभाल ली थी।

कप्तानसिंह बसूला ब्रिगेड का दूसरा सदस्य था। वरीयता में उसका क्रम कौन-सा था कहना कठिन है। कभी-कभी वह पहला होता, कभी-कभी अंतिम। शारीरिक शक्ति में वह बसूला ब्रिगेड के सभी सदस्यों की तुलना में ज्यादा था।
बसूला पुल के दक्षिण को जो सड़क जाती है, वह गुलबिया गोदाम के पास शहर को रेलवे स्टेशन से जोड़ने वाली सड़क से संधि कर लेती है। बसूला पुल से दो सौ गज जाने पर बाएँ हाथ को एक टिन शेड है जिसमें देशी शराब की दुकान है।

 ठेकेदार बदलते रहते हैं परंतु देशी दारू की दुकान वहीं बनी रहती है। यों तो दिन-भर मयकश आते-जाते रहते हैं परंतु साँझ उतरते ही मयखाना आबाद होने लगता है। सड़क की दाहिनी ओर यानी शराब की दुकान के सामने सड़क की दूसरी बाजू पर रखे टपरों पर कढ़ाइयाँ चढ़ जाती हैं। पापड़, मुंगोड़ी, भजिए, कचौड़ी, समोसे और सेव तले जाने लगते हैं। सारा वातावरण पकते हुए खाद्य पदार्थ और दारु की मिली-जुली गंध से भर जाता है। मयकशों को आमंत्रण बाँटने लगता है। एक हथठेला पर अँगीठी रखे एक अंडे वाला आ जाता। अंडे उबाल कर, नमक और काली मिर्च के साथ बेचने लगता। लोग गए चौबे के बगीचे में नीम के झाड़ के नीचे टोलियों में बैठ जाते और गम गलत करने लगते। शराब की दुकान का नाम ‘दारू मंदिर’ प्रचलित था।

पुल का नाम बसूला पुल क्यों पड़ा-इस पर कई कहानियाँ जनश्रुतियों में रक्षित हैं। कहते हैं, पहले इस नाले पर कोई पुल नहीं था। यह बात सही ही होगी क्योंकि जहाँ-जहाँ जिस नदी-नाले पर आज पुल हैं, एक समय ऐसा भी था कि वहाँ कोई पुल नहीं था। नदी-नाले चौमासे-भर मार्ग अवरुद्ध कर देते थे। बरसात-भर आवागमन बंद रहता। कहते हैं, डेढ़-दो सौ साल पहले जब जानकीरमण मंदिर की नींव पड़ी थी तभी अयोध्या से आए महंत रामशरण दास ने इस स्थान पर एक सँकरा, लकड़ी और बाँसों का पुल बनवाया था। पुल के निर्माण में लगे मिस्तरी के पास एक बसूला ही था, कोई और औजार नहीं था। एक बसूले की मदद से उसने सँकरा-लकड़ी और बाँसों का पुल बनवाया था। फिर बहुत दिनों तक वह मिस्तरी इस पुल के पार उतरने वालों से एक कौड़ी उतराई वसूल करता रहा।

उत्तर के गाँवों से आने वाला कोई मुसाफिर या राही आता तो उसे पुल पर से गुजरने के पहले उत्तरी किनारे पर बैठे मिस्तरी के पुत्र को एक कौड़ी महसूल चुकाना पड़ता। पुल पार करने वाले के पुल पर चढ़ने के पहले ही मिस्तरी-पुत्र आवाज देता, ‘दद्दा बसूला’ फिर वाक्य छोटा हो गया, केवल ‘बसूला’ कहने से काम चलने लगा। अगर बेटा ने ‘बसूला’ कहकर आवाज नहीं दी, तो मिस्तरी समझ जाता कि महसूल चुकाया नहीं गया, और वह दक्षिण किनारे पर पुल के ढाँचे को हिलाने लगता। पूरा पुल भूकंपग्रस्त जमीन की तरह काँपने लगता और राही भयभीत हो जाता। कभी-कभी तो कोई राही नाले में गिर पड़ता। इसलिए पुल पार करने के पहले महसूल चुका देने में ही भलाई समझी जाने लगी। जब तक मिस्तरी जिंदा रहा, महसूल वसूल करने का यह काम चला। फिर बंद हो गया, परंतु पुल का नाम वसूला पुल हो गया। बिगड़कर बाद में बसूला पुल।

बहुत बाद में जब सागर में अंग्रेजों ने छावनी स्थापित की तब लकड़ी के जर्जर पुल के स्थान पर चूने से पत्थरों की जुड़ाई करके यह तीन बड़े महराबों वाला पुल बनाया गया; परंतु इसका नाम भी बसूला पुल ही प्रचलित रहा।
अब तो बसूला पुल के दोनों ओर-चारों सड़कों पर-छोटा-मोटा बाजार बन गया है। मोटर-ट्रक, मोटर-कार, मोटर-साइकल सुधारने वालों, बेल्डिंग करने वालों, वल्कनाइजिंग वालों की दुकानें चाय के टपरे पान के ठेले, छोटी होटलें कपड़े के छोटे व्यापारी और अनेक प्रकार के व्यवसायियों ने दुकानें खोल ली हैं। रिहायशी इलाकों के सड़क किनारे के मकान दुकानों में बदल गए हैं।




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