द्रष्टव्य जगत का यथार्थ - भाग 1 - ओम प्रकाश पांडेय Drastavya Jagat Ka Yathartha - Part 1 - Hindi book by - Om Prakash Pandey
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द्रष्टव्य जगत का यथार्थ - भाग 1

ओम प्रकाश पांडेय

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :287
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2684
आईएसबीएन :81-7315-524-0

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प्रस्तुत है भारत की कालजयी संस्कृति की निरंतता एवं उसकी पृष्ठभूमि....

Drashtavya Jagat Ka Yatharth-1

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘दृष्टव्य जगत का यथार्थ’ नामक ग्रंथ दो खण्डों में प्रस्तुत किया जा रहा है। इनमें पूर्ववर्ती रचनाकारों की श्रृंखला की एक नवीन कड़ी के रूप में सँजोने के साथ साथ इनमें उल्लिखित प्राचीन संदर्भों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में परिभाषित करने का यथासंभव प्रयत्न किया गया है। यथार्थ का तात्पर्य दृष्टि-सापेक्ष वास्तविकताओं से होता है।
‘दृष्टव्य जगत का यथार्थ’ एक अद्भुत एवं विलक्षण उपक्रम है। पुरातन साहित्य, के विस्तृत कानन में प्रविष्ट होकर विद्वान लेखक ने संदर्भों को जोड़ने एवं उनकी व्याख्या करने में अपनी प्रतिभा का प्रमाण प्रस्तुत किया है।

प्रस्तुत ग्रन्थ ‘दृष्टव्य जगत का यथार्थ’ भारत की कालजयी संस्कृति की निरंतरता एवं उसकी पृष्ठभूमि का अभिनव वेदांत है। इसकी पृष्ठभूमि में और उसकी व्याख्याओं में एक चमत्कार है, एक सम्मोहन है, एक सदाचेतन अंतर्धारा है, जो हमारे भारतीय उत्स को अभिसिंचित करते हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ में समाविष्ट भारतीय साहित्य दर्शन, पुराण, परम्परा, भूगोल, इतिहास एवं संस्कृत के अगणित संदर्भ और प्रमाण विश्वकोश की तरह ही हैं।
चूँकि योग्यतम ही जीवन संग्राम में बचा रह पाता है, अतः आपके अन्दर का स्वत्व यदि इस पुस्तक के पढ़ने से जाग्रत हो सके तो लेखक का यह सत्प्रयास सफल हो जायेगा। ‘दृष्टव्य जगत् का यथार्थ’ अपने तरह का सर्वथा, ज्ञानपरक, खोजपरक एवं संग्रहणीय ग्रन्थ है।

आमुख


मनुष्य एक विचारशील प्राणी है, अत: उसके मन में, जिस सृष्टि में वह रहता है, उसके आदि काल से अब तक की घटनाओं के संबंध में अनेक प्रश्न उठते हैं। भारत में भी ऋषियों ने वेदों, उपनिषदों पुराणों, महाकाव्यों आदि के द्वारा सृष्टि के आरंभ से ही मानव के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विकास-क्रम को चित्रित करने का प्रयास किया है।
प्रस्तुत पुस्तक ‘द्रष्टव्य जगत् का यथार्थ’ के लेखक श्री ओम प्रकाश पांडेय ने भारतीय ऋषियों द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों और दैवी, प्राकृतिक और सांस्कृतिक घटना-क्रम के विवरणों का विश्व के अन्य मनीषियों तथा आधुनिक वैज्ञानिकों के विचारों के साथ तुलनात्मक विवेचन किया है।

विद्वान लेखक ने इस पुस्तक में वर्णित विषयवस्तु के बृहद चित्रपट पर अध्ययनपूर्ण तथ्य प्रस्तुत किए हैं और विभिन्न विचारों का विश्लेषण किया है, जो दर्शन एवं संस्कृति के पाठकों को ज्ञानवर्धक और रोचक प्रतीत होंगे।

नवरात्र संवत्-2060
नई दिल्ली-110021

कर्ण सिंह

प्राक्कथन


अब यह बात सर्वमान्य और सर्वविदित है कि हमारी पृथ्वी सौरमंडल का एक हिस्सा है और वह अपनी धुरी पर चार मिनट प्रति अंश की गति से घूमती हुई सूर्य की परिक्रमा करती है तथा इस परिक्रमा में उसे एक साल (365 दिन, 5 घंटा, 48 मिनट और 45.51 सेकंड) लगता है। हमें यह भी पता है कि सौरमंडल का कौन सा ग्रह कितनी दूरी पर है, इसका व्यास क्या है और उस तक पहुँचने में किस गति से कितना समय लग सकता है। पूरे सौरमंडल को एक किनारे से दूसरे किनारे तक दौड़कर पार करना हो तो प्रकाश की गति, यानी एक लाख छियासी हजार दो सौ बयासी मील प्रति सेकंड की रफ्तार से दौड़ने पर लगभग दो वर्ष का समय लगेगा। गति-सीमा और गंतव्य को माप सकने की जो इकाई अब तक सबसे अधिक तेज मानी जाती थी, वह थी प्रकाशगति (रोशनी के पहुँचने की रफ्तार) अब उससे तीन सौ गुना अधिक तेज चलने वाली इकाई को न्यूजर्सी के लिजन वांग नामक अनुसंधानकर्ता ने खोज निकाला है, जिसे ‘लाइट पल्स’ यानी ‘प्रकाश-तरंगों की गति’ कहते हैं। यह खोज जुलाई 2000 में प्रकाश में आई है।

इस खोज से जो दूरी ‘प्रकाशवर्ष’ में पढ़ी और समझी जाती थी, अब वह ‘प्रकाश तरंग गति’ से कुछ घंटों में आकर सिमट गई है। ये सारे रहस्य हमारी पारंपरिक और अत्याधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान-संपदा के लगातार हुए विश्लेषणों के जरिए खुल सके हैं और खुलते जा रहे हैं। इस तरह हम ‘द्रष्टव्य जगत् का यथार्थ’ समझ सकने में सक्षम हो रहे हैं। हमारी यह ज्ञान-राशि इतनी अधिक बिखरी हुई है कि उसको किसी एक जगह संचित किए बिना किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सकता। ‘ऋग्वेद’ का कथन ‘एकम् सदविप्रा बहुधा वदन्ति’ केवल दार्शनिक चिंतन और आत्मा-परमात्मा संबंधी सत्यों के बारे में ही नहीं, सृष्टि के तमाम रहस्यों, ब्रह्मांड की विभिन्न स्थितियों जैविक-प्रस्फुटन की तमाम गूढ़ताओं, मानवीय प्रजातियों के क्रमिक विकास, भाषा और लिपियों के संस्कार और यहां तक कि प्रलय की उद्भावनाओं तक सच साबित होता है।

लेकिन इसे सच साबित करने के लिए जिस विलक्षण प्रतिभा और अथक् श्रम का परिचय देना पड़ता है, वह आज दुर्लभ हो गया है। श्री ओम प्रकाश पांडेय के ग्रंथ ‘द्रष्टव्य जगत् का यथार्थ’ में वह सब समाहित दिखता है। यह ग्रंथ एक ऐसा विश्वकोश है, जिसमें वेदों, उपनिषदों संहिताओं, ब्राह्मण ग्रंथों और अगणित संस्कृत संदर्भ ग्रंथों का निचोड़ तो है ही, विभिन्न अनुसंधान-ग्रंथों शोध-पत्रों, इतिहास, भूगोल, साहित्य और दर्शन के साक्ष्यों का समुच्चय है। हमारे लोकमानस में व्याप्त तमाम अनुभूतियों का उत्स कितना सघन साक्ष्य-संपन्न और प्रामाणिक है-यह श्री पांडेय के इस शोधग्रंथ से सिद्ध हो जाता है। श्री पांडेय का संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं पर समान अधिकार उनके इस महत्त्वपूर्ण शोधग्रंथ का मूलाधार है जिसके जरिए वैदिक ऋचाओं में बिंधा हुआ रहस्य भी वे सामने ला सके हैं तो अंग्रेजी के माध्यम से उस दिशा में किए गए वैश्विक चिंतन और निष्कर्षों के आईने में भारतीय ऋषि-मुनियों और मनीषियों के चिंतन-मनन को परखकर उसकी प्रामाणिकता भी प्रदर्शित कर सके हैं।

श्री पांडेय की प्रतिभा विलक्षण रूप में तब हमारे सामने आती है, जब वे वैदिक उद्भावनाओं को वैज्ञानिक अनुसंधानों के साँचे में ढालकर देखते हुए हमारे सामने उस सत्य की प्रामाणिकता को ला खड़ा करते हैं। इसी क्रम में वे उन तमाम शब्दों के रहस्य खोल देते हैं, जिन्हें हम सुनते तो अनंत काल से आ रहे हैं, लेकिन उनके पीछे का अर्थ और उस अर्थ का आधार व्यथा, यह नहीं जानते। उदाहरणत: हमने बचपन में ही सुन रखा था कि ज्योतिब्रह्म और नादब्रह्म आलंकारिक विशेषण हैं शब्द की अभ्यर्थना के, लेकिन यह समझने में असमर्थ थे कि मेघों के आपसी घर्षण से नि:सृत विद्युत और गर्जना, यानी ऊर्जा और नाद-दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं और सृष्टि निर्माण में दोनों की सहभागिता स्पष्ट रूप से प्रमाणित है। और दोनों की उत्पत्ति परम ब्रह्म से है। अत: ब्रह्मज्योति और ब्रह्मनाद एक ही शक्ति की अभिव्यक्ति के दो भिन्न रूप हैं, ‘बहुधा वदन्ति’ का एक उदाहरण। ऐसे रहस्यों को समझा सकने के लिए सहज क्रमिकता की आवश्यकता होती है, उसका सहज उपयोग श्री ओम प्रकाश पांडेय के इस ग्रंथ में मिलता है। जिस दिशा में भी वे बढ़े, उसे अद्यावधि मान्यताओं तक पहुंचाया। कालगणना के प्राचीन सिद्धान्तों का विश्लेषण करते हुए वे निमेष (0.27 सेकंड), क्षण (0.51 सेकंड), घटिका (24 मिनट), प्रहर (तीन घंटा) जैसी इकाइयों से पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वर्ष, युग, मन्वंतर व कल्प प्रमाण तक पहुँचते हैं और मानवी सभ्यताओं में प्रचलित संवत्सरों का ब्योरा प्रस्तुत करते हैं। प्रलय पर दृष्टि-प्रक्षेप करते हैं तो प्रलय की मान्यताओं का उल्था करते हुए उसके विभिन्न रूपों-ब्राह्म प्रलय (Universal dissolution), नैमित्तिक प्रलय (Solar-disannul), युगांतर प्रलय (External/Internal collision), नित्य प्रलय (Periodical catastrophe), लघु प्रलय (Routine disaster), जल प्लावन (Deluge) व गैसों से पड़नेवाले प्रभाव (Global warming and Green house effect) को जाँचते हुए भारत की स्थितियों तक से हमारा परिचय कराते है। पितरों और ब्रह्मा के मानस पुत्रों की खोज करते हुए उनके और पुत्रों और वंशजों का ब्योरा देते हैं और नारायण वंश की पटाक्षेप क्यों और कैसे हुआ, इसकी जानकारी देते हैं।

हिंदी में ऐसे विद्वान अध्येताओं की अब कमी होती जा रही है, वह वंश-परंपरा विरल हो गई है। श्री ओम प्रकाश पांडेय ने अपने इस ग्रंथ से यह प्रमाणित किया है कि वह परंपरा समाप्तप्राय भले मानी जाए, समाप्त नहीं हुई।
इस अनूठे और विरल ग्रंथ का हिंदी में प्रकाशन इस धारणा को भी पुष्ट करेगा कि अद्यतन जटिल वैज्ञानिक अवधारणाओं को व्यक्त करने में भी हमारी भाषा की क्षमता अद्वितीय है।
इस अध्ययनपूर्ण शोधग्रंथ से जो ज्ञानवर्धक और रोचक सामग्री हमारे सामने आई है, उसे हिंदी संसार खुली बाँहों से स्वागत करेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

132, कैलाश हिल्स
नई दिल्ली-110065

-पद्मश्री डॉ. कन्हैयालाल नंदन



निवेदन



भौतिक संपन्नता के आधुनिक परिवेश में आवश्यक स्तर (Status Symbol) को बनाए रखने की बाध्यताओं के चलते हम प्राय: धनार्जन की एकाग्रता में इतने निमग्न हो जाते हैं कि इसके नैतिक व अनैतिक पक्षों का भी हमें भान नहीं रह पाता है। इन स्वार्थजनित कारणों से मानवीय मूल्यों व शुचिताओं के प्रति बरती गई उदासीनताओं के परिणामस्वरूप हमारा जीवन भी शनै:शनै: नीरस व यंत्रवत् ही बनता चला जा रहा है लौकिक भोगों के लिए धनार्जन एक अनिवार्य आवश्यकता है और इससे विमुख होकर हम अपने दायित्वों का निर्वहण कदापि नहीं कर सकते।

ऐसी स्थिति में धनोपार्जन से संबंधित कर्तव्यों का पूर्ण मनोयोग से पालन तो अवश्य करना चाहिए किंतु इसके साथ ही अर्थ-लिप्सा से बचने के लिए अनासक्ति की मर्यादाओं का भी ध्यान रखना चाहिए, ताकि दूसरों के हितों की उपेक्षा या उनके प्राप्य के शोषण की संभावनाएं न्यूनाधिक ही बनी रहें। ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मागृध: कस्य स्विद्धनम्’ का यह बोध हमें संस्कारों द्वारा ही प्राप्त हो जाता है। संस्कार मूलत: परंपराओं की कोश से ही प्रसूत होते हैं और परंपराएँ अपनी प्रकृति के अनुरूप पूर्वग्रहों से कदाचित् ही मुक्त रह पाती हैं। देश-काल की परिस्थितियों के अनुसार पूर्वग्रहों के प्रति पनपी आसक्ति का स्वाभाविक उद्वेग ही हमारे अहं का कारण बनता है और अहंजनित भ्रांतियों की मरीचिकाएँ ही हमें हमारे मूल गंतव्य से विचलित कर संकीर्णता की ईर्ष्यालु पगडंडी पर एकाकी बढ़ने के लिए आकर्षित करती हैं। ईर्ष्या के पथ को अपनाने के कारण हमारे सारे लोकाचार स्वकेन्द्रित हो जाते हैं और इस एकांग-घात के परिणामस्वरूप अंतत: हमारी समरसताएँ व संस्कार भी रुग्ण होने लगते हैं। संभवत: इस रोग का ही प्रभाव है कि वैश्वीकरण (Globalisation) का जोर-शोर से ढिंढोरा पीटनेवाले महानगरीय परिवेशों में आश्चर्यजनक रूप से परिवार का आशय मात्र पति-पत्नी तक में ही सीमित होकर रह गया है।

चार्वाक तथा उससे पहले की देवयुगीन सभ्यताओं में हमें कुछ इससे भी बीभत्स संक्रमणों से जूझना पड़ा था। ‘यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्’ की एकालापता पर आधारित उस स्वार्थी जीवनचर्या के गरल को पचाने में भावी पीढ़ियों को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था, इतिहास-पुराण इसके साक्षी हैं। येन-येन प्रकारेण आधुनिकता के सतही प्रलोभनों के चलते हम पुन: उन्हीं मनोवृत्तियों की ओर ही धीरे-धीरे आकृष्ट होते जा रहे हैं। इससे पहले कि हम आत्मघाती प्रवृत्ति के कराल चंगुल में फँस जाएँ, हमें संकीर्णता के सम्मोहनों से अपने को मुक्त करना पड़ेगा। संकीर्णता से मुक्ति के लिए सर्वप्रथम हमें अपनी अहंपोषित मान्यताओं का विसर्जन करना पड़ेगा और इसके लिए संयम, संकल्प व सचेतनता की आवश्यकता होती है। अहं-शून्यता के द्वारा ही हमारे अंतस में श्रद्धा का पवित्र भाव पनपता है और इस पवित्रता की ऊष्मा से हमारे अंत:करण में जो ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित होती है (श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्), उसी के आलोक में हम यथार्थ का सहज दर्शन करने व तदनुसार भ्रांतियों से मुक्त वास्तविक जीवन का आनंद-लाभ करने में समर्थ हो पाते हैं। यहाँ यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ सकता है कि जब संपूर्ण विश्व ही आधुनिकता के प्रवाह में बहा जा रहा है तब धारा के विपरीत रहकर हम अपने अस्तित्व को किस तरह बचा पाएँगे ?

ऐसी स्थिति में जब सर्वत्र बयार बह रही हो तब हम अपने वातायन को बंद कर घुटन को तो आमंत्रित नहीं कर सकते लेकिन यही बयार जब आँधी का स्वरूप धारण कर हमें हमारे घर से भी बाहर उड़ा देने को उद्यत दिखे तब हमें अपनी सुरक्षा के लिए किसी मजबूत खंभे या आड़ का सहारा तो लेना ही पड़ेगा। अतीत के यथार्थ ही वे खंभे हैं, जो अस्तित्व विहीनता के संकट से बचाते हुए हमारे दृष्टिकोण को विराटत्व से परिपूर्ण कर देते हैं। विराटत्व की यह अनुभूति ही हमारे अंतस में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की शुद्ध चेतना को जाग्रत कर हमें ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ की दायित्वपूर्ण जीवनचर्या अपनाने की शक्ति प्रदान करती है।



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